Thursday, March 16, 2023

गीता का "भारत" को संदेश :

नियोजयसि केशव!

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अर्जुन उवाच --

ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।।

तत्किं कर्म घोरे मां नियोजयसि केशव।।१।।

श्रीमद्भगवद्गीता के तीसरे अध्याय का प्रारंभ ही इस जिज्ञासा से होता है।

जिसका अंतिम उत्तर भगवान् श्रीकृष्ण ग्रन्थ के अंतिम अध्याय १८ के अंत में इस प्रकार से देते हैं --

भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः।।

ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्।।५५।।

सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः।।

मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्।।५६।।

चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः।।

बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव।।५७।।

मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।।

अथ चेत्त्वहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि।।५८।।

और अर्जुन के द्वारा पूछे गए त्रुटिपूर्ण प्रश्न को सुधारकर उसका उत्तर भगवान् श्रीकृष्ण इस प्रकार से देते हैं --

यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।।

मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति।।५९।।

यस्मात् च --

स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा।।

कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्।।६०।।

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।।

भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।।६१।।

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।।

तत्प्रसादात् परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।।६२।।

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।।

विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु।।६३।।

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