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Saturday, July 24, 2021

तान्यहं और तानहं

गीता में 'अहं' पद का प्रयोग 

***

अध्याय 4 -श्लोक 5, 

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।

तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप ।।

(4/5)

अध्याय 16, -श्लोक 19,

तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् ।

क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ।।

(16/19)

***

इस पोस्ट का सन्दर्भ कल के मेरे द्वारा अपने  vinaysv  blog  में लिखे गए पोस्ट 

~~कर्पूरगौरं~~

से है। 

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जो पुरुष अपने आत्म-स्वरूप से अभिज्ञ होता है, वह अपने तथा दूसरों के भी इन असंख्य आभासी जन्म-मृत्यु आदि को जानते हुए, अपनी अविनाशी आत्मा के जन्म तथा मृत्यु से रहित होने के सत्य से भी अवगत होता है । जबकि वह मनुष्य, जो अपने आपको जन्म लेनेवाला तथा मरणशील मानता है, वह अपनी इस निज आत्मा की अविनाशिता से अपरिचित रह जाता है।  

-- 

जो पुरुष अपने अन्तर्हृदय में नित्य विद्यमान भगवत्सत्ता अर्थात्  भगवत्ता की उपेक्षा जाने-अनजाने, मोह या अज्ञानवश करते हुए, उस परमात्मा से द्वेष करते हैं, और उसका इस प्रकार तिरस्कार करते हैं, उनका वही निज आत्म-स्वरूप परमेश्वर उन्हें पुनः पुनः सतत आसुरी योनियों में जन्म लेने के लिए बाध्य करता है।

***



Friday, August 30, 2019

आसुरीम्, आस्तिक्यम्, आस्ते

श्रीमद्भगवद्गीता
शब्दानुक्रम -Index  
--
आसुरीम् 9/12, 16/4, 16/20,
आस्तिक्यम् 18/42,
आस्ते 3/6, 5/13,
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Thursday, August 29, 2019

आपन्नम्, आपन्नाः, आपः

श्रीमद्भगवद्गीता
शब्दानुक्रम -Index 
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आपन्नम् 7/24,
आपन्नाः 16/20,
आपः 2/23, 2/70, 7/4,
--           

Saturday, August 10, 2019

अप्राप्य, अप्रियम्, अप्सु

श्रीमद्भगवद्गीता
शब्दानुक्रम -Index
--
अप्राप्य 6/37,  9/3, 16/20,    
अप्रियम् 5/20, 
अप्सु 7/8,
--   

Thursday, October 2, 2014

आज का श्लोक, ’योनिम्’ / ’yonim’

आज का श्लोक, ’योनिम्’ / ’yonim’
___________________________

’योनिम्’ / ’yonim’ - गर्भ को,

अध्याय 16, श्लोक 20,

आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिं ॥
--
(आसुरीम् योनिम् आपन्नाः मूढाः जन्मनि जन्मनि ।
माम् अप्राप्य एव कौन्तेय ततः यान्ति अधमाम् गतिम् ॥)
--
भावार्थ :
वे मूढ, जन्म-जन्म में आसुरी योनि को ही प्राप्त होते हैं, अर्थात् आसुरी गर्भ से जन्म लेते हैं । वे मुझे नहीं प्राप्त होते, और हे कौन्तेय (अर्जुन) ! इसलिए वे अधम गति को ही प्राप्त हो जाते हैं
--

’योनिम्’ / ’yonim’ - through the womb of,

Chapter 16, śloka 20,

āsurīṃ yonimāpannā
mūḍhā janmani janmani |
māmaprāpyaiva kaunteya
tato yāntyadhamāṃ gatiṃ ||
--
(āsurīm yonim āpannāḥ
mūḍhāḥ janmani janmani |
mām aprāpya eva kaunteya
tataḥ yānti adhamām gatim ||)
--
Meaning :
Birth after birth, those dull-witted enter and are born in the evil wombs (āsurī yoni), and so, instead of attaining ME, keep going  to inferior and lower planes of existence.    
--

Sunday, September 28, 2014

16/20,

आज का श्लोक,
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अध्याय 16, श्लोक 20,

आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिं ॥
--
(आसुरीम् योनिम् आपन्नाः मूढाः जन्मनि जन्मनि ।
माम् अप्राप्य एव कौन्तेय ततः यान्ति अधमाम् गतिम् ॥)
--
भावार्थ :
वे मूढ, जन्म-जन्म में आसुरी योनि को ही प्राप्त होते हैं, अर्थात् आसुरी गर्भ से जन्म लेते हैं । वे मुझे नहीं प्राप्त होते, और हे कौन्तेय (अर्जुन) ! इसलिए वे अधम गति को ही प्राप्त हो जाते हैं
--
Chapter 16, śloka 20,

āsurīṃ yonimāpannā
mūḍhā janmani janmani |
māmaprāpyaiva kaunteya
tato yāntyadhamāṃ gatiṃ ||
--
(āsurīm yonim āpannāḥ
mūḍhāḥ janmani janmani |
mām aprāpya eva kaunteya
tataḥ yānti adhamām gatim ||)
--
Meaning :
Birth after birth, those dull-witted enter and are born in the evil wombs (āsurī yoni), and so, instead of attaining ME, keep going to inferior and lower planes of existence.    
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