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Tuesday, June 17, 2014

आज का श्लोक, ’सर्वारम्भपरित्यागी’ / ’sarvārambhaparityāgī’

आज का श्लोक,
’सर्वारम्भपरित्यागी’ / ’sarvārambhaparityāgī’
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’सर्वारम्भपरित्यागी’ / ’sarvārambhaparityāgī’- जो कर्तृत्व-बुद्धि रूपी भ्रम से मुक्त हो चुका है ।

अध्याय 12, श्लोक 16,

अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥
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(अनपेक्षः शुचिः दक्षः उदासीनः गतव्यथः ।
सर्व-आरम्भ-परित्यागी यः मद्भक्तः सः मे प्रियः ॥)
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भावार्थ :
जो किसी भी आकाङ्क्षा से रहित, बाहर-भीतर की शुद्धता के प्रति सजग, पक्षपात से रहित है, जिसकी व्यथाएँ विलीन हो चुकी हैं, जो कर्तृत्व ('मैं कर्ता हूँ' - इस प्रकार की) बुद्धि / आग्रह से ग्रस्त नहीं है, ऐसा मेरा भक्त, मुझे प्रिय है ।
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अध्याय 14, श्लोक 25,

मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥
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(मान-अपमानयोः तुल्यः तुल्यः मित्र-अरि-पक्षयोः ।
सर्व-आरम्भ-परित्यागी गुणातीतः सः उच्यते ॥)
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भावार्थ :
जो मान और अपमान होने की स्थिति में समान रूप से अविचलित है, और इसी प्रकार से मित्रों और शत्रुओं के साथ भी समभाव से स्थित है, सम्पूर्ण कर्मों के प्रारम्भ से ही कर्तृत्व के अभिमान ( ’मैं कर्ता हूँ’, -इस भावना) से रहित है, वह गुणों से अतीत कहा जाता है ।
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’सर्वारम्भपरित्यागी’ / ’sarvārambhaparityāgī’- One who is free from the illusion : 'I do' / 'I don't do',

Chapter 12, śloka 16,

anapekṣaḥ śucirdakṣa
udāsīno gatavyathaḥ |
sarvārambhaparityāgī 
yo madbhaktaḥ sa me priyaḥ ||
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(anapekṣaḥ śuciḥ dakṣaḥ
udāsīnaḥ gatavyathaḥ |
sarva-ārambha-parityāgī 
yaḥ madbhaktaḥ saḥ me priyaḥ ||)
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Meaning :
One who expects nothing, pure and clean in life, heart and mind, careful, unattached, has overcome misery, takes no initiative in any enterprise (since has got rid of the sense, 'I do, and actions are done by me'.), such a devotee is beloved to Me.
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Chapter 14, śloka 25,

mānāpamānayostulyas-
tulyo mitrāripakṣayoḥ |
sarvārambhaparityāgī 
guṇātītaḥ sa ucyate ||
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(māna-apamānayoḥ tulyaḥ
tulyaḥ mitra-ari-pakṣayoḥ |
sarva-ārambha-parityāgī 
guṇātītaḥ saḥ ucyate ||)
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Meaning :
One who is unaffected and same in honor and dishonor, who is unaffected and same in friends and enemies, and one who from the very beginning of an action has given up the sense ; 'I do / I don't do', is said to have transcended the three guṇas / (attributes).
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Thursday, April 24, 2014

आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (14),

आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (14),
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’सः’ / ’saḥ’  - वह,

अध्याय 14, श्लोक 19,

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥
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(न अन्यम् गुणेभ्यः कर्तारम् यदा द्रष्ट अनुपश्यति ।
गुणेभ्यः च परं वेत्ति मद्भावम् सः अधिगच्छति ॥)
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भावार्थ :
जब मनुष्य समष्टि चेतन में एकीभाव से स्थित हो जाता है, अर्थात् मन, बुद्धि, स्मृति और ’मैं’-भावना से नितांत अछूता होकर देखता है कि गुणों के सिवा दूसरा कुछ नहीं है जिसे ’कर्ता’ कहा जा सके, तब वह उन गुणों से परे अवस्थित मेरे (अपने-आपके) स्वरूप को जान लेता है और उसमें अधिष्ठित हो जाता है ।
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अध्याय 14, श्लोक 25,

मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः उच्यते ॥
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(मान-अपमानयोः तुल्यः तुल्यः मित्र-अरि-पक्षयोः ।
सर्व-आरम्भ-परित्यागी गुणातीतः सः उच्यते ॥)
--
भावार्थ :
जो मान और अपमान होने की स्थिति में समान रूप से अविचलित है, और इसी प्रकार से मित्रों और शत्रुओं के साथ भी समभाव से स्थित है, सम्पूर्ण कर्मों के प्रारम्भ से ही कर्तृत्व के अभिमान ( ’मैं कर्ता हूँ’, -इस भावना) से रहित है, वह गुणों से अतीत कहा जाता है ।
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अध्याय 14, श्लोक 26,

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।
गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥
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(माम् च यः अव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।
सः गुणान् समतीत्य- एतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥)
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और जो मनुष्य विशुद्ध निष्ठापूर्वक भक्तियोगसहित मेरी सेवा (उपासना) करता है, वह इन तीनों गुणों को भलीभाँति लाँघकर, इनसे पार हुआ, सच्चिदाननद ब्रह्म से एकीभूत हो जाता है ।
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’सः’ / ’saḥ’ - He,

Chapter 14, shloka 19,
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nānyaṃ guṇebhyaḥ kartāraṃ
yadā draṣṭānupaśyati |
guṇebhyaśca paraṃ vetti
madbhāvaṃ so:'dhigacchati ||
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(na anyam guṇebhyaḥ kartāram
yadā draṣṭa anupaśyati |
guṇebhyaḥ ca paraṃ vetti
madbhāvam saḥ adhigacchati ||)
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Meaning :
When one is able to see that there are these three guṇa only and nothing else that could be termed the agent (responsible for all actions), and then looks beyond them and finds out and knows the Supreme, he knows Me and attains to Me, My Real Form.
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Chapter 14, shloka 25,
mānāpamānayostulyas-
tulyo mitrāripakṣayoḥ |
sarvārambhaparityāgī
guṇātītaḥ sa ucyate ||
--
(māna-apamānayoḥ tulyaḥ
tulyaḥ mitra-ari-pakṣayoḥ |
sarva-ārambha-parityāgī
guṇātītaḥ saḥ ucyate ||)
--
Meaning :
One who is unaffected and same in honor and dishonor, who is unaffected and same in friends and enemies, and one who from the very begining of an action has given up the sense ; 'I do / I don't do', is said to have transcended the three guṇas . (attributes).


Chapter 14, shloka 26,

māṃ ca yo:'vyabhicāreṇa
bhaktiyogena sevate |
sa guṇānsamatītyaitān-
brahmabhūyāya kalpate ||
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(mām ca yaḥ avyabhicāreṇa
bhaktiyogena sevate |
saḥ guṇān samatītya- etān
brahmabhūyāya kalpate ||)

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Meaning :
One who serves / attends to Me with uncontaminated devotion transcends these three attributes (guṇas) and is unified with Brahman (Me).
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