Wednesday, April 30, 2014

आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (1)

आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (1)
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’सः’ / 'saḥ' - वह (पुल्लिंग)

अध्याय 1, श्लोक 13,

ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
सहसैवाभ्यहन्यन्त शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥
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(ततः शङ्खाः च भेर्यः च पणवानक-गोमुखाः ।
सहसा एव अभ्यहन्यन्त सः शब्दः तुमुलः अभवत् ॥)
--
भावार्थ :
तब शंख एवं रणभेरियाँ, ढोल और दुंदुभियाँ, अकस्मात् ही बज उठे, और उनसे तुमुल घोर शब्द उत्पन्न हुआ  ।
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अध्याय 1, श्लोक 19,

घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत् ।
नभश्च पृथिवी चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ॥
--
(सः घोषः धार्तराष्ट्राणाम् हृदयानि व्यदारयत् ।
नभः च पृथिवीम् च एव तुमुलः व्यनुनादयन् ॥)
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भावार्थ :
युद्ध प्रारंभ करने के संकेत के लिए पांडव सेनानियों और श्रीकृष्ण द्वारा किए गए अनेक शंखों की तुमुल ध्वनि से धरती और आकाश हिल उठे और धृतराष्ट्रपुत्रों के हृदय दहल उठे।
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अध्याय 1, श्लोक 27,

श्वसुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
तान्समीक्ष्य कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ॥
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श्वसुरान् सुहृदः च एव सेनयोः उभयोः अपि ।
तान् समीक्ष्य सः कौन्तेयः सर्वान् बन्धून् अवस्थितान् ॥)
--
भावार्थ :
श्वसुरों को, सुहृदों को, दोनों ही सेनाओं में अवस्थित अपने सारे बन्धुओं को देखकर वह कुन्तीपुत्र अर्जुन,....
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’सः’ / 'saḥ' - He,

Chapter 1, shloka 13,

tataḥ śaṅkhāśca bheryaśca
paṇavānakagomukhāḥ |
sahasaivābhyahanyanta
sa śabdastumulo:'bhavat ||
--
(tataḥ śaṅkhāḥ ca bheryaḥ ca
paṇavānaka-gomukhāḥ |
sahasā eva abhyahanyanta
saḥ śabdaḥ tumulaḥ abhavat ||)
--
Meaning :
All of a sudden, conchs, kettledrums, tabors, drums and blared forth causing a tumultuous sound.
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Chapter 1, shloka 19,

sa ghoṣo dhārtarāṣṭrāṇāṃ
hṛdayāni vyadārayat |
nabhaśca pṛthivī caiva
tumulo* vyanunādayan ||
--
(saḥ ghoṣaḥ dhārtarāṣṭrāṇām
hṛdayāni vyadārayat |
nabhaḥ ca pṛthivīm ca eva
tumulaḥ vyanunādayan ||)
--
Meaning :
The tumultuous* sound of the conchs blown by śrīkṛṣṇa, shrikRShNa and by the army of the pāṇḍava(s), tore apart the heavens and the earth and rent the hearts of the sons of dhṛtarāṣṭra .
.
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(*the 'tumula' in Sanskrit and 'tumultuous' in English! having the same meaning and similar pronunciation but 'tumula' has an etymology it is also similar to another word 'tamil' meaning deep and loud, though the language 'Tamil' has yet another etymology)
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Chapter 1, shloka 27,

śvasurānsuhṛdaścaiva
senayorubhayorapi |
tānsamīkṣya sa kaunteyaḥ
sarvānbandhūnavasthitān ||
--
śvasurān suhṛdaḥ ca eva
senayoḥ ubhayoḥ api |
tān samīkṣya saḥ kaunteyaḥ
sarvān bandhūn avasthitān ||)
--
Meaning :
(He, - arjuna saw there,) his fathers-in-law,  dear-ones and well-wishers, standing before him in both the armies. And Having seen them all his brethren, ...
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आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (2)

आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (2)
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’सः’ / ’saḥ’ - वह,

अध्याय 2, श्लोक 15,

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥
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(यम् हि न व्यथयन्ति एते पुरुषम् पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखम् धीरम् सः अमृतत्वाय कल्पते ॥)
--
भावार्थ :
हे पुरुषश्रेष्ठ (अर्जुन)! जिस मनुष्य को (इन्द्रियाँ और विषयों से उनका संयोग) ये दोनों  व्याकुल नहीं कर पाते, जो सुख और दुःख का सामना समान धैर्य के साथ कर लेता है, वह अवश्य ही अमृतत्व की प्राप्ति का भागी होता है ।
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अध्याय 2, श्लोक 21,

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययं ।
कथं पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कं ॥
--
(वेद अविनाशिनम् नित्यम् यः एनम् अजम् अव्ययम् ।
कथम् सः पुरुषः पार्थ कम् घातयति हन्ति कम् ॥)
--
भावार्थ :
जो पुरुष इस अविनाशी, अजन्मा आत्मा को अनश्वर जानता है, हे पृथापुत्र(अर्जुन)! वह किसे मार सकता है और उसके लिए किसे किसी के माध्यम से मारा जाना भी संभव है?
--    
अध्याय 2, श्लोक 70,

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत् ।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥
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(आपूर्यमाणम्-अचलप्रतिष्ठम्
समुद्रम् आपः प्रविशन्ति यद्वत् ।
तद्वत् कामाः यम् प्रविशन्ति सर्वे
सः शान्तिम् आप्नोति न कामकामी ॥)
--
भावार्थ :
जैसे सब ओर से परिपूर्ण अचल और अपने-आप में सुस्थिर समुद्र में भिन्न भिन्न स्रोतों से आनेवाली सारी नदियाँ समा जाती हैं और वह यथावत् अविचलित ही रहता है, उसी प्रकार विभिन्न कामनाएँ जिस मनुष्य को (उसकी आत्मा से) बाहर न खींचती हुई, उसमें ही समाहित हो जाती हैं, वही मनुष्य शान्ति प्राप्त कर लेता है, न कि वह जिसका चित्त विभिन्न कामनाओं से आकर्षित हुआ इधर उधर भटकता रहता है ।
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अध्याय 2, श्लोक 71,

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।
निर्ममो निरहङ्कारः शान्तिमधिगच्छति ॥
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(विहाय कामान् यः सर्वान् पुमान् चरति निःस्पृहः ।
निर्ममः निरहङ्कारः सः शान्तिम् अधिगच्छति ॥)
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भावार्थ :
और, जो पुरुष कामनाओं को त्यागकर, ममत्व से रहित, अहंकार से रहित, स्पृहा (अर्थात् ईर्ष्या / लालसा) से भी रहित हुआ आचरण करता है, वह शान्ति को प्राप्त होता है ।
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’सः’ / ’saḥ’ - He,

Chapter 2, shloka 15,

yaṃ hi na vyathayantyete
puruṣaṃ puruṣarṣabha |
samaduḥkhasukhaṃ dhīra
so:'mṛtatvāya kalpate ||
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(yam hi na vyathayanti ete
puruṣam puruṣarṣabha |
samaduḥkhasukham dhīram
saḥ amṛtatvāya kalpate ||)
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Meaning : O noble among the men, One who is not tormented by these two (the contact of the senses with their specific objects), who is unmoved when coming across pleasures and pains caused by them, sure wins the state of immortality /liberation.
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Chapter 2, shloka 21,

vedāvināśinaṃ nityaṃ
ya enamajamavyayaṃ |
kathaṃ sa puruṣaḥ pārtha
kaṃ ghātayati hanti kaṃ ||
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(veda avināśinam nityam
yaḥ enam ajam avyayam |
katham saḥ puruṣaḥ pārtha
kam ghātayati hanti kam ||)
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Meaning :
How can one who knows, this (Self) is imperishable, eternal, never born, and immutable, he himself kill or get some-one killed by another?  

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Chapter 2, shloka 70,

āpūryamāṇamacalapratiṣṭhaṃ
samudramāpaḥ praviśanti yadvat |
tadvatkāmā yaṃ praviśanti sarve
sa śāntimāpnoti na kāmakāmī ||
--
(āpūryamāṇam-acalapratiṣṭham
samudram āpaḥ praviśanti yadvat |
tadvat kāmāḥ yam praviśanti sarve
saḥ śāntim āpnoti na kāmakāmī ||)
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Meaning : Just as, the waters coming from all the directions enter and merge into the ocean, and the ocean stays steady and unaffected, quite so, only the one who is not affected by the desires that come to and merge into his mind wins the state of peace. And not the one, who keeps thinking of and indulging in desires.

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Chapter 2, shloka 71,

vihāya kāmānyaḥ sarvān-
pumāṃścarati niḥspṛhaḥ |
nirmamo nirahaṅkāraḥ
sa śāntimadhigacchati ||
--
(vihāya kāmān yaḥ sarvān
pumān carati niḥspṛhaḥ |
nirmamaḥ nirahaṅkāraḥ
saḥ śāntim adhigacchati ||)
--
Meaning :
One who has forsaken all desire, and lives peacefully contented thus, having no attachment nor ego, abides ever in bliss supreme.

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आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (3)

आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (3)
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 ’सः’ / 'saḥ' - वह,

अध्याय 3, श्लोक 6,

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः उच्यते ॥
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(कर्मेन्द्रियाणि संयम्य यः आस्ते मनसा स्मरन् ।
इन्द्रियार्थान् विमूढात्मा मिथ्याचारः सः उच्यते ॥)
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भावार्थ :
जो मूढबुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक रोककर, उन्हें उनके विषयों से दूर रखते हुए भी, मन से इन्द्रियों के उन विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात् दम्भी कहा जाता है ।
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अध्याय 3, श्लोक 7,

यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियमारभतेऽर्जुन ।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः विशिष्यते ॥
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(यः तु इन्द्रियाणि मनसा नियम्य आरभते अर्जुन ।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगम् असक्तः सः विशिष्यते ॥)
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भावार्थ :
किन्तु जो मनुष्य मन से इन्द्रियों को वश में रखते हुए समस्त कर्मेन्द्रियों के द्वारा अनासक्ति सहित कर्मयोग का आचरण करता है, वह (पूर्वोक्त श्लोक में वर्णित मनुष्य की अपेक्षा) श्रेष्ठ है ।
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अध्याय 3, श्लोक 12,

इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः
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(इष्टान् भोगान् हि वः देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।
तैः दत्तान् अप्रदाय एभ्यः यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥)
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भावार्थ :
यज्ञ के द्वारा पूजित किए जाने से प्रसन्न हुए देवता अवश्य ही तुम्हें तुम्हारे इच्छित भोग प्रदान करेंगे । उनके द्वारा इस प्रकार से प्रदान न किए जाते हुए, जो इन भोगों को (अनधिकृत रूप से) भोगता है, वह चोर है ।
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अध्याय 3, श्लोक 16,

एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ जीवति ॥
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(एवम् प्रवर्तितम् चक्रम् न अनुवर्तयति इह यः ।
अघायुः इन्द्रियारामः मोघम् पार्थ सः जीवति ॥)
--
भावार्थ :
हे पार्थ (अर्जुन)! इस लोक में जो मनुष्य इस प्रकार (धर्म की) परंपरा से प्रचलित (सृष्टि के) चक्र के अनुसार आचरण नहीं करता, वह इन्द्रियों के भोगों में सुख अनुभव करनेवाला, पाप में आयु बितानेवाला  व्यर्थ ही जीता है ।
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अध्याय 3, श्लोक 21,

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥
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(यत् यत् आचरति श्रेष्ठः तत् तत् एव इतरः जनः ।
सः यत् प्रमाणम् कुरुते लोकः तत् अनुवर्तते ॥)
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भावार्थ :
श्रेष्ठ पुरुष जैसा, जो-जो आचरण करता है, अन्य लोग भी वैसा ही आचरण किया करते हैं । वह जिसे महत्व देता है, लोग भी उसी के अनुसार बरतने लगते हैं ।
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अध्याय 3, श्लोक 42,
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इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः
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(इन्द्रियाणि पराणि आहुः इन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
मनसः तु परा बुद्धिः यः बुद्धेःपरतः तु सः ॥)
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भावार्थ :
इन्द्रियाँ शरीर की तुलना में अधिक श्रेष्ठ, सूक्ष्म और चेतन कही गई हैं । किन्तु मन तो इन्द्रियों से भी अधिक श्रेष्ठ सूक्ष्म और चेतन है । मन से भी अधिक श्रेष्ठ सूक्ष्म और चेतन है, और इसी प्रकार से (आत्मा) जो बुद्धि से भी परे है, वह बुद्धि से भी अधिक श्रेष्ठ सूक्ष्म और चेतन है ।
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टिप्पणी :
श्री रमण महर्षिकृत सत्-दर्शनम् में श्लोक क्रमांक 6 और 7 में इसे निम्न शब्दों में कहा गया है :
शब्दादिरूपं भुवनं समस्तम्
शब्दादि सत्तेन्द्रियवृत्तिभास्या ।
सत्तेन्द्रियाणां मनसो वशे स्यात्
मनोमयं तद्भुवनं वदामः ॥
तथा,
धियासहोदेति धियास्तमेति
लोकस्ततो धीप्रविभास्य एषः ।
धीलोकजन्मक्षयधामपूर्णं
सद्वस्तु जन्मक्षयशून्यमेकम् ॥
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भावार्थ : सम्पूर्ण जगत् शब्द, रूप, रस, गंध तथा स्पर्श इन पाँच प्रकार के इन्द्रिय संवेदनों के माध्यम से अनुभव किया जाता है । अर्थात् जगत् (और शरीर भी) इन्द्रियों की वृत्ति का विषय है, इसलिए इन्द्रियाँ जगत् और शरीर से अधिक श्रेष्ठ सूक्ष्म और चेतन हैं । किन्तु जब तक मन इन्द्रियों से नहीं जुड़ता तब तक इन्द्रियों का कार्य संभव नहीं होता ।  इसलिए जगत् मनोमय है । साथ ही, मन बुद्धि से ही प्रेरित हुआ परिचालित होता है । इसलिए बुद्धि मन की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ सूक्ष्म और चेतन है । किन्तु पुनः बुद्धि भी कभी प्रवृत्त होती है और कभी प्रवृत्त नहीं भी होती । अर्थात् बुद्धि के जागृत होने कार्य करने या न करने का एक अचल अधिष्ठान है, जो बुद्धि से भी अधिक श्रेष्ठ सूक्ष्म और चेतन है ।
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’सः’ / 'saḥ' - He,

Chapter 3, shloka 6,
karmendriyāṇi saṃyamya
ya āste manasā smaran |
indriyārthānvimūḍhātmā
mithyācāraḥ sa ucyate ||
--
(karmendriyāṇi saṃyamya
yaḥ āste manasā smaran |
indriyārthān vimūḍhātmā
mithyācāraḥ saḥ ucyate ||)
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Meaning :
One who though outwardly restraining the organs, keeps on indulging in the the thoughts of the objects and the pleasures that are enjoyed from them, is verily deluded and is a hypocrite.
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Chapter 3, shloka 7,
yastvindriyāṇi manasā
niyamārabhate:'rjuna |
karmendriyaiḥ karmayoga-
masaktaḥ sa viśiṣyate ||
__
(yaḥ tu indriyāṇi manasā
niyamya ārabhate arjuna |
karmendriyaiḥ karmayoga-
masaktaḥ saḥ viśiṣyate ||)
--
Meaning :
(In comparison and contrast to the last shloka, ...) But one, who without indulging in the senses, with no attachment, by means of mind (wisdom) keeping the senses under control, directs them towards the yoga of action, is superior indeed.  
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Chapter 3, shloka 12,

iṣṭānbhogānhi vo devā
dāsyante yajñabhāvitāḥ |
tairdattānapradāyaibhyo
yo bhuṅkte stena eva saḥ |
--
(iṣṭān bhogān hi vaḥ devā
dāsyante yajñabhāvitāḥ |
taiḥ dattān apradāya ebhyaḥ
yo bhuṅkte stena eva saḥ ||)
--
Meaning :
By means of  yajña, propitiating the favorite Gods, get your wishes granted, and live happily. One who seeks to enjoy pleasures without offering worship to those Gods is a thief indeed.
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Chapter 3, shloka 16,

evaṃ pravartitaṃ cakraṃ
nānuvartayatīha yaḥ |
aghāyurindriyārāmo
moghaṃ pārtha sa jīvati ||
--
(evam pravartitam cakram
na anuvartayati iha yaḥ |
aghāyuḥ indriyārāmaḥ
mogham pārtha saḥ jīvati ||)
--
Meaning :
(This is with reference to the earlier 2 shlokas, where the meaning of yajña is explained in essence.)
Who-so-ever in the world does not follow this cycle of nature, and enjoys sensuous pleasures against this law, lives in vain, incurs sin only.)

Chapter 3, shloka 21,
yadyadācarati śreṣṭhas-
tattadevetaro janaḥ |
sa yatpramāṇaṃ kurute
lokastadanuvartate ||
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(yat yat ācarati śreṣṭhaḥ
tat tat eva itaraḥ janaḥ |
saḥ yat pramāṇam kurute
lokaḥ tat anuvartate ||)
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Meaning :
The way men of higher status behave, is followed by ordinary people. Whatever great men think of as right and good, others also tend to do the same.
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Chapter 3, shloka 42,

indriyāṇi parāṇyāhur-
indriyebhyaḥ paraṃ manaḥ |
manasastu parā buddhir-
yo buddheḥ paratastu saḥ ||
--
(indriyāṇi parāṇi āhuḥ
indriyebhyaḥ paraṃ manaḥ |
manasaḥ tu parā buddhiḥ
yaḥ buddheḥ  parataḥ tu saḥ ||)
--
Meaning :
Senses are more powerful and subtle than the body, but the mind is stronger and more subtle than the senses. And, the intellect is  strong and superior to mind, but the Self is superior to and beyond the intellect. (And in the next shloka, 43 of this chapter 3, arjuna is told by the Lord, How one should know this Self by transcending the intellect.)
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आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (4)

आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (4)
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अध्याय 4, श्लोक 2,
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
कालेनेह महता योगो नष्टः परंतप ॥
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(एवम् परम्पराप्राप्तम् इमम् राजर्षयः विदुः ।
सः कालेन इह महता योगः नष्टः परन्तप ॥)
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भावार्थ :
इस प्रकार परम्परा से प्राप्त होते आ रहे (जिस) इस योग को राजर्षियों ने जाना,  हे परंतप अर्जुन! वह बहुत काल से इस पृथिवी से लुप्तप्राय सा हो गया ।
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अध्याय 4, श्लोक 3,
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एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥
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(सः एव अयम् मया ते अद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।
भक्तः असि मे सखा च इति रहस्यम् हि एतत् उत्तमम् ॥)
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भावार्थ :
वही पुरातन योग मेरे द्वारा आज तुम्हारे लिए कहा गया, क्योंकि तुम मेरे भक्त और प्रिय सखा हो और यह (योग) अत्यन्त श्रेष्ठ एक रहस्य है, इसलिए ।
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अध्याय 4, श्लोक 9,
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥
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(जन्म कर्म च मे दिव्यम् एवम् यो वेत्ति तत्त्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म न एति माम् एति सः अर्जुन ॥)
--
भावार्थ :
जो तत्त्वतः यह जानता है कि मेरा जन्म तथा कर्म दिव्य (अर्थात् चकित कर देनेवाला, निर्मल और अलौकिक) है, वह देह को त्यागने के पश्चात् पुनः जन्म नहीं लेता, क्योंकि वह तो मुझमें ही समाविष्ट हो जाता है ।
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अध्याय 4, श्लोक 14,
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे करफले स्पृहा ।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥
-
(न माम् कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।
इति यो माम् अभिजानाति कर्मभिः न सः बध्यते ॥)
--
भावार्थ :
न तो कर्म मुझसे लिप्त होते हैं और न कर्मफलों से मुझे कोई आशा है, इस प्रकार से जो मुझे (अपने-आपको) सम्यक् रूपेण जान-समझ लेता है, वह कर्मों के द्वारा नहीं बाँधा जाता ।
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अध्याय 4, श्लोक 18,
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कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।
स बुद्धिमान्मनुष्येषुयुक्त कृत्स्नकर्मकृत् ॥
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(कर्मणि अकर्म यः पश्येत् अकर्मणि च कर्म यः ।
सः बुद्धिमान् मनुष्येषु सः युक्तः कृत्स्न-कर्मकृत् ॥)
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भावार्थ :
जो मनुष्य कर्म ( के होने / करने ) में अकर्म अर्थात् कर्म के न होने को देख लेता है, तथा अकर्म (कर्म के न होने / न करने) में भी कर्म का होना देख लेता है, मनुष्यों में  बुद्धिमान वह मनुष्य, वह योगयुक्त समस्त कर्मों का सम्यक् करनेवाला कर्मयोगी, (कृत-कृत्य) होता है ।
--
अध्याय 4, श्लोक 20,

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः
--
(त्यक्त्वा फल-आसङ्गम् नित्यतृप्तः निराश्रयः ।
कर्मणि अभिप्रवृत्तः अपि न एव किञ्चित् करोति सः ॥)
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भावार्थ:
फल की आसक्ति से अछूता, नित्यवस्तु (निज आत्मा) में ही परम तृप्त यदि (प्रारब्धवश) कर्म में प्रवृत्त दिखलाई भी देता है, तो भी वह वस्तुतः कुछ नहीं करता ।
--

’सः’ / ’saḥ’ - He,
 -
Chapter 4, shloka 2,
--
evaṃ paramparāprāpta-
mimaṃ rājarṣayo viduḥ |
sa kāleneha mahatā
yogo naṣṭaḥ paraṃtapa ||
--
(evam paramparāprāptam
imam rājarṣayaḥ viduḥ |
saḥ kālena iha mahatā
yogaḥ naṣṭaḥ parantapa ||)
--
Meaning :
As said in the earlier shloka, Lord Supreme first taught This 'yoga' to Lord Sun, Lord Sun to the manu,  (-The Foremost Ancestor of the mankind) and this was the unbroken tradition of this Supreme knowledge of Yoga that was kept alive by The Lord > saṃbhavāmi yuge yuge > described in shloka 7 of this chapter. The same was imparted to Great Sages of the Royal Clans. But was almost lost to the (sight of) man with the passage of long times, O paraṃtapa (tormentor of the enemies, arjuna)!
--
Chapter 4, shloka 3,

sa evāyaṃ mayā te:'dya
yogaḥ proktaḥ purātanaḥ |
bhakto:'si me sakhā ceti
rahasyaṃ hyetaduttamam ||
--
(saḥ eva ayam mayā te
adya yogaḥ proktaḥ purātanaḥ |
bhaktaḥ asi me sakhā ca iti
rahasyam hi etat uttamam ||)
--
Meaning :
The very same (Yoga) is imparted by Me unto you today, (as) you are My devotee, and also a beloved friend, and this mystery is the most holy, sacred and a deep secret.
--
Chapter 4, shloka 9,

janma karma ca me divya-
mevaṃ yo vetti tattvataḥ |
tyaktvā dehaṃ punarjanma
naiti māmeti so:'rjuna ||
--
(janma karma ca me divyam
evam yo vetti tattvataḥ |
tyaktvā dehaṃ punarjanma
na eti mām eti saḥ arjuna ||)
--
'The way I manifest, and the role I act and play is divine'. - One who knows this in essence, O arjuna, after casting away this material-body made of 5 elements, never enters another, but attains Me only.

Chapter 4, shloka 14,

na māṃ karmāṇi limpanti
na me karaphale spṛhā |
iti māṃ yo:'bhijānāti
karmabhirna sa badhyate ||
-
(na mām karmāṇi limpanti
na me karmaphale spṛhā |
iti yo mām abhijānāti
karmabhiḥ na saḥ badhyate ||)
--
Meaning :
The actions neither cling me, nor the urge possesses me. One who understands this about me (oneself) well, is never bound by the actions.
--
Chapter 4, shloka 18,

karmaṇyakarma yaḥ paśye-
dakarmaṇi ca karma yaḥ |
sa buddhimānmanuṣyeṣu
sa yukta kṛtsnakarmakṛt ||
--
(karmaṇi akarma yaḥ paśyet
akarmaṇi ca karma yaḥ |
saḥ buddhimān manuṣyeṣu
saḥ yuktaḥ kṛtsna-karmakṛt ||)
--
Meaning :
The One, who sees the Action (hidden) in in-action, and in the same way, the in-action also, (hidden) in Action,  such a wise among the men, has really realized the freedom from all action. He is the one, adept* in Action.
--
(*yogaḥ karmasu kauśalam |  gītā 2/50)
--
Chapter 4, shloka 20,

tyaktvā karmaphalāsaṅgaṃ
nityatṛpto nirāśrayaḥ |
karmaṇyabhipravṛtto:'pi
naiva kiñcitkaroti saḥ ||

(tyaktvā phala-āsaṅgam
nityatṛptaḥ nirāśrayaḥ |
karmaṇi abhipravṛttaḥ api
na eva kiñcit karoti saḥ ||)
--
Meaning :
Unconcerned to the fruits of action, (karma), one who is content ever in the Self, is no longer dependent on others. Though engaged in action  because of the inclination of mind, (or because of destiny of one-self, and the others as well) is nowhere in the action.
--


आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (5)

आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (5)
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 ’सः’ / 'saḥ' - वह,

अध्याय 5, श्लोक 3,

ज्ञेयः नित्यसन्न्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥
--
(ज्ञेयः सः नित्यसन्न्यासी यः न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।
निर्द्वन्द्वः हि महाबाहो सुखम् बन्धात् प्रमुच्यते ॥)
--
भावार्थ :
हे महाबाहु (अर्जुन)!  द्वन्दरहित हुआ जो (कर्मयोगी) न किसी से द्वेष करता है और न कोई आकांक्षा रखता है, सुखपूर्वक संसार-बन्धन से मुक्त हो जाता है । ऐसे मनुष्य को नित्यसंन्यासी ही समझा जाना चाहिए ।
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अध्याय 5, श्लोक 5,

यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते ।
एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति  पश्यति ॥
--
(यत्-साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानम् तत् योगैः अपि गम्यते ।
एकम् साङ्ख्यम् च योगम् च यः पश्यति सः पश्यति ॥)
--
भावार्थ :
जिस तत्व की उपलब्धि विवेचनाओं के माध्यम से की जाती है, योगविधियों से भी उसकी प्राप्ति होती है । जो उस तत्व को देखता है, उसे यह भी दिखलाई देता है कि स्वरूपतः, सांख्य (विवेचना) और योग (भक्ति, ज्ञान, कर्म,) एक दूसरे से भिन्न नहीं हैं ।
(टिप्पणी :
1 इसी अध्याय 5 के गत श्लोक (सं. 4) में इसी तथ्य की पुष्टि प्राप्त होती है ।
2 ’आत्मनो जडवर्गात् पृथग्ग्रहणम्’ के प्रकाश में प्रकृति-पुरुष-विवेक से आत्म-अनात्म को समझने का प्रयास, जिसे आत्मानुसंधान भी कहा जाता है और जो समस्त वेदान्त शास्त्रों का आधारभूत तत्व है । )
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अध्याय 5, श्लोक 10,

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥
--
(ब्रह्मणि आधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न सः पापेन पद्मपत्रम् इव अम्भसा ॥)
--
भावार्थ :
जो पुरुष सभी कर्मों को  परब्रह्म परमात्मा के प्रति समर्पित करते हुए (कर्म तथा कर्मफल में) आसक्ति को भी त्याग देता है, वह (कर्मजनित) पाप  से वैसा ही अछूता होता है, जैसे कमलपत्र जल से ।
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अध्याय 5, श्लोक 21,

बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् ।
ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥
--
(बाह्य-स्पर्शेषु-असक्तात्मा विन्दति आत्मनि यत् सुखम् ।
सः ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखम्-अक्षयम् अश्नुते ।)
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भावार्थ :
बाहर के (मन, बुद्धि तथा इन्द्रियों से होनेवाले विषयजनित) सम्पर्क से अछूता मनुष्य जिस सुख को अपनी अन्तरात्मा में प्राप्त करता है, ब्रह्मके ध्यान में लीन उसको ही उस अक्षय सुख का अनुभव होता है ।
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अध्याय 5, श्लोक 23,

शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।
कामक्रोधोद्भवं वेगं युक्तः सुखी नरः ॥
--
(शक्नोति इह एव यः सोढुम् प्राक् शरीरविमोक्षणात् ।
कामक्रोधोद्भवम् वेगम् सः युक्तः सः सुखी नरः ॥)
--
भावार्थ :
वह साधक जो कि इस शरीर के जीते-जी ही, शरीर का नाश होने से पहले ही काम-क्रोध से पैदा होनेवाले वेग को सहन करने में सक्षम हो जाता है, निश्चय ही वह मनुष्य योगी है और वही सुखी है ।
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अध्याय 5, श्लोक 24,
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योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव च ।
योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥
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(यः अन्तःसुखः अन्तरारामः तथा अन्तर्ज्योतिः एव यः ।
सः योगी ब्रह्मनिर्वाणम् ब्रह्मभूतः अधिगच्छति ॥)
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भावार्थ :
जो पुरुष अपने ही भीतर (आत्मा में ही) सुखी, रमण करता है, तथा अपना प्रकाश अपने ही भीतर प्राप्त करता है, वह योगी निर्वाणरूपी ब्रह्म से एकत्व प्राप्तकर, उसके ही स्वरूप का हो जाता है ।
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अध्याय 5, श्लोक 28,
यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः ।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः
--
(यतेन्द्रियमनोबुद्धिः मुनिः मोक्षपरायणः ।
विगतेच्छाभयक्रोधः यः सदा मुक्तः एव सः॥)
--
भावार्थ :
जो मुमुक्षु मुनि इन्द्रियों मन (अवधान) तथा बुद्धि (अर्थात् मन की प्रवृत्ति) को यत्नपूर्वक साधते हुए, इच्छा, भय तथा क्रोध से जो उनसे मुक्त रहता है, वह सदा ही मुक्त होता है ।
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’सः’ / 'saḥ' - He,

Chapter 5, shloka 3,

jñeyaḥ sa nityasannyāsī
yo na dveṣṭi na kāṅkṣati |
nirdvandvo hi mahābāho
sukhaṃ bandhātpramucyate ||
--
(jñeyaḥ saḥ nityasannyāsī
yaḥ na dveṣṭi na kāṅkṣati |
nirdvandvaḥ hi mahābāho
sukham bandhāt pramucyate ||)
--
Meaning :
He is indeed a true ascetic, who neither hates nor desires. free of the such opposites, O mahAbAho (arjuna)! he is easily freed from bondage.
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Chapter 5, shloka 5,

yatsāṅkhyaiḥ prāpyate sthānaṃ
tadyogairapi gamyate |
ekaṃ sāṅkhyaṃ ca yogaṃ ca
yaḥ paśyati sa paśyati ||
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(yat-sāṅkhyaiḥ prāpyate sthānam
tat yogaiḥ api gamyate |
ekam sāṅkhyam ca yogam ca
yaḥ paśyati saḥ paśyati ||)
--
Meaning :
The goal that is attained by the way of sAnkhya* is the same as that is attained by means of yoga (practicing bhakti / devotion, 'niShkAma-karma' / 'self-less action', or jnAna / the way of meditation), And the one who sees that this essential truth of both is the same is the real seer.
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 ( * sAnkhya - That begins with the contemplation and discrimination between the 'prakRti' and the 'puruSha', and treating the 'Self' as the principle that is different from 'prakRti' / non-self. Though this begins with the assumption that 'self' is different from the non-self, ultimately the 'self' too dissolves with the 'non-self' and what is discovered is indescribable.)
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Chapter 5, shloka 10,
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brahmaṇyādhāya karmāṇi
saṅgaṃ tyaktvā karoti yaḥ |
lipyate na sa pāpena
padmapatramivāmbhasā ||
--
(brahmaṇi ādhāya karmāṇi
saṅgaṃ tyaktvā karoti yaḥ |
lipyate na saḥ pāpena
padmapatram iva ambhasā ||)
--

Chapter 5, shloka 21,

bāhyasparśeṣvasaktātmā
vindatyātmani yatsukham |
sa brahmayogayuktātmā
sukhamakṣayamaśnute ||
--
(bāhya-sparśeṣu-asaktātmā
vindati ātmani yat sukham |
saḥ brahmayogayuktātmā
sukham-akṣayam aśnute ||)
--
Meaning :
Thus is attained the bliss infinite by this consciousness, (that is freed from all action, unidentified with the action), untouched by the outward objects, That is the imperishable Bliss of Brahman, and because of merging in Brahman.
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Chapter 5, shloka 23,

śaknotīhaiva yaḥ soḍhuṃ
prākśarīravimokṣaṇāt |
kāmakrodhodbhavaṃ vegaṃ
sa yuktaḥ sa sukhī naraḥ ||
--
(śaknoti iha eva yaḥ soḍhum
prāk śarīravimokṣaṇāt |
kāmakrodhodbhavam vegam
saḥ yuktaḥ saḥ sukhī naraḥ ||)
--
Meaning :
Far before the body falls as dead, one who can manage to face the urges of lust and anger (and can control them) is indeed a yogi, and he alone is truly a happy man.
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Chapter 5, shloka 24,

yo:'ntaḥsukho:'ntarārāmas-
tathāntarjyotireva ca |
sa yogī brahmanirvāṇaṃ
brahmabhūto:'dhigacchati ||
--
(yaḥ antaḥsukhaḥ antarārāmaḥ
tathā antarjyotiḥ eva yaḥ |
saḥ yogī brahmanirvāṇam
brahmabhūtaḥ adhigacchati ||)
--
Meaning :
One who is happy and content in the Self, one who sports in, finds love and joy within, one who is a light unto oneself, is verily a yogī, the one having known Brahman, -of the form of  nirvāṇa, has become one with Brahman .

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Chapter 5, shloka 28,

yatendriyamanobuddhir-
munirmokṣaparāyaṇaḥ |
vigatecchābhayakrodho
yaḥ sadā mukta eva saḥ ||
--
(yatendriyamanobuddhiḥ
muniḥ mokṣaparāyaṇaḥ |
vigatecchābhayakrodhaḥ
yaḥ sadā muktaḥ eva saḥ ||)
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Meaning :
The seeker after liberation, who practices yoga by keeping the senses, mind and intellect together in order, one who is free from desire, fear and anger is already liberated in life, and for ever.
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Tuesday, April 29, 2014

आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (6)

आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (6)
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’सः’ / 'saḥ'  -  वह,

अध्याय 6, श्लोक 1,
श्रीभगवानुवाच :
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥
--
(अनाश्रितः कर्मफलम् कार्यम् कर्म करोति यः ।
सः सन्न्यासी च योगी च न निरग्निः न च अक्रियः ॥)
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भावार्थ :
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं  - वह नहीं, जो कि  हठपूर्वक अग्नि को नहीं छूता, या दूसरे सारे कर्मों को त्याग देता है, बल्कि वह पुरुष  जो कि कर्म के फल पर आश्रित नहीं होता, अर्थात् फल अनुकूल या प्रतिकूल क्या होता है इस विषय में जिसका कोई आग्रह नहीं होता, और जो अपने लिए निर्धारित कर्तव्य को पूर्ण करने रूपी कर्म में संलग्न होता है, वास्तविक अर्थों में संन्यासी (जिसने कर्म को त्याग दिया है) और वही कर्मयोगी अर्थात् कर्म करते हुए भी उसे मोक्ष का साधन बना लेने में कुशल योगी होता है ।
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अध्याय 6, श्लोक 23,

तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम् ।
निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥
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(तम् विद्यात् दुःखसंयोग-वियोगम् योगसञ्ज्ञितम् ।
सः निश्चयेन योक्तव्यो योगः अनिर्विण्णचेतसा ॥)
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भावार्थ :
जो दुःख के संयोग से विरहित है -अर्थात् जिसमें दुःख का नितान्त अभाव है, जिसे योग की संज्ञा दी जाती है -अर्थात् जो ऐसा योग है, उसे इस प्रकार से निश्चयपूर्वक जानकर, उस योग को धैर्यसहित, बिना उकताए, अथक् प्रयास सहित, उत्साहपूर्ण चित्त से सिद्ध किया जाना चाहिए ।
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अध्याय 6, श्लोक 30,
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि च मे न प्रणश्यति ॥
--
(यः माम् पश्यति सर्वत्र सर्वम् च मयि पश्यति ।
तस्य अहं न प्रणश्यामि सः च मे न प्रणश्यति ॥)
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भावार्थ :
जो मुझको (अपने-आपको) सर्वत्र देखता है तथा जो सबको मुझमें (अपने-आप ही में) अवस्थित देखता है, न तो उसके अस्तित्व मैं नष्ट होने देता हूँ और न ही वह मुझे (अपनी निज आत्मा / परमात्मा को) नष्ट होने देता है ।
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अध्याय 6, श्लोक 31,

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि योगी मयि वर्तते ॥
--
(सर्वभूतस्थितम् यः माम् भजति-एकत्वम्-आस्थितः ।
सर्वथा वर्तमानः अपि सः योगी मयि वर्तते ॥)
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भावार्थ :
जो मनुष्य सब भूतों में अवस्थित मुझ परमात्मा को अपने-आपकी अनन्यता मुझसे होने की भावना में अवस्थित हुआ मुझे भजता है, सब प्रकार के लौकिक कार्यों में व्यवहारसंलग्न रहते हुए भी, वह योगी वस्तुतः मुझमें ही व्यवहाररत होता है ।
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अध्याय 6, श्लोक 32,

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं योगी परमो मतः ॥
--
(अत्मौपम्येन सर्वत्र समम् पश्यति यः अर्जुन ।
सुखम् वा यदि वा दुःखम् सः योगी परमः मतः ॥
--
भावार्थ :
हे अर्जुन! सुख हो अथवा दुःख, अपने लिए हो या दूसरों के लिए, जो योगी उन्हें समभाव से देखता है वह योगी परम श्रेष्ठ कहा जाता है ।
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अध्याय 6, श्लोक 44,
पूर्वाभ्यासेन तेनैव  ह्रियते ह्यवशोSपि  सः
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्माति वर्तते ॥
--
(पूर्वाभ्यासेन तेन एव ह्रियते हि-अवशः अपि सः
जिज्ञासुः अपि योगस्य शब्दब्रह्म-अतिवर्तते ॥)
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भावार्थ :
जिस योगी की मृत्यु योग की पूर्णता को प्राप्त करने से पहले हो जाती है, ऐसा मनुष्य भी अपने संस्कारों के बल से खींचा जाकर किसी उपयुक्त कुल में जन्म लेता है, जहाँ उसे ऐसा उचित वातावरण मिलता  है, जिससे वह पुनः सम्यक मार्ग को ग्रहण कर लेता है ।
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अध्याय 6, श्लोक 47,
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।
श्रद्धावान्भजते यो मां मे युक्ततमो मतः ॥
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(योगिनाम् अपि सर्वेषाम् मद्गतेन अन्तरात्मना ।
श्रद्धावान् भजते यो माम् सः मे युक्ततमः मतः ॥)
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भावार्थ :
समस्त योगियों में भी पुनः वह योगी, जो अपनी अन्तरात्मा में मुझको जानकर मुझमें प्रविष्ट और समाहित हुआ है, ऐसा श्रद्धान्वित, जो मुझे इस प्रकार से भजता है मेरे मत में श्रेष्ठ योगी है ।
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’सः’ / 'saḥ' - he,

Chapter 6, shloka 1,

śrībhagavānuvāca :

anāśritaḥ karmaphalaṃ
kāryaṃ karma karoti yaḥ |
sa sannyāsī ca yogī ca
na niragnirna cākriyaḥ ||
--
(anāśritaḥ karmaphalam
kāryam karma karoti yaḥ |
saḥ sannyāsī ca yogī ca
na niragniḥ na ca akriyaḥ ||)
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Meaning :
bhagavān (Lord) śrīkṛṣṇa said -
Neither the one who has taken a vow of touching not the fire (that means begging for the food and not cook oneself, a condition a traditional saṃnyāsī is expected to observe), nor one who abstains from all other such works in order to live as one, but he, who without thinking of and depending upon the result of actions, performs his duties is  a true yogī  or  saṃnyāsī .  
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Chapter 6, shloka 23,

taṃ vidyādduḥkhasaṃyoga-
viyogaṃ yogasañjñitam |
sa niścayena yoktavyo
yogo:'nirviṇṇacetasā ||
--
(tam vidyāt duḥkhasaṃyoga
-viyogam yogasañjñitam |
saḥ niścayena yoktavyo
yogaḥ anirviṇṇacetasā ||)
--
Meaning :
Know what is named 'yoga', is that which results in the end of association of sorrow. This should be carefully understood with conviction that such a state is achieved by firm resolve, untiring and zealous spirit.
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Chapter 6, shloka 30,

yo māṃ paśyati sarvatra
sarvaṃ ca mayi paśyati |
tasyāhaṃ na praṇaśyāmi
sa ca me na praṇaśyati ||
--
(yaḥ mām paśyati sarvatra
sarvam ca mayi paśyati |
tasya ahaṃ na praṇaśyāmi
saḥ ca me na praṇaśyati ||)
--
Meaning :
One who everywhere finds and sees Me, and likewise, everything in Me, is not lost sight of Me, nor I lose sight of him [is not lost to Me, nor I to him].

Chapter 6, shloka 31,

sarvabhūtasthitaṃ yo māṃ
bhajatyekatvamāsthitaḥ |
sarvathā vartamāno:'pi
sa yogī mayi vartate ||
--
(sarvabhūtasthitam yaḥ mām
bhajati-ekatvam-āsthitaḥ |
sarvathā vartamānaḥ api
saḥ yogī mayi vartate ||)
--
Meaning :
One who sharing Me, -the One Who abides in all beings, though deals without conflict in the worldly matters also, such a yogī truly dwells in Me.


Chapter 6, shloka 32,
ātmaupamyena sarvatra
samaṃ paśyati yo:'rjuna |
sukhaṃ vā yadi vā duḥkhaṃ
sa yogī paramo mataḥ ||
--
(atmaupamyena sarvatra
samam paśyati yaḥ arjuna |
sukham vā yadi vā duḥkham
saḥ yogī paramaḥ mataḥ ||)
--
Meaning :
One who sees the same 'Self' in oneself and everywhere (and all other beings as well) and shares the pains and pleasures of all as his own is a yogI exalted indeed, O arjuna!
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Chapter 6, shloka 44,

pūrvābhyāsena tenaiva
hriyate hyavaśoSpi  saḥ |
jijñāsurapi yogasya
śabdabrahmāti vartate ||
--
(pūrvābhyāsena tena eva
hriyate hi-avaśaḥ api saḥ |
jijñāsuḥ api yogasya
śabdabrahma-ativartate ||)
--
Meaning :
A yogI, the aspirant for Truth, never falls from the path of yoga, Though if  dies before reaching the goal of Self-realization, because 'drawn' by the force of the latent tendencies (sanskAra), he is 'reborn' in a noble clan  where he comes again in touch with the right teachings that leads him onto the right path.

Chapter 6, shloka 47,
yogināmapi sarveṣāṃ
madgatenāntarātmanā |
śraddhāvānbhajate yo māṃ
sa me yuktatamo mataḥ ||
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(yoginām api sarveṣām
madgatena antarātmanā |
śraddhāvān bhajate yo mām
saḥ me yuktatamaḥ mataḥ ||)
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Meaning :
Of all the yogī-s, One who has entered me through the heart, one who shares deep love with me, is truly the greatest and the most beloved to Me.
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Monday, April 28, 2014

आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (7)

आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (7)
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अध्याय 7, श्लोक 17,

तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं च मम प्रियः ॥
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(तेषम् ज्ञानी नित्ययुक्तः एकभक्तिः विशिष्यते ।
प्रियः हि ज्ञानिनः अत्यर्थम् अहम् सः च मम प्रियः ॥
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भावार्थ :
(मुझे भजनेवाले चार प्रकार के उपरोक्त श्लोक (16) में वर्णित भक्तों में से,) मुझमें एकनिष्ठ भक्ति रखनेवाला मुझमें नित्य निमग्न ज्ञानी भक्त श्रेष्ठ है, क्योंकि जैसा वह मुझे प्रिय है, मैं भी उसे स्वरूपतः वैसा ही प्रिय हूँ । अगले श्लोक (18) में इसे और स्पष्ट किया गया है ।

अध्याय 7, श्लोक 18,
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।
आस्थितः हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥
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(उदाराः सर्वे एव एते ज्ञानी तु आत्मा एव मे मतम् ।
आस्थितः सः हि युक्तात्मा माम् एव अनुत्तमाम् गतिम् ॥)
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भावार्थ :
ये सभी विशाल-हृदय  हैं, परन्तु ज्ञानी तो साक्षात् मेरा ही स्वरूप होता है, ऐसा मेरा मत है, क्योंकि वह मन-बुद्धिसहित मुझमें समाहित हुआ अति उत्तम स्थिति, परम गति में प्रतिष्ठित होता है ।
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अध्याय 7, श्लोक 19,

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ।
वासुदेवः सर्वमिति महात्मा सुदुर्लभः ॥
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(बहूनाम् जन्मनाम्-अन्ते ज्ञानवान् माम् प्रपद्यते ।
वासुदेवः सर्वम्-इति सः महात्मा सुदुर्लभः ॥)
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भावार्थ :
बहुत से जन्मों (और पुनर्जन्मों) के बाद, अन्त के जन्म में तत्वज्ञान को प्राप्त हुआ मनुष्य मेरी ओर आकर्षित होता है, मुझे भजता है । ऐसा वह मनुष्य, जिसकी दृष्टि में सब कुछ केवल वासुदेव ही होता है, वह महात्मा अत्यन्त ही दुर्लभ होता है ।
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अध्याय 7, श्लोक 22,

तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥
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(सः तया श्रद्धया युक्तः तस्य आराधनम् ईहते ।
लभते च ततः कामान् मया एव विहितान् हि तान् ॥)
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भावार्थ :
(जो भक्त कामनाओं से मोहित बुद्धि के कारण अन्य देवताओं की शरण में जाता है ... - श्लोक 20, 21,) वह उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता की आराधना करता है तथा उस देवता से मेरे ही द्वारा किए गए विधान से, वह उन इच्छित भोगों को अवश्य ही प्राप्त कर लेता है ॥
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Chapter 7, shloka 17,

teṣāṃ jñānī nityayukta
ekabhaktirviśiṣyate |
priyo hi jñānino:'tyartham
ahaṃ sa ca mama priyaḥ ||
--
(teṣam jñānī nityayuktaḥ
ekabhaktiḥ viśiṣyate |
priyaḥ hi jñāninaḥ atyartham
aham saḥ ca mama priyaḥ ||
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Meaning :
(Of those for kinds of devotees, as described in the earlier shloka 16,) The  jñānī, the Realized in Me ever abides in Me, because being aware of Me in Essence. He is very dear to Me and I AM to Him, as is Self / Me only.

Chapter 7, shloka 18,

udārāḥ sarva evaite jñānī
tvātmaiva me matam |
āsthitaḥ sa hi yuktātmā
māmevānuttamāṃ gatim ||
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(udārāḥ sarve eva ete
 jñānī tu ātmā eva me matam |
āsthitaḥ saḥ hi yuktātmā
mām eva anuttamām gatim ||)
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Meaning :
Though all these 4 kinds of devotees are kind of broad- heart,  jñānī  is verily the Self only, according to Me. Ever in communion with Me, He always shares The Supreme State I AM.


Chapter 7, shloka 19,
bahūnāṃ janmanāmante
jñānavānmāṃ prapadyate |
vāsudevaḥ sarvamiti
sa mahātmā sudurlabhaḥ ||
--
(bahūnām janmanām-ante
jñānavān mām prapadyate |
vāsudevaḥ sarvam-iti
saḥ mahātmā sudurlabhaḥ ||)
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After many births (and rebirths) in the last birth, the jñānī (Man who has attained the wisdom and Me as well) realizes Me as vāsudeva, The Consciousness Supreme, who abides ever in the hearts of all beings.
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Chapter 7, shloka 22,
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sa tayā śraddhayā yuktas-
tasyārādhanamīhate |
labhate ca tataḥ kāmān-
mayaiva vihitānhi tān ||
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(saḥ tayā śraddhayā yuktaḥ
tasya ārādhanam īhate |
labhate ca tataḥ kāmān
mayā eva vihitān hi tān ||)
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Meaning :
(Those who desire their wishes granted, ...See shloka 20, 21,)) though people worship other deities through them, I alone fulfill them and they seem to have acquired those gifts from them.


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आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (8)

आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (8)
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’सः’ / 'saḥ' - वह,

अध्याय 8, श्लोक 5,

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वाकलेवरं ।
यः प्रयाति  मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥
--
(अन्तकाले च माम्-एव स्मरन् मुक्त्वा कलेवरम् ।
यः प्रयाति सः मद्भावम् याति न-अस्ति-अत्र संशयः ॥)
--
भावार्थ :
और जो मनुष्य अपना अन्तकाल आने पर मुझको ही स्मरण करता हुआ देह को त्याग देता है, वह मेरे ही स्वरूप को प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं है ।
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अध्याय 8, श्लोक 10,

प्रयाणकाले मनसाचलेन
भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्
तं परं पुरुषमुपैति दिव्यं ॥
--
(प्रयाणकाले मनसा अचलेन ।
भक्त्या युक्तः योगबलेन च एव ।
भ्रुवोः मध्ये प्राणम् आवेश्य सम्यक्
सः तम् परम् पुरुषम् उपैति दिव्यम् ॥)
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भावार्थ :
(और) अन्त-समय आने पर  अचल मन, भक्ति तथा (श्लोक 8 में कहे गए पूर्व में किए गए अभ्यास से सिद्ध हुए) योगबल की सहायता से ही वह भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित (आविष्ट) करते हुए वह उस परम पुरुष परमेश्वर को ही प्राप्त होता है ।
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अध्याय 8, श्लोक 13,
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन्देहं याति परमां गतिम् ॥
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(ओम् इति एकाक्षरम् ब्रह्म व्याहरन् माम् अनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन् देहम्  सः याति परमाम् गतिम् ॥)
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भावार्थ :
ॐ, - इस एक अक्षर-ब्रह्म का उच्चारण करते हुए, उसके तत्व का ध्यान करते हुए, तथा मुझ (निर्गुण आत्मतत्व) को उस प्रकार से स्मरण करते हुए, जो देहत्याग कर जाता है, वह परम गति को प्राप्त होता है ।
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अध्याय 8, श्लोक 19,
भूतग्रामः एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥
--
(भूतग्रामः सः एव अयम् भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।
रात्र्यागमे अवशः पार्थ प्रभवति अहरागमे ॥)
[रात्रि-आगमे, अहः-आगमे]
--
भावार्थ :
हे पार्थ (अर्जुन) वही यह भूत-समुदाय उत्पान हो-होकर (प्रकृति से नियन्त्रित होने से) विवश होकर रात्रि आने पर प्रलीन (सुषुप्त) तथा  दिन के आरम्भ में, प्रातः पुनः व्यक्त हो उठता है । (अर्थात् क्रमश व्यक्त और अव्यक्त होता रहता है, किन्तु... श्लोक 16, 17, 18 तथा अगले श्लोक में देखने से व्यक्त और अव्यक्त का तात्पर्य अधिक स्पष्ट होगा, क्योंकि यहाँ ’अव्यक्त’ शब्द को भी पुनः सामान्य तथा विशेष इन दो अभिप्रायों में लिया गया है  ।)
--
अध्याय 8, श्लोक 20,

परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः ।
यः सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥
--
(परः तस्मात् तु भावः अन्यः अव्यक्तः अव्यक्तात् सनातनः ।
यः सः सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥)
--
भावार्थ :
समस्त भूतसमुदाय दिन के उगने के साथ संसार के व्यवहार में जाग्रत / व्यक्त हो उठता है, एवं रात्रि आने पर निद्रा के वशीभूत हुआ प्रलीन हो जाता है । अहोरात्रविद् (काल की गणना करनेवालों) जी दृष्टि में यह दिन और रात्रि का नियम आब्रह्म-भुवन (सृष्टिकर्ता ब्रह्मा से लेकर समस्त छोटे-से छोटे भूतों तक) लागू होता है । इस व्यक्त और अव्यक्त भाव से अन्य एक और अव्यक्त भाब है, जो अव्यक्त होने के साथ साथ सनातन भी है । और जो सारे भूतों के विनष्ट हो जाने (अपने आदिकारण में विलीन हो जाने) के बाद भी विनष्ट नहीं होता (क्योंकि वह अविनाशी है ।)
--
अध्याय 8, श्लोक 22,
--
पुरुषः परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥
--
(पुरुषः सः परः पार्थ भक्त्या लभ्यः तु अनन्यया ।
यस्य अन्तःस्थानि भूतानि येन सर्वम् इदम् ततम् ॥)
--
भावार्थ :
हे पार्थ (अर्जुन) जिससे और जिसमें यह सब दृश्य जगत् ओत-प्रोत है, सर्वभूत जिसके ही भीतर अवस्थित हैं,  वह पुरुष (परमात्मा) तो अनन्य भक्ति से ही प्राप्त होता है ।
--


Chapter 8, shloka 5,

antakāle ca māmeva
smaranmuktvākalevaraṃ |
yaḥ prayāti saḥ madbhāvaṃ
yāti nāstyatra saṃśayaḥ ||
--
(antakāle ca mām-eva
smaran muktvā kalevaram |
yaḥ prayāti saḥ madbhāvam
yāti na asti atra saṃśayaḥ ||)
--
Meaning :
One, who at the time of death thinks of Me, leaves his body, definitely after his death attains Me, My Real Being only. Of this, there is no doubt.
--
Chapter 8, shloka 10,
prayāṇakāle manasācalena
bhaktyā yukto yogabalena caiva |
bhruvormadhye prāṇamāveśya samyak
sa taṃ paraṃ puruṣamupaiti divyaṃ ||
--
(prayāṇakāle manasā acalena |
bhaktyā yuktaḥ yogabalena ca eva |
bhruvoḥ madhye prāṇam āveśya samyak
saḥ tam param puruṣam upaiti divyam ||)
--
Meaning :
(Please see this shloka along-with shloka 1of this chapter. Those who by their whole devtion to Him, have mastered the skill of remembering Him (The Supreme Reality, / ’brahman’ / 'Self', / śrīkṛṣṇa paramātman) get stabilized in 'Heart', which is the Spiritual Heart / Love of Him, as Pure Consciousness Principle. Sri  has emphasized that one who remembers Him through 'Self-Enquiry' need not and should not go through the circuitous path of yoga as is advised by the ardent supporters of yoga and yogik methods. The 'Self-Enquiry' can not proceed until there is devotion to The Lord, and if there is this devotion, Even the 'Self-Enquiry' is but an excuse only, and one shall reach and attain The Lord, with no exception. However, those who are inclined, interested and able enough to discover the ' prāṇa ' (vital-breath) and ' cetanā ' (the awareness / consciousness associated with ' prāṇa '), and reach their common and the only source, wherefrom they emerge-out, take the manifest form and appear as different from one-another, as two, which is the 'Heart', they will find the same Reality as Self, There.
Such a devotee can easily bring the attention at the place where the two paths of ' prāṇa ' change their course of movement along the ' kuṇḍalinī '. This happens only through pure devtion and by no other means. And such a devotee can thus bringing the at that prāṇa-centre, having attention there and remembering 'Me' That is, The Lord śrīkṛṣṇa paramātman or 'Self' as 'Me' (I-Consciousness).
But again this is a secondary path, and in an earlier shloka 6, Lord has clearly pointed out that whatever one remembers and thinks of at the time of death, one attains the same state after his death. So one should always remember the Lord / Self.
--  


Chapter 8, shloka 13,
omityekākṣaraṃ brahma
vyāharanmāmanusmaran |
yaḥ prayāti tyajandehaṃ
sa yāti paramāṃ gatim ||
--
(om iti ekākṣaram brahma
vyāharan mām anusmaran |
yaḥ prayāti tyajan deham
saḥ yāti paramām gatim ||)
--
Meaning :
Remembering The Supreme, The Lord Who is manifest before us in the form of the holy syllable 'Om', and Who is the only ever abiding Self, repeating mentally this syllable, one who leaves off this mortal body attains Me, The Supreme Self.

Chapter 8, shloka 19,
bhūtagrāmaḥ sa evāyaṃ
bhūtvā bhūtvā pralīyate |
rātryāgame:'vaśaḥ pārtha
prabhavatyaharāgame ||
--
(bhūtagrāmaḥ saḥ eva ayam
bhūtvā bhūtvā pralīyate |
rātryāgame avaśaḥ pārtha
prabhavati aharāgame ||)
[rātri-āgame, ahaḥ-āgame]
--
Meaning :
Compelled by prakṛti and 3 guṇas, With the coming up of dawn, this multitude of beings emerges out helplessly and wakes up as in the manifest world, and with the end of the day rests into dissolution into the hidden, , again and again in the same way.

--

Chapter 8, shloka 20,
parastasmāttu bhāvo:'nyo:'
vyakto:'vyaktātsanātanaḥ |
yaḥ sa sarveṣu bhūteṣu
naśyatsu na vinaśyati ||
--
(paraḥ tasmāt tu bhāvaḥ anyaḥ
avyaktaḥ avyaktāt sanātanaḥ |
yaḥ saḥ sarveṣu bhūteṣu
naśyatsu na vinaśyati ||)
--
Meaning :
Beyond this manifest and this hidden, there is yet another level of existence My transcendent form and abode, which is immutable and imperishable. Which stays so eternally even through the destruction of both the manifest and the  the immanent (seed / hidden / not manifest).
--

--
Chapter 8, shloka 22,
--
puruṣaḥ sa paraḥ pārtha
bhaktyā labhyastvananyayā |
yasyāntaḥsthāni bhūtāni
yena sarvamidaṃ tatam ||
--
(puruṣaḥ saḥ paraḥ pārtha
bhaktyā labhyaḥ tu ananyayā |
yasya antaḥsthāni bhūtāni
yena sarvam idam tatam ||)
--
Meaning :
O pārtha (arjuna)! The Supreme, wherein abides the whole existence, is all over and everywhere yet transcends all, and all beings are within Him, is attained only through devotion extreme.
--

Saturday, April 26, 2014

आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (9)

आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (9)
_________________________

’सः’ / ’saḥ’ - वह,

अध्याय 9, श्लोक 30,

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव मन्तव्यो सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥
--
(अपि चेत् सुदुराचारः भजते माम् अनन्य भाक् ।
साधुः एव सः मन्तव्यः सम्यक्-व्यवसितः हि सः ॥)
--
अत्यन्त दुराचारी मनुष्य भी यदि अनन्यभाव से मेरा भजन (भक्ति) करता है तो उसको साधु ही समझा जाना चाहिए क्योंकि वह अपने कार्य में सम्यक् रीति से संलग्न है ।
--
’सः’ / ’saḥ’ - He,

Chapter 9, shloka 30,

api cetsudurācāro
bhajate māmananyabhāk |
sādhureva sa mantavyo
samyagvyavasito hi saḥ ||
--
(api cet sudurācāraḥ
bhajate mām ananya bhāk |
sādhuḥ eva saḥ mantavyaḥ
samyak-vyavasitaḥ hi saḥ ||)
--
Meaning :
A man though is given to bad habits and temperaments, if worships Me, with undivided devotion, he should be considered  righteous, for he is going on the right path.
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आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (10)

आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (10)
__________________________

’सः’ / ’saḥ’ - वह,  

अध्याय 10, श्लोक 3,

यो मामजननादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
असम्मूढः मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
--
(यः माम् अजम् अनादिम् च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
असम्मूढः सः मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥)
--
भावार्थ :
जो मुझको (अर्थात् आत्मा के स्वरूप को) अजन्मा, अनादि और जगत् के परमेश्वर की तरह से जानता है, वह प्रज्ञावान् पुरुष मृत्युलोक में होनेवाले समस्त पापों से छूट जाता है ।
--
 
अध्याय 10, श्लोक 7,
--
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ।
सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥
--
(एताम् विभूतिम् योगम् च मम यः वेत्ति तत्त्वतः ।
सः अविकम्पेन योगेन युज्यते न अत्र संशयः ॥)
--
जो पुरुष मेरी परमैश्वर्यरूपी विभूति तथा योग(सामर्थ्य) को, इन्हें  तत्त्वतः जानता है,  वह अविकम्पित अचल भक्तियोग से युक्त हो जाता है, इस बारे में संशय नहीं ।
 
--
’सः’ / ’saḥ’ - He,

Chapter 10, shloka 3,
yo māmajananādiṃ ca
vetti lokamaheśvaram |
asammūḍhaḥ sa martyeṣu
sarvapāpaiḥ pramucyate ||
--
(yaḥ mām ajam anādim ca
vetti lokamaheśvaram |
asammūḍhaḥ saḥ martyeṣu
sarvapāpaiḥ pramucyate ||)
--
One who knows I AM birth-less, beginning-less Lord Supreme of all beings and their respective Loka, such a wise man of pure understanding is released from all sins that mortals tend to commit.
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Chapter 10, shloka 7,
--
etāṃ vibhūtiṃ yogaṃ ca
mama yo vetti tattvataḥ |
so:'vikampena yogena
yujyate nātra saṃśayaḥ ||
--
(etām vibhūtim yogam ca
mama yaḥ vetti tattvataḥ |
saḥ avikampena yogena
yujyate na atra saṃśayaḥ ||)
--
One who realizes the Essence of My Divine forms ( vibhūti ) and the Power associated with them, and My  (yoga-aiśvarya ) / infinite potential, He attains the unwavering devotion ( acala bhakti ) towards Me.
--

आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (11)

आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (11)
__________________________

’सः’ / ’saḥ’ - वह,

अध्याय 11, श्लोक 14,
ततः विस्मयाविष्टो  हृष्टरोमा धनञ्जयः ।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत  ॥
--
(ततः सः विस्मयाविष्टः हृष्टरोमाः धनञ्जयः ।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिः अभाषत ॥)
--
भावार्थ :
--
तब विस्मय से आविष्ट हृष्टरोम धनञ्जय (अर्जुन) ने सिर झुकाकर दोनों हथेलियों की अञ्जलि बनाते हुए भगवान् को प्रणाम करते हुए यह कहा , …।
--
अध्याय 11, श्लोक 55,
--
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः मामेति पाण्डव ॥
--
(मत्कर्म-कृत्-मत्परमः मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः सः माम् एति पाण्डव ॥)
--
भावार्थ :
हे पाण्डुपुत्र अर्जुन! जो पुरुष मेरे लिए ही (प्रारब्धवश प्राप्त हुए) आसक्तिरहित होकर, सम्पूर्ण कर्मों को करता है (और उन्हें मुझे ही अर्पित करता है), जो सभी प्राणियों से वैररहित है, ऐसा मेरा वह भक्त मुझे ही प्राप्त होता है ।
--
’सः’ / ’saḥ’ - He,

Chapter 11, shloka 14,

tataḥ sa vismayāviṣṭo
hṛṣṭaromā dhanañjayaḥ |
praṇamya śirasā devaṃ
kṛtāñjalirabhāṣata  ||
--
(tataḥ saḥ vismayāviṣṭaḥ
hṛṣṭaromāḥ dhanañjayaḥ |
praṇamya śirasā devaṃ
kṛtāñjaliḥ abhāṣata ||)
--
Meaning :
Filled with amazement, and his hair standing on end, bowing his head, with folded hands,
Arjuna said thus; ... ...
--
Chapter 11, shloka 55,

matkarmakṛnmatparamo
madbhaktaḥ saṅgavarjitaḥ |
nirvairaḥ sarvabhūteṣu
yaḥ sa māmeti pāṇḍava ||
--
(matkarma-kṛt-matparamaḥ
madbhaktaḥ saṅgavarjitaḥ |
nirvairaḥ sarvabhūteṣu
yaḥ saḥ mām eti pāṇḍava ||)
--
Meaning :
One Who dedicates all actions to Me, Who works for Me only, Who is committed to Me, devoid of all attachment, and having enmity with no one, attains Me O pāṇḍava (arjuna)!
--


Friday, April 25, 2014

आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (12)

आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (12)
__________________________

’सः’ / ’saḥ’ - वह,

अध्याय 12, श्लोक 14,

सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
मय्यर्पितमनिबुद्धिर्यो मद्भक्तः मे प्रियः ॥
--
(सन्तुष्टः सततम् योगी यतात्मा दृड्ढनिश्चयः ।
मयि-अर्पित-मनोबुद्धिः यः मे भक्तः सः मे प्रियः ॥)
--
भावार्थ :
वह योगी, मेरा वह भक्त, जो निरंतर मुझमें अर्पित मन एवं बुद्धियुक्त हुआ सन्तुष्ट रहता है, मेरा प्रिय है ।
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अध्याय 12, श्लोक 15,
--
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः च मे प्रियः ॥
--
(यस्मात् न उद्विजते लोकः लोकात् न उद्विजते च यः ।
हर्ष-अमर्ष-भय-उद्वेगैः मुक्तः यः  सः च मे प्रियः ॥)
--
भावार्थ :
जिससे कोई दूसरा उद्वेग को नहीं प्राप्त होता और जो स्वयं भी किसी दूसरे से उद्वेग को नहीं प्राप्त होता, जो हर्ष, ईर्ष्याजनित क्लेश, भय आदि से उत्पान उद्वेगों से रहित है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है ।
--

अध्याय 12, श्लोक 16,
--
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः मे प्रियः ॥
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(अनपेक्षः शुचिः दक्षः उदासीनः गतव्यथः ।
सर्व-आरम्भ-परित्यागी यः मद्भक्तः सः मे प्रियः ॥)
--
भावार्थ :
जो किसी भी आकाङ्क्षा से रहित, बाहर-भीतर की शुद्धता के प्रति सजग, पक्षपात से रहित है, जिसकी व्यथाएँ विलीन हो चुकी हैं, जो कर्तृत्व ( 'मैं कर्ता हूँ' - इस )  बुद्धि से ग्रस्त नहीं है, ऐसा मेरा भक्त, मुझे प्रिय है ।
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अध्याय 12, श्लोक 17,

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः मे प्रियः ॥
--
(यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।
शुभ-अशुभ-परित्यागी भक्तिमान् यः सः मे प्रियः ॥)
--
भावार्थ :
जो न इष्ट वस्तु की प्राप्ति में हर्षित और न अनिष्ट की प्राप्ति में उद्विग्न होता है, जो न शोक करता है, न कामना, शुभ और अशुभ दोनों को समान समझता हुआ दोनों को त्याग देनेवाला मेरा भक्त मुझे प्रिय है ।
--
’सः’ / ’saḥ’ - he,

Chapter 12, shloka 14,
santuṣṭaḥ satataṃ yogī
yatātmā dṛḍhaniścayaḥ |
mayyarpitamanobuddhir-
yo madbhaktaḥ sa me priyaḥ ||
--
(santuṣṭaḥ satatam yogī
yatātmā dṛḍḍhaniścayaḥ |
mayi-arpita-manobuddhiḥ
yaḥ me bhaktaḥ saḥ me priyaḥ ||)
--
Meaning :
Allways contented, abiding in Me moment to moment, and has firm resolve of practicing yoga. Having dedicated mind and intellect to Me,  such a devotee is beloved to Me.
--

Chapter 12, shloka 15,
yasmānnodvijate loko
lokānnodvijate ca yaḥ |
harṣāmarṣabhayodvegair-
mukto yaḥ sa ca me priyaḥ ||
--
(yasmāt na udvijate lokaḥ
lokāt na udvijate ca yaḥ |
harṣa-amarṣa-bhaya-udvegaiḥ
muktaḥ yaḥ ca saḥ me priyaḥ ||)
--
Meaning :
One who does not annoy the world, nor is annoyed by the world, who is free from Elation, anger, fear and anxiety, such a devotee is dear to Me.
--
Chapter 12, shloka 16,

anapekṣaḥ śucirdakṣa
udāsīno gatavyathaḥ |
sarvārambhaparityāgī
yo madbhaktaḥ sa me priyaḥ ||
--
(anapekṣaḥ śuciḥ dakṣaḥ
udāsīnaḥ gatavyathaḥ |
sarva-ārambha-parityāgī
yaḥ madbhaktaḥ saḥ me priyaḥ ||)
--
Meaning :
One who expects nothing, pure and clean in life, heart and mind, careful, unattached, has overcome misery,  Takes no intiative in any enterprise (since has got rid of the sense, 'I do, and actions are done by me'.), such a devotee is beloved to Me.
--

Chapter 12, shloka 17,
yo na hṛṣyati na dveṣṭi
na śocati na kāṅkṣati |
śubhāśubhaparityāgī
bhaktimānyaḥ sa me priyaḥ ||
--
(yo na hṛṣyati na dveṣṭi
na śocati na kāṅkṣati |
śubha-aśubha-parityāgī
bhaktimān yaḥ saḥ me priyaḥ ||)
--
Meaning :
My devotee who neither rejoices when a desired result is achieved, nor is disappointed if an undesired and unfavorable one is obtained by him, is beloved to Me.
--

आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (13)

आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (13)
__________________________

अध्याय 13, श्लोक 3,
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् ।
च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥
--
(तत् क्षेत्रम् यत् च यादृक् च यत् विकारी यतः च यत् ।
सः च यः यत्-प्रभावः च तत् समासेन मे श्रुणु ॥)
--
भावार्थ :
वह क्षेत्र (जिसे इस अध्याय के प्रथम क्षेत्र में ’शरीर’ कहा गया है) जो कुछ है, और जैसा (उसका स्वरूप और वास्तविकता) है, वह जिसका विकार है, और जिसके, जिस (कारण) से इस विकाररूपी इस क्षेत्र (के रूप) में परिणत हुआ है, वह जो और जैसे प्रभाववाला है, उसका साररूप में  वर्णन मुझसे सुनो ।
--
टिप्पणी :
श्रीमद्भग्वद्गीता के शाङ्करभाष्य में अध्याय तीन का प्रथम श्लोक इस प्रकार है :
श्रीभगवानुवाच :
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ।
--
(इदम् शरीरम् कौन्तेय क्षेत्रम् इति अभिधीयते ।
एतत् यः वेत्ति तम् प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तत् विदुः ॥)
--
किन्तु गीता के कुछ अन्य भाष्यों में ( और शायद हस्तलिखित हस्तलिखित प्राचीन प्रतियों में भी) अध्याय 13 का प्रारंभ निम्न श्लोक से पाया जाता है :
अर्जुन उवाच :
प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।
एतत्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ॥
--
(प्रकृतिम् पुरुषम् च एव क्षेत्रम् क्षेत्रज्ञम् एव च ।
एतत्वेत्तुम् इच्छामि ज्ञानम् ज्ञेयम् च केशव ।)
--
भावार्थ :
अर्जुन बोले :
हे केशव! प्रकृति और पुरुष तथा क्षेत्र एवं क्षेत्रज्ञ के संबंध में तथा साथ ही  ज्ञान एवम् ज्ञेय के संबंध में (मुझे आपसे) जानने की इच्छा है ।
--
अध्याय 13, श्लोक 23,
--
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न भूयोऽभिजायते ॥
--
(यः एवम् वेत्ति पुरुषम् प्रकृतिम् च गुणैः सह ।
सर्वथा वर्तमानः अपि न सः भूयः अभिजायते ॥)
--
भावार्थ :
जो पुरुष को और प्रकृति को उसके गुणों के साथ इस प्रकार से जान लेता है, सब प्रकार से सारे व्यवहार करते हुए भी वह पुनः फिर जन्म नहीं लेता ।
--

अध्याय 13, श्लोक 27,
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति पश्यति ॥)
--
(समम् सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तम् परमेश्वरम् ।
विनश्यत्सु अविनश्यन्तम् यः पश्यति सः पश्यति ।)
--
भावार्थ :
नाश को प्राप्त होते रहनेवाले सब चर अचर भूतों में अविनाशी समभाव से, समान रूप से विद्यमान परमेश्वर को जो देखता है, वही (सत्य को) देखता है ।
--

अध्याय 13, श्लोक 29,
प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं पश्यति ॥
--
(प्रकृत्या एव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।
यः पश्यति तथा आत्मानम् अकर्तारम् सः पश्यति ॥)
--
भावार्थ :
समस्त कर्म प्रकृति के द्वारा ही किए जाते हैं , तथा आत्मा / अपने-आप के अकर्ता होने के सत्य को जो देखता है, वही (सत्य को) देखता है ।
--

Chapter 13, shloka 3,

tatkṣetraṃ yacca yādṛkca
yadvikāri yataśca yat |
sa ca yo yatprabhāvaśca
tatsamāsena me śṛṇu ||
--
(tat kṣetram yat ca yādṛk ca
yat vikārī yataḥ ca yat |
saḥ ca yaḥ yat-prabhāvaḥ ca
tat samāsena me śruṇu ||)
--
Meaning : Now listen from Me in short about; What is the form and nature of that dwelling place where the 'Self' lives / abides in, what kind is that place in essence and how, why and to what extent it transforms / mutates, and what affects and causes this transformation.

Note : 1.In the starting shloka of this chapter, Lord śrīkṛṣṇa tells arjuna that this body is kṣetra, and the one that knows this kṣetra, is called the kṣetrajña -one who knows. The simple dictionary meaning of this word kṣetra, is : 'dwelling-place'. Though another word for  kṣetra , as is used by the most scholars is 'field'.
2. The Chapter 13 of  śāṅkara-bhāṣya of  begins with the shloka :

श्रीभगवानुवाच :
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ।
--
(इदम् शरीरम् कौन्तेय क्षेत्रम् इति अभिधीयते ।
एतत् यः वेत्ति तम् प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तत् विदुः ॥)
--
We also find some traditions where they have the following shloka:

arjuna uvāca :

prakṛtiṃ puruṣaṃ caiva
kṣetraṃ kṣetrajñameva ca |
etatveditumicchāmi
jñānaṃ jñeyaṃ ca keśava ||
--
(prakṛtim puruṣam ca eva
kṣetram kṣetrajñam eva ca |
etatvettum icchāmi
jñānam jñeyam ca keśava |)
--
as the first shloka of this chapter 13 of śrīmadbhagvadgītā.
--
Meaning :
arjuna said :  O keśava! I want to know (from you) about the prakṛti and the puruṣa, kṣetra,  kṣetrajña  and also about jñāna and the jñeya. Let us refresh our understanding of these terms :
prakṛti .. According to The sāṅkhya, prakṛti is the principle that is inert, object of knowledge.
puruṣa .. is the consciousness principle that is the evidence of itself and of the prakṛti .
kṣetra,  .. is the 'known'.
kṣetrajña.. is the one consciousness principle, the entity that 'knows.'
jñāna.. is the Intelligence inherent in the puruṣa. Alternatively, this word jñāna is also used in the sense of knowledge / information that is basically different from Intelligence.
jñeya.. The object we know about.
--
Chapter 13, shloka 23,
ya evaṃ vetti puruṣaṃ
prakṛtiṃ ca guṇaiḥ saha |
sarvathā vartamāno:'pi
na sa bhūyo:'bhijāyate ||
--
(yaḥ evam vetti puruṣam
prakṛtim ca guṇaiḥ saha |
sarvathā vartamānaḥ api
na saḥ bhūyaḥ abhijāyate ||)
--
Meaning :
One who knows puruṣa, the prakṛti, and its 3 guṇas (attributes) though engaged outwardly in the worldy matters has no next birth.

Chapter 13, shloka 27,
samaṃ sarveṣu bhūteṣu
tiṣṭhantaṃ parameśvaram |
vinaśyatsvavinaśyantaṃ
yaḥ paśyati sa paśyati ||)
--
(samam sarveṣu bhūteṣu
tiṣṭhantam parameśvaram |
vinaśyatsu avinaśyantam
yaḥ paśyati saḥ paśyati |)
--
Meaning :
One who is aware that the Lord Imperishable as consciousness is always present there, in all beings that are born and subsequently die, is one who really observes the truth.

Chapter 13, shloka 29,
prakṛtyaiva ca karmāṇi
kriyamāṇāni sarvaśaḥ |
yaḥ paśyati tathātmāna-
makartāraṃ sa paśyati ||
--
(prakṛtyā eva ca karmāṇi
kriyamāṇāni sarvaśaḥ |
yaḥ paśyati tathātmānam
akartāram saḥ paśyati ||)
--
Meaning :
All the actions are always performed by the prakṛti only (by means of the 3 guṇa-s /attributes). And the one who observes that 'I' ( the Self ) take no part in any action really sees.
--

Thursday, April 24, 2014

आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (14),

आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (14),
__________________________

’सः’ / ’saḥ’  - वह,

अध्याय 14, श्लोक 19,

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥
--
(न अन्यम् गुणेभ्यः कर्तारम् यदा द्रष्ट अनुपश्यति ।
गुणेभ्यः च परं वेत्ति मद्भावम् सः अधिगच्छति ॥)
--
भावार्थ :
जब मनुष्य समष्टि चेतन में एकीभाव से स्थित हो जाता है, अर्थात् मन, बुद्धि, स्मृति और ’मैं’-भावना से नितांत अछूता होकर देखता है कि गुणों के सिवा दूसरा कुछ नहीं है जिसे ’कर्ता’ कहा जा सके, तब वह उन गुणों से परे अवस्थित मेरे (अपने-आपके) स्वरूप को जान लेता है और उसमें अधिष्ठित हो जाता है ।
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अध्याय 14, श्लोक 25,

मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः उच्यते ॥
--
(मान-अपमानयोः तुल्यः तुल्यः मित्र-अरि-पक्षयोः ।
सर्व-आरम्भ-परित्यागी गुणातीतः सः उच्यते ॥)
--
भावार्थ :
जो मान और अपमान होने की स्थिति में समान रूप से अविचलित है, और इसी प्रकार से मित्रों और शत्रुओं के साथ भी समभाव से स्थित है, सम्पूर्ण कर्मों के प्रारम्भ से ही कर्तृत्व के अभिमान ( ’मैं कर्ता हूँ’, -इस भावना) से रहित है, वह गुणों से अतीत कहा जाता है ।
--

अध्याय 14, श्लोक 26,

मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।
गुणान्समतीत्यैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥
--
(माम् च यः अव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।
सः गुणान् समतीत्य- एतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥)
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और जो मनुष्य विशुद्ध निष्ठापूर्वक भक्तियोगसहित मेरी सेवा (उपासना) करता है, वह इन तीनों गुणों को भलीभाँति लाँघकर, इनसे पार हुआ, सच्चिदाननद ब्रह्म से एकीभूत हो जाता है ।
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’सः’ / ’saḥ’ - He,

Chapter 14, shloka 19,
--
nānyaṃ guṇebhyaḥ kartāraṃ
yadā draṣṭānupaśyati |
guṇebhyaśca paraṃ vetti
madbhāvaṃ so:'dhigacchati ||
--
(na anyam guṇebhyaḥ kartāram
yadā draṣṭa anupaśyati |
guṇebhyaḥ ca paraṃ vetti
madbhāvam saḥ adhigacchati ||)
--
Meaning :
When one is able to see that there are these three guṇa only and nothing else that could be termed the agent (responsible for all actions), and then looks beyond them and finds out and knows the Supreme, he knows Me and attains to Me, My Real Form.
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Chapter 14, shloka 25,
mānāpamānayostulyas-
tulyo mitrāripakṣayoḥ |
sarvārambhaparityāgī
guṇātītaḥ sa ucyate ||
--
(māna-apamānayoḥ tulyaḥ
tulyaḥ mitra-ari-pakṣayoḥ |
sarva-ārambha-parityāgī
guṇātītaḥ saḥ ucyate ||)
--
Meaning :
One who is unaffected and same in honor and dishonor, who is unaffected and same in friends and enemies, and one who from the very begining of an action has given up the sense ; 'I do / I don't do', is said to have transcended the three guṇas . (attributes).


Chapter 14, shloka 26,

māṃ ca yo:'vyabhicāreṇa
bhaktiyogena sevate |
sa guṇānsamatītyaitān-
brahmabhūyāya kalpate ||
--
(mām ca yaḥ avyabhicāreṇa
bhaktiyogena sevate |
saḥ guṇān samatītya- etān
brahmabhūyāya kalpate ||)

--
Meaning :
One who serves / attends to Me with uncontaminated devotion transcends these three attributes (guṇas) and is unified with Brahman (Me).
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आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (15),

आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (15),
__________________________

’सः’ / 'saḥ'    - वह,
 
अध्याय 15, श्लोक 1,
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श्रीभगवानुवाच :
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद वेदवित् ॥
--
(ऊर्ध्वमूलम् अधःशाखम् अश्वत्थम् प्राहुः अव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यः तम् वेद सः वेदवित् ॥)
--
भावार्थ :
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा :
अस्तित्व, जीवन, मनुष्य का मन, या जगत् रूपी अश्वत्थ (पीपल) का जो वृक्ष है, जिसे अविनाशी कहा जाता है, उसके उद्गम् का मूल परमात्मा है । वेद जिसके पत्र-आदि हैं, उस (अश्वत्थ के स्वरूप) को जो जानता है, वही वेद का यथार्थ जाननेवाला है ।
--  

अध्याय 15, श्लोक 19,
--
यो मामेवसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥
--
(यः माम् एवम् असम्मूढः जानाति पुरुषोत्तमम् ।
सः सर्वविद्-भजति माम् सर्वभावेन भारत ॥)
--
भावार्थ :
मूढता से रहित निर्मल बुद्धियुक्त हुआ जो मनुष्य (ज्ञानी) मुझको ही तत्त्वतः मेरे पुरुषोत्तम स्वरूप से जानता है, वह अनायास ही सभी प्रकार से मुझे जानकर मेरा अनुगामी होकर मुझे ही अनन्य भाव से भजता है ।
--
टिप्पणी :
इस अध्याय के श्लोक 15, 16, 17, 18, तथा प्रस्तुत श्लोक में क्रमशः ’पुरुष’ एवं ’पुरुषोत्तम’ के महत्व को, आभासी भिन्नता एवं  स्वरूपगत समानता  को स्पष्ट किया गया है उस सन्दर्भ में क्रमशः आत्मा और परमात्मा को दो पुरुष कहा गया है । इसे ही मुण्डक उपनिषद् में तृतीय मुडक के प्रथम खण्ड के प्रथम श्लोक में वृक्ष पर बैठे हुए एक साथ रहनेवाले दो पक्षियों के उदाहरण से इस प्रकार से कहा है :
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया
समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्य-
नश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥
--
दृष्टव्य है कि उक्त श्लोक में जिस वृक्ष पर वे दो पक्षी बैठे हैं, वह भी अश्वत्थ या पीपल ही है, जिसकी वटी को उनमें से एक स्वाद के आकर्षण में खाता है, जबकि दूसरा जो ऊँचाई पर बैठा उसे केवल देखता है, स्वयं उन फलों को नहीं खाता । यह देहरूपी पीपल पर बसनेवाली दो सत्ताओं, आत्मा अर्थात् ’व्यक्ति’ (अन्य पुरुष) और ’परमात्मा’ (उत्तम पुरुष) के  प्रतीक हैं । संस्कृत भाषा में ’अस्मद्’ प्रत्यय को ’उत्तम पुरुष’ कहा जाता है, ’युष्मद्’ प्रत्यय को ’मध्यम पुरुष’ एवम् ’अदस्’ प्रत्यय को ’अन्य पुरुष’ कहा जाता है ।
उत्तम पुरुष (अस्मद्, ’अहम्’) सर्वभूतमात्र में अविभक्त रूप से अवस्थित है, जबकि मध्यम पुरुष सदैव कोई दूसरा किन्तु अस्मद् के सन्दर्भ में हुआ करता है । वे दोनों जिस तीसरे के बारे में वार्तालाप करते हैं वह ’अन्य पुरुष’ होता है, अर्थात् वह भी जड न होकर उत्तम पुरुष एवं मध्यम पुरुष की ही तरह चेतन सत्ता होता है । इसलिए ’पुरुषोत्तम’ का अर्थ है हमारे अपने भीतर जहाँ ’मैं’-प्रतीति होती है, उस प्रतीति का अधिष्ठान । वह है परमात्मा । भगवान श्रीकृष्ण ने इसे गीता के इस ग्रन्थ में कई प्रकार से अनेक स्थानों पर कहा है । और लगभग सभी स्थानों पर ’परमात्मा’ के लिए सीधे-सीधे प्रथम-पुरुष एकवचन ’अहम्’ / ’माम्’, ’मा’ / ’मया’/ ’मह्यम्’, ’मे’ / ’मत्’ / ’मम’, मे / तथा ’मयि’ पदों का प्रयोग किया है । हाँ और जैसा कि इस अध्याय में श्लोक 17 में देखा जा सकता है, कई स्थानों पर ’ईश्वर’ का उल्लेख ’तत्’ या ब्रह्म के अभिप्राय से भी किया है, इसमें सन्देह नहीं । इसलिए अपने हृदय में उस उत्तम पुरुष को जानने के लिए हमें अन्तःकरण चतुष्टय के अधिष्ठान को, ’व्यक्ति’-चेतना के आधारभूत चैतन्य को समझना होगा ।
--    
’सः’ / 'saḥ'  - He, That,
Chapter 15, shloka 1,

śrībhagavānuvāca :
ūrdhvamūlamadhaḥśākham-
aśvatthaṃ prāhuravyayam |
chandāṃsi yasya parṇāni
yastaṃ veda sa vedavit ||
--
(ūrdhvamūlam adhaḥśākham
aśvattham prāhuḥ avyayam |
chandāṃsi yasya parṇāni
yaḥ tam veda saḥ vedavit ||)
--
This tree aśvattha eternal, is said to be imperishable, with it's roots that come from the above (Supreme), and the branches flinging towards the ground below (The world of perceptions). The hymns of veda are but its leaves and one who knows this secret indeed knows the essence of veda.
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Chapter 15, shloka 19,
--
yo māmevasammūḍho
jānāti puruṣottamam |
sa sarvavidbhajati māṃ
sarvabhāvena bhārata ||
--
(yaḥ mām evam asammūḍhaḥ
jānāti puruṣottamam |
saḥ sarvavid-bhajati mām
sarvabhāvena bhārata ||)
--
Meaning :
One who free from delusion, such a man of wisdom, -sage, knows Me as the Supreme Being, He alone worships Me in all respects and always with his whole being.
--
Note :
To grasp the full import of this shloka, one needs to go through shloka 15 onwards of this chapter. These shloka explain the importance and meaning of puruṣa and puruṣottamam.
A brief  reference to Sanskrit Grammar here, will be of immense help to us.
In Sanskrit Language / Grammar, the 3 persons are ’अस्मद्’,'asmad’, 'युष्मद्', 'yuṣmad' and the 'अदस्', 'adas' . They mean 'I', 'you', and 'that'/ 'this', respectively.
Everyone knows and is aware of oneself always by the very instinct. This sense of just being without attributes is 'अस्मि' ' ' that is again the first person present tense of the Sanskrit root 'अस्', meaning to 'be'. This 'be' is again a distorted form of ' भू ' 'bhū'. 'अस् ' means 'is', while ' भू / bhū ' means 'becoming'.
Thus the pure sense of 'is-ness' gets changed / deformed as 'being'-ness. The Supreme ( उत्तम / uttama ) thereby becomes / occupies a secondary position of 'being'.  This secondary position of Supreme is our sense of being 'some-one'. This is 'person' / first person.
And the one who free from delusion, knows Me as the Supreme Being, He alone worships Me in all respects and always with his whole being.
A word about ' भजति ' / ' bhajati ' . This word is the simple present third person, singular form of the  Sanskrit verb-root ' भज् ' / ' bhaj ', that literally means 'to share'.
--  

Wednesday, April 23, 2014

आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (16)

आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (16),
__________________________


अध्याय 16, श्लोक 23,

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥
--
(यः शास्त्रविधिम्-उत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
सः सिद्धिम्-अवाप्नोति न सुखम् न पराम् गतिम् ॥)
--
भावार्थ :
जो मनुष्य शास्त्रसम्मत (वेदविहित) तरीके को त्यागकर अपनी इच्छा से प्रेरित हुआ मनमाना आचरण करता है उसे ध्येय-प्राप्ति नहीं होती, उसे न ही सुख प्राप्त होता है और न परम गति ।
--

Chapter 16, shloka 23,

yaḥ śāstravidhimutsṛjya
vartate kāmakārataḥ |
na sa siddhimavāpnoti
na sukhaṃ na parāṃ gatim ||
--
(yaḥ śāstravidhim-utsṛjya
vartate kāmakārataḥ |
na saḥ siddhim-avāpnoti
na sukham na parām gatim ||)
--

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Meaning :
One who ignores scriptural injunctions and acts motivated by desire, does not attain perfection, nor happiness and the goal of the supreme spiritual goal.
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आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (17)

आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’,
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’सः’ / ’saḥ’   - वह,

अध्याय 17, श्लोक 3,

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः एव सः
__
(सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
श्रद्धामयः अयम् पुरुषः यः यत्-श्रद्धः सः एव सः
--
भावार्थ :
हे भारत! सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त एवं ’मैं’-भावना रूपी चतुष्टय तथा उनका अधिष्ठान साक्षी-बुद्धि / शुद्ध चेतनता) के अनुरूप हुआ करती है । यह पुरुष श्रद्धामय है, अतएव जो पुरुष जैसी श्रद्धावाला है, वह स्वयं भी वही है ।
--
टिप्पणी:
चूँकि श्रद्धा अन्तःकरण से अभिन्न है, इसलिए जैसा अन्तःकरण होता है, मनुष्य भी बिल्कुल वही होता है । इसीलिए मनुष्य में श्रद्धा भी सात्त्विकी, तामसी या राजस या उन तीनों गुणों की उपस्थिति के अनुसार भिन्न भिन्न प्रकार की होती है ।
--

अध्याय 17, श्लोक 11,
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।
यष्टव्यनेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥
--
अफलाकाङ्क्षिभिः यज्ञः विधिदृष्टः यः इज्यते ।
यष्टव्यम् एव इति मनः समाधाय सः सात्त्विकः ॥
--
भावार्थ :
जो शास्त्रविधि से सम्मत और नियत है, यज्ञ करना ही कर्तव्य है इस प्रकार से मन का समाधान करते हुए, जिसे फल की आकाङ्क्षा न रखते हुए किया जाता है, वह सात्त्विक यज्ञ है ।
--
’सः’ / ’saḥ’ - he, that,

Chapter 17, shloka 3,

sattvānurūpā sarvasya
śraddhā bhavati bhārata |
śraddhāmayo:'yaṃ puruṣo
yo yacchraddhaḥ sa eva saḥ ||
__
(sattvānurūpā sarvasya
śraddhā bhavati bhārata |
śraddhāmayaḥ ayam puruṣaḥ
yaḥ yat-śraddhaḥ saḥ eva saḥ ||
--
Meaning :
According to the sattva, every-one has the own specific construct of mind (thought, intellect, consciousness and ego, these 4 together form the tendencies and modes of mind, and this is the inherent spontaneous instinct śraddhā, of a man) . This man is verily the śraddhā, so one is of the kind, what-ever and of what-so-ever kind is the inborn tendencies of the mind / śraddhā, he has from the birth.
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Chapter 17, shloka 11,

aphalākāṅkṣibhiryajño
vidhidṛṣṭo ya ijyate |
yaṣṭavyaneveti manaḥ
samādhāya sa sāttvikaḥ ||
--
aphalākāṅkṣibhiḥ yajñaḥ
vidhidṛṣṭaḥ yaḥ ijyate |
yaṣṭavyam eva iti manaḥ
samādhāya saḥ sāttvikaḥ ||
--

Meaning :
The sacrifice, that is performed because it is a duty without expecting any favorable result, and is in according to the the injunctions of the scriptures, is sāttvika in essence.
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आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (18)

आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’
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’सः’ / ’saḥ’  - वह

अध्याय 18, श्लोक 8,

दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।
कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥
--
(दुःखम् इति एव यत् कर्म काय-क्लेश-भयात् त्यजेत् ।
सः कृत्वा राजसम् त्यागम् न एव कर्मफलम् लभेत् ॥)

भावार्थ :
कर्ममात्र ही दुःखरूप (क्लेश का कारण) है, ऐसा सोचकर यदि कोई शरीर को क्लेश न उठाना पड़े इस भय से कर्तव्य कर्मों का करना भी त्याग दे तो इस प्रकार का राजस त्याग करने पर, इस त्याग के फल की प्राप्ति भी उसे नहीं होती ।
--
 
अध्याय 18, श्लोक 9,
कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन ।
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव त्यागः सात्त्विको मतः ॥
--
(कार्यम् इति एव यत् कर्म नियतम् क्रियते अर्जुन ।
सङ्गम् त्यक्त्वा फलम् च एव सः त्यागः सात्त्विकः मतः ॥)
--
भावार्थ :
शास्त्रविहित त्याग, अर्थात् ऐसा कर्म जिसे करना कर्तव्य है, जो कर्तव्य के रूप में प्राप्त हुआ है, आसक्ति से रहित होकर तथा फल की अभिलाषा न करते हुए जिसे किया जाना चाहिए, वही त्याग सात्त्विक है ।
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अध्याय 18, श्लोक 11,
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।
यस्तु कर्मफलत्यागी त्यागीत्यभिधीयते ॥
--
(न हि देहभृता शक्यम् त्यक्तुम् कर्माणि अशेषतः ।
यस्तु कर्मफलत्यागी सः त्यागी इति अभिधीयते ॥)
--
क्योंकि किसी भी देहधारी के लिए यह तो संभव ही नहीं कि वह कर्ममात्र को, सभी कर्मों को त्याग दे । हाँ, यह अवश्य ही संभव है कि वह (कर्म के फल में आसक्ति न रखते हुए, इस प्रकार) कर्मफल को ही त्याग दे, और वह (ऐसा मनुष्य) वास्तविक त्यागी जाना जाता है ।
टिप्पणी :
और इस प्रकार से ’त्याग’ करने की योग्यता उसे ही प्राप्त होती है जो ’सांख्य-योग’ अर्थात् ’बुद्धि-योग’ से ’कर्ता’ के स्वरूप का अनुसंधान करता हुआ एक चैतन्यघन परमात्मा से ही सब कुछ उद्भूत्, अवस्थित और पुनः विलीन होता है, इस निष्ठा को प्राप्त हो जाता है । पुनः इस निष्ठा को प्राप्त होने हेतु भी पात्रता / अधिकारिता का होना अपरिहार्य है । और यह विवेक, वैराग्य, शम-दम आदि षट्-संपत्ति तथा मुमुक्षा के परिपक्व होने पर अपने आप होता है । तब मनुष्य के हृदय में अवस्थित वह तत्व स्वयं ही अनुग्रह करता है, जिसकी आवरण और विक्षेप शक्ति के कारण इससे पहले तक जीव अज्ञान में डूबा हुआ होता है ।
--
अध्याय 18, श्लोक 16,

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः ।
पश्यत्यकृतबुद्धिवान्न पश्यति दुर्मतिः ॥
--
(तत्र एवम् सति कर्तारम् आत्मानम् केवलम् तु यः ।
पश्यति अकृतबुद्धित्वात् न सः पश्यति दुर्मतिः ॥)
--
भावार्थ :
जैसा अध्याय 3 के श्लोक 27, में संक्षेप में कहा गया है, उसका ही विस्तार से वर्णन करते हुए इस अध्याय के पिछले श्लोकों में ’कर्म’ के होने के बारे में, ’कर्म’ के स्वरूप पर विवेचन में यह स्पष्ट किया गया है कि सारे ’कर्म’ प्रकृति के द्वारा उसके तीन गुणों के माध्यम से संपन्न किए जाते हैं, किन्तु अहंकार-बुद्धि से मोहित मनुष्य ’मैं कर्ता हूँ ।’ इस मान्यता से ग्रस्त हो जाया करता है ।...
(सारे ’कर्म’ प्रकृति के द्वारा उसके तीन गुणों के माध्यम से संपन्न किए जाते हैं) ऐसा होते हुए भी, इस सच्चाई को केवल बुद्धिमान ही देख पाता है, जबकि जो मनुष्य केवल अपने-आपके ही स्वतन्त्र कर्ता होने की मान्यता से ग्रस्त होता है, दुर्बुद्धि से ग्रस्त वह मूढमति, इसे नहीं देख पाता ।
--
[ टिप्पणी :
श्लोक 3, अध्याय 27,
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥
--
(प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहङ्कारविमूढ-आत्मा कर्ता-अहम्-इति मन्यते ।)
--
भावार्थ :
सभी कर्म बिना किसी अपवाद के, प्रकृति के ही (तीन) गुणों के माध्यम से घटित हुआ करते हैं । किन्तु ’मैं-बुद्धि’ के अभिमान से विमूढ मनुष्य ’मैं कर्ता हूँ’ यह मान्य कर बैठते हैं । ]
--


अध्याय 18, श्लोक 17,
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
हत्वापि इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥
*
( यस्य न अहंकृतः भावः बुद्धिः यस्य न लिप्यते ।
हत्वा-अपि इमान् लोकान्  न हन्ति न निबध्यते ॥)
--
भावार्थ :
जिस मनुष्य के मन में 'मैं कर्ता हूँ' ऐसी भावना नहीं है, और जिसकी बुद्धि इस भावना से अलिप्त होती है, वह इन समस्त लोकों को मारकर भी वस्तुतः न तो किसी की हत्या करता है, और न हत्या के इस पाप का भागी ही होता है ।
--
अध्याय 18, श्लोक 71,
--
श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः ।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥
--
(श्रद्धावान् अनसूयः च शृणुयात् अपि यः नरः ।
सः अपि मुक्तः शुभान् लोकान् प्राप्नुयात् पुण्यकर्मणाम् ॥)
--
भावार्थ :
जो मनुष्य श्रद्धायुक्त और इस शास्त्र में दोषदृष्टि न रखता हुआ इसे श्रवण भी करेगा, वह भी (पापों से) मुक्त होकर उत्तम कर्मकरनेवालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होगा ।
--

’सः’ / 'saḥ' - he, that

Chapter 18, shloka 8,
--
duḥkhamityeva yatkarma
kāyakleśabhayāttyajet |
sa kṛtvā rājasaṃ tyāgaṃ
naiva tyāgaphalaṃ labhet ||
--
(duḥkham iti eva yatkarma
kāya-kleśa-bhayāt tyajet |
saḥ kṛtvā rājasam tyāgam
na eva karmaphalaṃ labhet ||)
--
Meaning :
Because the Action causes pain and discomfort to body, renouncing of such an obligatory duty, is a kind of  rājasa tyāga and is in vain, because yields no fruit of renunciation what-so-ever.
--
Note : the fruit of renuciation is mentle peace and harmony, which is not attained when one renounces the duties, because of compulsion or fear.
See next shloka that explains how a sāttvikaḥ tyāga is different from rājasa tyāga .

Chapter 18, shloka 9,

kāryamityeva yatkarma
niyataṃ kriyate:'rjuna |
saṅgaṃ tyaktvā phalaṃ caiva
sa tyāgaḥ sāttviko mataḥ ||
--
(kāryam iti eva yatkarma
niyatam kriyate arjuna |
saṅgam tyaktvā phalaṃ ca eva
saḥ tyāgaḥ sāttvikaḥ mataḥ ||)
--
Meaning :
The action that is performed for the sake of duty, without no attachment or anticipation of anything in return, it is sAttvika action, arjuna!
--
Chapter 18, shloka 11,
na hi dehabhṛtā śakyaṃ
tyaktuṃ karmāṇyaśeṣataḥ |
yastu karmaphalatyāgī
sa tyāgītyabhidhīyate ||
--
(na hi dehabhṛtā śakyam
tyaktum karmāṇi aśeṣataḥ |
yastu karmaphalatyāgī
saḥ tyāgī iti abhidhīyate ||)
--
Meaning :
As long as the sense of identity with the body persists, it is not possible for one togive up actions completely. But it is always possible to give up the fruits of action and one who understands and can do so, is a tyāgī indeed.

Chapter 18, shloka 16,

tatraivaṃ sati kartāram-
ātmānaṃ kevalaṃ tu yaḥ |
paśyatyakṛtabuddhivān-
na sa paśyati durmatiḥ ||
--
(tatra evam sati kartāram
ātmānam kevalam tu yaḥ |
paśyati akṛtabuddhitvāt
na saḥ paśyati durmatiḥ ||)
--
Meaning :
In the earlier shlokas 1 to 15 of this chapter 18,  the nature and essence of 'karma' has been explained in detail, and one who can renounce the Action by a right understanding of how originally a 'karma' / Action takes  place, only because by means of 3 guṇa, (attributes) of  prakṛti arranges so, can easily get rid of the false notion; 'I do / I do not do (perform) any action.'
Further help in this can be obtained by the shloka 27 of chapter 3, where the same truth has been pointed out in the following words:

prakṛteḥ kriyamāṇāni
guṇaiḥ karmāṇi sarvaśaḥ |
ahaṅkāravimūḍhātmā
kartāhamiti manyate ||
--
(prakṛteḥ kriyamāṇāni
guṇaiḥ karmāṇi sarvaśaḥ |
ahaṅkāravimūḍha-ātmā
kartā-aham-iti manyate || )
--
Meaning :
All actions happen, because by means of 3 guṇa, (attributes), prakṛti arranges so, but the man under the illusion / false notion of ego and thence by 'I do / I have to do'-idea, accepts himself as the one responsible for them. (If this idea could be seen as a false notion only, one at once renounces the fruit of action as well.)
--



Chapter 18, shloka 17,

yasya nāhaṃkṛto bhāvo
buddhiryasya na lipyate |
hatvāpi sa imām̐llokān-
na hanti na nibadhyate ||
*
( yasya na ahaṃkṛtaḥ bhāvaḥ
 buddhiḥ yasya na lipyate |
hatvā-api sa imān lokān
na hanti na nibadhyate ||)
--

Meaning :
One who is not possessed by ego, and whose intellect is not entangled, though he may appear killing men in this world, does not kill at all. Nor is he bound by his actions and the sins consequent to them.
--
Chapter 18, shloka 71,
--
śraddhāvānanasūyaśca
śṛṇuyādapi yo naraḥ |
so:'pi muktaḥ śubhām̐llokān-
prāpnuyātpuṇyakarmaṇām ||
--
(śraddhāvān anasūyaḥ ca
śṛṇuyāt api yaḥ naraḥ |
saḥ api muktaḥ śubhān lokān
prāpnuyāt puṇyakarmaṇām ||)
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Meaning :
One who with full trust, and with no doubts what-so-ever in the truth of this text, listens to this holy scripture, shall be freed of  all karma and shall attain the holy loka of auspicious beings.
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