Tuesday, April 29, 2014

आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (6)

आज का श्लोक, ’सः’ / ’saḥ’ (6)
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’सः’ / 'saḥ'  -  वह,

अध्याय 6, श्लोक 1,
श्रीभगवानुवाच :
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥
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(अनाश्रितः कर्मफलम् कार्यम् कर्म करोति यः ।
सः सन्न्यासी च योगी च न निरग्निः न च अक्रियः ॥)
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भावार्थ :
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं  - वह नहीं, जो कि  हठपूर्वक अग्नि को नहीं छूता, या दूसरे सारे कर्मों को त्याग देता है, बल्कि वह पुरुष  जो कि कर्म के फल पर आश्रित नहीं होता, अर्थात् फल अनुकूल या प्रतिकूल क्या होता है इस विषय में जिसका कोई आग्रह नहीं होता, और जो अपने लिए निर्धारित कर्तव्य को पूर्ण करने रूपी कर्म में संलग्न होता है, वास्तविक अर्थों में संन्यासी (जिसने कर्म को त्याग दिया है) और वही कर्मयोगी अर्थात् कर्म करते हुए भी उसे मोक्ष का साधन बना लेने में कुशल योगी होता है ।
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अध्याय 6, श्लोक 23,

तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम् ।
निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥
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(तम् विद्यात् दुःखसंयोग-वियोगम् योगसञ्ज्ञितम् ।
सः निश्चयेन योक्तव्यो योगः अनिर्विण्णचेतसा ॥)
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भावार्थ :
जो दुःख के संयोग से विरहित है -अर्थात् जिसमें दुःख का नितान्त अभाव है, जिसे योग की संज्ञा दी जाती है -अर्थात् जो ऐसा योग है, उसे इस प्रकार से निश्चयपूर्वक जानकर, उस योग को धैर्यसहित, बिना उकताए, अथक् प्रयास सहित, उत्साहपूर्ण चित्त से सिद्ध किया जाना चाहिए ।
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अध्याय 6, श्लोक 30,
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि च मे न प्रणश्यति ॥
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(यः माम् पश्यति सर्वत्र सर्वम् च मयि पश्यति ।
तस्य अहं न प्रणश्यामि सः च मे न प्रणश्यति ॥)
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भावार्थ :
जो मुझको (अपने-आपको) सर्वत्र देखता है तथा जो सबको मुझमें (अपने-आप ही में) अवस्थित देखता है, न तो उसके अस्तित्व मैं नष्ट होने देता हूँ और न ही वह मुझे (अपनी निज आत्मा / परमात्मा को) नष्ट होने देता है ।
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अध्याय 6, श्लोक 31,

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि योगी मयि वर्तते ॥
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(सर्वभूतस्थितम् यः माम् भजति-एकत्वम्-आस्थितः ।
सर्वथा वर्तमानः अपि सः योगी मयि वर्तते ॥)
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भावार्थ :
जो मनुष्य सब भूतों में अवस्थित मुझ परमात्मा को अपने-आपकी अनन्यता मुझसे होने की भावना में अवस्थित हुआ मुझे भजता है, सब प्रकार के लौकिक कार्यों में व्यवहारसंलग्न रहते हुए भी, वह योगी वस्तुतः मुझमें ही व्यवहाररत होता है ।
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अध्याय 6, श्लोक 32,

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं योगी परमो मतः ॥
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(अत्मौपम्येन सर्वत्र समम् पश्यति यः अर्जुन ।
सुखम् वा यदि वा दुःखम् सः योगी परमः मतः ॥
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भावार्थ :
हे अर्जुन! सुख हो अथवा दुःख, अपने लिए हो या दूसरों के लिए, जो योगी उन्हें समभाव से देखता है वह योगी परम श्रेष्ठ कहा जाता है ।
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अध्याय 6, श्लोक 44,
पूर्वाभ्यासेन तेनैव  ह्रियते ह्यवशोSपि  सः
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्माति वर्तते ॥
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(पूर्वाभ्यासेन तेन एव ह्रियते हि-अवशः अपि सः
जिज्ञासुः अपि योगस्य शब्दब्रह्म-अतिवर्तते ॥)
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भावार्थ :
जिस योगी की मृत्यु योग की पूर्णता को प्राप्त करने से पहले हो जाती है, ऐसा मनुष्य भी अपने संस्कारों के बल से खींचा जाकर किसी उपयुक्त कुल में जन्म लेता है, जहाँ उसे ऐसा उचित वातावरण मिलता  है, जिससे वह पुनः सम्यक मार्ग को ग्रहण कर लेता है ।
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अध्याय 6, श्लोक 47,
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।
श्रद्धावान्भजते यो मां मे युक्ततमो मतः ॥
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(योगिनाम् अपि सर्वेषाम् मद्गतेन अन्तरात्मना ।
श्रद्धावान् भजते यो माम् सः मे युक्ततमः मतः ॥)
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भावार्थ :
समस्त योगियों में भी पुनः वह योगी, जो अपनी अन्तरात्मा में मुझको जानकर मुझमें प्रविष्ट और समाहित हुआ है, ऐसा श्रद्धान्वित, जो मुझे इस प्रकार से भजता है मेरे मत में श्रेष्ठ योगी है ।
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’सः’ / 'saḥ' - he,

Chapter 6, shloka 1,

śrībhagavānuvāca :

anāśritaḥ karmaphalaṃ
kāryaṃ karma karoti yaḥ |
sa sannyāsī ca yogī ca
na niragnirna cākriyaḥ ||
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(anāśritaḥ karmaphalam
kāryam karma karoti yaḥ |
saḥ sannyāsī ca yogī ca
na niragniḥ na ca akriyaḥ ||)
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Meaning :
bhagavān (Lord) śrīkṛṣṇa said -
Neither the one who has taken a vow of touching not the fire (that means begging for the food and not cook oneself, a condition a traditional saṃnyāsī is expected to observe), nor one who abstains from all other such works in order to live as one, but he, who without thinking of and depending upon the result of actions, performs his duties is  a true yogī  or  saṃnyāsī .  
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Chapter 6, shloka 23,

taṃ vidyādduḥkhasaṃyoga-
viyogaṃ yogasañjñitam |
sa niścayena yoktavyo
yogo:'nirviṇṇacetasā ||
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(tam vidyāt duḥkhasaṃyoga
-viyogam yogasañjñitam |
saḥ niścayena yoktavyo
yogaḥ anirviṇṇacetasā ||)
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Meaning :
Know what is named 'yoga', is that which results in the end of association of sorrow. This should be carefully understood with conviction that such a state is achieved by firm resolve, untiring and zealous spirit.
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Chapter 6, shloka 30,

yo māṃ paśyati sarvatra
sarvaṃ ca mayi paśyati |
tasyāhaṃ na praṇaśyāmi
sa ca me na praṇaśyati ||
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(yaḥ mām paśyati sarvatra
sarvam ca mayi paśyati |
tasya ahaṃ na praṇaśyāmi
saḥ ca me na praṇaśyati ||)
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Meaning :
One who everywhere finds and sees Me, and likewise, everything in Me, is not lost sight of Me, nor I lose sight of him [is not lost to Me, nor I to him].

Chapter 6, shloka 31,

sarvabhūtasthitaṃ yo māṃ
bhajatyekatvamāsthitaḥ |
sarvathā vartamāno:'pi
sa yogī mayi vartate ||
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(sarvabhūtasthitam yaḥ mām
bhajati-ekatvam-āsthitaḥ |
sarvathā vartamānaḥ api
saḥ yogī mayi vartate ||)
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Meaning :
One who sharing Me, -the One Who abides in all beings, though deals without conflict in the worldly matters also, such a yogī truly dwells in Me.


Chapter 6, shloka 32,
ātmaupamyena sarvatra
samaṃ paśyati yo:'rjuna |
sukhaṃ vā yadi vā duḥkhaṃ
sa yogī paramo mataḥ ||
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(atmaupamyena sarvatra
samam paśyati yaḥ arjuna |
sukham vā yadi vā duḥkham
saḥ yogī paramaḥ mataḥ ||)
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Meaning :
One who sees the same 'Self' in oneself and everywhere (and all other beings as well) and shares the pains and pleasures of all as his own is a yogI exalted indeed, O arjuna!
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Chapter 6, shloka 44,

pūrvābhyāsena tenaiva
hriyate hyavaśoSpi  saḥ |
jijñāsurapi yogasya
śabdabrahmāti vartate ||
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(pūrvābhyāsena tena eva
hriyate hi-avaśaḥ api saḥ |
jijñāsuḥ api yogasya
śabdabrahma-ativartate ||)
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Meaning :
A yogI, the aspirant for Truth, never falls from the path of yoga, Though if  dies before reaching the goal of Self-realization, because 'drawn' by the force of the latent tendencies (sanskAra), he is 'reborn' in a noble clan  where he comes again in touch with the right teachings that leads him onto the right path.

Chapter 6, shloka 47,
yogināmapi sarveṣāṃ
madgatenāntarātmanā |
śraddhāvānbhajate yo māṃ
sa me yuktatamo mataḥ ||
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(yoginām api sarveṣām
madgatena antarātmanā |
śraddhāvān bhajate yo mām
saḥ me yuktatamaḥ mataḥ ||)
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Meaning :
Of all the yogī-s, One who has entered me through the heart, one who shares deep love with me, is truly the greatest and the most beloved to Me.
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