Thursday, April 10, 2014

आज का श्लोक, ’सामासिकस्य’ / 'sAmAsikasya',

आज का श्लोक, ’सामासिकस्य’ / 'sAmAsikasya',
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’सामासिकस्य’ / 'sAmAsikasya', वैयाकरणों का, व्याकरणकारों का,

अध्याय 10, श्लोक 33,

अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च ।
अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ॥
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(अक्षराणाम् अकारः अस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च ।
अहम् एव अक्षयः कालः धाता अहम् विश्वतोमुखः ॥)
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भावार्थ :
वर्णाक्षरों में ’अ’-कार हूँ, सामासिकों / वैयाकरणों में द्वन्द्व । मैं ही अनन्त विस्तारवाला काल, और सब ओर मुख वाला सर्वतोमुखी सबको धारण करनेवाला, आश्रय ।

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’सामासिकस्य’ / 'sAmAsikasya', - of grammarians of Sanskrit.

Chapter 10, shloka 33,
akSharANAmakAro'smi
dvandvaH sAmAsikasya cha |
ahamevAkShayaH kAlo
dhAtAhaM vishvatomukhaH ||
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Of letters in alphabets, I AM the letter 'A'. Of grammarians, I AM the binary-dual-compound-word. I AM again the Time, the eternity, I AM the reservoir that holds and protects the entire universe.
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