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Thursday, August 15, 2019

अविकम्पेन, अविकार्यः, अविज्ञेयम्, अविद्वांसः

श्रीमद्भगवद्गीता
शब्दानुक्रम -Index 
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अविकम्पेन 10/7,
अविकार्यः 2/25,
अविज्ञेयम् 13/15,
अविद्वांसः 3/25,
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Friday, August 9, 2019

अन्तिके, अन्ते, अन्नसंभवः, अन्नम्

श्रीमद्भगवद्गीता
शब्दानुक्रम -Index 
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अन्तिके 13/15,
अन्ते 7/19, 8/6,
अन्नसंभवः 3/14,
अन्नम् 15/14,
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अन्तः

श्रीमद्भगवद्गीता
शब्दानुक्रम -Index
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अन्तः 2/16, 10/19, 10/20, 10/32, 10/40, 13/15, 15/3,
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टिप्पणी :
गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित श्रीमद्भगवद्गीता के शांकरभाष्य (संवत्  2072, पुस्तक सं. 10)
से उपरोक्त शब्दानुक्रम यहाँ उद्धृत किया गया है।
अकारादिवर्णानुक्रम में दिए गए 'अन्तः' शब्द के साथ प्रूफ की त्रुटि से 2/16 के स्थान पर २-९६ मुद्रित है,
कृपया नोट करें।
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Wednesday, July 31, 2019

अघम्, अघायुः, अङ्गानि, अचरम्

श्रीमद्भगवद्गीता
शब्दानुक्रम -Index
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अघम् 3/13,
अघायुः 3/16,
अङ्गानि 2/58,
अचरम् 13/15,
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Monday, March 24, 2014

आज का श्लोक, ’सूक्ष्मत्वात्’ / 'sUkShmatvAt'

आज का श्लोक, ’सूक्ष्मत्वात्’ / 'sUkShmatvAt'
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’सूक्ष्मत्वात्’ / 'sUkShmatvAt' -सूक्ष्म, बारीक, महीन होने से,

अध्याय 13, श्लोक 15,

बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च ।
सूक्ष्मत्वादविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥

(बहिः अन्तः च भूतानाम् अचरम् चरम् एव च ।
सूक्ष्मत्वात् अविज्ञेयं दूरस्थम् च अन्तिके च यत् ॥

भावार्थ :
वह, जो सभी चर एवं अचर भूतों के रूप में तथा उनसे भीतर-बाहर भी है, जो दूर से दूर एवं निकट से भी समीप है, सर्वाधिक सूक्ष्म होने के कारण मन-बुद्धि एवं इन्द्रियों की पकड़ में नहीं आ पाता ।  
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’सूक्ष्मत्वात्’ / 'sUkShmatvAt' - because is subtle-most.
Chapter 13, shloka 15,
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bahirantashcha bhUtAnAM
acharaM charameva cha |
sUkShmatvAdavijneyaM
dUrasthaM chAntike cha tat ॥
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Meaning :
That (Brahman), Who dwells within and without, in all beings and beyond them, He is farther than the farthest and near than the nearest, being subtle-most, is beyond the grasp of the senses, mind or intellect.
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