Monday, June 30, 2014

आज का श्लोक, ’सर्वतः’ / ’sarvataḥ’

आज का श्लोक,  ’सर्वतः’ /  ’sarvataḥ’ 
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’सर्वतः’ /  ’sarvataḥ’  - सब ओर से,

अध्याय 2, श्लोक 46,

यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके ।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥
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(यावान्-अर्थः उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके ।
तावान्-सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥)
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भावार्थ : ब्रह्म के तत्व को जो जान चुका होता है, उस ब्राह्मण का वेदों से उतना ही प्रयोजन होता है, जितना कि हर ओर जल से परिपूर्ण विशाल सरोवर प्राप्त होने पर किसी मनुष्य का छोटे से तालाब से होता है ।
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अध्याय 11, श्लोक 16,

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं
पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं
पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥
--
(अनेकबाहु-उदरवक्त्रनेत्रम्
पश्यामि त्वाम् सर्वतः अनन्तरूपम् ।
न अन्तम् न मध्यम् न पुनः तव आदिम्
पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥)
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भावार्थ :
अनेक भुजाओं पेट एवं नेत्रों से युक्त आपको सब ओर मैं अनंत रूपों में देख रहा हूँ । किन्तु न तो आपकी सीमा को, न मध्य को और न ही आरंभ को हे विश्वेश्वर, हे विश्वरूप! मैं देख् पा रहा हूँ ।
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टिप्पणी :
इस श्लोक को नीचे दिए गए अध्याय 13 , श्लोक 13 के साथ देखना उपयोगी होगा ।
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अध्याय 13, श्लोक 13,

सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥
--
(सर्वतःपाणिपादम् तत् सर्वतः अक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतःश्रुतिमत् लोके सर्वम् आवृत्य तिष्ठति ॥
--
भावार्थ :
वह (ब्रह्म) सब ओर हाथ-पैरवाला, सब ओर नेत्र, सिर तथा मुखवाला, सब ओर कानवाला है, तथा सबको व्याप्त करते हुए स्थित है । इसे और ठीक से समझने के लिए इस अध्याय 13 का अगला श्लोक क्रमांक 14 देखें ।
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टिप्पणी :
इस श्लोक का तात्पर्य समझने के लिए हम सूर्य का उदाहरण ले सकते हैं । उपनिषद् में कहा है, : सूर्यो आत्मा जगतः । सूर्य की किरणों का विस्तार दिग्-दिगन्त तक है, किरणें जो सूर्य के हाथ, पैर, नेत्र एवम् कान भी हैं । भगवान् भास्कर सब को स्पर्श करते हैं, सब का अधिष्ठान हैं, सब को देखते हैं और अपने रश्मिरूपी श्रोत्रों / श्रुतियों से सब को सुनते भी हैं ।
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अध्याय 11, श्लोक 17,

किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च
तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ता-
द्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥
--
(किरीटिनम् गदिनम् चक्रिणम् च ।
तेजोराशिम् सर्वतः दीप्तिमन्तम् ।
पश्यामि त्वाम् दुर्निरीक्ष्यम् समन्तात्-
दीप्तानलार्क-द्युतिम्-अप्रमेयम् ॥)
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भावार्थ :
मुकुट, गदा तथा चक्र धारण किए हुए आपको, आपके सब ओर से प्रकाशमान तेजपुञ्ज को, प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के समान द्युतिमान आपके रूप को जिसे देख पाना अत्यन्त ही कठिन है, मैं देख रहा हूँ ।

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अध्याय 11, श्लोक 40,

नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥
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नमः पुरस्तात् अथ पृष्ठतः ते नमः अस्तु ते सर्वतः एव सर्व ।
अनन्तवीर्य अमितविक्रमः त्वम् सर्वम् समाप्नोषि ततः असि सर्वः ॥
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भावार्थ :
हे अनन्तसामर्थ्यवान् ! आपको आगे से तथा पीछे से भी नमस्कार । आपके लिए सब ओर से ही प्रणाम हो, हे सर्वस्व ! हे अनन्त पराक्रमशाली आप सम्पूर्ण संसार को व्याप्त किए हुए हैं, इसलिए आप ही सर्वरूप, सब-कुछ हैं ।
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टिप्पणी : उपरोक्त श्लोक में पहले आधे भाग में ’सर्व’ पद का प्रयोग संबोधनवाची है, -’हे सर्व!’ के अर्थ में ।
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’सर्वतः’ /  ’sarvataḥ’ - from / on all sides, in every direction
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Chapter 2, śloka 46,

yāvānartha udapāne
sarvataḥ samplutodake |
tāvānsarveṣu vedeṣu
brāhmaṇasya vijānataḥ ||
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(yāvān-arthaḥ udapāne
sarvataḥ samplutodake |
tāvān-sarveṣu vedeṣu
brāhmaṇasya vijānataḥ ||)
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Meaning :
One who has realized Brahman, has as much concern for the veda, as the one living near an overflowing reservoir of waters has for a small pond.
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Chapter 11, śloka 16,

anekabāhūdaravaktranetraṃ
paśyāmi tvāṃ sarvato:'nantarūpam |
nāntaṃ na madhyaṃ na punastavādiṃ
paśyāmi viśveśvara viśvarūpa ||
--
(anekabāhu-udaravaktranetram
paśyāmi tvām sarvataḥ anantarūpam |
na antam na madhyam na punaḥ tava ādim
paśyāmi viśveśvara viśvarūpa ||)
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Meaning :
I see You every-where with your so many arms, so many bellies, and so many eyes. And again, I don't see either your Beginning, Middle or End, O viśveśvara! (The only Lord of the Whole world!) O viśvarūpam (The One with the Whole world as one of your infinite faces)!
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Note :
Comparing the above with following may be interesting and useful also. :

Chapter 13, śloka 13,
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sarvataḥpāṇipādaṃ tat-
sarvato:'kṣiśiromukham |
sarvataḥśrutimalloke
sarvamāvṛtya tiṣṭhati ||
--
(sarvataḥpāṇipādam tat
sarvataḥ akṣiśiromukham |
sarvataḥśrutimat loke
sarvam āvṛtya tiṣṭhati ||
--

Meaning :
(This brahman / tat) has His hands / arms, feet, eyes, ears, heads, and faces, envelopping the Whole existence. And in this way He is ever everywhere.
--
Note :
We can see the example of the Sun. His rays reach everywhere, they are his hands / arms, feet, eyes, ears, heads, and faces, through which He touches, gives support to, looks at, listens to and shows Himself to everything and every being.
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Chapter 11, śloka 17,

kirīṭinaṃ gadinaṃ cakriṇaṃ ca
tejorāśiṃ sarvato dīptimantam |
paśyāmi tvāṃ durnirīkṣyaṃ samantā-
ddīptānalārkadyutimaprameyam ||
--
(kirīṭinam gadinam cakriṇam ca |
tejorāśim sarvataḥ dīptimantam |
paśyāmi tvām durnirīkṣyam samantāt-
dīptānalārka-dyutim-aprameyam ||)
--
Meaning :
I see You crowned, armed with a mace (gadā), and a discus (cakra), like a column of splendor, shining on all sides,  immeasurable, and blinding the eyes with Your effulgence like that of the blazing Sun and Fire.
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Chapter 11, śloka 40,

namaḥ purastādatha pṛṣṭhataste
namo:'stu te sarvata eva sarva |
anantavīryāmitavikramastvaṃ
sarvaṃ samāpnoṣi tato:'si sarvaḥ ||
--
namaḥ purastāt atha pṛṣṭhataḥ te
namaḥ astu te sarvataḥ eva sarva |
anantavīrya amitavikramaḥ tvam
sarvam samāpnoṣi tataḥ asi sarvaḥ ||
--
Meaning :
Obeisance to You from the front, Obeisance to You from the back, obeisance to You from all the sides. You are Omnipresent, and All. O Supreme! You are valor infinite and strength infallible! You pervade All, ...You Are All!!
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आज का श्लोक, ’सर्वतःश्रुतिमत्’ / ’sarvataḥśrutimat’

आज का श्लोक,
’सर्वतःश्रुतिमत्’ / ’sarvataḥśrutimat’
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’सर्वतःश्रुतिमत्’ / ’sarvataḥśrutimat’  - सब दिशाओं में  श्रवण (कान) हैं जिसके,

अध्याय 13, श्लोक 13,
सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥
--
(सर्वतःपाणिपादम् तत् सर्वतः अक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतःश्रुतिमत् लोके सर्वम् आवृत्य तिष्ठति ॥
--
भावार्थ :
वह (ब्रह्म) सब ओर हाथ-पैरवाला, सब ओर नेत्र, सिर तथा मुखवाला, सब ओर कानवाला है, तथा सबको व्याप्त करते हुए स्थित है । इसे और ठीक से समझने के लिए इस अध्याय 13 का अगला श्लोक क्रमांक 14 देखें ।
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टिप्पणी :
इस श्लोक का तात्पर्य समझने के लिए हम सूर्य का उदाहरण ले सकते हैं । उपनिषद् में कहा है, : सूर्यो आत्मा जगतः । सूर्य की किरणों का विस्तार दिग्-दिगन्त तक है, किरणें जो सूर्य के हाथ, पैर, नेत्र एवम् कान भी हैं । भगवान् भास्कर सब को स्पर्श करते हैं, सब का अधिष्ठान हैं, सब को देखते हैं और अपने रश्मिरूपी श्रोत्रों / श्रुतियों से सब को सुनते भी हैं ।
--
’सर्वतःश्रुतिमत्’ / ’sarvataḥśrutimat’ - One having His ears / attention towards all and every direction.

Chapter 13, śloka 13,
--
sarvataḥpāṇipādaṃ tat-
sarvato:'kṣiśiromukham |
sarvataḥśrutimalloke
sarvamāvṛtya tiṣṭhati ||
--
(sarvataḥpāṇipādam tat
sarvataḥ akṣiśiromukham |
sarvataḥśrutimat loke
sarvam āvṛtya tiṣṭhati ||
--

Meaning :
(This brahman / tat) has His hands / arms, feet, eyes, ears, heads, and faces, enveloping the Whole existence. And in this way He is ever everywhere.
--
Note :
We can see the example of the Sun. His rays reach everywhere, they are his hands / arms, feet, eyes, ears, heads, and faces, through which He touches, gives support to, looks at, listens to and shows Himself to everything and every being.
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आज का श्लोक, ’सर्वतःपाणिपादम्’ / ’sarvataḥpāṇipādam’

आज का श्लोक,  
’सर्वतःपाणिपादम्’ / ’sarvataḥpāṇipādam’ 
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’सर्वतःपाणिपादम् ’ / ’sarvataḥpāṇipādam’ - सब दिशाओं में हाथ तथा पैर हैं जिसके,

अध्याय 13, श्लोक 13,

सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥
--
(सर्वतःपाणिपादम् तत् सर्वतः अक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतःश्रुतिमत् लोके सर्वम् आवृत्य तिष्ठति ॥
--
भावार्थ :
वह (ब्रह्म) सब ओर हाथ-पैरवाला, सब ओर नेत्र, सिर तथा मुखवाला, सब ओर कानवाला है, तथा सबको व्याप्त करते हुए स्थित है । इसे और ठीक से समझने के लिए इस अध्याय 13 का अगला श्लोक क्रमांक 14 देखें ।
--
टिप्पणी :
इस श्लोक का तात्पर्य समझने के लिए हम सूर्य का उदाहरण ले सकते हैं । उपनिषद् में कहा है, : सूर्यो आत्मा जगतः । सूर्य की किरणों का विस्तार दिग्-दिगन्त तक है, किरणें जो सूर्य के हाथ, पैर, नेत्र एवम् कान भी हैं । भगवान् भास्कर सब को स्पर्श करते हैं, सब का अधिष्ठान हैं, सब को देखते हैं और अपने रश्मिरूपी श्रोत्रों / श्रुतियों से सब को सुनते भी हैं ।
--
 
’सर्वतःपाणिपादम् ’ / ’sarvataḥpāṇipādam’ - One having His arms and feet towards all and every direction.
--
Chapter 13, śloka 13,
--
sarvataḥpāṇipādaṃ tat-
sarvato:'kṣiśiromukham |
sarvataḥśrutimalloke
sarvamāvṛtya tiṣṭhati ||
--
(sarvataḥpāṇipādam tat
sarvataḥ akṣiśiromukham |
sarvataḥśrutimat loke
sarvam āvṛtya tiṣṭhati ||
--

Meaning :
(This brahman / tat) has His hands / arms, feet, eyes, ears, heads, and faces, envelopping the Whole existence. And in this way He is ever everywhere.
--
Note :
We can see the example of the Sun. His rays reach everywhere, they are his hands / arms, feet, eyes, ears, heads, and faces, through which He touches, gives support to, looks at, listens to and shows Himself to everything and every being.
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आज का श्लोक, ’सर्वतःअक्षिशिरोमुखम्’ / ’sarvataḥ-akṣiśiromukham’

आज का श्लोक,
’सर्वतःअक्षिशिरोमुखम्’ / ’sarvataḥ-akṣiśiromukham’  
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’सर्वतः अक्षिशिरोमुखम्’ / ’sarvataḥ-akṣiśiromukham’  - सब दिशाओं में नेत्र, सिर एवं मुख हैं जिसके,

अध्याय 13, श्लोक 13,

सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्
सर्वतःश्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥
--
(सर्वतःपाणिपादम् तत् सर्वतः-अक्षिशिरोमुखम्
सर्वतःश्रुतिमत् लोके सर्वम् आवृत्य तिष्ठति ॥
--
भावार्थ :
वह (ब्रह्म) सब ओर हाथ-पैरवाला, सब ओर नेत्र, सिर तथा मुखवाला, सब ओर कानवाला है, तथा सबको व्याप्त करते हुए स्थित है । इसे और ठीक से समझने के लिए इस अध्याय 13 का अगला श्लोक क्रमांक 14 देखें ।
--
टिप्पणी :
इस श्लोक का तात्पर्य समझने के लिए हम सूर्य का उदाहरण ले सकते हैं । उपनिषद् में कहा है, : सूर्यो आत्मा जगतः । सूर्य की किरणों का विस्तार दिग्-दिगन्त तक है, किरणें जो सूर्य के हाथ, पैर, नेत्र एवम् कान भी हैं । भगवान् भास्कर सब को स्पर्श करते हैं, सब का अधिष्ठान हैं, सब को देखते हैं और अपने रश्मिरूपी श्रोत्रों / श्रुतियों से सब को सुनते भी हैं ।
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’सर्वतः अक्षिशिरोमुखम्’ / ’sarvataḥ-akṣiśiromukham’ - One having His eyes / sight, Head / Intelligence, and face / form towards all and every direction.

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Chapter 13, śloka 13,
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sarvataḥpāṇipādaṃ tat-
sarvato:'kṣiśiromukham |
sarvataḥśrutimalloke
sarvamāvṛtya tiṣṭhati ||
--
(sarvataḥpāṇipādam tat
sarvataḥ-akṣiśiromukham |
sarvataḥśrutimat loke
sarvam āvṛtya tiṣṭhati ||
--

Meaning :
(This brahman / tat) has His hands / arms, feet, eyes, ears, heads, and faces, envelopping the Whole existence. And in this way He is ever everywhere.
--
Note :
We can see the example of the Sun. His rays reach everywhere, they are his hands / arms, feet, eyes, ears, heads, and faces, through which He touches, gives support to, looks at, listens to and shows Himself to everything and every being.
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Sunday, June 29, 2014

आज का श्लोक, ’सर्वत्र’ / ’sarvatra’

आज का श्लोक,  ’सर्वत्र’ / ’sarvatra’
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’सर्वत्र’ / ’sarvatra’ - सर्वत्र, हर स्थान पर,

अध्याय 2, श्लोक 57,
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
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(यः सर्वत्र अनभिस्नेहः तत् तत् प्राप्य शुभाशुभम् ।
न अभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥)
--
भावार्थ :
जो मनुष्य सर्वत्र ही किसी भी शुभ अथवा अशुभ फल से निर्लिप्त हुआ, न तो प्रसन्न होता है और न खिन्न, उसकी प्रज्ञा स्थिर है ।
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अध्याय 6, श्लोक 30,

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥
--
(यः माम् पश्यति सर्वत्र सर्वम् च मयि पश्यति ।
तस्य अहं न प्रणश्यामि सः च मे न प्रणश्यति ॥)
--
भावार्थ :
जो मुझको (अपने-आपको) सर्वत्र देखता है तथा जो सबको मुझमें (अपने-आप ही में) अवस्थित देखता है, न तो उसके अस्तित्व मैं नष्ट होने देता हूँ और न ही वह मुझे (अपनी निज आत्मा / परमात्मा को) नष्ट होने देता है ।
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अध्याय 6, श्लोक 32,

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥
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(आत्मौपम्येन सर्वत्र समम् पश्यति यः अर्जुनः ।
सुखम् वा यदि वा दुःखम् सः योगी परमः मतः ॥)
--
भावार्थ :
सुख हो या दुःख, किसी भी परिस्थिति में, हे अर्जुन! अपनी (चेतन आत्मा की चेतना की) उपमा से सर्वत्र एक समान व्याप्त चैतन्य आत्मा को ही, जो देखता है, वह योगी परम (श्रेष्ठ) माना जाता है ।
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अध्याय 12, श्लोक 4,

सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहितेरताः ॥
--
(संनियम्य इन्द्रियग्रामम् सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति माम् एव सर्वभूतहिते रताः ॥)
--
भावार्थ :
अपनी समस्त इन्द्रियों को भली प्रकार से नियन्त्रण में रखते हुए, जो समबुद्धि रखनेवाले सब भूतों के हित में रत होते हैं वे मुझको प्राप्त हो जाते हैं ।
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अध्याय 13, श्लोक 28,

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
न हिनस्त्यात्मात्मानं ततो याति परां गतिं ॥
--
(समम् पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितम् ईश्वरम् ।
न हिनस्ति आत्मना आत्मानम् ततः याति पराम् गतिम् ॥)
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भावार्थ :
परमेश्वर को सर्वत्र और सबमें एक समान विद्यमान देखते हुए, अपने आपके या किसी के भी प्रति हिंसा नहीं करता और इसलिए ऐसा मनुष्य परम श्रेष्ठ गति प्राप्त करता है ।
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अध्याय 13,  श्लोक 32,

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते
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(यथा सर्वगतम् सौक्ष्म्यात् आकाशम् न उपलिप्यते ।
सर्वत्र अवस्थितः देहे तथा आत्मा न उपलिप्यते ।
--
भावार्थ :
जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त आकाश सूक्ष्म होने के कारण (जिसमें व्याप्त है, उससे) लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार सर्वत्र अवस्थित आत्मा (जो कि आकाश से भी अधिक सूक्ष्म तथा और भी अधिक व्यापक है, - जो कि सबमें है, और सब जिसमें है,) देह से लिप्त नहीं होता ।
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अध्याय 18, श्लोक 49,
 
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति ॥
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(असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति ॥)
--
भावार्थ :
आसक्ति-बुद्धि से सर्वत्र और सर्वथा रहित, मन-बुद्धि तथा इन्द्रियों को वश में रखनेवाला, स्पृहारहित ऐसा मनुष्य साँख्ययोग के व्यवहार से परम नैष्कर्म्य-सिद्धि को प्राप्त होता है ।
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’सर्वत्र’ / ’sarvatra’ - at all places, every-where.

Chapter 2,  śloka57,

yaḥ sarvatrānabhisnehas-
tattatprāpya śubhāśubham |
nābhinandati na dveṣṭi
tasya prajñā pratiṣṭhitā ||
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(yaḥ sarvatra anabhisnehaḥ
tat tat prāpya śubhāśubham |
na abhinandati na dveṣṭi
tasya prajñā pratiṣṭhitā ||)
--
Meaning :
One who is equally indifferent everywhere in achieving whatever good or bad comes to him, and neither rejoices nor regrets is said to have attained firm wisdom.
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Chapter 6,  śloka 30,

yo māṃ paśyati sarvatra 
sarvaṃ ca mayi paśyati |
tasyāhaṃ na praṇaśyāmi
sa ca me na praṇaśyati ||
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(yaḥ mām paśyati sarvatra 
sarvam ca mayi paśyati |
tasya ahaṃ na praṇaśyāmi
saḥ ca me na praṇaśyati ||)
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Meaning :
One who everywhere finds and sees Me, and likewise, everything in Me, is not lost sight of Me, nor I lose sight of him [is not lost to Me, nor I to him].
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Chapter 6,  śloka 32,

ātmaupamyena sarvatra 
samaṃ paśyati yo:'rjuna |
sukhaṃ vā yadi vā duḥkham
sa yogī paramo mataḥ ||
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(ātmaupamyena sarvatra 
samam paśyati yaḥ arjunaḥ |
sukham vā yadi vā duḥkham
saḥ yogī paramaḥ mataḥ ||)
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Meaning :
arjuna ! In happiness or in pain, one who sees the same Self in him-self and all others everywhere, is a yogī great indeed.
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Chapter 12,  śloka 4,

sanniyamyendriyagrāmaṃ
sarvatra samabuddhayaḥ |
te prāpnuvanti māmeva
sarvabhūtahiteratāḥ ||
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(saṃniyamya indriyagrāmam
sarvatra samabuddhayaḥ |
te prāpnuvanti mām eva
sarvabhūtahite ratāḥ ||)
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Meaning :
Those who keeping the senses well under control, always with even-mind devoted for the welfare of all beings, they also attain Me.
 --
 
Chapter 13,  śloka 28,

samaṃ paśyanhi sarvatra 
samavasthitamīśvaram |
na hinastyātmātmānaṃ
tato yāti parāṃ gatiṃ ||
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(samam paśyan hi sarvatra 
samavasthitam īśvaram |
na hinasti ātmanā ātmānam
tataḥ yāti parām gatim ||)
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Meaning :
Realizing and seeing the same Supreme Reality present within oneself, all and everywhere, inflicts no harm / violence upon oneself or others as each and everything is the embodiment of the same Self, the same Supreme Reality only.
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Chapter 13,  śloka 32,

yathā sarvagataṃ saukṣmyā-
dākāśaṃ nopalipyate |
sarvatrāvasthito dehe
tathātmā nopalipyate
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(yathā sarvagatam saukṣmyāt
ākāśam na upalipyate |
sarvatra avasthitaḥ dehe
tathā ātmā na upalipyate |
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Meaning :
As all-pervading ether is not contaminated due to its subtlety, quite so, the Self is not contaminated though residing in all bodies.
(Note : This  śloka beautifully explains how the 'self' in a body, and the 'Self' That is Omnipresent, That has the entire existence as its very body is the one and the same indivisible Reality.)
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Chapter 18,  śloka 49,
 
asaktabuddhiḥ sarvatra 
jitātmā vigataspṛhaḥ |
naiṣkarmyasiddhiṃ paramāṃ
sannyāsenādhigacchati ||
--
(asaktabuddhiḥ sarvatra 
jitātmā vigataspṛhaḥ |
naiṣkarmyasiddhiṃ paramāṃ
sannyāsenādhigacchati ||)
--
Meaning :
With no attachment nor craving for anything, a man with control over his body, senses and mind, by means of the right understanding and practice of 'sāṃkhyaysoga', attains the great state of freedom from all action (naiṣkarmyasiddhiḥ)
 --
Note :
naiṣkarmyasiddhiḥ means,
Getting rid of the false idea (illusion), the primal-ignorance:
 '' I do various actions, and enjoy / suffer / experience the consequences their-of."
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आज का श्लोक, ’सर्वत्रगम्’ / ’sarvatragam’

आज का श्लोक,
’सर्वत्रगम्’ / ’sarvatragam’ 
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’सर्वत्रगम्’  / ’sarvatragam’ - सर्वव्यापी,

अध्याय 12, श्लोक 3,

ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते ।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥
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(ये तु अक्षरम् अनिर्देश्यम् अव्यक्तम् पर्युपासते ।
सर्वत्रगम् अचिन्त्यम् च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥)
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भावार्थ : ईश्वर की अनन्य भक्ति से ही उसकी कृपा होने पर उसके दर्शन एवं स्वरूप को तत्व से जानना संभव होता है । यह सीधा मार्ग है ।
--
टिप्पणी : 
इस श्लोक की पूर्वभूमिका के रूप में पिछले अध्याय 11 के श्लोक 54, 55 एवं इस अध्याय के श्लोक 1, 2 को समझना उपयोगी होगा ।
ईश्वर की अनन्य भक्ति से ही उसकी कृपा होने पर उसके दर्शन एवं स्वरूप को तत्व से जानना और उसमें एकत्व की प्राप्ति संभव होती है । यह सीधा मार्ग है ।

अध्याय 11, श्लोक 54,

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ॥
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(भक्त्या तु अनन्यया शक्यः अहम् एवंविधः अर्जुन ।
 ज्ञातुम् द्रष्टुम् च तत्वेन प्रवेष्टुम् च परन्तप ॥)
--
भावार्थ :
किन्तु अनन्य भक्ति होने से अवश्य ही मुझको मेरे यथार्थ स्वरूप में इस प्रकार से देख पाना, जानना, तथा मुझमें प्रविष्ट होकर मुझसे अभिन्न हो जाना संभव है ।
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अध्याय 11, श्लोक 55,
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥
--
(मत्कर्म-कृत्-मत्परमः मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः सः माम् एति पाण्डव ॥)
--
भावार्थ :
हे पाण्डुपुत्र अर्जुन! जो पुरुष मेरे लिए ही (प्रारब्धवश प्राप्त हुए) आसक्तिरहित होकर, सम्पूर्ण कर्मों को करता है (और उन्हें मुझे ही अर्पित करता है), जो सभी प्राणियों से वैररहित है, ऐसा मेरा वह भक्त मुझे ही प्राप्त होता है ।
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अनन्य भक्ति के चार प्रकार -

अध्याय 7, श्लोक 16,

चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥
--
(चतुर्विधा भजन्ते माम् जनाः सुकृतिनः अर्जुन ।
आर्तः जिज्ञासुः अर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥)
--
भावार्थ :
हे अर्जुन ! शुभ कर्म करनेवाले मेरे भक्त चार प्रकार से मुझे भजते हैं ; आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी एवं ज्ञानी ।
टिप्पणी :
आर्त - जो किसी संकट से त्रस्त है और उस संकट छुटकारा पाना चाहता है ,
जिज्ञासु - जो मेरे (ईश्वर के) स्वरूप को जानने की इच्छा रखता है ।
अर्थार्थी - जो किसी लौकिक अभिलाषा को पूर्ण करना चाहता है ।
ज्ञानी - जो मुझे तत्व से जानता है ।
--
’सर्वत्रगम्’  / ’sarvatragam’ - All-pervading,

Chapter 12, śloka 3,

ye tvakṣaramanirdeśyam-
avyaktaṃ paryupāsate |
sarvatragamacintyaṃ ca
kūṭasthamacalaṃ dhruvam ||
--
(ye tu akṣaram anirdeśyam
avyaktam paryupāsate |
sarvatragam acintyam ca
kūṭasthamacalaṃ dhruvam ||)
--
Meaning : However those who are devoted to Me and try to meditate upon Me as the Formless, All-pervading, as One that is beyond the grasp of the mind and intellect, That could not be pointed-out, as the principle, - Imperishable, Changesless, Eternal, And the Essence and the Core of the very existence, ....
--
Note :
The earlier śloka-s 54, 55 of Chapter 11, and 1 and 2 of this Chapter 12, are very helpful in understanding the purport of this one.
Chapter 11, śloka 54,

bhaktyā tvananyayā śakya
ahamevaṃvidho:'rjuna |
jñātuṃ draṣṭuṃ ca tatvena
praveṣṭuṃ ca parantapa ||
--
(bhaktyā tu ananyayā śakyaḥ
aham evaṃvidhaḥ arjuna |
 jñātum draṣṭum ca tatvena
praveṣṭum ca parantapa ||)
--
Meaning :
But Only through devotion pure, O parantapa (arjuna) ! it is ever possible to know, see Me, and to enter and merge into Me.
--
ananya bhakti - pure devotion

Chapter 7, śloka 16,

caturvidhā bhajante māṃ
janāḥ sukṛtino:'rjuna |
ārto jijñāsurarthārthī
jñānī ca bharatarṣabha ||
--
(caturvidhā bhajante mām
janāḥ sukṛtinaḥ arjuna |
ārtaḥ jijñāsuḥ arthārthī
jñānī ca bharatarṣabha ||)
--
Meaning :
O arjun, four kinds of devotees who perform noble deeds are the following :
1 ārta - one caught up in distress,
2  jijñāsu - one who is eager to know My Form and Reality,
3 arthārthī - one who wants wishes fulfilled, and
4 jñānī - one who truly knows Me.
--

Chapter 11, śloka 55,
matkarmakṛnmatparamo
madbhaktaḥ saṅgavarjitaḥ |
nirvairaḥ sarvabhūteṣu
yaḥ sa māmeti pāṇḍava ||
--
(matkarma-kṛt-matparamaḥ
madbhaktaḥ saṅgavarjitaḥ |
nirvairaḥ sarvabhūteṣu yaḥ
saḥ mām eti pāṇḍava ||)
--
Meaning :
One Who dedicates all actions to Me, Who works for Me only, Who is committed to Me, devoid of all attachment, and having enmity with no one, attains Me O pāṇḍava (arjuna)!
--
Chapter 12, śloka 2,

śrībhagavānuvāca :

mayyāveśya mano ye māṃ
nityayuktā upāsate |
śraddhayā parayopetā-
ste me yuktatamā matāḥ ||
--
(mayi āveśya mano ye mām
nityayuktāḥ upāsate |
śraddhayā parayā upetāḥ
te me yuktatamā matāḥ ||)
--
Meaning :
bhagavān śrīkṛṣṇa said :
In my view, those who dedicate their heart and mind to me in great devotion and extreme surrender every moment, have no doubt higher attainment (than the rest).
--

Chapter 12, śloka 1,
arjuna uvāca :
evaṃ satatayuktā ye
bhaktāstvāṃ paryupāsate |
ye cāpyakṣaramavyaktaṃ
teṣāṃ ke yogavittamāḥ |
--
(evaṃ satatayuktāḥ ye
bhaktāḥ tvām paryupāsate |
ye ca api akṣaram-avyaktam
teṣām ke yogavittamāḥ ||)
--
Meaning :
arjuna asked :
Out of Those who keep on remembering you every moment with utter devotion and those also, who worship you as the Imperishable, Formless Reality (brahman), Who could be said of having higher attainment?  
--

Saturday, June 28, 2014

आज का श्लोक, ’सर्वत्रगः’ / ’sarvatragaḥ’

आज का श्लोक,
’सर्वत्रगः’ / ’sarvatragaḥ’
___________________

’सर्वत्रगः’ / ’sarvatragaḥ’ - सर्वत्रगामी, सर्वव्यापी,

अध्याय 9, श्लोक 6,

यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥
--
(यथा आकाशस्थितः नित्यम् वायुः सर्वत्रगः महान् ।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानि इति उपधारय ॥)
--
भावार्थ :
इसे इस तरह से समझो, - जैसे आकाश में स्थित वायु सर्वत्र गतिशील होते हुए भी आकाश में ही अवस्थित रहती है, वैसे ही सब भूत (जड, चेतन प्रकृति) मुझमें ही स्थित रहते हैं ।
--
’सर्वत्रगः’ / ’sarvatragaḥ’  - reaching everywhere, all-pervading,

Chapter 9, ślōka 6,

yathākāśasthito nityaṃ
vāyuḥ sarvatrago mahān |
tathā sarvāṇi bhūtāni
matsthānītyupadhāraya ||
--
(yathā ākāśasthitaḥ nityam
vāyuḥ sarvatragaḥ mahān |
tathā sarvāṇi bhūtāni
matsthāni iti upadhāraya ||)
--
Meaning :
Just as the Great air (vāyu) moves freely everywhere within the space, All the beings quite so, abide ever within Me only.
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आज का श्लोक, ’समदर्शनः’ / ’samadarśanaḥ’

आज का श्लोक,
’समदर्शनः’ / ’samadarśanaḥ’
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’समदर्शनः’ / ’samadarśanaḥ’ - तत्वदर्शी, एक ही सत्यता को सर्वत्र अनुभव करने / देखने वाला,

अध्याय 6, श्लोक 29,

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः
--
(सर्वभूतस्थम् आत्मानम् सर्वभूतानि च आत्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥)
--
भावार्थ :
जो सम्पूर्ण भूतों में एक ही आत्मा (अर्थात् अपने-आप) को तथा सम्पूर्ण भूतों को एक ही आत्मा (अर्थात् अपने-आप) में देखता है, इस प्रकार से योग में स्थित हुआ सर्वत्र विद्यमान और एक समान एक ही तत्व का दर्शन करता है ।
--
’समदर्शनः’ / ’samadarśanaḥ’ - one who sees the same Reality in all and everything.
 
Chapter 6, śloka 29,

sarvabhūtasthamātmānaṃ 
sarvabhūtāni cātmani |
īkṣate yogayuktātmā 
sarvatra samadarśanaḥ ||
--
(sarvabhūtastham ātmānam 
sarvabhūtāni ca ātmani |
īkṣate yogayuktātmā 
sarvatra samadarśanaḥ ||)
--
Meaning :
The one who sees the same Self in all beings, and all beings in the Self, such a One having realized and identified with Brahman sees everything as the same Reality.
--

आज का श्लोक, ’सर्वथा’ / ’sarvathā’

आज का श्लोक, ’सर्वथा’ /  ’sarvathā’
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’सर्वथा’ /  ’sarvathā’ - पूर्णतः, सब प्रकार से,

अध्याय 6, श्लोक 31,

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥
--
(सर्वभूतस्थितम् यो माम् भजति एकत्वम्-आस्थितः ।
सर्वथा वर्तमानः अपि सः योगी मयि वर्तते ॥)
--
भावार्थ :
जो मुझ एकमेव चेतन तत्त्व को सब प्राणियों में समान रूप से अवस्थित जानकर अपने आपको उस तत्त्व से अभिन्न जानता है, ऐसा योगी बाह्यतः सब प्रकार से एक सामान्य मनुष्य की भाँति व्यवहार करता हुआ भी पूर्णतः मुझमें ही व्यवहारशील होता है ।

--
अध्याय 13, श्लोक 23,

य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥
--
(यः एवम् वेत्ति पुरुषम् प्रकृतिम् च गुणैः सह ।
सर्वथा वर्तमानः अपि न सः भूयः अभिजायते ॥)
--
भावार्थ :
जो पुरुष को और प्रकृति को उसके गुणों के साथ इस प्रकार से जान लेता है, सब प्रकार से सारे व्यवहार करते हुए भी वह पुनः फिर जन्म नहीं लेता ।
--
’सर्वथा’ /  ’sarvathā’ - in all ways, in every way,

Chapter 6, śloka 31,

sarvabhūtasthitaṃ yo māṃ
bhajatyekatvamāsthitaḥ |
sarvathā vartamāno:'pi
sa yogī mayi vartate ||
--
(sarvabhūtasthitam yo mām
bhajati ekatvam-āsthitaḥ |
sarvathā vartamānaḥ api
sa yogī mayi vartate ||)
--
Meaning :
One  who knows Me (The One and the only Consciousness) present in all beings, and shares Me in this way by realizing his identity with Me, though behaves as an ordinary human being, he ever does so with abiding in Me alone.
--
Chapter 13, śloka 23,

ya evaṃ vetti puruṣaṃ
prakṛtiṃ ca guṇaiḥ saha |
sarvathā vartamāno:'pi
na sa bhūyo:'bhijāyate ||
--
(yaḥ evam vetti puruṣam
prakṛtim ca guṇaiḥ saha |
sarvathā vartamānaḥ api
na saḥ bhūyaḥ abhijāyate ||)
--
Meaning :
One who knows  puruṣa, the prakṛti, and its 3 guṇa(s) / (attributes) though engaged outwardly in the worldly matters has no next birth.
--
Note :
puruṣa - The Consciousness-principle, - The Noumenal,
prakṛti -The Manifestation-principle, - The Phenomenal,
guṇa(s) - The 3 aspects of The Manifestation-principle,
--






आज का श्लोक, ’सर्वदुर्गाणि’ / ’sarvadurgāṇi’

आज का श्लोक,
’सर्वदुर्गाणि’ / ’sarvadurgāṇi’
___________________________

’सर्वदुर्गाणि’ / ’sarvadurgāṇi’ - समस्त बाधाओं, संकटों, अवरोधों को,

अध्याय 18, श्लोक 58,

मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ॥
--
(मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात् तरिष्यसि ।
अथ चेत् त्वम् अहङ्कारात् न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ॥)
--
भावार्थ :
मुझमें चित्त संलग्न कर तुम मेरी कृपा से समस्त बाधाओं को पार कर लोगे । और यदि अहंकारवश मेरी बात नहीं सुनोगे तो विनष्ट हो जाओगे ।
--
’सर्वदुर्गाणि’ / ’sarvadurgāṇi’ - all obstacles and troubles.

Chapter 18, śloka 58,
--
maccittaḥ sarvadurgāṇi 
matprasādāttariṣyasi |
atha cettvamahaṅkārān-
na śroṣyasi vinaṅkṣyasi ||
--
(maccittaḥ sarvadurgāṇi 
matprasādāt tariṣyasi |
atha cet tvam ahaṅkārāt
na śroṣyasi vinaṅkṣyasi ||)
--
Meaning :
If you listen to my advice with keen attention and devotion to Me, you shall conquer over all obstacles and troubles. And if because of your haughtiness you disregard Me, you shall be destroyed.
--


आज का श्लोक, ’सर्वदुःखानाम्’ / ’sarvaduḥkhānāṃ’

आज का श्लोक,
’सर्वदुःखानाम्’ /  ’sarvaduḥkhānāṃ’ 
___________________________

’सर्वदुःखानाम्’ /  ’sarvaduḥkhānāṃ’ - ससमस्त दुःखों की,

अध्याय 2, श्लोक 65

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥
--
(प्रसादे सर्वदुःखानां हानिः अस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसः हि आशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥)
--
भावार्थ :
(पूर्वश्लोक 2 / 64  का सन्दर्भ देखें -
इस प्रकार राग-द्वेष से रहित हुए अंतःकरण वाले मनुष्य की इन्द्रियाँ भले ही प्रारब्धवश विषयों में विचरण करती हों, अपनी सत् -स्वरूप आत्मा के वश में होने से उसे प्रसन्नता की ओर अग्रसर रखती हैं।)
इस प्रकार प्रसन्न अन्तःकरणयुक्त मनुष्य के समस्त दुःखों का अंत हो जाता है और उसकी शुद्ध बुद्धि शीघ्र ही आत्मा में सम्यकरूपेण स्थिर हो जाती है ।
--
’सर्वदुःखानाम्’ /  ’sarvaduḥkhānāṃ’ - of all misery,

Chapter 2, śloka 65

prasāde sarvaduḥkhānāṃ 
hānirasyopajāyate|
prasannacetaso hyāśu
buddhiḥ paryavatiṣṭhate ||
--
(prasāde sarvaduḥkhānāṃ 
hāniḥ asya uopajāyate|
prasannacetasaḥ hi āśu
buddhiḥ paryavatiṣṭhate ||)
--
 
Meaning :
(This shloka is in reference with the earlier one, where is said:
One who has become free from the attachment and envy, likes and dislikes of the pleasures and pains of the objects, is happy.And because of the momentum of destiny, though his senses may keep him in touch with them, his mind fixed in the peace of 'Self' keeps senses under check, and takes him towards serenity, and bliss.)
With serenity, through such happiness, all his sorrow comes to an end and soon his intellect is firmly established in the 'Self'.
--

आज का श्लोक, ’सर्वदेहिनाम्’ / ’sarvadehinām’

आज का श्लोक,
’सर्वदेहिनाम्’ / ’sarvadehinām’ 
___________________________

’सर्वदेहिनाम्’ / ’sarvadehinām’ - सभी देहधारियों का,

अध्याय 14, श्लोक 8,

तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ॥
--
(तमः तु अज्ञानजम् विद्धि मोहनम् सर्वदेहिनाम्
प्रमाद आलस्यनिद्राभिः तत् निबध्नाति भारत ॥)
--
भावार्थ :
हे भारत (अर्जुन)! तमोगुण को, जो समस्त देहधारियों के चित्त को मोहित करता है, उसे तो अज्ञान से उत्पन्न जानो । और वह (तमोगुण) उन्हें प्रमाद, आलस्य एवं निद्रा जैसी वृत्तियों से बाँधता है ।

--
’सर्वदेहिनाम्’ / ’sarvadehinām’ - of all creatures,

Chapter 14, śloka 8,

tamastvajñānajaṃ viddhi
mohanaṃ sarvadehinām |
pramādālasyanidrābhis-
tannibadhnāti bhārata ||
--
( tamaḥ tu ajñānajam viddhi
mohanam sarvadehinām |
pramāda-ālasya-nidrābhiḥ
tat nibadhnāti bhārata ||)
--
Meaning :
O bhārata (arjuna)! Know well that tamoguṇa, (the attribute of inertia) in all the creatures, is caused by the (inherent) ignorance. And binds the mind through the tendencies (vṛtti-s) of distraction, indolence and drowsiness.
--



आज का श्लोक, ’सर्वद्वाराणि’ / ’sarvadvārāṇi’

आज का श्लोक,
’सर्वद्वाराणि’ / ’sarvadvārāṇi’
_______________________

’सर्वद्वाराणि’ / ’sarvadvārāṇi’ - इन्द्रियों रूपी द्वार जिनसे चित्त बाहर की दिशा में जाता है ।

अध्याय 8, श्लोक 12,
--
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो  योगधारणाम् ॥
--
(सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।
मूर्ध्नि आधायात्मनः प्राणम् आस्थितः योगधारणम् ॥)
--

भावार्थ :
मन जिन इंद्रियों के मार्ग से बहिर्मुख  होता है, उन सब रोककर मन को अंतर्मुख अर्थात्  'हृदय' में ठहराकर  और पुनः उन मार्गों पर न जाने  देकर  (चित्त निरोध )।  प्राणों को हृदय से मूर्ध्ना की दिशा में जानेवाली नाड़ी पर ले जाकर मस्तक में स्थिर  (प्राण-निरोध) करते हुए साधक योगधारणा में प्रवृत्त होता है।
--
’सर्वद्वाराणि’ / ’sarvadvārāṇi’ -all the senses that are door for the attention of mind to go in the outward direction, away from the 'Self'.

Chapter 8, śloka 12,
--
sarvadvārāṇi saṃyamya
mano hṛdi nirudhya ca |
mūrdhnyādhāyātmanaḥ
prāṇamāsthito  yogadhāraṇām ||
--
(sarvadvārāṇi saṃyamya
mano hṛdi nirudhya ca |
mūrdhni ādhāyātmanaḥ
prāṇam āsthitaḥ yogadhāraṇam ||)
--

Meaning :
Controlling all the sense-organs where-from the attention strays away towards the objects, holding back the mind into the Heart, directing the vital energy (prANas) towards the cerebrum, abide in the contemplation of Yoga.
--

Friday, June 27, 2014

आज का श्लोक, ’सर्वद्वारेषु’ / ’sarvadvāreṣu’

आज का श्लोक,
’सर्वद्वारेषु’ / ’sarvadvāreṣu’
_______________________

’सर्वद्वारेषु’ / ’sarvadvāreṣu’ - समस्त इन्द्रियों तथा मन-बुद्धि में, के माध्यम से,

अध्याय 14, श्लोक 11,

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते ।
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥
--
(सर्वद्वारेषु देहे अस्मिन् प्रकाशः उपजायते ।
ज्ञानम् यदा तदा विद्यात् विवृद्धम् सत्त्वम् इति उत ॥)
--
भावार्थ : मन पर तीनों गुणों का प्रभाव निरन्तर पड़ता रहता है । पिछले श्लोक 10 में बतलाया गया कि किस प्रकार एक समय पर एक ही गुण शेष दो गुणों को दबाकर मन पर आधिपत्य कर लेता है । इस क्रम में जिस समय सत्त्वगुण प्रबल होता है देह के सभी द्वारों (मन तथा इन्द्रियों में) चेतनता, निर्मलता तथा नीरोगता (स्वास्थ्य, आरोग्य) का विस्तार होता है, क्योंकि जैसा इसी अध्याय के पूर्व श्लोक क्रमांक 6 में कहा गया, सत्त्वगुण जो कि सुख से बाँधता है, इन्हीं का कारक है । और चूँकि ये तीनों दशाएँ आत्मा की सहज स्वाभाविक अवस्था है, इसलिए मनुष्य को इनमें सुख की प्रतीति तथा फलस्वरूप तज्जनित सुख का आभास भी होता है । यह अवस्था सत्त्व की प्रबलता और प्रचुरता की द्योतक है ।
--
’सर्वद्वारेषु’ / ’sarvadvāreṣu’ - through / in all senses and mind and thought,

Chapter 14, śloka 11,

sarvadvāreṣu dehe:'smin-
prakāśa upajāyate |
jñānaṃ yadā tadā vidyād-
vivṛddhaṃ sattvamityuta ||
--
(sarvadvāreṣu dehe asmin
prakāśaḥ upajāyate |
jñānam yadā tadā vidyāt
vivṛddham sattvam iti uta ||)
--
Meaning :
Mind functions by the force and under the influence of the three attributes (guṇa-s) of manifestation (prakṛti). As explained in the śloka 6 of this Chapter, 'sattvaguṇa' has the qualities of  consciousness, harmony, joy, intelligence, clarity, purity and cleanliness, and absence of ill, when 'sattvaguṇa' predominates over the other two attributes (namely rajoguṇa and tamoguṇa,)  one feels just happy and peaceful, content, which are the revelations of the nature of the essential Reality / Self. This further becomes 'experience' and the 'memory'. Thus 'sattvaguṇa' causes the sense of happiness. And as a consequence binds with 'pleasure'. This is again a bondage only, -not the freedom. When this happens, it is the indication of the preponderance of  'sattvaguṇa'.
--






आज का श्लोक, ’सर्वधर्मान्’ / ’sarvadharmān’

आज का श्लोक,
’सर्वधर्मान्’ / ’sarvadharmān’  
______________________________

’सर्वधर्मान्’ / ’sarvadharmān’  - समस्त वृत्तियों से,

अध्याय 18, श्लोक 66,

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
--
(सर्वधर्मान् परित्यज्य माम् एकम् शरण व्रज ।
अहम् त्वा सर्वपापेभ्यः मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥)
--
भावार्थ :
सम्पूर्ण धर्मों अर्थात् मन  के प्रवृत्तिरूपी भिन्न-भिन्न धर्मों को / मानसिक ऊहापोह को त्यागकर मुझ एक परमात्मा की शरण में आओ । मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो ।
--
’सर्वधर्मान्’ / ’sarvadharmān’  -from the different tendencies (vṛtti-s) of mind,

Chapter 18, śloka 66,

sarvadharmānparityajya
māmekaṃ śaraṇaṃ vraja |
ahaṃ tvā sarvapāpebhyo
mokṣayiṣyāmi mā śucaḥ ||
--
(sarvadharmān parityajya
mām ekam śaraṇa vraja |
aham tvā sarvapāpebhyaḥ
mokṣayiṣyāmi mā śucaḥ ||)
--
Put aside all the different tendencies of mind (vṛtti-s), come to Me, take shelter in Me. I shall liberate you from all sin, Grieve not.
--

आज का श्लोक, ’सर्वपापेभ्यः’ / ’sarvapāpebhyaḥ’

आज का श्लोक,
’सर्वपापेभ्यः’ / ’sarvapāpebhyaḥ’
______________________________

’सर्वपापेभ्यः’ / ’sarvapāpebhyaḥ’ - समस्त पापों से,

अध्याय 18, श्लोक 66,

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
--
(सर्वधर्मान् परित्यज्य माम् एकम् शरण व्रज ।
अहम् त्वा सर्वपापेभ्यः मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥)
--
भावार्थ :
सम्पूर्ण धर्मों अर्थात् मन की प्रवृत्तिरूपी भिन्न-भिन्न धर्मों को / मानसिक ऊहापोह को त्यागकर मुझ एक परमात्मा की शरण में आओ । मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो ।
--
’सर्वपापेभ्यः’ / ’sarvapāpebhyaḥ’ - from all sins,

Chapter 18, śloka 66,

sarvadharmānparityajya
māmekaṃ śaraṇaṃ vraja |
ahaṃ tvā sarvapāpebhyo 
mokṣayiṣyāmi mā śucaḥ ||
--
(sarvadharmān parityajya
mām ekam śaraṇa vraja |
aham tvā sarvapāpebhyaḥ 
mokṣayiṣyāmi mā śucaḥ ||)
--
Put aside all the different tendencies of mind (vṛtti-s), come to Me, take shelter in Me. I shall liberate you from all sin, Grieve not.
--

आज का श्लोक, ’सर्वपापैः’ / ’sarvapāpaiḥ’

आज का श्लोक,  ’सर्वपापैः’ / ’sarvapāpaiḥ’
________________________________

’सर्वपापैः’ / ’sarvapāpaiḥ’ - समस्त पापों से,

अध्याय 10, श्लोक 3,

यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
--
(यः माम् अजम् अनादि च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
असम्मूढः सः मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
--
भावार्थ :
जो मुझ जन्म-रहित, अनादि तथा लोकों के परमेश्वर को तत्वतः जानता है, ऐसा निर्दोष बुद्धियुक्त मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है ।
--

’सर्वपापैः’ / ’sarvapāpaiḥ’ - from all sin,

Chapter 10, śloka 3,

yo māmajamanādiṃ ca
vetti lokamaheśvaram |
asammūḍhaḥ sa martyeṣu
sarvapāpaiḥ pramucyate ||
--
(yaḥ mām ajam anādi ca
vetti lokamaheśvaram |
asammūḍhaḥ saḥ martyeṣu
sarvapāpaiḥ pramucyate ||
--
Meaning :
One who with perfect clarity and without delusion, knows Me, the birth-less (one never born, because Is Ever so) and beginning-less (timeless) principle as The Supreme Lord of all creatures, with becomes free from all sin.
--



आज का श्लोक, ’सर्वभावेन’ / ’sarvabhāvena’

आज का श्लोक,  ’सर्वभावेन’ / ’sarvabhāvena’
__________________________________

’सर्वभावेन’ / ’sarvabhāvena’ - सम्पूर्ण हृदय से,

अध्याय 15, श्लोक 19,

यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥
--
(यः माम् एवम् असम्मूढः जानाति पुरुषोत्तमम् ।
सः सर्ववित्-भजति माम् सर्वभावेन भारत ॥)
--
भावार्थ :
मूढता से रहित निर्मल बुद्धियुक्त हुआ जो मनुष्य (ज्ञानी) मुझको ही तत्त्वतः मेरे पुरुषोत्तम स्वरूप से जानता है, वह अनायास ही सभी प्रकार से मुझे जानकर मेरा अनुगामी होकर मुझे ही अनन्य भाव से भजता है ।
--
अध्याय 18, श्लोक 62,
--
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥
--
(तम् एव शरणम् गच्छ सर्वभावेन भारत ।
तत्-प्रसादात् पराम् शान्तिम् स्थानम् प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥)
--
भावार्थ :
हे भारत (अर्जुन)! अपने सम्पूर्ण हृदय से उस परमेश्वर की ही शरण में जाओ । उसकी कृपा से तुम्हें शान्ति तथा सनातन परम धाम प्राप्त होगा ।
--

’सर्वभावेन’ / ’sarvabhāvena’ - dedicating one-self to Me with whole heart.

Chapter 15, श्लोक 19,

yo māmevamasammūḍho
jānāti puruṣottamam |
sa sarvavidbhajati māṃ
sarvabhāvena bhārata ||
--
(yaḥ mām evam asammūḍhaḥ
jānāti puruṣottamam |
saḥ sarvavit-bhajati mām
sarvabhāvena bhārata ||)
--
Meaning :
One who is free from delusion, such a man of wisdom, - a sage, who knows all and everything, knows Me as the Supreme Being, He alone worships Me in all respects and always with his whole being.
--
Chapter 18, śloka 62,

tameva śaraṇaṃ gaccha 
sarvabhāvena bhārata |
tatprasādātparāṃ śāntiṃ 
sthānaṃ prāpsyasi śāśvatam ||
--
(tam eva śaraṇam gaccha 
sarvabhāvena bhārata |
tat-prasādāt parām śāntim 
sthānam prāpsyasi śāśvatam ||)
--
Meaning :
Therefore, with all your heart, seek shelter in Him alone. Through His grace, you shall attain the abode that is bliss supreme and peace eternal.
-- 

आज का श्लोक, ’सर्वभूतस्थम्’ / ’sarvabhūtastham’

आज का श्लोक, ’सर्वभूतस्थम्’ / ’sarvabhūtastham’
____________________________________

’सर्वभूतस्थम्’ / ’sarvabhūtastham’ - सब में अवस्थित,

अध्याय 6, श्लोक 29,

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥
--
(सर्वभूतस्थम् आत्मानम् सर्वभूतानि च आत्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥)
--
भावार्थ :
जो सम्पूर्ण भूतों में एक ही आत्मा (अर्थात् अपने-आप) को तथा सम्पूर्ण भूतों को एक ही आत्मा (अर्थात् अपने-आप) में देखता है, इस प्रकार से योग में स्थित हुआ सर्वत्र विद्यमान और एक समान एक ही तत्व का दर्शन करता है ।
--
’सर्वभूतस्थम्’ / ’sarvabhūtastham’ - present in all beings.
 
Chapter 6, śloka 29,

sarvabhūtasthamātmānaṃ 
sarvabhūtāni cātmani |
īkṣate yogayuktātmā 
sarvatra samadarśanaḥ ||
--
(sarvabhūtastham ātmānam 
sarvabhūtāni ca ātmani |
īkṣate yogayuktātmā 
sarvatra samadarśanaḥ ||)
--
Meaning :
The one who sees the same Self in all beings, and all beings in the Self, such a One having realized and identified with Brahman sees everything as the same Reality.

--

आज का श्लोक, ’सर्वभूतस्थितम्’ / ’sarvabhūtasthitam’

आज का श्लोक,
’सर्वभूतस्थितम्’ / ’sarvabhūtasthitam’ 
_________________________________

’सर्वभूतस्थितम्’ / ’sarvabhūtasthitam’ - सब प्राणियों में अवस्थित (एकमेव चेतन सत्ता),

अध्याय 6, श्लोक 31,

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥
--
(सर्वभूतस्थितम् यो माम् भजति एकत्वम्-आस्थितः ।
सर्वथा वर्तमानः अपि स योगी मयि वर्तते ॥)
--
भावार्थ :
जो मुझ एकमेव चेतन तत्त्व को सब प्राणियों में समान रूप से अवस्थित जानकर अपने आपको उस तत्त्व से अभिन्न जानता है, ऐसा योगी बाह्यतः सब प्रकार से एक सामान्य मनुष्य की भाँति व्यवहार करता हुआ भी मुझमें ही व्यवहारशील होता है ।

--
सर्वभूतस्थितम्’ / ’sarvabhūtasthitam’ - (The One and the only Consciousness) present in all beings.
 
Chapter 6, śloka 31,

sarvabhūtasthitaṃ yo māṃ
bhajatyekatvamāsthitaḥ |
sarvathā vartamāno:'pi
sa yogī mayi vartate ||
--
(sarvabhūtasthitam yo mām
bhajati ekatvam-āsthitaḥ |
sarvathā vartamānaḥ api
sa yogī mayi vartate ||)
--
Meaning :
One  who knows Me (The One and the only Consciousness) present in all beings, and shares Me in this way by realizing his identity with Me, though behaves as an ordinary human being, he ever does so with abiding in Me alone.
--

Wednesday, June 25, 2014

आज का श्लोक, ’सर्वभूतहिते’ / ’sarvabhūtahite’

आज का श्लोक,
’सर्वभूतहिते’ / ’sarvabhūtahite’
________________________

’सर्वभूतहिते’ / ’sarvabhūtahite’ - समस्त प्राणियों के हित में,

अध्याय 5, श्लोक 25,

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥
--
(लभन्ते ब्रहनिर्वाणम् ऋषयः क्षीणकल्मषाः ।
छिन्नद्वैधाः यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥
--
भावार्थ :
जिनके समस्त पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके समस्त संशय छिन्न हो चुके हैं, आत्मा के निदिध्यासन में सतत संलग्न, सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत ऐसे ऋषि परब्रह्मरूपी शान्ति में प्रतिष्ठित हो जाते हैं ।
--
अध्याय 12, श्लोक 4,

सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥
--
(संनियम्य इन्द्रियग्रामम् सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति माम् एव सर्वभूतहिते रताः ॥)
--
भावार्थ :
अपनी समस्त इन्द्रियों को भली प्रकार से नियन्त्रण में रखते हुए, जो समबुद्धि रखनेवाले सब भूतों के हित में रत होते हैं वे मुझको प्राप्त हो जाते हैं ।
--

’सर्वभूतहिते’ / ’sarvabhūtahite’ - concerned with the welfare of all beings,

Chapter 5,  śloka 25,

labhante brahmanirvāṇam-
ṛṣayaḥ kṣīṇakalmaṣāḥ |
chinnadvaidhā yatātmānaḥ
sarvabhūtahite ratāḥ ||
--
(labhante brahanirvāṇam
ṛṣayaḥ kṣīṇakalmaṣāḥ |
chinnadvaidhāḥ yatātmānaḥ
sarvabhūtahite ratāḥ ||
--
Meaning :
Those with all their sins destroyed, and all their doubts cleared away, the sages (ṛṣayaḥ) ever engaged in the contemplation of the Self, ever concerned with the the welfare of all beings, attain the brahmanirvāṇam (brahman, the form of peace ultimate).
--

Chapter 12, śloka 4,

sanniyamyendriyagrāmaṃ
sarvatra samabuddhayaḥ |
te prāpnuvanti māmeva
sarvabhūtahite ratāḥ ||
--
(saṃniyamya indriyagrāmam
sarvatra samabuddhayaḥ |
te prāpnuvanti mām eva
sarvabhūtahite ratāḥ ||)
--
Meaning :
Those who keeping the senses well under control, always with even-mind devoted for the welfare of all beings, they also attain Me.
 --






आज का श्लोक, ’सर्वभूतात्मभूतात्मा’ / ’sarvabhūtātmabhūtātmā’

आज का श्लोक,
’सर्वभूतात्मभूतात्मा’ / ’sarvabhūtātmabhūtātmā’ 
_________________________________________

’सर्वभूतात्मभूतात्मा’ / ’sarvabhūtātmabhūtātmā’-  वह आत्मा (मनुष्य) जिसने सबमें विद्यमान आत्मा (ईश्वरीय चेतना) और अपने में विद्यमान अपने अस्तित्व की चेतना की परस्पर अभिन्नता को जान लिया हो ।  

अध्याय 5, श्लोक 7,

योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।
सर्वभूतात्मभूतातात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥
--
(योगयुक्तः विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन् अपि न लिप्यते ॥)
--
भावार्थ :
योग में सम्यकतया स्थित हुआ विशुद्ध अन्तःकरणवाला मनुष्य जिसने अपने मन-बुद्धि इन्द्रियों को विवेकपूर्वक वश में कर लिया है, ऐसा वह आत्मा (मनुष्य) जिसने सबमें विद्यमान आत्मा (ईश्वरीय चेतना) और अपने में विद्यमान अपने अस्तित्व की चेतना की परस्पर अभिन्नता को जान लिया हो, (प्रारब्धवश) विभिन्न कर्मों को करते हुए भी, स्वयं के अपने ’स्वतन्त्र कर्ता’ होने के, कर्तापन के अभिमान में लिप्त नहीं होता ।  

--

’सर्वभूतात्मभूतात्मा’ / ’sarvabhūtātmabhūtātmā’ - one who has realized the identity of the consciousness of one's own as the Consciousness that is manifest as world and all the beings of the world.
Chapter 5, śloka 7,

yogayukto viśuddhātmā
vijitātmā jitendriyaḥ |
sarvabhūtātmabhūtātātmā 
kurvannapi na lipyate ||
--
(yogayuktaḥ viśuddhātmā
vijitātmā jitendriyaḥ |
sarvabhūtātmabhūtātmā 
kurvan api na lipyate ||)
--
Meaning :
Such a One of pure mind and with the help of discrimination who has control over his mind (intellect), body and organs, so well-established in yoga, one who has realized the identity of the consciousness of one's own as the Consciousness that is manifest as world and all the beings of the world, though lets the actions happen (or not happen) in their own course, never entertains the idea that he is in any way, involved in doing those actions that seem to be done by him.
--

आज का श्लोक, ’सर्वभूतानि’ / ’sarvabhūtāni’

आज का श्लोक,  ’सर्वभूतानि’ / ’sarvabhūtāni’
____________________________________

’सर्वभूतानि’ / ’sarvabhūtāni’ - समस्त भूत, प्राणिमात्र,

अध्याय 6, श्लोक 29,

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥
--
(सर्वभूतस्थम् आत्मानम् सर्वभूतानि च आत्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥)
--
भावार्थ :
जो सम्पूर्ण भूतों में एक ही आत्मा (अर्थात् अपने-आप) को तथा सम्पूर्ण भूतों को एक ही आत्मा (अर्थात् अपने-आप) में देखता है, इस प्रकार से योग में स्थित हुआ सर्वत्र विद्यमान और एक समान एक ही तत्व का दर्शन करता है ।
--
अध्याय 7, श्लोक 27,

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥
--
(इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।
सर्वभूतानि सम्मोहम्  सर्गे यान्ति परन्तप ॥)
--
भावार्थ :
हे भारत (अर्जुन) ! संसार में अपने जन्म ही से, संसार में सम्पूर्ण प्राणी, इच्छा तथा द्वेष से उत्पन्न हो रहे सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों से विभ्रम को प्राप्त हो रहे हैं ।
--

अध्याय 9, श्लोक 4,

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्वस्थितः ॥
--
(मया ततम् इदम् सर्वम् जगत् अव्यक्तमूर्तिना ।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न च अहम् तेष्वस्थितः ॥)
--
भावार्थ :
मुझ अव्यक्तस्वरूप (निराकार) से यह सम्पूर्ण जगत् परिपूर्ण है । और सम्पूर्ण भूत मेरे ही आश्रय से मुझमें स्थित हैं, न कि मैं उनमें ।
--
टिप्पणी :
सम्पूर्ण जगत् एवम् भूत आदि अपने अस्तित्व के प्रमाण के लिए किसी चेतन सत्ता के आश्रित होते हैं, जबकि वह चेतन सत्ता अपने अस्तित्व का प्रमाण स्वयं ही है । इस प्रकार से ’चेतनता’ के सर्वव्यापक होने के तथ्य को अस्वीकार नहीं किया जा सकता । वही चेतनता किसी देह में प्राणरूप से व्यक्त होने पर उसे व्यक्ति-विशेष के रूप में अभिव्यक्त करती है । इस प्रकार से चेतनता की अभिव्यक्ति होने के पश्चात् ही ’मैं’ यह-यह, इस प्रकार का हूँ आदि भावनाएँ मन-मस्तिष्क में उत्पन्न होती हैं । इस प्रकार से परिभाषित हुआ ’व्यक्ति’, विनाशशील कल्पना मात्र है, जबकि इस कल्पना का आश्रय अविनाशी परमात्मा ।
--

अध्याय 9, श्लोक 7,

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥
--
(सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिम् यान्ति मामिकाम् ।
कल्पक्षये पुनः तानि कल्पादौ विसृजामि अहम् ॥)
--
भावार्थ :
हे कौन्तेय (अर्जुन) ! कल्प के अन्त में समस्त भूतों का मेरी (अपरा) प्रकृति में लय हो जाता है, और कल्प के आरंभ में मैं उनहें पुनः सृजित करता हूँ ।
 
--

अध्याय 18, श्लोक 61,

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥
--
(ईश्वरः सर्वभूतानाम् हृद्देशे अर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥)
--
भावार्थ :
हे अर्जुन! ईश्वर, देहरूपी यन्त्र में आरूढ हुए सम्पूर्ण प्राणियों के हृदय में अवस्थित होकर उन्हें अपनी माया के द्वारा परिचालित करता है ।
--

’सर्वभूतानि’ / ’sarvabhūtāni’ - to all beings,

Chapter 6, śloka 29,

sarvabhūtasthamātmānaṃ
sarvabhūtāni cātmani |
īkṣate yogayuktātmā
sarvatra samadarśanaḥ ||
--
(sarvabhūtastham ātmānam
sarvabhūtāni ca ātmani |
īkṣate yogayuktātmā
sarvatra samadarśanaḥ ||)
--
Meaning :
The one who sees the same Self in all beings, and all beings in the Self, such a One having realized and identified with Brahman sees everything as the same Reality.

--

Chapter 7, śloka 27,

icchādveṣasamutthena
dvandvamohena bhārata |
sarvabhūtāni sammohaṃ
sarge yānti parantapa ||
--
(icchādveṣasamutthena
dvandvamohena bhārata |
sarvabhūtāni sammoham
sarge yānti parantapa ||)
--
O  bhārata (arjuna) !, from the very birth all beings are subject to delusion caused by the twins like desire and envy, pleasure and pain.
--
Chapter 9, śloka 4,
mayā tatamidaṃ sarvaṃ
jagadavyaktamūrtinā |
matsthāni sarvabhūtāni
na cāhaṃ teṣvasthitaḥ ||
--
(mayā tatam idam sarvam
jagat avyaktamūrtinā |
matsthāni sarvabhūtāni
na cāhaṃ teṣvasthitaḥ ||)
--
Meaning :
This whole manifest expanse, all the world is pervaded by Me, The Immanent. All beings abide in Me, and not Me in them.
--

Chapter 9, śloka 7,

sarvabhūtāni kaunteya
prakṛtiṃ yānti māmikām |
kalpakṣaye punastāni
kalpādau visṛjāmyaham ||
--
(sarvabhūtāni kaunteya
prakṛtim yānti māmikām |
kalpakṣaye punaḥ tāni
kalpādau visṛjāmi aham ||)
--
Meaning :
O kaunteya (arjuna)! At the time of dissolution, at the end of the kalpa ( a day of brahmā), all  beings dissolve into My prakṛti, and at the beginning of the kalp, I create them into a new life.
--
Chapter 18, śloka 61,
--
īśvaraḥ sarvabhūtānāṃ
hṛddeśe:'rjuna tiṣṭhati |
bhrāmayansarvabhūtāni
yantrārūḍhāni māyayā ||
--
(īśvaraḥ sarvabhūtānām
hṛddeśe arjuna tiṣṭhati |
bhrāmayan sarvabhūtāni
yantrārūḍhena māyayā ||)
--
Meaning :
O arjuna! The Lord Supreme dwells within the space in the heart of all beings as consciousness, and by means of His will (māya), prompts them to function accordingly as if they are driven in a mechanical way.
--



Tuesday, June 24, 2014

आज का श्लोक, ’सर्वभूतेषु’ / ’sarvabhūteṣu’

आज का श्लोक,  ’सर्वभूतेषु’ / ’sarvabhūteṣu’
_________________________________

’सर्वभूतेषु’ / ’sarvabhūteṣu’ - समस्त प्राणियों में,

अध्याय 3, श्लोक 18,

नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
न च अस्य सर्वभूतेषु कश्चिद्व्यपदाश्रयः ॥
--
(न एव तस्य कृतेन अर्थः न अकृतेन इह कश्चन ।
न च अस्य सर्वभूतेषु कश्चित् अर्थव्यपाश्रयः ॥)
--
भावार्थ :
न तो उसके लिए किसी कर्म को किए जाने का अथवा न किए जाने का कोई प्रयोजन रह जाता है, और न ही इसका (उसका) सम्पूर्ण प्राणियों में से किसी से भी स्वार्थ का किञ्चित्मात्र भी कोई संबंध होता है ।
--
अध्याय 7, श्लोक 9,

पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥
--
(पुण्यः गन्धः पृथिव्याम् च तेजः च अस्मि विभावसौ ।
जीवनम् सर्वभूतेषु तपः च अस्मि तपस्विषु ॥)
--
भावार्थ :
पृथ्वी (या पृथ्वी तत्व) में पवित्र गन्ध, और तेजस्विता हूँ अग्नि में । सम्पूर्ण भूतों (प्राणिमात्र) में जीवन तथा तपस्वियों में तप हूँ ।
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टिप्पणी : गन्ध वह ’तन्मात्रा’ है जिससे पृथ्वी तत्व प्रकट होता है । दूसरी गन्ध वह है, जो पृथ्वी से प्रकट होती है । यहाँ आशय प्रथम प्रकार की गन्ध से है, इसलिए उसे ’पवित्र’ विशेषण दिया गया है  ।
--
अध्याय 9, श्लोक 29,

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥
--
(समः अहम् सर्वभूतेषु न मे द्वेष्यः अस्ति न प्रियः ।
ये भजन्ति तु माम् भक्त्या मयि ते तेषु च अपि अहम् ॥)
--
अध्याय 11, श्लोक 55,

मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥
--
(मत्कर्म-कृत्-मत्परमः मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः सः माम् एति पाण्डव ॥)
--
भावार्थ :
हे पाण्डुपुत्र अर्जुन! जो पुरुष मेरे लिए ही (प्रारब्धवश प्राप्त हुए) आसक्तिरहित होकर, सम्पूर्ण कर्मों को करता है (और उन्हें मुझे ही अर्पित करता है), जो सभी प्राणियों से वैररहित है, ऐसा मेरा वह भक्त मुझे ही प्राप्त होता है ।
--
अध्याय 18, श्लोक 20,

सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥
--
(सर्वभूतेषु येन एकम् भावम् अव्ययम् ईक्षते ।
अविभक्तम् विभक्तेषु तत्-ज्ञानम् विद्धि सात्त्विकम् ॥)
--
भावार्थ :
जिस ज्ञान (के माध्यम) से मनुष्य  सब भूतों में  अविभक्त अर्थात् समान रूप से विद्यमान एक ही अविनाशी परमात्मभाव को देखता है उस ज्ञान को (तुम) सात्त्विक (ज्ञान) जानो ।
--
सर्वभूतेषु’ / ’sarvabhūteṣu’ - in all beings,
--
Chapter 3, śloka 18,

naiva tasya kṛtenārtho
nākṛteneha kaścana |
na ca asya sarvabhūteṣu 
kaścidvyapadāśrayaḥ ||
--
(na eva tasya kṛtena arthaḥ
na akṛtena iha kaścana |
na ca asya sarvabhūteṣu 
kaścit arthavyapāśrayaḥ ||)
--
Meaning :
(The one content in the Self) has nothing to gain by performing an action, nor to lose by avoiding an action. He has nothing to do with or expect from anybody who-so-ever for any purpose, what-so-ever.
--

Chapter 7, śloka 9,

puṇyo gandhaḥ pṛthivyāṃ ca
tejaścāsmi vibhāvasau |
jīvanaṃ sarvabhūteṣū 
tapaścāsmi tapasviṣu ||
--
(puṇyaḥ gandhaḥ pṛthivyām ca
tejaḥ ca asmi vibhāvasau |
jīvanam sarvabhūteṣu 
tapaḥ ca asmi tapasviṣu ||)
--
Meaning :
The sacred scent (gandha, the tanmātrā ) which is the essence of the 'Earth'-Element (pṛthvī tatva, mahābhūta), and the radiance (heat and light) in the Fire, I AM. Life in all the Beings and austerities (tapaḥ / tapas) in those who perform various kinds of tapas, - I AM.
--
Chapter 9, śloka 29,

samo:'haṃ sarvabhūteṣu 
na me dveṣyo:'sti na priyaḥ |
ye bhajanti tu māṃ bhaktyā
mayi te teṣu cāpyaham ||
--
(samaḥ aham sarvabhūteṣu 
na me dveṣyaḥ asti na priyaḥ |
ye bhajanti tu mām bhaktyā
mayi te teṣu ca api aham ||)
--
Meaning :
I AM the same identity (Self) in all beings, and not hateful to one and favoring to some other. But those who are devoted to Me, (I too AM devoted to them) and just as they abide in Me, I too in them.  
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Chapter 11, śloka 55,

matkarmakṛnmatparamo
madbhaktaḥ saṅgavarjitaḥ |
nirvairaḥ sarvabhūteṣu 
yaḥ sa māmeti pāṇḍava ||
--
(matkarma-kṛt-matparamaḥ
madbhaktaḥ saṅgavarjitaḥ |
nirvairaḥ sarvabhūteṣu 
yaḥ saḥ mām eti pāṇḍava ||)
--
Meaning :
One Who dedicates all actions to Me, Who works for Me only, Who is committed to Me, devoid of all attachment, and having enmity with no one, attains Me O pāṇḍava (arjuna)!
--
Chapter 18, śloka 20,

sarvabhūteṣu yenaikaṃ
bhāvamavyayamīkṣate |
avibhaktaṃ vibhakteṣu
tajjñānaṃ viddhi sāttvikam ||
--
(sarvabhūteṣu yena ekam
bhāvam avyayam īkṣate |
avibhaktam vibhakteṣu
tat-jñānam viddhi sāttvikam ||)
--
Meaning :
The knowledge (wisdom) that helps one realize that the same imperishable principle is ever present and manifest in all forms as undivided divine whole, know this as of the sāttvika kind.
--




आज का श्लोक, ’सर्वभृत्’ / ’sarvabhṛt’

आज का श्लोक, ’सर्वभृत्’ / ’sarvabhṛt’
_____________________________

’सर्वभृत्’ / ’sarvabhṛt’ - सबका पालन-पोषण करनेवाला,

अध्याय 13, श्लोक 14,

सर्वेन्द्रियगुणाभासम्  सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥
--
(सर्वेन्द्रियगुणाभासम्  सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
असक्तम् सर्वभृत् च एव निर्गुणम् गुणभोक्तृ च ॥)
--
भावार्थ : इस अध्याय के प्रारंभिक श्लोकों में जिसे ’क्षेत्रज्ञ’ कहा गया वह आत्मा (अर्थात् ’मैं’ रूपी परमात्मा), यद्यपि सम्पूर्ण इन्द्रियों के गुणों (अर्थात् विषयों) को जाननेवाला है, किन्तु सर्वथा इन्द्रियविवर्जित है, -इन्द्रियरहित है । इसी तरह वह सर्वथा आसक्तिरहित भी है, किन्तु सबको पूर्णता प्रदान करनेवाला वह निर्गुण होते हुए भी इस रीति से गुणों का उपभोग भी करता है ।
--
’सर्वभृत्’ / ’sarvabhṛt’ - One Who sustains and supports all beings.

Chapter 13, śloka 14,

sarvendriyaguṇābhāsam
sarvendriyavivarjitam |
asaktaṃ sarvabhṛccaiva
nirguṇaṃ guṇabhoktṛ ca ||
--
(sarvendriyaguṇābhāsam
sarvendriyavivarjitam |
asaktam sarvabhṛt ca eva
nirguṇam guṇabhoktṛ ca ||)
--
Meaning : Manifesting One-self in the form of all the senses and also The One, Who is the Only evidence of those senses and their respective objects, unattached to them yet sustaining them all, He (kṣetrajña, the One Who 'knows' only the kṣetra, without mediate-knowledge) is also the Only enjoyer of them, is attribute-less ( nirguṇa ) .  

आज का श्लोक, ’सर्वयज्ञानाम्’ / ’sarvayajñānām’

आज का श्लोक, ’सर्वयज्ञानाम्’ / ’sarvayajñānām’
_______________________________________

’सर्वयज्ञानाम्’ / ’sarvayajñānām’ - समस्त यज्ञों का,

अध्याय 9, श्लोक 24,

अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
न तु मामभिजाननति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ।
--
(अहम् हि सर्वयज्ञानाम् भोक्ता च प्रभुः एव च ।
न तु माम् अभिजानन्ति तत्त्वेन अतः च्यवन्ति ते ॥)
--
भावार्थ :
मैं ही सम्पूर्ण यज्ञों का भोक्ता तथा स्वामी भी हूँ , चूँकि (जो) मुझ परमेश्वर को मेरे तत्त्वरूप से नहीं जानते, अतएव वे अधःपतित हो जाते हैं ।

--
’सर्वयज्ञानाम्’ / ’sarvayajñānām’ - of all sacrifices (yajña-s)

Chapter 9, śloka 24,

ahaṃ hi sarvayajñānāṃ 
bhoktā ca prabhureva ca |
na tu māmabhijānanati
tattvenātaścyavanti te |
--
(aham hi sarvayajñānām 
bhoktā ca prabhuḥ eva ca |
na tu mām abhijānanti
tattvena ataḥ cyavanti te ||)
--
Meaning :
I am the One Who enjoys, and I am the Alone the Lord of all sacrifices (yajña-s), but (those) who are unable to know Me, fall again and again.
--


आज का श्लोक, ’सर्वयोनिषु’ / ’sarvayoniṣu’

आज का श्लोक,  ’सर्वयोनिषु’ / ’sarvayoniṣu’
______________________________

’सर्वयोनिषु’ / ’sarvayoniṣu’ - समस्त योनियों में,

अध्याय 14, श्लोक 4,

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥
--
(सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।
तासाम् ब्रह्म महत् योनिः अहम् बीजप्रदः पिता ॥)
--
भावार्थ :
हे कौन्तेय (कुन्तीपुत्र अर्जुन)! समस्त योनियों में जितनी भी मूर्तियाँ (अनेक रूपाकृतियाँ) उत्पन्न होती हैं, उन सबकी महत् योनि, सबका आदिकारण प्रकृति अर्थात् महत्-ब्रह्म ही है (जैसा कि पिछले श्लोक में कहा गया था), जिसे मैं ही बीज प्रदान करता हूँ और इस प्रकार से मैं ही उनका पिता हूँ ।
--
’सर्वयोनिषु’ / ’sarvayoniṣu’ - In all species of all creatures,

Chapter 14,  śloka 4

sarvayoniṣu kaunteya
mūrtayaḥ sambhavanti yāḥ |
tāsāṃ brahma mahadyonir-
ahaṃ bījapradaḥ pitā ||
--
(sarvayoniṣu kaunteya
mūrtayaḥ sambhavanti yāḥ |
tāsām brahma mahat yoniḥ
aham bījapradaḥ pitā ||)
--
Meaning :
This prakṛti / mahat-brahma is the mahat yoni  -Great mother, that conceives the seed of All the beings that are born in innumerable different body-forms. And I AM The Father, That provides the seed.
--

Monday, June 23, 2014

आज का श्लोक, ’सर्वलोकमहेश्वरम्’ / ’sarvalokamaheśvaram’

आज का श्लोक,
’सर्वलोकमहेश्वरम्’ / ’sarvalokamaheśvaram’ 
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’सर्वलोकमहेश्वरम्’ / ’sarvalokamaheśvaram’ - समस्त लोकों का परमेश्वर,
 
अध्याय 5, श्लोक 29,
--
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥
--
(भोक्तारम् यज्ञतपसाम् सर्वलोकमहेश्वरम् ।
सुहृदम् सर्वभूतानाम् ज्ञात्वा माम् शान्तिम् ऋच्छति ॥)
--
भावार्थ :
सब यज्ञों और तपों के भोगनेवाले, सम्पूर्ण लोकों के ईश्वरों के भी ईश्वर, सभी भूतप्राणियों के आत्मीय, मुझको जानकर शान्ति को प्राप्त होता है ।
--
’सर्वलोकमहेश्वरम्’ / ’sarvalokamaheśvaram’ - The Only Lord Supreme of All the worlds,

Chapter 5, śloka 29,
 
bhoktāraṃ yajñatapasāṃ
sarvalokamaheśvaram |
suhṛdaṃ sarvabhūtānāṃ
jñātvā māṃ śāntimṛcchati ||
--
(bhoktāram yajñatapasām
sarvalokamaheśvaram |
suhṛdam sarvabhūtānām
jñātvā mām śāntim ṛcchati ||)
--
Meaning :
Knowing, Me / I AM, the goal of all sacrifices and austerities, The Only Supreme Lord of all the worlds and their respective gods, And beloved of all beings, one attains supreme peace.
--

आज का श्लोक, ’सर्ववित्’ / ’sarvavit’

आज का श्लोक, ’सर्ववित्’ / ’sarvavit’
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’सर्ववित्’ / ’sarvavit’ - सर्वज्ञ,

अध्याय 15, श्लोक 19,

यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥
--
(यः माम् एवम् असम्मूढः जानाति पुरुषोत्तमम् ।
सः सर्ववित्-भजति माम् सर्वभावेन भारत ॥)
--
भावार्थ :
मूढता से रहित निर्मल बुद्धियुक्त हुआ जो मनुष्य (ज्ञानी) मुझको ही तत्त्वतः मेरे पुरुषोत्तम स्वरूप से जानता है, वह अनायास ही सभी प्रकार से मुझे जानकर मेरा अनुगामी होकर मुझे ही अनन्य भाव से भजता है ।
--

’सर्ववित्’ / ’sarvavit’ - One who knows All and Everything.

Chapter 15, श्लोक 15,

yo māmevamasammūḍho
jānāti puruṣottamam |
sa sarvavidbhajati māṃ
sarvabhāvena bhārata ||
--
(yaḥ mām evam asammūḍhaḥ
jānāti puruṣottamam |
saḥ sarvavit-bhajati mām
sarvabhāvena bhārata ||)
--
Meaning :
One who is free from delusion, such a man of wisdom, - a sage, who knows All and Everything, knows Me as the Supreme Being, He alone worships Me in all respects and always with his whole being.
--

आज का श्लोक, ’सर्ववृक्षाणाम्’ / ’sarvavṛkṣāṇām’

आज का श्लोक,
’सर्ववृक्षाणाम्’ / ’sarvavṛkṣāṇām’ 
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’सर्ववृक्षाणाम्’ / ’sarvavṛkṣāṇām ’ - सब वृक्षों में,

अध्याय 10, श्लोक 26,

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।
गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥
--
(अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम् देवर्षीणम् च नारदः ।
गन्धर्वाणम् चित्ररथः सिद्धानाम् कपिलः मुनिः ॥)
--
भावार्थ :
अश्वत्थ (पीपल अथवा वट आदि) समस्त वृक्षों में, और देवर्षियों में नारद, गन्धर्वों में चित्ररथ नामक गन्धर्व, और सिद्धाओं में कपिल मुनि (हूँ) ।

--
’सर्ववृक्षाणाम्’ / ’sarvavṛkṣāṇām’ - among the trees,

Chapter 10, śloka 26,

aśvatthaḥ sarvavṛkṣāṇāṃ 
devarṣīṇāṃ ca nāradaḥ |
gandharvāṇāṃ citrarathaḥ
siddhānāṃ kapilo muniḥ ||
--
(aśvatthaḥ sarvavṛkṣāṇām 
devarṣīṇam ca nāradaḥ |
gandharvāṇam citrarathaḥ
siddhānām kapilaḥ muniḥ ||)
--
The ( aśvatthaḥ) Indian fig-tree among all the trees, and nārada among the celestial sages, citraratha among the celestial musicians,  and kapila muni among the siddha-s ; (I AM)
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Note : kapila muni : the famous inspired sage, son of sage (kardama) and (devahūti) who reduced to ashes 60000 sons of sagara, who, while searching for the sacrificial horse taken away by Indra, fell in with him (kapila muni) and accused him (kapila muni) of stealing the horse. He (kapila muni) reduced the multiplicity of elements to 3, i.e. Sattva, Rajas, and Tamas, and saw the distinction between prakṛti and puruṣa, who activates it ( prakṛti ) and is yet quite distinct from it.
--





आज का श्लोक, ’सर्ववेदेषु’ / ’sarvavedeṣu’

आज का श्लोक,  ’सर्ववेदेषु’ / ’sarvavedeṣu’
_________________________________

’सर्ववेदेषु’ / ’sarvavedeṣu’ - समस्त वेदों में,

रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥
--
(रसः अहम् अप्सु कौन्तेय प्रभा अस्मि शशिसूर्ययोः ।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषम् नृषु ॥)
--
भावार्थ :
हे कौन्तेय (अर्जुन)! जलों में ’रस’ नामक तन्मात्रा, चन्द्रमा एवं सूर्य में प्रकाश (प्रतिबिम्बित आभास अर्थात् चैतन्य),  समस्त वेदों में प्रणव अर्थात् ओंकार, तथा आकाश में शब्द, और मनुष्यों में पौरुष हूँ ।
--
टिप्पणी :
पञ्च तन्मात्राएँ पञ्च-प्राणों के गुणधर्मवाली हैं । इसलिए रस, स्पर्श, गन्ध, शब्द, तथा प्रकाश, ’समान’, ’व्यान’, ’अपान’, ’उदान’, तथा प्राण के समान धर्मवाले हैं । इस दृष्टि से जल तत्त्वतः रस है । चन्द्रमा एवं सूर्य आदि में दिखलाई देनेवाला प्रकाश / अग्नि / ’प्रभा’ किसी चेतन सत्ता के लिए, उस (चेतन सत्ता) के ही प्रमाण से अस्तित्वमान है । वह चेतन-सत्ता ’प्रकाश’ को प्रमाण है, न कि प्रकाश उसका (प्रमाण) । शब्द ’आकाश’ का गुण है, गन्ध पृथ्वी का, ’प्रणव’ वेद का, प्रकाश सूर्य तथा चन्द्र अर्थात् अग्नि का, और पौरुष / चेतनता जीवमात्र का । ’आकाश’ का तात्पर्य यहाँ स्थान-विशेष से है जैसे वायु से युक्त स्थान, जल या अन्य किसी पदार्थ में व्याप्त ’स्थान’ ।
--  

’सर्ववेदेषु’ / ’sarvavedeṣu’ - in the veda.
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raso:'hamapsu kaunteya
prabhāsmi śaśisūryayoḥ |
praṇavaḥ sarvavedeṣu 
śabdaḥ khe pauruṣaṃ nṛṣu ||
--
(rasaḥ aham apsu kaunteya
prabhā asmi śaśisūryayoḥ |
praṇavaḥ sarvavedeṣu 
śabdaḥ khe pauruṣam nṛṣu ||)
--
Meaning : O kaunteya, arjuna, the essence of the flow / taste, (rasa) of water, the light of the Moon and the Sun, The One sacred syllable (praṇava / OM) of the veda, I am the sound in the space, and consciousness / life in the humans / beings.
Note :
The 5 elements (mahābhūta) and 5 vital forces (prāṇa), and 5 gross elements (sthūlabhūta) are essence of one-another. Their manifest qualities (guṇa) as is perceived by the 5 senses, - flow (taste), touch, smell, sound, and sight (vision) respectively are synonymous of water, air, earth, space and light. These 5 senses are 'tanmātrā'. The 'Light' is a bit of a different quality (guṇa), that the one emitted by the Sun and the Moon (or fire) is directly revealed to 'one', 'seen' by one, by a 'conscious entity', and while it proves the existence of 'one', -a 'conscious entity' in the human body, the other four (senses) are but inferred only.  The 'conscious entity' or the 'consciousness' that is associated with a specific body (pura) is (puruṣa). The physical body may be a 'male' or a 'female', but the 'consciousness' that claims one-self the owner of the body is always beyond the attributes of the body. The 'male' / 'female' applies to the body only.
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Saturday, June 21, 2014

आज का श्लोक, ’सर्वशः’ / ’sarvaśaḥ’

आज का श्लोक, ’सर्वशः’ / ’sarvaśaḥ’
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’सर्वशः’ / ’sarvaśaḥ’ - सब प्रकार से, सब ओर से, हर तरह से,

अध्याय 1, श्लोक 18,

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक्पृथक् ॥
--
(द्रुपदः द्रौपदेयाः च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रः च महाबाहुःशङ्खान् दध्मुः पृथक् पृथक् ॥)
--
भावार्थ :
हे राजन् (धृतराष्ट्र) ! राजा द्रुपद (द्रौपदी के पिता)  तथा बलशाली भुजाओं वाले सुभद्रापुत्र अभिमन्यु सहित द्रौपदी के पाँचों पुत्रों ने भी युद्धक्षेत्र में सब ओर से अलग अलग शंखों का घोष किया ।
--
अध्याय 2, श्लोक 58,

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
--
(यदा संहरते च अयम् कूर्मः अङ्गानि इव सर्वशः
इन्द्रियाणि इन्द्रियार्थेभ्यः तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
--
भावार्थ :
जैसे कछुआ अपने अंगों को खोल के भीतर समेट लेता है, उस तरह से जब मनुष्य इन्द्रियों को उनके विषयों से परावृत्त कर (लौटाकर), अपने अन्तर में स्थित चेतना में एकाग्र / स्थिर कर लेता है तो उसकी बुद्धि स्थिर होती है ।
--
अध्याय 2, श्लोक 68,

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
--
(तस्मात् यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः
इन्द्रियाणि इन्द्रियार्थेभ्यः तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥)
--
भावार्थ :
जैसा कि इस अध्याय 2 के इससे पूर्व के श्लोक 67 में कहा गया, यदि इन्द्रियाँ चंचल हों तो मन जिस किसी भी इन्द्रिय का अनुसरण कर उससे संलग्न हो जाता है, वही इन्द्रिय उसकी विवेक-बुद्धि को हर लेती है, ... इसलिए,)
हे महाबाहु अर्जुन! जिस पुरुष की सभी इन्द्रियाँ सम्यक् रूपेण उनके विषयों से हटा ली जाकर निगृहीत अर्थात् वश में होती हैं उसकी प्रज्ञा स्थिर होती है ।
--
अध्याय 3, श्लोक 23,

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या पार्थ सर्वशः
--
(यदि हि अहम् न वर्तेयम् जातु कर्मणि अतन्द्रितः ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥)
--
यदि किसी भी काल में (कभी भी), मैं ही अप्रमादयुक्त न होकर (अर्थात् प्रमादयुक्त होकर, असावधानीपूर्वक) कर्म करूँ, तो चूँकि मनुष्य सब भाँति मेरा ही अनुसरण करते हैं ...( बड़ा अनर्थ हो जाये जैसा कि अगले श्लोक 24 में स्पष्ट किया गया है), हे पार्थ (अर्जुन) ! क्योंकि मनुष्यमात्र ही हर प्रकार से मेरी ओर ले जानेवाले मार्ग का ही अनुसरण किया करते हैं ।
टिप्पणी :
अध्याय 3, श्लोक 23 तथा अध्याय 4, श्लोक 11 की दूसरी पंक्ति समान है ।

--
अध्याय 4, श्लोक 11,
--
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तान्स्तथैव भजाम्यहम् ।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः
--
(ये यथा माम् प्रपद्यन्ते तान् तथा एव भजामि अहम् ।
मम् वर्त्म-अनुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥)
--
मेरे प्रति जिस प्रकार की श्रद्धा-निष्ठा युक्त भावना रखते हुए जो मेरी जिस प्रकार से उपासना करते हैं, मैं उन्हें उसी रूप में प्राप्त होता हूँ । क्योंकि मनुष्यमात्र ही हर प्रकार से मेरी ओर ले जानेवाले मार्ग का ही अनुसरण किया करते हैं ।
--
टिप्पणी :
अध्याय 3, श्लोक 23 तथा अध्याय 4, श्लोक 11 की दूसरी पंक्ति समान है ।
--

अध्याय 10, श्लोक 2,

न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।
अहं आदिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः
--
(न मे विदुः सुरगणाः प्रभवम् न महर्षयः ।
अहम् आदिः हि देवानाम् महर्षीणाम् च सर्वशः ॥)
--
भावार्थ :
मेरी उत्पत्ति (आविर्भाव) को न तो सुरगण जानते हैं, और न ही कोई भी महर्षि । क्योंकि मैं ही सब प्रकार से देवताओं का तथा महर्षियों का भी आदि कारण हूँ ।

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अध्याय 13, श्लोक 29,

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ॥
--
(प्रकृत्या एव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः
यः पश्यति तथा आत्मानम् अकर्तारम् सः पश्यति ॥)
--
भावार्थ :
समस्त कर्म प्रकृति के द्वारा ही किए जाते हैं , तथा आत्मा / अपने-आप के अकर्ता होने के सत्य को जो देखता है, वही (सत्य को) देखता है ।

--
’सर्वशः’ / ’sarvaśaḥ’ - in every way, on all sides,

Chapter 1, śloka 18,

drupado draupadeyāśca
sarvaśaḥ pṛthivīpate |
saubhadraśca mahābāhuḥ
śaṅkhāndadhmuḥ pṛthakpṛthak ||
--
(drupadaḥ draupadeyāḥ ca
sarvaśaḥ pṛthivīpate |
saubhadraḥ ca mahābāhuḥ-
śaṅkhān dadhmuḥ pṛthak pṛthak ||)
--
(sanjaya narrating to the King dhṛtarāṣṭra, -the running commentary of what he saw at battlefield)
drupada and the sons of draupadī, also the mighty-armed abhimanyu, -son of subhadrā , all blew their respective conchs. O King (dhṛtarāṣṭra)!
--

Chapter 2, śloka 58,

yadā saṃharate cāyaṃ
kūrmo:'ṅgānī va sarvaśaḥ |
indriyāṇīndriyārthebhyas-
tasya prajñā pratiṣṭhitā ||
--
(yadā saṃharate ca ayam
kūrmaḥ aṅgāni iva sarvaśaḥ |
indriyāṇi indriyārthebhyaḥ 
tasya prajñā pratiṣṭhitā ||
--
Meaning :
The aspirant should withdraw his attention back form the objects towards the senses, and then withdraw the same within heart / pure consciousness only, just like a tortoise who withdraws his limbs inwards. One who could do this is said to have of steady wisdom.
--

Chapter 2, śloka 68,

tasmādyasya mahābāho
nigṛhītāni sarvaśaḥ |
indriyāṇīndriyārthebhyas-
tasya prajñā pratiṣṭhitā ||
--
(tasmāt yasya mahābāho
nigṛhītāni sarvaśaḥ |
indriyāṇi indriyārthebhyaḥ
tasya prajñā pratiṣṭhitā ||)
--
(As already stated in the earlier śloka 68 of this Chapter 4, the discrimination of a mind is lost when it follows a sense attracted towards its object ,...)
Therefore O mahābāho (arjuna) ! One who has perfect control over the senses, and keeps them away from their respective objects whenever required, has his wisdom firmly established (in Truth).
   
Chapter 3, śloka 23,

yadi hyahaṃ na varteyaṃ
jātu karmaṇyatandritaḥ |
mama vartmānuvartante
manuṣyā pārtha sarvaśaḥ ||
--
(yadi hi aham na varteyam
jātu karmaṇi atandritaḥ |
mama vartmānuvartante
manuṣyāḥ pārtha sarvaśaḥ ||)
--
Meaning :
If even once for a moment, I stop working without proper attention and care, there will be great harm, (as is clarified in the next śloka24, of this Chapter 3) because  O pārtha!  (arjuna!) men always follow Me in all matters.
--
Note : The second half of the śloka 11 of Chapter 4, and śloka 23 of the Chapter 3 are identical.
--
Chapter 4, śloka 11,
ye yathā māṃ prapadyante
tānstathaiva bhajāmyaham |
mama vartmānuvartante
manuṣyāḥ pārtha sarvaśaḥ ||
--
(ye yathā mām prapadyante
tān tathā eva bhajāmi aham |
mam vartma-anuvartante
manuṣyāḥ pārtha sarvaśaḥ ||)
--
Meaning :
Who-so-ever comes to me with what-so-ever attitude, I respond to him in the same way. Because, O pārtha!  (arjuna!) men always follow Me in all matters.
--
Note : The second half of the śloka 11 of Chapter 4, and śloka 23  of the Chapter 3 are identical.
--
Chapter 10, śloka 2,

na me viduḥ suragaṇāḥ
prabhavaṃ na maharṣayaḥ |
ahaṃ ādirhi devānāṃ
maharṣīṇāṃ ca sarvaśaḥ ||
--
(na me viduḥ suragaṇāḥ
prabhavam na maharṣayaḥ |
aham ādiḥ hi devānām
maharṣīṇām ca sarvaśaḥ ||)
--
Meaning :
Neither the various celestial beings / divine entities, nor the great sages know My origin, because I AM the very origin of all those divine entities and the Great sages.
--
Chapter 13, śloka 29,

prakṛtyaiva ca karmāṇi
kriyamāṇāni sarvaśaḥ |
yaḥ paśyati tathātmānam-
akartāraṃ sa paśyati ||
--
(prakṛtyā eva ca karmāṇi
kriyamāṇāni sarvaśaḥ |
yaḥ paśyati tathā ātmānam
akartāram saḥ paśyati ||)
--
Meaning :
All the actions (karmāṇi) are always performed by the prakṛti only (by means of the 3 guṇa-s  / attributes). And the one who observes that 'I' ( the Self ) takes no part in any action (karma) sees the truth.
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आज का श्लोक, ’सर्वसङ्कल्पसंन्यासी’ / ’sarvasaṅkalpasaṃnyāsī’

आज का श्लोक,
’सर्वसङ्कल्पसंन्यासी’ / ’sarvasaṅkalpasaṃnyāsī’
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’सर्वसङ्कल्पसंन्यासी’ / ’sarvasaṅkalpasaṃnyāsī’ - जिसने कामनाओं को, तथा कर्मों में आसक्ति को त्याग दिया है,

अध्याय 6, श्लोक 4,

यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते ॥
--
(यदा हि न इन्द्रियार्थेषु न कर्मसु अनुषज्जते ।
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढः तदा उच्यते ॥)
--
भावार्थ :
(आरुरुक्ष और योगारूढ, अध्यात्मजिज्ञासु की इन दोनों अवस्थाएँ का वर्णन इस अध्याय 6 के पिछले श्लोक क्रमांक 3, में किया गया । अब योगारूढ की अवस्था का वर्णन आगे किया जा रहा है ...)
जिस काल में आरुरुक्षु मुनि (अभ्यासरत) न तो इन्द्रियों के विषयों में और न ही कर्मों में आसक्त / लिप्त होता है, अर्थात् दोनों के प्रति उदासीन होता है, तब उसे ही योगारूढ कहा जाता है ।
--
’सर्वसङ्कल्पसंन्यासी’ / ’sarvasaṅkalpasaṃnyāsī’ - One who has forsaken all desires and attachment to action.

Chapter 6, śloka 4,

yadā hi nendriyārtheṣu
na karmasvanuṣajjate |
sarvasaṅkalpasaṃnyāsī
yogārūḍhastadocyate ||
--
(yadā hi na indriyārtheṣu
na karmasu anuṣajjate |
sarvasaṅkalpasaṃnyāsī 
yogārūḍhaḥ tadā ucyate ||)
--
Meaning :
When, one practicing yoga (ārurukṣa, as explained in the previous śloka 3 of this Chapter 6), attains a stage of maturity where-by he has no more attachment either with the sense-objects or with the actions (karma-s), he is called yogārūḍha  -one established in yoga.  
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Friday, June 20, 2014

आज का श्लोक, ’सर्वस्य / ’sarvasya’

आज का श्लोक,  ’सर्वस्य / ’sarvasya’
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’सर्वस्य / ’sarvasya’ - सबका, सबकी, सबके, सब के लिए,

अध्याय 2, श्लोक 30,

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥
--
देही नित्यम् अवध्यः अयम् देहे सर्वस्य भारत ।
तस्मात् सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुम् अर्हसि ॥
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भावार्थ :
हे भारत (अर्जुन) ! देह का वास्तविक स्वामी, वह चेतना जो देह को अपना कहती है, सभी देहों में सदैव अवध्य है, अर्थात् देह के बनने-मिटने से वह अप्रभावित रहता है । इसलिए सम्पूर्ण प्राणियों (में से किसी) के लिए भी तुम्हारा शोक करना उचित नहीं है ।
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अध्याय 7, श्लोक 25,

नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजव्ययम् ॥
--
(न अहम् प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।
मूढः अयम् न अभिजानाति लोकः माम् अजम् अव्ययम् ॥)
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भावार्थ :
अपनी योगमाया* में अच्छी तरह से आवरित मैं सबको प्रत्यक्ष प्रकटतः नहीं दिखलाई देता । यह मूढ संसार मुझ जन्मरहित अविनाशी मेरे स्वरूप से अनभिज्ञ रहता है ।
--
*टिप्पणी :
(भगवान् की योगमाया के तीन पक्ष हैं - आवरण, विक्षेप और अनुग्रह । इन तीन शक्तियों के प्रभाव से ही आत्मा जीव के रूप में बन्धनग्रस्त होती है और फिर मुक्ति को प्राप्त होकर अपने स्वरूप (भगवान्) में समाहित हो जाती है ।
--
अध्याय 8, श्लोक 9,

कविं पुराणमनुशासितारमणोरणियांसमनुस्मरेद्यः ।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्णं तमसः पपरस्तात् ॥
--
(कविम् पुराणम् अनुशासितारम् अणोः अणीयांसम् अनुस्मरेत् यः ।
सर्वस्य धातारम् अचिन्त्यरूपम् आदित्यवर्णम् तमसः परस्तात् ॥)
--
कवि अर्थात् सर्वज्ञ, आदिरहित, सबके नियन्ता सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म सबका धारण, पालन करनेवाले अचिन्त्य स्वरूप है जिनका ऐसे सूर्य के समान चैतन्यमय पुरुष, अविद्यारूपी अंधकार से अति परे, ... उस परम ईश्वर का जो भी इस-इस प्रकार से स्मरण करता है, ...।
--
टिप्पणी :
अध्याय 8 के इस श्लोक क्रमांक 9 में प्रयुक्त शब्द ’अनुस्मरेत्’ को इसी अध्याय के पूर्व के श्लोक क्रमांक 7 में भी ’अनुस्मर’ के रूप में प्रयुक्त किया गया है, ...
--
अध्याय 10, श्लोक 8,

अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥
--
(अहम् सर्वस्य प्रभवः मत्तः सर्वम् प्रवर्तते ।
इति मत्वा भजन्ते माम् बुधाः भावसमन्विताः ॥)
--
मैं सबकी उत्पत्ति (हूँ), मुझसे ही सब कुछ प्रवृत्तिशील है, इस प्रकार से समझते हुए, हृदय की भावना को मुझ समन्वित कर बुद्धिमान मनुष्य मुझको (परमेश्ववर को)  सदा भजते हैं ।
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अध्याय 13, श्लोक 17,

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि  सर्वस्य विष्ठितम्   ॥
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(ज्योतिषाम् अपि तत् ज्योतिः तमसः परम् उच्यते ।
ज्ञानम् ज्ञेयम् ज्ञानगम्यम् हृदि सर्वस्य विष्ठितम्  ॥)
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भावार्थ :
समस्त ज्योतिर्मय पिंडों में स्थित स्थूल (इंद्रियग्राह्य) ज्योति की तुलना में उसी ज्योति को  से श्रेष्ठ कहा गया है, जो सबके हृदय में ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञानगम्य तीनों रूपों में प्रविष्ट है ।
--

अध्याय 15, श्लोक 15,

सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं  च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेवचाहम्  ॥
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(सर्वस्य च अहम् हृदि संनिविष्टः मत्तः स्मृतिः ज्ञानम् अपोहनम् च ।
वेदैः सर्वैः अहम् एव वेद्यः वेदान्तकृत्-वेदवित् एव च अहम् ॥)
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भावार्थ :
'मैं' सबके हृदय में  चेतना के रूप में सदा अवस्थित हूँ । मुझसे ही प्राणिमात्र में स्मृति, ज्ञान एवं उनका उद्गम, संकल्पों का उद्भव, विकल्प और विलोपन होता रहता है ।  पुनः समस्त वेदों में एकमात्र मुझे ही जानने योग्य कहा गया है । वेदान्त का प्रणेता, वेदार्थ का कर्ता और वेद को समझनेवाला भी मैं ही हूँ ।
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अध्याय 17, श्लोक 3,

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥
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(सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
श्रद्धामयः अयम् पुरुषः यः यत्-श्रद्धः सः एव सः ॥)
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भावार्थ :
हे भारत! सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अन्तःकरण (मन, बुद्धि, चित्त एवं ’मैं’-भावना रूपी चतुष्टय तथा उनका अधिष्ठान साक्षी-बुद्धि / शुद्ध चेतनता) के अनुरूप हुआ करती है । यह पुरुष श्रद्धामय है, अतएव जो पुरुष जैसी श्रद्धावाला है, वह स्वयं भी वही है ।
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अध्याय 17, श्लोक 7,

आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥
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(आहारः तु अपि सर्वस्य त्रिविधः भवति प्रियः ।
यज्ञः तपः तथा दानम् तेषाम् भेदम् इमम् शृणु ॥)
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भावार्थ :
भोजन भी सबको अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार (सात्विक, राजसिक अथवा तामसी) तीन प्रकार से प्रिय होता है । एवं इसी तरह से यज्ञ, तप एवं दान भी (जिन तीन प्रकारों से अपनी अपनी प्रकृति से) किया जाता है, उनके भेद क्या हैं, इसे सुनो ।
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’सर्वस्य / ’sarvasya’ - of all, for all,

Chapter 2, śloka 30,

dehī nityamavadhyo:'yaṃ
dehe sarvasya bhārata |
tasmātsarvāṇi bhūtāni
na tvaṃ śocitumarhasi ||
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dehī nityam avadhyaḥ ayam
dehe sarvasya bhārata |
tasmāt sarvāṇi bhūtāni
na tvaṃ śocitum arhasi ||
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Meaning :
The one in all the physical forms that has owned the body, is ever so unassailable O bhārata (arjuna) ! Therefore your grieving for all those beings is just meaningless.
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Chapter 7, śloka 25,

nāhaṃ prakāśaḥ sarvasya 
yogamāyāsamāvṛtaḥ |
mūḍho:'yaṃ nābhijānāti
loko māmajavyayam ||
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(na aham prakāśaḥ sarvasya 
yogamāyāsamāvṛtaḥ |
mūḍhaḥ ayam na abhijānāti
lokaḥ mām ajam avyayam ||)
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Meaning :
Hidden under My yogamāyā*, I AM not visible to all. So, this world ignorant of My Reality, is unable to know Me, -The Unborn and The Imperishable principle.
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*Note :
 yogamāyā is the power that manifests in the 3 forms as : āvaraṇa, vikṣepa, anugraha,
 āvaraṇa,  conceals the Reality from our eyes.
vikṣepa, imposes upon us something else as true.
anugraha, is the Grace, that enables to free ourselves from these two kinds which keep us in bondage.
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Chapter 8, śloka 9,

kaviṃ purāṇamanuśāsitāra-
maṇoraṇiyāṃsamanusmaredyaḥ |
sarvasya dhātāramacintyarūpa-
mādityavarṇaṃ tamasaḥ paparastāt ||
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(kavim purāṇam anuśāsitāram
aṇoḥ aṇīyāṃsam anusmaret yaḥ |
sarvasya dhātāram acintyarūpam
ādityavarṇam tamasaḥ parastāt ||)
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Meaning :
"He is Omniscient (kavi), He is timeless Being, He is the Sovereign Lord of all, subtlest in comparision to the subtle, He is The One who sutains all and everythin, of the form which is beyond the imagination of the man, He is effulgent like the Sun, beyond sarkness of ignorance, ..."
Who so ever Meditates upon Him thus, ...
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Chapter 10, śloka 8,

ahaṃ sarvasya prabhavo
mattaḥ sarvaṃ pravartate |
iti matvā bhajante māṃ
budhā bhāvasamanvitāḥ ||
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(aham sarvasya prabhavaḥ
mattaḥ sarvam pravartate |
iti matvā bhajante mām
budhāḥ bhāvasamanvitāḥ ||)
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Meaning :
I AM The origin from where all everything comes into existence, and through Me, everything prospers. The wise are ever devoted to Me with this spirit of understanding Me.
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Chapter 13, śloka 17,

jyotiṣāmapi tajjyotis-
tamasaḥ paramucyate |
jñānaṃ jñeyaṃ jñānagamyaṃ
hṛdi  sarvasya viṣṭhitam   ||
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(jyotiṣām api tat jyotiḥ
tamasaḥ param ucyate |
jñānam jñeyam jñānagamyam
hṛdi  sarvasya viṣṭhitam  ||)
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Meaning :
It is the light of all lights, different from darkness, It is the Enlightenment, comprehensible and within the capacity of understanding. It is already and ever there available accessible and inherent in the Heart of all beings.
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Chapter 15, śloka 15,
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sarvasya cāhaṃ hṛdi sanniviṣṭo
mattaḥ smṛtirjñānamapohanaṃ  ca |
vedaiśca sarvairahameva vedyo
vedāntakṛdvedavidevacāham  ||
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(sarvasya ca aham hṛdi saṃniviṣṭaḥ
mattaḥ smṛtiḥ jñānam apohanam ca |
vedaiḥ sarvaiḥ aham eva vedyaḥ
vedāntakṛt-vedavit eva ca aham ||)
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Meaning :

I am seated in the Hearts of all being. I am the source of memory, knowledge and forgetfulness also. From Me emerge all thought (vṛtti / saṃkalpa), choice and rejection, and also their dissolution . I am the principle all the Vedas speak of, worth known, and is learnt from. Alone I am the author and the knower of the vedas.
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Chapter 17, śloka 3,

sattvānurūpā sarvasya 
śraddhā bhavati bhārata |
śraddhāmayo:'yaṃ puruṣo
yo yacchraddhaḥ sa eva saḥ ||
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(sattvānurūpā sarvasya 
śraddhā bhavati bhārata |
śraddhāmayaḥ ayam puruṣaḥ
yaḥ yat-śraddhaḥ saḥ eva saḥ ||)
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Meaning :
According to the sattva, every-one has the own specific construct of mind (thought, intellect, consciousness and ego, these 4 together form the tendencies and modes of mind, and this is the inherent spontaneous instinct śraddhā, of a man) . This man is verily the śraddhā, so one is of the kind, what-ever and of what-so-ever kind is the inborn tendencies of the mind / śraddhā, he has from the birth.
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Chapter 17, śloka 7,

āhārastvapi sarvasya 
trividho bhavati priyaḥ |
yajñastapastathā dānaṃ
teṣāṃ bhedamimaṃ śṛṇu ||
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(āhāraḥ tu api sarvasya 
trividhaḥ bhavati priyaḥ |
yajñaḥ tapaḥ tathā dānam
teṣām bhedam imam śṛṇu ||)
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Meaning :
The food of all, they like according to their tendencies (prakṛti - sātvika, rājasika tāmasika) is also of three kinds as also the way of sacrifice (yajña), austerities (tapas) and charity (dānaṃ ) performed by them.
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