Monday, June 23, 2014

आज का श्लोक, ’सर्ववित्’ / ’sarvavit’

आज का श्लोक, ’सर्ववित्’ / ’sarvavit’
_____________________________

’सर्ववित्’ / ’sarvavit’ - सर्वज्ञ,

अध्याय 15, श्लोक 19,

यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥
--
(यः माम् एवम् असम्मूढः जानाति पुरुषोत्तमम् ।
सः सर्ववित्-भजति माम् सर्वभावेन भारत ॥)
--
भावार्थ :
मूढता से रहित निर्मल बुद्धियुक्त हुआ जो मनुष्य (ज्ञानी) मुझको ही तत्त्वतः मेरे पुरुषोत्तम स्वरूप से जानता है, वह अनायास ही सभी प्रकार से मुझे जानकर मेरा अनुगामी होकर मुझे ही अनन्य भाव से भजता है ।
--

’सर्ववित्’ / ’sarvavit’ - One who knows All and Everything.

Chapter 15, श्लोक 15,

yo māmevamasammūḍho
jānāti puruṣottamam |
sa sarvavidbhajati māṃ
sarvabhāvena bhārata ||
--
(yaḥ mām evam asammūḍhaḥ
jānāti puruṣottamam |
saḥ sarvavit-bhajati mām
sarvabhāvena bhārata ||)
--
Meaning :
One who is free from delusion, such a man of wisdom, - a sage, who knows All and Everything, knows Me as the Supreme Being, He alone worships Me in all respects and always with his whole being.
--

No comments:

Post a Comment