Friday, June 27, 2014

आज का श्लोक, ’सर्वभूतस्थितम्’ / ’sarvabhūtasthitam’

आज का श्लोक,
’सर्वभूतस्थितम्’ / ’sarvabhūtasthitam’ 
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’सर्वभूतस्थितम्’ / ’sarvabhūtasthitam’ - सब प्राणियों में अवस्थित (एकमेव चेतन सत्ता),

अध्याय 6, श्लोक 31,

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ॥
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(सर्वभूतस्थितम् यो माम् भजति एकत्वम्-आस्थितः ।
सर्वथा वर्तमानः अपि स योगी मयि वर्तते ॥)
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भावार्थ :
जो मुझ एकमेव चेतन तत्त्व को सब प्राणियों में समान रूप से अवस्थित जानकर अपने आपको उस तत्त्व से अभिन्न जानता है, ऐसा योगी बाह्यतः सब प्रकार से एक सामान्य मनुष्य की भाँति व्यवहार करता हुआ भी मुझमें ही व्यवहारशील होता है ।

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सर्वभूतस्थितम्’ / ’sarvabhūtasthitam’ - (The One and the only Consciousness) present in all beings.
 
Chapter 6, śloka 31,

sarvabhūtasthitaṃ yo māṃ
bhajatyekatvamāsthitaḥ |
sarvathā vartamāno:'pi
sa yogī mayi vartate ||
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(sarvabhūtasthitam yo mām
bhajati ekatvam-āsthitaḥ |
sarvathā vartamānaḥ api
sa yogī mayi vartate ||)
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Meaning :
One  who knows Me (The One and the only Consciousness) present in all beings, and shares Me in this way by realizing his identity with Me, though behaves as an ordinary human being, he ever does so with abiding in Me alone.
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