Monday, June 2, 2014

आज का श्लोक, ’संनियम्य’ / ’samniyamya’

आज का श्लोक,  ’संनियम्य’ /  ’samniyamya’
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’संनियम्य’ /  ’samniyamya’ - भलीभाँति नियंत्रण में रखते हुए,

अध्याय 12, श्लोक 4,

सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहितेरताः ॥

(संनियम्य इन्द्रियग्रामम् सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति माम् एव सर्वभूतहिते रताः ॥)
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भावार्थ :
अपनी समस्त इन्द्रियों को भली प्रकार से नियन्त्रण में रखते हुए, जो समबुद्धि रखनेवाले सब भूतों के हित में रत होते हैं वे मुझको प्राप्त हो जाते हैं ।
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’संनियम्य’ /  ’samniyamya’ - having kept the senses / passions well under control,

Chapter 12, śloka 4,

sanniyamyendriyagrāmaṃ
sarvatra samabuddhayaḥ |
te prāpnuvanti māmeva
sarvabhūtahiteratāḥ ||
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(saṃniyamya indriyagrāmam
sarvatra samabuddhayaḥ |
te prāpnuvanti mām eva
sarvabhūtahite ratāḥ ||)
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Meaning :
Those who keeping the senses well under control, always with even-mind devoted for the welfare of all beings, they also attain Me.
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