Sunday, June 29, 2014

आज का श्लोक, ’सर्वत्र’ / ’sarvatra’

आज का श्लोक,  ’सर्वत्र’ / ’sarvatra’
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’सर्वत्र’ / ’sarvatra’ - सर्वत्र, हर स्थान पर,

अध्याय 2, श्लोक 57,
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
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(यः सर्वत्र अनभिस्नेहः तत् तत् प्राप्य शुभाशुभम् ।
न अभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥)
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भावार्थ :
जो मनुष्य सर्वत्र ही किसी भी शुभ अथवा अशुभ फल से निर्लिप्त हुआ, न तो प्रसन्न होता है और न खिन्न, उसकी प्रज्ञा स्थिर है ।
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अध्याय 6, श्लोक 30,

यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति ।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥
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(यः माम् पश्यति सर्वत्र सर्वम् च मयि पश्यति ।
तस्य अहं न प्रणश्यामि सः च मे न प्रणश्यति ॥)
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भावार्थ :
जो मुझको (अपने-आपको) सर्वत्र देखता है तथा जो सबको मुझमें (अपने-आप ही में) अवस्थित देखता है, न तो उसके अस्तित्व मैं नष्ट होने देता हूँ और न ही वह मुझे (अपनी निज आत्मा / परमात्मा को) नष्ट होने देता है ।
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अध्याय 6, श्लोक 32,

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥
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(आत्मौपम्येन सर्वत्र समम् पश्यति यः अर्जुनः ।
सुखम् वा यदि वा दुःखम् सः योगी परमः मतः ॥)
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भावार्थ :
सुख हो या दुःख, किसी भी परिस्थिति में, हे अर्जुन! अपनी (चेतन आत्मा की चेतना की) उपमा से सर्वत्र एक समान व्याप्त चैतन्य आत्मा को ही, जो देखता है, वह योगी परम (श्रेष्ठ) माना जाता है ।
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अध्याय 12, श्लोक 4,

सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहितेरताः ॥
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(संनियम्य इन्द्रियग्रामम् सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति माम् एव सर्वभूतहिते रताः ॥)
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भावार्थ :
अपनी समस्त इन्द्रियों को भली प्रकार से नियन्त्रण में रखते हुए, जो समबुद्धि रखनेवाले सब भूतों के हित में रत होते हैं वे मुझको प्राप्त हो जाते हैं ।
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अध्याय 13, श्लोक 28,

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
न हिनस्त्यात्मात्मानं ततो याति परां गतिं ॥
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(समम् पश्यन् हि सर्वत्र समवस्थितम् ईश्वरम् ।
न हिनस्ति आत्मना आत्मानम् ततः याति पराम् गतिम् ॥)
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भावार्थ :
परमेश्वर को सर्वत्र और सबमें एक समान विद्यमान देखते हुए, अपने आपके या किसी के भी प्रति हिंसा नहीं करता और इसलिए ऐसा मनुष्य परम श्रेष्ठ गति प्राप्त करता है ।
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अध्याय 13,  श्लोक 32,

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते
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(यथा सर्वगतम् सौक्ष्म्यात् आकाशम् न उपलिप्यते ।
सर्वत्र अवस्थितः देहे तथा आत्मा न उपलिप्यते ।
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भावार्थ :
जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त आकाश सूक्ष्म होने के कारण (जिसमें व्याप्त है, उससे) लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार सर्वत्र अवस्थित आत्मा (जो कि आकाश से भी अधिक सूक्ष्म तथा और भी अधिक व्यापक है, - जो कि सबमें है, और सब जिसमें है,) देह से लिप्त नहीं होता ।
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अध्याय 18, श्लोक 49,
 
असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति ॥
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(असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति ॥)
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भावार्थ :
आसक्ति-बुद्धि से सर्वत्र और सर्वथा रहित, मन-बुद्धि तथा इन्द्रियों को वश में रखनेवाला, स्पृहारहित ऐसा मनुष्य साँख्ययोग के व्यवहार से परम नैष्कर्म्य-सिद्धि को प्राप्त होता है ।
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’सर्वत्र’ / ’sarvatra’ - at all places, every-where.

Chapter 2,  śloka57,

yaḥ sarvatrānabhisnehas-
tattatprāpya śubhāśubham |
nābhinandati na dveṣṭi
tasya prajñā pratiṣṭhitā ||
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(yaḥ sarvatra anabhisnehaḥ
tat tat prāpya śubhāśubham |
na abhinandati na dveṣṭi
tasya prajñā pratiṣṭhitā ||)
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Meaning :
One who is equally indifferent everywhere in achieving whatever good or bad comes to him, and neither rejoices nor regrets is said to have attained firm wisdom.
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Chapter 6,  śloka 30,

yo māṃ paśyati sarvatra 
sarvaṃ ca mayi paśyati |
tasyāhaṃ na praṇaśyāmi
sa ca me na praṇaśyati ||
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(yaḥ mām paśyati sarvatra 
sarvam ca mayi paśyati |
tasya ahaṃ na praṇaśyāmi
saḥ ca me na praṇaśyati ||)
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Meaning :
One who everywhere finds and sees Me, and likewise, everything in Me, is not lost sight of Me, nor I lose sight of him [is not lost to Me, nor I to him].
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Chapter 6,  śloka 32,

ātmaupamyena sarvatra 
samaṃ paśyati yo:'rjuna |
sukhaṃ vā yadi vā duḥkham
sa yogī paramo mataḥ ||
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(ātmaupamyena sarvatra 
samam paśyati yaḥ arjunaḥ |
sukham vā yadi vā duḥkham
saḥ yogī paramaḥ mataḥ ||)
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Meaning :
arjuna ! In happiness or in pain, one who sees the same Self in him-self and all others everywhere, is a yogī great indeed.
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Chapter 12,  śloka 4,

sanniyamyendriyagrāmaṃ
sarvatra samabuddhayaḥ |
te prāpnuvanti māmeva
sarvabhūtahiteratāḥ ||
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(saṃniyamya indriyagrāmam
sarvatra samabuddhayaḥ |
te prāpnuvanti mām eva
sarvabhūtahite ratāḥ ||)
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Meaning :
Those who keeping the senses well under control, always with even-mind devoted for the welfare of all beings, they also attain Me.
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Chapter 13,  śloka 28,

samaṃ paśyanhi sarvatra 
samavasthitamīśvaram |
na hinastyātmātmānaṃ
tato yāti parāṃ gatiṃ ||
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(samam paśyan hi sarvatra 
samavasthitam īśvaram |
na hinasti ātmanā ātmānam
tataḥ yāti parām gatim ||)
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Meaning :
Realizing and seeing the same Supreme Reality present within oneself, all and everywhere, inflicts no harm / violence upon oneself or others as each and everything is the embodiment of the same Self, the same Supreme Reality only.
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Chapter 13,  śloka 32,

yathā sarvagataṃ saukṣmyā-
dākāśaṃ nopalipyate |
sarvatrāvasthito dehe
tathātmā nopalipyate
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(yathā sarvagatam saukṣmyāt
ākāśam na upalipyate |
sarvatra avasthitaḥ dehe
tathā ātmā na upalipyate |
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Meaning :
As all-pervading ether is not contaminated due to its subtlety, quite so, the Self is not contaminated though residing in all bodies.
(Note : This  śloka beautifully explains how the 'self' in a body, and the 'Self' That is Omnipresent, That has the entire existence as its very body is the one and the same indivisible Reality.)
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Chapter 18,  śloka 49,
 
asaktabuddhiḥ sarvatra 
jitātmā vigataspṛhaḥ |
naiṣkarmyasiddhiṃ paramāṃ
sannyāsenādhigacchati ||
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(asaktabuddhiḥ sarvatra 
jitātmā vigataspṛhaḥ |
naiṣkarmyasiddhiṃ paramāṃ
sannyāsenādhigacchati ||)
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Meaning :
With no attachment nor craving for anything, a man with control over his body, senses and mind, by means of the right understanding and practice of 'sāṃkhyaysoga', attains the great state of freedom from all action (naiṣkarmyasiddhiḥ)
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Note :
naiṣkarmyasiddhiḥ means,
Getting rid of the false idea (illusion), the primal-ignorance:
 '' I do various actions, and enjoy / suffer / experience the consequences their-of."
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