Thursday, December 16, 2021

अन्तःकरण

मन, बुद्धि, चित्त, अहं(कार)

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निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।।

न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ।।३१।।

(अध्याय १)

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व 

जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।।

मयैवेते निहताः पूर्वमेव 

निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्  ।।३३।।

(अध्याय ११)

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अन्तःकरण को चार लक्षणों से जाना जा सकता है :

मन, बुद्धि, चित्त और अहं(कार)

मन, अन्तःकरण की भोगबुद्धि है । अर्थात् यह बुद्धि कि मैं सुख-दुःख, पाप-पुण्य का उपभोगकर्ता हूँ ।

बुद्धि अर्थात् ऐसा ज्ञान, जो कि सत्य, असत्य, मिथ्या / दोषयुक्त, अर्थात्  मोह और / या भ्रम से ग्रस्त हो सकता है ।

चित्त अर्थात् चेतना :

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।।

इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ।।२२।।

(अध्याय १०)

चेतना के तीन तल हैं :

पहला है -- चेतन (conscious),

दूसरा है -- अवचेतन (sub-conscious),

और तीसरा है -- अचेतन (un-conscious).

अचेतन ही आत्म-अज्ञान (मूल अविद्या) अर्थात् अहं(कार) है ।

यही अचेतन पहले तो अवचेतन की तरह अभिव्यक्त होता है और फिर चेतन की तरह ।

इस अचेतन में ही, कर्तृत्व, भोक्तृत्व, ज्ञातृत्व तथा स्वामित्व, इन चार प्रकार की बुद्धियों का उद्भव, स्थिति और लय होता है ।

इस प्रकार से अनायास ही आत्मा (अपने-आप) को ही बुद्धि में ही कर्ता, भोक्ता, ज्ञाता तथा स्वामी मान लिया जाता है।

फिर आत्मा क्या है? आत्मा न तो कर्ता, न भोक्ता, न ज्ञाता और न ही स्वामी है । अन्तःकरण के ये चार लक्षण, मन की उपाधियाँ हैं। उपाधि ही वह निमित्त है, जिसके बारे में प्रारम्भ के दो श्लोकों (1/31, 11/33) में कहा है।

इस प्रकार वह सभी कुछ, जो कुछ भी होता है वह कर्म / घटना केवल दृश्य प्रतीतिमात्र है। कर्ता, भोक्ता, ज्ञाता तथा स्वामी का अस्तित्व भी केवल कोरी कल्पना ही है।

आत्मा यद्यपि इस समस्त दृश्यमात्र का अधिष्ठान है, दृष्टा और दृश्य भी अन्योन्याश्रित होने से उनका स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है। इस सत्य को जान लेना ही आत्म-ज्ञान और आत्म-निष्ठा भी है। 

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Wednesday, November 3, 2021

निमित्त और उपादान

अध्याय १,

निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।

न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ।।३१।।

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अध्याय ११,

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व

जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।

मयैवेते निहताः पूर्वमेव

निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ।।३३।।

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अध्याय १३

गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।

पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ।।१३।।

अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।

प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ।।१४।।

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सद्दर्शनम् 

सर्वैर्निदानं जगतोऽहमश्च,

वाच्यः प्रभुः कश्चिदपारशक्तिः ।

चित्रेऽत्रेऽत्र लोक्यं च विलोकिता च

पटः प्रकाशोऽप्यभवत् स एकः ।।१।।

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क्या इसका अर्थ यह हुआ कि सृष्टि तो वस्तुतः कभी होती ही नहीं, क्योंकि परमात्मा स्वयं ही जगत् है ।

ऊपर के श्लोकों में यह कहा गया कि परमात्मा ही वैश्वानर तथा सोम का रूप लेता है (न कि उनकी सृष्टि करता है), किन्तु अब यदि अध्याय १० के इन श्लोकों का अवलोकन करें, जिनमें कहा गया है :

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।

अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ।।२०।।

आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् ।

मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ।।२१।।

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।

इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ।।२२।।

रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।

वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्  ।।२३।।

पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् ।

सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ।।२४।।

महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।

यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालय ।।२५।।

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।

गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ।।२६।।

उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् ।

ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् ।।२७।।

आयुधानामहं वज्रं धेनूनानस्मि कामधुक् ।

प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकि ।।२८।।

अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।

पितृणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्  ।।२९।।

('पितृणामर्यमा' में 'तृ' दीर्घ है, जिसे यहाँ यथावत् प्रस्तुत print / typeset करने में कठिनाई है, कृपया 10/29 में देखें, शायद मिल जाएगा,  या फिर अन्यत्र देखें।) 

प्रह्लादास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्  ।

मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ।।३०।।

पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् ।

झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ।।३१।।

सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।

अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ।।३२।।

अक्षराणामकारोस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च ।

अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ।।३३।।

मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् ।

कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ।।३४।।

बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।

मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ।।३५।।

द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्वितामहम् ।

जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्वमतामहम् ।।३६।।

वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः ।

मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ।।३७।।

दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।

मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ।।३८।।

नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।

एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतिर्विस्तरो मया ।।३९।।

यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।

न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ।।४०।।

यद्यद्विभूतिमत्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।

तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् ।।४१।।

10/30 एवं 10/33 में परमात्मा के 'काल' के स्वरूप को दो प्रकार  से व्यक्त किया गया है। 

एक तो वह है जो भौतिकीविदों (कलयतां) के द्वारा प्रतिपादित किया जानेवाला 'काल' है जो कि क्रमशः पुनः पुनः व्यक्त और अव्यक्त (manifest and unmanifest)  होता है, तो दूसरा वह जो अक्षय-स्वरूप अर्थात् अक्षर-स्वरूप है। 

इसे ही शिव-अथर्वशीर्ष में इस प्रकार से कहा गया है :

"अक्षरात्संजायते कालो कालाद् व्यापकः उच्यते व्यापको हि भगवान् रुद्रो भोगायमानो... "

तात्पर्य यह कि भौतिकीविदों द्वारा जिस "काल" का आकलन किया जाता है, वह बनती-मिटती रहनेवाली वस्तु है जो सतत व्यक्त और अव्यक्त होता रहता है। 

इसकी तुलना में परमात्मा वह "अक्षय-स्वरूप" काल है जिससे कि यह सापेक्ष काल पुनः पुनः अस्तित्व ग्रहण करता हुआ और पुनः पुनः विलीन होता हुआ प्रतीत होता है। 

इसी आभासी "काल" से स्थान / आकाश का उद्भव होता है ।

क्या परमात्मा सृष्टि का 'कर्ता' है?

स्पष्ट है कि सृष्टि अभिव्यक्ति है, न कि उसके द्वारा की जानेवाली निर्मिति, क्योंकि परमात्मा स्वयं ही सृष्टि का :

एकमात्र (unique) निमित्त कारण तथा, 

उपादान कारण (effective and material cause),

दोनों ही एक साथ है, या कहें कि परमात्मा स्वयं ही सृष्टा तथा सृष्टि भी है, किन्तु सृष्टिकर्त्ता नहीं है, और न उससे अलग दूसरा कोई सृष्टिकर्ता है। 

अतः यद्यपि यह तय किया जा सकता है कि भौतिक सृष्टि कब हुई, किन्तु उस तथ्य का संबंध केवल सूर्य के उद्भव से ही हो सकता है, न कि शेष अस्तित्व, या काल और स्थान (Time and Space) से ।

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Tuesday, October 26, 2021

सोमः भूत्वा रसात्मकः ।।

अहं वैश्वानरो भूत्वा

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रुद्र ही सोम होकर पृथ्वी में प्रविष्ट होता है, जहाँ वह वनस्पतियों और औषधियों को रसात्मक होकर पुष्ट करता है, वहीं जीवों में वैश्वानर होकर जीवों के द्वारा सेवन किए जानेवाले अलग अलग चार प्रकार के अन्न को पचाने का कार्य भी करता है। 

इस प्रकार एकमेवाद्वितीय परमेश्वर परब्रह्म रुद्र, वैश्वानर, सोम आदि विविध रूप लेकर जगत की सृष्टि, परिपालन और संहार करता है। 

जहाँ एक ओर उस एकमेव ईश्वर, परब्रह्म परमात्मा को भगवान् श्रीकृष्ण ने उत्तम पुरुष एकवचन 'अहं' पद के प्रयोग के द्वारा  श्रीमद्भगवद्गीता में व्यक्त किया है, वहीं भगवान् रुद्र ने भी इसी प्रकार उत्तम पुरुष एकवचन के द्वारा ही उसका / अपने तत्व का वर्णन शिव-अथर्वशीर्ष में किया है ।

वस्तुतः तो शिव-अथर्वशीर्ष के द्वितीय मंत्र में देवतागण रुद्र की स्तुति करते हुए कहते हैं :

यो वै रुद्रः स भगवान् यच्च कृष्णं तस्मै वै नमो नमः ।।९।।

यद्यपि यहाँ "कृष्ण" शब्द वर्ण के अर्थ में प्रयुक्त किया गया है, किन्तु गीता में ही अध्याय १० में भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारा किया गया यह उल्लेख भी दृष्टव्य है :

रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।

वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ।।२३।।

काल-क्रम को आधार माने तो श्रीमद्भगवद्गीता की रचना यद्यपि अथर्वशीर्ष के बाद हुई है, किन्तु वेद तथा पुराण आदि अपौरुषेय होने से उनमें व्यक्त किए गए सत्य काल से प्रभावित नहीं होते। 

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जैसा पहले कहा गया है, 'सोम' जहाँ एक ओर रुद्र का ही पर्याय है, वहीं एक रोचक कथा से यह भी विदित होता है कि क्यों इसे 'देवताओं' के 'पेय' के रूप में जाना जाने लगा। 

जब भगवान् श्रीराम ने रावण का वध कर दिया तब देवता बहुत प्रसन्न हुए और इन्द्र ने भगवान् श्रीराम की स्तुति करते हुए उनसे निवेदन किया कि देवता उनके प्रति अपना अनुग्रह कैसे प्रकट कर सकते हैं? 

तब भगवान् श्रीराम ने इन्द्र से कहा कि वह इस युद्ध में मारे गए सभी वानरों, ऋक्षों आदि पर अमृत की वर्षा कर उन्हें फिर से जीवित कर दे। तब इन्द्र ने ऐसा ही किया । तब अमृत की कुछ बून्दें वहाँ की भूमि पर इधर-उधर बिखर गईं, जिनसे अमृता या सोमवल्ली की उत्पत्ति हुई। 

इसे ही आयुर्वेद में गुडूची कहा जाता है, और इसके नाम से एक औषधिवर्ग ही है, जिसे "गुडूच्यादिवर्ग" कहा जाता है। 

चूँकि इस औषधि के रस को अमृततुल्य माना जाता है इसलिए भी देवताओं के अमृत-पान का संबंध इससे जोड़कर यह कहा जाता है कि देवता किसी विशेष द्रव्य / पेय का पान करते हैं।

किन्तु जैसा पहले कहा गया, उससे यही स्पष्ट है कि "सोम" कोई पेय नहीं है ।

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Saturday, October 23, 2021

त्रैविद्या सोमपाः

पुष्णामि / पचामि 

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"सोमः" शीर्षक से लिखित एक पुस्तक का वीडियो, यू-ट्यूब पर देखा। मेजर जनरल जी. डी. बख्शी द्वारा लिखी गई इस पुस्तक को देखने का सौभाग्य तो नहीं मिला, अतः उस बारे में मेरे द्वारा कुछ लिखने का प्रश्न ही नहीं उठता। बहरहाल, वीडियो पर एक टिप्पणी लिखी, जिसमें यह उल्लेख किया, कि गीता में 'सोम' के विषय में क्या कहा गया है।

गीता अध्याय १५ के निम्न दो श्लोकों में क्रमशः सोम तथा अग्नि का वर्णन इस प्रकार से है :

गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।

पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ।।१३।।

अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।

प्राणायामसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ।।१४।। 

अध्याय ९ के निम्न श्लोक में 'सोमपाः' का प्रयोग भी दृष्टव्य है :

त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा 

यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।

ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक-

मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ।।२०।।

इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण ने उत्तम पुरुष एकवचन क्रियापदों 'पुष्णामि' तथा 'पचामि' के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि वे ही सोम का रूप ग्रहण कर समस्त औषधियों को पुष्टि प्रदान करते हैं, वहीं वे ही वैश्वानर अग्नि के रूप में अन्न के चार प्रकार के पाचन की क्रिया को संपन्न करते हैं ।

उपरोक्त वर्णन से यह स्पष्ट है कि इस प्रकार से जिस 'सोम' को आज के कुछ विद्वान् कोई रसायन या पदार्थ-विशेष मान बैठे हैं, और उसे जड़ी-बूटियों आदि में खोजने की चेष्टा करते हुए उसके विषय में भाँति भाँति के अनुमान लगाते हैं वह कितना त्रुटिपूर्ण है । दूसरी ओर, आयुर्वेद में गुडूची नामक वनस्पति का एक नाम 'सोम' या 'अमृतवल्ली' पाया जाता है ।

इस वनस्पति का रस प्राप्त कर उसे औषधि की तरह से प्रयोग किया जाता है। 

यज्ञ के द्वारा हवन किए जानेवाले द्रव्यों से वैदिक देवताओं का आवाहन किया जाता है और इस दृष्टि से सोम भी इन्द्र, अग्नि,  वायु आदि की तरह देवता-विशेष है, न कि कोई वनस्पति, द्रव्य इत्यादि । 

इसकी पुष्टि शिव-अथर्वशीर्ष से भी होती है जहाँ देवता रुद्र की स्तुति करते हुए मंत्र २ में कहते हैं :

"यो वै रुद्रः स भगवान् यश्च सोमस्तस्मै वै नमो नमः।।८।।"

इससे भी यही स्पष्ट होता है कि 'सोम' के रूप में रुद्र ही यज्ञ में हवन की गई सामग्री को ग्रहण करते हैं ।

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Friday, September 3, 2021

गीता-नवनीत

सर्वोपनिषदो गावः

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जीवन पथ पर वैसे तो हर मनुष्य को चाहे-अनचाहे चलना ही होता है किन्तु अपने इस कार्य को वह चार तरीकों के आधार पर इस प्रकार से सुनिश्चित कर सकता है कि अंततः उसे जीवन में श्रेयस् की प्राप्ति हो जाए। 

गीता का अध्याय ७ का यह श्लोक इसी ओर संकेत करता है :

श्री भगवान् उवाच :

चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।

आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ।।१७।।

वहीं गीता के अध्याय १२ के इस श्लोक में कहा गया है :

श्रेयो हि ज्ञानं अभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते। 

ध्यानात्कर्मफलस्त्यागस्त्याच्छान्तिरनन्तरम् ।।१२।।

इस प्रकार इस श्लोक से श्रेयस् अर्थात् सत्य, ईश्वर, मन की पूर्ण और परम शान्ति की प्राप्ति की अभिलाषा रखनेवाले जिज्ञासुओं के भेद की ओर संकेत किया गया है।

किन्तु इन सभी जिज्ञासुओं के बीच में जो भी भेद दिखलाई देता है वह भी मूलतः पुनः उनकी उसी दो प्रकार की निष्ठा का ही भेद है, जिसे कि अध्याय ३ के इस श्लोक से स्पष्ट किया गया है :

लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ । 

ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनां ।।३।।

इस प्रकार निष्ठा के भेद से ही उपरोक्त चार प्रकार के भिन्न भिन्न तरीकों के प्रयोग में भी अंतर हो सकता है ।

पुनः इसका ही संक्षेप में वर्णन अध्याय ५ के इन श्लोकों में किया गया है :

अर्जुन उवाच :

सन्न्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि । 

यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ।।१।।

श्री भगवान् उवाच :

सन्न्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।

तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ।।२।।

ज्ञेयः स नित्यसन्न्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।

निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ।।३।।

साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।

एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ।।४।।

यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते ।

एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ।।५।।

सन्न्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः। 

योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म न चिरेणाधिगच्छति।।६।।

इस प्रकार भिन्न भिन्न जिज्ञासुओं को एक ही श्रेयस् की प्राप्ति साङ्ख्य या योग की अपनी अपनी निष्ठा के अनुसार होती है। 

भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता के अध्याय २ में साङ्ख्यरूपी योग का महत्व प्रतिपादित किया, अध्याय ३ में कर्मयोग का, एवं अध्याय ४ में यज्ञ और कर्म के महत्व का वर्णन समान रूप से किया। सन्न्यास का अर्थ है वह, जिसे योग अथवा साङ्ख्य की अपनी निष्ठा के अनुसार सन्न्यास की प्राप्ति हो गई। 

अध्याय ५ में इसीलिए कर्मसन्न्यास-योग का वर्णन किया गया, और उसके महत्व को प्रतिपादित किया गया।

किन्तु इसी क्रम को आगे बढ़ाने हुए अध्याय ६ का प्रारंभ निम्न श्लोक से किया गया :

अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः । 

स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ।।१।।

इसलिए सन्न्यासी यज्ञरूपी कर्म करे या न करे, अग्नि का स्पर्श करे या नहीं, कर्मफल का आश्रय नहीं ग्रहण करता। किन्तु इस सन्न्यास की उपलब्धि के लिए मनुष्य को जो योगाभ्यास करना होता है उस अभ्यास में उस मुनि की परिपक्वता के अनुसार उसे आरुरुक्षु अथवा योगारूढ कहा जाता है। इस प्रकार यद्यपि मुनि का कर्म या तो श्रेयस् की प्राप्ति के उद्देश्य से किया जाता है, या कर्म के शमन के लिए, यह उसकी परिपक्वता के अनुसार होता  है। पुनः यहाँ यह भी कहा गया है कि दोनों ही स्थितियों में योग का अवलम्बन लिया जाता है। इसलिए नित्यसन्न्यासी और योगी में समानता और भिन्नता भी देखी जा सकती है । 

इसे ही अगले श्लोकों में कहा गया है :

श्री भगवान् उवाच :

यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।

न ह्यसन्न्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ।।२।।

तथा,

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।

योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ।।३।।

अध्याय ६ को इसलिए योग अथवा अभ्यासयोग कहा गया। 

इसी क्रम को अध्याय ७ में विस्तारपूर्वक ज्ञानविज्ञानयोग का नाम दिया गया। 

ज्ञानविज्ञानयोग के ही क्रम में अगले अध्याय ८ में ब्रह्मविद्या के माध्यम से ब्रह्म की प्राप्ति के महत्व को तारकब्रह्मयोग नामक अध्याय में स्पष्ट किया गया।

गीता अध्याय २ में यद्यपि साङ्ख्य का तथा अध्याय ३ में कर्म को महत्व देकर उनका वर्णन किया गया, किन्तु इस प्रकरण को अध्याय ४ में इस प्रकार से उद्घाटित किया गया है कि साङ्ख्य की निष्ठा और दुरूहता के कारण उस मार्ग को न ग्रहण करने के इच्छुक और कर्म में रुचि और उसकी निष्ठा रखनेवाले मनुष्य के लिए जो उचित और ग्राह्य है, वह उस राजविद्या राजयोग रूपी कर्मनिष्ठा का अवलम्बन लेकर श्रेयस् की प्राप्ति का अभ्यास कर सके। यह वही योगविद्या है जिसका उपदेश सृष्टि करने के समय परमेश्वर ने विवस्वान (सूर्य) को दिया था, सूर्य से यह उपदेश मनु को प्राप्त हुआ और मनु से इक्ष्वाकु को, इस प्रकार यह भगवान् श्रीराम के वंश में परम्परा से प्राप्त होता रहा। 

अध्याय ४ इस प्रकार से प्रारंभ होता है :

श्री भगवान् उवाच :

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।

विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ।।१।।

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः। 

स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ।।२।।

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः । 

भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ।।३।।

इस प्रकार रामायण के अन्तर उत्तररामायण और उत्तररामायण के अन्तर गीता का प्राकट्य हुआ। 

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Sunday, August 22, 2021

प्रसाद : कामायनी,

हृदय की बात! 

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भरत मुनि के नाट्य-शास्त्र में कुल ३३ भाव हैं,  जिनमें से एक है : निर्वेद ।

यही ३३ (कोटि के) देवता शिव-अथर्वशीर्ष में 'रुद्र' के पर्याय हैं। किन्तु निर्वेद के अतिरिक्त शेष सभी संचारी और व्यभिचारी कहे जाते हैं। यहाँ 'व्यभिचारी' का तात्पर्य 'दुराचारी' नहीं, समय और परिस्थिति के अनुसार वि-अभि-चारी है।

'प्रसाद' की रचना 'कामायनी' पढ़ते समय इस शब्द से कभी मेरा परिचय हुआ था। 

गीता में अध्याय २ में इसका उल्लेख :

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।

तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ।।५२।।

में पाया जाता है ।

कामायनी के,

"रे मन, तुमुल कोलाहल कलय में मैं हृदय की बात रे!"

इस गीत को आशा भोसले ने गाया भी है ।

यह 

"हृदय की बात"

क्या है? 

यह अपने अस्तित्व का भान और उसकी वह सहज स्फुर्णा है, जिसे 'अहं-स्फुर्णा' कहा जाता है। यद्यपि यह विषय-रहित भान नित्य विशुद्ध होता है, किन्तु बुद्धि भूल से इसे ही किसी विषय पर आरोपित कर 'अहंकार' का रूप ले लेती है। यही बुद्धि इस अहंकार-रूपी मोहकलिल को पार कर लेती है तो निर्वेद नामक स्थिति में होती है। वैसे तो बुद्धि के दो प्रकार स्थिति और गति के रूप में होते हैं, किन्तु बुद्धि की निर्वेद नामक यह अवस्था इन दोनों से विलक्षण है, जहाँ उस प्रज्ञा का उन्मेष होता है, जिसके प्रतिष्ठित हो जाने पर मनुष्य अपनी आत्मा को स्वरूपतः जान लेता है। 

"श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च" के माध्यम से, श्रुतियों और शास्त्रों आदि के द्वारा जिस बुद्धि के चंचल होने का संकेत किया गया है, वही बुद्धि इस प्रकार मोहकलिल को पार कर, अचल समाधि में कैसे दृढ हो जाती है, इसका वर्णन 

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।

समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ।।५३।।

के माध्यम से पुनः, "योग" की प्राप्ति के वर्णन में है। 

इसी योग की प्राप्ति के बाद योगारूढ हुए स्थितप्रज्ञ, समाधिस्थ हुए मुमुक्षु की स्थिति का वर्णन,

क्रमशः श्लोक क्रमांक ५४, ५५, तथा ५६ में है :

स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव । 

स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ।।५४।।

प्रजहाति यदा कामान्सर्वार्थान्पार्थ मनोगतान् ।

आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ।।५५।।

दुःखेष्वनुद्गविग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।

वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ।।५६।। 

इस प्रज्ञा और इसके लक्षणों का वर्णन पुनः

"तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।"

के द्वारा इसी अध्याय के अगले श्लोकों ५७ तथा ५८ में भी प्राप्त होता है :

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।

नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।।५७।।

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।।५८।।

प्रसंगवश, 

योगारूढ मुनि / योगी, तथा आरुरुक्षु मुनि के बारे में गीता के अध्याय ६ के इस श्लोक ३, का उल्लेख करना यहाँ उपयोगी होगा :

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।

योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ।।३।।

किन्तु यदि इस सब सन्दर्भ से थोड़ा हटकर यह देखें कि 'प्रसाद' के 'निर्वेद' सर्ग के इस गीत में 'पवन (प्राण) की प्राचीर' और 'चेतना थक सी रही' को जिस प्रकार 'झूलते विश्व-दिन' के परिप्रेक्ष्य में संयोजित किया गया है, तो कहना होगा कि इससे कवि की यह रचना को कालजयी 'हृदय की बात' हो जाती है!

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उल्लिखित गीत इस प्रकार से है:

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रे मन! 

तुमुल-कोलाहल कलय में,

मैं, हृदय की बात रे! 

विकल होकर, नित्य चंचल,

खोजती जब नींद के पल, 

चेतना थक-सी रही तब, 

मैं, मलय की बात रे! 

चिर-विषाद-विलीन-मन की, 

इस व्यथा के तिमिर-वन की, 

मैं, उषा-सी ज्योति-रेखा, 

कुसुम-विकसित, प्रात रे! 

जहाँ मरु-ज्वाला धधकती,

चातकी कन को तरसती,

उन्हीं जीवन घाटियों में, 

मैं, सरस बरसात रे! 

पवन की प्राचीर में रुक, 

जला जीवन जी रहा झुक, 

इस सुलगते विश्व-दिन की,

मैं, कुसुम-ऋतु, रात रे!

चिर निराशा, नीरधर से,

प्रतिच्छायित,अश्रु-सर में,

उस स्वरलहरी के, अक्षर सब,

संजीवन-रस बने-घुले,

रे मन! 

***











 


Thursday, August 19, 2021

तप, ज्ञान, कर्म और योग

अभ्यासयोग 

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अध्याय ३ में भगवान् श्रीकृष्ण ने अध्यात्म-विषयक जिज्ञासुओं में दो प्रकार की निष्ठा का वर्णन किया है :

लोकेऽस्मिन्द्विविधानिष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।

ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ।।३।।

दो प्रकार की निष्ठाएँ क्रमशः साँख्य एवं योग की दृष्टि से कहने के अनंतर अर्जुन को इस विषय में शंका होती है कि निष्ठा की भिन्नता से क्या मुमुक्षु की उपलब्धि भी भिन्न भिन्न प्रकार की होती है?

अतः तब अध्याय ५ में भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन की इस शंका का निवारण करते हुए उससे कहते हैं :

साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः। 

एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्।।४।।

इस प्रकार गीता में ज्ञान-विषयक दो धारणाएँ प्राप्त होती हैं:

एक तो साङ्ख्यदर्शन के अनुसार होनेवाला आत्म-ज्ञान, जो कि मुक्ति का साधन है, तथा दूसरा सैद्धान्तिक तत्त्वज्ञान, जो केवल शास्त्रीय होता है और वस्तुतः अज्ञान का ही विशेष प्रकार है। 

इस प्रकार का ज्ञान भी यद्यपि सैद्धान्तिक होता है, किन्तु फिर भी वह ज्ञानरहित अभ्यास की अपेक्षा श्रेष्ठ होता है। 

इसलिए अध्याय १२ में भगवान् श्रीकृष्ण (सैद्धान्तिक ज्ञान से रहित) तप करनेवाले अभ्यासयोगियों अर्थात् तपस्वियों से इस ज्ञान से युक्त ज्ञानियों को अधिक श्रेष्ठ कहते हुए ध्यानयोगियों को ऐसे ज्ञानियों से भी श्रेष्ठतर कहते हैं। पुनः ऐसे ध्यानयोग में संलग्न, ध्यानरूपी कर्म करने की तुलना में उन्हें और भी अधिक श्रेष्ठ कहते हैं, जो कर्मफल (की आशा) को भी त्याग देते हैं।

अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।

अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय।।९।।

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव। 

मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ।।१०

अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः। 

सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्।।११।।

तथा अंत में :

श्रेयो हि ज्ञानं अभ्यासाज्ज्ञाद्ध्यानं विशिष्यते। 

ध्यानात्कर्मफलस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ।।१२।।

इस प्रकार तप, कर्म, ज्ञानरहित अभ्यास अर्थात् तप और ज्ञान-सहित कर्म को क्रमशः श्रेष्ठतर कहते हुए, अन्त में कर्मफल को ही त्याग देने को शान्ति की प्राप्ति का साधन कहते हैं। 

***


Friday, July 30, 2021

संयम

पातञ्जल योग-सूत्रों में वर्णित संयम 

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श्रीमदभगवद्गीता में 

"संयम" 

शब्द का प्रयोग क्रमशः इस प्रकार से है :

अध्याय २

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।

वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।६१।।

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। 

यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः।।६९।।

अध्याय ३

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्। 

इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते।।६।।

अध्याय ४

श्रोत्रादीनिन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति। 

शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति।। २६

अध्याय ६

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः। 

मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः।। १४

अध्याय ८

सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च। 

मूर्ध्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्।।१२।।

अध्याय १०

अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्। 

पितृणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्।।२९।।

पातञ्जल योग-दर्शन के चार अध्यायों में से समाधिपाद नामक पहले अध्याय में समाधि का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है।

दूसरे अध्याय साधनपाद में समाधि की प्रक्रिया में जिन साधनों की सहायता लेना आवश्यक है, उन साधनों का वर्णन विस्तार से किया गया है। 

उन साधनों का ठीक से प्रयोग करने पर चित्त का रूपान्तरण जिस प्रकार से हो जाता है, और आत्मा के स्वरूप को जानकर वह जिस कैवल्य में दृढतापूर्वक अधिष्ठित हो जाता है,  उस कैवल्य-मुक्ति का वर्णन किया गया है। 

विभूतिपाद के प्रथम तीन सूत्र क्रमशः इस प्रकार से हैं :

देशबन्धश्चित्तस्य धारणा।।१।।

तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्।।२।।

तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः।।३।।

उपरोक्त सूत्र में समाधिपाद के सूत्र :

स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का ।।४३।।

का संदर्भ 'स्वरूपशून्यमिव' के तुल्य और समानार्थी भी है।

इस प्रकार गीता में प्रयुक्त 'समाधि' तथा 'ध्यान', 'संयम' की सिद्धि में सहायक हैं और 'धारणा', 'ध्यान' तथा 'समाधि' का सामान्य और विशेष अर्थ 'संयम' के संदर्भ में दृष्टव्य है ।

***





Thursday, July 29, 2021

समाधि, समाधातुम्,

ब्रह्मकर्मसमाधिना 4/24,

समधिगच्छति 3/4,

समाधातुम् 12/9,

समाधाय 17/11,

समाधौ 2/44, 2/53,

***

पातञ्ल योगसूत्र का प्रारंभ समाधिपाद से होता है। 

पुनः समाधि के प्रकारों में क्रमशः 

वितर्कविचारानन्दास्मितानुगमात् सम्प्रज्ञातः ।। १७ ।।

तथा 

विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः ।।१८ ।।

(समाधिपाद) 

इस प्रकार से मुख्यतः समाधि के  दो प्रकार वर्णित किए गए हैं। 

इसका अर्थ यह हुआ कि समाधिस्थ 'मन' इन दो प्रकारों में से किसी एक में समाधान-पूर्वक अवस्थित होता है ।

वितर्क का अर्थ हुआ तर्क-वितर्कयुक्त, विश्लेषणपरक चिन्तन । 

विचार का अर्थ हुआ किसी व्यवधान से रहित सरलता से किया जानेवाला वैचारिक क्रम, जिसमें तर्क-वितर्क को अधिक महत्व नहीं दिया जाता।

आनन्द का अर्थ हुआ भाव या भावना में निमग्न होने से प्राप्त होने वाला सुख। 

अस्मिता का अर्थ हुआ ज्ञातृत्व, कर्तृत्व, भोक्तृत्व, और स्वामित्व की भावना में निमग्न होने से प्राप्त होनेवाला सुख अर्थात् अहं-संकल्प। 

इस प्रकार इन चारों के संबंध से युक्त अस्मिता रूप समाधान, या वितर्क, विचार और आनन्द के रूप में होने वाला समाधान, यह  सम्प्रज्ञात समाधि है (उपरोक्त सूत्र १७),

इसी प्रकार इससे अन्य समाधि वह है जिसमें मन ज्ञात- से परे चला जाता है (उपरोक्त सूत्र १८),

किन्तु वहाँ भी संस्काररूप में तो 'मन' होता ही है जो इस समाधि से व्युत्थान की दशा में पुनः पूर्ववत् कार्य करने लगता है ।

यद्यपि इस दूसरी समाधि को प्राप्त कर लेने पर इससे भी 'मन' पर एक नया संस्कार होता है जो पूर्व संस्कारों के बीज को दग्ध कर देता है।

इस प्रकार 'चित्त' नामक वस्तु का अस्तित्व क्रमशः संस्कार, 'मन' की वृत्ति तथा समाधानयुक्त दशा के रूप में हुआ करता है। 

यद्यपि असम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति हो जाने पर कुछ या सारे बीजरूप संस्कार दग्ध हो जाते हैं किन्तु उस समाधि में निरंतर बने रहने से वे पूरी तरह भस्म हो जाते हैं और यही वास्तविक ज्ञानाग्नि है ।

पातञ्जल योगसूत्र में 'समाधि' और 'संयम' इन दोनों का अभिप्राय भिन्न भिन्न है, क्योंकि विभूतिपाद के 

देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ।।१।।

तत्रप्रत्ययैकतानता ध्यानम्  ।।२।।

तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः ।।३।।

तथा, 

त्रयमेकत्र संयमः।।४।।

से यही प्रतीत होता है। 

इसी प्रकार 'तदेवार्थमात्रनिर्भासं' की पुनरावृत्ति समाधिपाद के

स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का ।।४३।। 

सूत्र से सुसंगत है। 

पुनः 'अर्थ' का अभिप्राय वही है जो 

इन्द्रियार्थान् 3/6,

इन्द्रियार्थेभ्यः  2/58, 2/68,

तथा 

इन्द्रियार्थेषु 5/9, 6/4, 13/8,

में है, अर्थात् इन्द्रियों के विषय ।

किन्तु 'समाधातुम्' का प्रयोग अध्याय १२ में :

अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थितम् ।

अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ।।९।।

दृष्टव्य है। यह भी उल्लेखनीय है कि उपरोक्त श्लोक में 'योग'  शब्द भी देखा जा सकता है। 

पुनः अध्याय ३ के निम्न श्लोक में समधिगच्छति शब्द का प्रयोग भी उपलब्धि के अर्थ में किया गया है 

न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।

न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति  ।।४।।

समाधान और समाधि एक ही प्रक्रिया का प्रारंभ और पूर्णता है । यह अध्याय २ के निम्न श्लोकों से भी स्पष्ट होता है --

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।

व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ।।४४।।

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।

समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ।।५३।।

स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।

स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ।।५४।।

किन्तु गीता में भी उसी प्रकार से 'संयम' को 'समाधि' की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है, जैसा महर्षि पतञ्जलि ने उनके योगसूत्र में दिया है। 

इस बारे में अगले पोस्ट में! 

***








Saturday, July 24, 2021

तान्यहं और तानहं

गीता में 'अहं' पद का प्रयोग 

***

अध्याय 4 -श्लोक 5, 

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।

तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप ।।

(4/5)

अध्याय 16, -श्लोक 19,

तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् ।

क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ।।

(16/19)

***

इस पोस्ट का सन्दर्भ कल के मेरे द्वारा अपने  vinaysv  blog  में लिखे गए पोस्ट 

~~कर्पूरगौरं~~

से है। 

--

जो पुरुष अपने आत्म-स्वरूप से अभिज्ञ होता है, वह अपने तथा दूसरों के भी इन असंख्य आभासी जन्म-मृत्यु आदि को जानते हुए, अपनी अविनाशी आत्मा के जन्म तथा मृत्यु से रहित होने के सत्य से भी अवगत होता है । जबकि वह मनुष्य, जो अपने आपको जन्म लेनेवाला तथा मरणशील मानता है, वह अपनी इस निज आत्मा की अविनाशिता से अपरिचित रह जाता है।  

-- 

जो पुरुष अपने अन्तर्हृदय में नित्य विद्यमान भगवत्सत्ता अर्थात्  भगवत्ता की उपेक्षा जाने-अनजाने, मोह या अज्ञानवश करते हुए, उस परमात्मा से द्वेष करते हैं, और उसका इस प्रकार तिरस्कार करते हैं, उनका वही निज आत्म-स्वरूप परमेश्वर उन्हें पुनः पुनः सतत आसुरी योनियों में जन्म लेने के लिए बाध्य करता है।

***



Wednesday, July 7, 2021

कार्याकार्ये, कार्ये, कालम्,

क,  का, 

कार्याकार्ये, 18/30,

कार्ये, 18/22,

कालम्, 8/23,

--

कार्याकार्यव्यवस्थितौ

क,  का,  16/24, कार्याकार्यव्यवस्थितौ,

-- 

कार्यम्,

का, 

कार्यम्, 3/17, 3/19, 6/1, 18/5, 18/9, 18/31,

--

कार्यकरणकर्तृत्वे, कार्यते,

का, 

कार्यकरणकर्तृत्वे, 13/20,

कार्यते, 3/5,

--

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः

का, 

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः,  2/7,

--

कारणानि, कारयन्

का, 

कारणानि  18/13,

कारयन् 5/13,

--


Tuesday, June 22, 2021

गीतायोग

योगसञ्ज्ञितम् 

-------------------

तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्।

स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ।। २३

(अध्याय ६)

हेयं दुःखं अनागतम् ।। १६

दृष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः ।। १७

प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं 

भोगापवर्गार्थं दृश्यम् ।। १८

विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि ।। १९

दृष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः ।। २०

(पातञ्जल योगसूत्र, साधनपाद)

अथ योगानुशासनम् ।। १

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ।। २

तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ।। ३

(पातञ्जल योगसूत्र, समाधिपाद)

***

Monday, June 14, 2021

कायशिरोग्रीवम्, कायम्, कायेन, कारणम्,

का,

शब्दानुक्रम -Index,

--

कायशिरोग्रीवम्, 6/13,

कायम्, 11/44,

कायेन,  5/11,

कारणम्, 6/3, 13/21,

***


Friday, June 4, 2021

विभूति-योग

7.

(उत्तरगीता)

महाराज युधिष्ठिर ने भगवान् श्रीकृष्ण से प्रश्न किया :

हे कृष्ण! 

अध्याय १० :

वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जय। 

मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविं।। ३७

उक्त श्लोक का अभिप्राय क्या है, कृपया कहें !

युधिष्ठिर के द्वारा यह निवेदन किए जाने पर श्रीकृष्ण ने कहा :

युधिष्ठिर! 

ध्यानपूर्वक सुनो! इससे पूर्व अर्जुन ने मुझसे कहा था :

सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव। 

न ही ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः।। १४

स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।

भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते।। १५

वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः। 

याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि।। १६

कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्। 

केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया।। १७

विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन। 

भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ।। १८

अर्जुन के द्वारा यह जिज्ञासा की जाने पर मैंने उससे कहा :

हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः। 

प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे।। १९

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः। 

अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च।। २०

युधिष्ठिर!  

तब मैंने अर्जुन से कहा :

अर्जुन!  वस्तुतः तो मैं 'अहं' - आत्मा की तरह समस्त भूत-मात्रों के हृदय में ही निवास करता हूँ, और इसलिए वही मेरा परमधाम है, किन्तु व्यक्त रूप में जिन विभूतियों के माध्यम से मैं भक्तों के समक्ष प्रस्तुत होता हूँ उन्हें तुम प्रधानतः इस प्रकार से जानो! 

.. .. .. 

आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्। 

मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी।। २१

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः।

इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना।। २२

रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्। 

वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ।।२३

पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्। 

सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः।। २४

महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।

यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालय।। २५

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः। 

गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः।। २६

उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम्। 

ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्।। २७

आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्। 

प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः।। २८

अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्। 

पितृृणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ।। २९

('पितृणां' > 'तृ' में ऋकार दीर्घ है, जिसे यहाँ लिखने की सुविधा नहीं होने से यह त्रुटि सुधार लें।) 

प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् ।

मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्।। ३०

पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्।

झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी।। ३१

सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन।

अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्।। ३२

अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च। 

अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः।। ३३

मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्। 

कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा।। ३४

बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्। 

मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः।। ३५

द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्वितामहम्। 

जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्वतामहम् ।।३६

और हे युधिष्ठिर! 

इसी क्रम में मैंने अर्थात् वसुदेव के पुत्र वासुदेव ने अपना उल्लेख करते हुए कहा :

वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः ।

मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः।। ३७

ये सभी मेरी ही अर्थात् एकमेव मुझ परमात्मा की ही विभूतियाँ हैं। इसलिए युधिष्ठिर! इनमें से प्रत्येक ही मैं ही हूँ, और इसीलिए तुम, हे अर्जुन! इनमें से किसी भी विभूति में मेरी भावना करते हुए यदि मेरी उपासना करो, तो भी तुम एकमात्र मुझे ही प्राप्त हो जाओगे!

(इस प्रकार 'एकेश्वरवाद' की मर्यादा का संकेत किया गया।) 

हे युधिष्ठिर! 

मैं (अहम् - आत्मा) एक भी हूँ,  एक नहीं भी हूँ।*

मैं (अहम् -आत्मा) अनेक भी हूँ,  अनेक नहीं भी हूँ।*

मैं (अहम् -आत्मा)  शून्य भी हूँ,  अशून्य (शून्य नहीं भी) हूँ।*

मेरा वर्णन इस प्रकार से भी किया जाता है :

(अध्याय २)

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।

उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः।। १६

(*तुलना करें देवी अथर्वशीर्ष से)

तथा :

यो वै रुद्रो स भगवान् यश्च ब्रह्मा तस्मै वै नमो नमः। १

...यश्च विष्णुस्तस्मै वै नमो नमः। २

यश्च स्कन्दः...। ३

यश्च इन्द्रः ...। ४

यश्च अग्निः ... । ५

यश्च वायुः ... । ६

यश्च सूर्यः। ७

यश्च सोमः । ८

अष्टौ ग्रहाः। ९

अष्टौ प्रतिग्रहाः।  १०

यच्च भूः। ११

यच्च भुवः । १२

यच्च स्वः । १३

यच्च महः । १४

या च पृथिवी । १५

यच्चान्तरिक्षं।  १६

या च द्यौ । १७

याश्चापः । १८

यच्च तेजः । १९

यश्च कालः । २०

यश्च यमः । २१

यश्च मृत्युः । २२

यच्चामृतं । २३

यच्चाकाशं । २४

यच्च विश्वं । २५

यच्च स्थूलं । २६

यच्च सूक्ष्मं । २७

यच्च शुक्लं । २८

यच्च कृष्णं । २९

यच्च कृत्स्नं । ३०

यच्च सत्यं । ३१

यच्च सर्वं । ३२

तस्मै वै रुद्राय नमो नमः।। 

(- शिवाथर्वशीर्षम्,

 इस प्रकार बहुदेववाद की मर्यादा को दर्शाया गया।)

इस प्रकार रुद्र (महादेव) सहित १+३२ = ३३ 'कोटि' के देवों के स्वरूप को स्पष्ट किया गया।) 

***

[प्रसंगवश :

क्रमशः १९, २०, २१, तथा २२ से वर्तमान कोरोना के संबंध का अनुमान किया जा सकता है, और यदि यह सत्य है तो वर्ष २३ में नए संसार की सृष्टि होगी ऐसा कहा जा सकता है।]

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Wednesday, June 2, 2021

गीताशास्त्र

6.

(उत्तरगीता)

प्रेरणा और प्रयोजन 

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गीता अर्थात् "श्रीमद्भगवद्गीता" नामक महर्षि व्यास द्वारा रचित ग्रन्थ, जो महाभारत के भीष्मपर्व में पाया जाता है अपने इस कलेवर में एक स्वतंत्र धर्मशास्त्र है।

गीता के अध्याय १० में किया गया एक रोचक श्लोक इस प्रकार  से उल्लिखित है :

वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः ।

मुनीनामऽप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ।। ३७

स्पष्ट है कि एक ही अहं (आत्मा रूपी तत्व), पर्याय से वासुदेव ही व्यक्त रूप से या व्यक्ति के रूप में श्रीकृष्ण, अर्जुन, व्यास तथा उशना नामक कवि है। 

यहाँ यह जानना कि कठोपनिषद् का प्रारंभ ही उशना के उल्लेख से ही होता है :

ॐ उशन् ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ। तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस। १

(प्रथम अध्याय,  प्रथम वल्ली) 

प्रसंगवश यहाँ यह भी दृष्टव्य है कि उशनस् यह नाम दैत्यों के गुरु, शुक्राचार्य अथवा भृगु / भार्गव का है। 

दूसरी ओर, उशीनर नामक देश कुरु से उत्तर में है :

(गोपथ ब्राह्मण २:९)

इस प्रकार हम संस्कृत से ग्रीक के संबंध का अनुमान कर सकते हैं। 

--

चार पुरुषार्थों में से धर्म नामक पुरुषार्थ अर्थ के लिए प्रेरणा का कार्य करता है, जबकि अर्थ, धर्म का एक प्रयोजन-विशेष मात्र है। 

इसी प्रकार काम नामक पुरुषार्थ, मोक्ष का प्रेरक है और मोक्ष ही काम का प्रयोजन है।

किन्तु प्रेरणा और प्रयोजन की दृष्टि से गीता मूलतः धर्मशास्त्र है, जो कि धर्म के तीन व्यक्त प्रकारों, अधिभौतिक, आधिदैविक व आध्यात्मिक स्वरूप, और उसके आचरण अर्थात् अनुष्ठान की शिक्षा देता है। अतः गीता को एकेश्वरवाद या अनेकेश्वरवाद के सन्दर्भ में समझने का प्रयास ही मूलतः दोषपूर्ण, भ्रमोत्पादक और त्रुटिपूर्ण है। 

स्पष्ट है कि गीता में 'धर्म' का सन्दर्भ और उल्लेख व्यापक अर्थ में किया गया है, न कि समुदायों या सम्प्रदायों की अपनी अपनी मान्यताओं और पार्टियों (rituals) के तात्पर्य में 'religion' के अर्थ में। 

इसलिए गीता में जिस आधार पर इन विषयों की विवेचना की गई है, वह अधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक है।  मनुष्य को जो ज्ञात है, अस्तित्व / धर्म के  इन्हीं तीनों तलों पर, तथा उसी सन्दर्भ में यह विवेचन (treatment) गीता में पाया जाता है।

अधिभौतिक का तात्पर्य है : 

सांसारिक, लौकिक (mundane, secular), 

आधिदैविक का तात्पर्य है : 

मनो-जगत (psyche, mind) या मन का कार्यक्षेत्र, 

और आध्यात्मिक का तात्पर्य है :

आत्म-तत्व (the spiritual).

'आत्म-तत्व' शब्द से जिस तत्व (element) का उल्लेख वेदान्त के शास्त्रों में किया जाता है, उसका ही उल्लेख 'अहं-पदार्थ' शब्द के द्वारा भी किया जाता है । और पुनः उसका ही उल्लेख 'अहं' अर्थात् 'आत्मा' एवं 'अहंकार' इन दो पदों से भी किया जाता है।

इसलिए इस धर्मशास्त्र के गूढ विषय को रचनाकार महर्षि व्यास ने संस्कृत भाषा में इस प्रकार वर्णित किया कि केवल कोई पात्र मनुष्य ही इस विषय को इस ग्रन्थ के माध्यम से ग्रहण कर सके, किन्तु किसी भी अपात्र मनुष्य के लिए, पात्र अर्थात् अधिकारी होने तक, यह विषय और ग्रन्थ कठिन और दुरूह जान पड़े। 

इसलिए इस ग्रन्थ का तात्पर्य जान और समझ सकने के लिए बुद्धि की सूक्ष्मता ही नहीं, बल्कि चेतना (अर्थात् मन एवं चित्त) का शुद्ध होना ही उतनी ही अपरिहार्य आवश्यकता है।

चेतना (आत्मा) के चार व्यक्त प्रकार क्रमशः मन, बुद्धि, चित्त एवं अहं होते हैं। 

यही चेतना 'अहं' के अर्थ में आत्मा (Self), जबकि अहंकार के अर्थ में वैयक्तिकता (individuality,  self) है।

गीता नामक ग्रन्थ को धर्मशास्त्र (scripture) की तरह देखें, तो इसके तात्पर्य को तीन स्तरों से ग्रहण किया जा सकता है, और उस आधार पर इसकी विवेचना भी भिन्न भिन्न तरीकों से की जा सकती है :

बौद्धिक या सैद्धान्तिक (philosophical),

व्यावहारिक प्रयोग की दृष्टि से, मन (psychological) के परिप्रेक्ष्य में, तथा 

आध्यात्मिक सत्य (spirituality) की जिज्ञासा शान्त करने हेतु।

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Tuesday, June 1, 2021

कालेन

5.

(उत्तरगीता) 

महाराज युधिष्ठिर ने भगवान् श्रीकृष्ण से पूछा :

हे प्रभु! 

पात्रता की दृष्टि से अर्जुन में और मुझमें क्या समानता और क्या भिन्नता है, कृपया कहें! 

तब भगवान् श्रीकृष्ण बोले :

युधिष्ठिर! जैसा कि तुम्हारा नाम और गुण है, तुम युद्ध के समय भी स्थिरबुद्धि होते हो, जबकि अर्जुन ऐसे समय में कर्तव्य क्या है तथा अकर्तव्य क्या है, इस द्वन्द्व से मोहित-बुद्धि हो गया था। 

इस प्रकार उसकी निष्ठा साङ्ख्य के अनुकूल न होकर कर्म के अनुकूल थी। तुममें ऐसा द्वन्द्व या संशय नहीं उत्पन्न होता है।

उसे उसके अनुकूल शिक्षा देने हेतु मैंने उससे कहा :

(अध्याय ३)

सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।

कुर्याद्विद्वांस्तथासक्ताश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम् ।। २५

तथा, 

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्। 

जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्।। २६

इस प्रकार उसकी निष्ठा कर्म में होने से उसमें कर्तृत्व, भोक्तृत्व, स्वामित्व और ज्ञातृत्व रूपी अज्ञान और तज्जनित दुविधा एवं संशय भी थे ही। 

इसलिए मैंने परिस्थिति के अनुरूप उसे वह शिक्षा दी जिससे कि समय आने पर वह भी तुम्हारी तरह साङ्ख्य की शिक्षा का पात्र हो सके। 

इसीलिए मैंने उसे कर्मयोग अर्थात् राजयोग, राजविद्या की वही शिक्षा प्रदान की जो कि महान काल के प्रभाव से विलुप्तप्राय हो चुकी थी।

इसलिए तुम्हारे लिए मैं पुनः जिस उत्तरगीता का उपदेश करूँगा, उसे सुनकर तुम्हारी यह जिज्ञासा शान्त हो जाएगी कि क्या मैंने अर्जुन को तुमसे भिन्न कोई विशेष शिक्षा दी थी।

(अध्याय ४)

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।

विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ।। १

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः। 

स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप।। २

स एवायं मया तेऽद्य योगं प्रोक्तः पुरातनः।

भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्।। ३

अर्जुन उवाच :

अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।

कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति।। ४

तब मैंने अर्जुन से कहा :

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। 

तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप।। ५

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। 

प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया।। ६

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। 

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। ७

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। 

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।। ८

तथा --

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः। 

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।। ९

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।

ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।। ३७

--

हे युधिष्ठिर! 

उपरोक्त श्लोकों से तुम समझ सकते हो कि यहाँ मुझ परमात्मा अर्थात् ईश्वर, जीवात्मा अर्थात् जीव, और आत्मा की अनन्यता को इंगित किया गया है। 

'अहं' पद (शब्द) का प्रयोग उत्तम पुरुष एकवचन तथा अन्य पुरुष एकवचन दोनों अर्थों में ग्राह्य है। 

इसी प्रकार से क्रिया-पद 'वेद' भी उत्तम पुरुष एकवचन तथा अन्य पुरुष एकवचन से सुसंगत है। 

इसलिए जो इसे जान लेता है कि मेरा जन्म तथा कर्म दिव्य है, उसे पुनर्जन्म प्राप्त नहीं होता, और वह मुझे ही प्राप्त हो जाता है।

जिस तरह एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने के लिए मनुष्य पैदल या वाहन आदि के मार्ग से जाते हैं, किन्तु पक्षी आकाश के मार्ग से उड़कर शीघ्र ही वहाँ पहुँच जाता है, उसी प्रकार कर्मयोग के मार्ग का अधिकारी पुरुष यद्यपि कुछ समय व्यतीत करते हुए अनेक माध्यमों से मुझे प्राप्त हो सकता है, किन्तु साङ्ख्य-योग का अधिकारी ज्ञानमार्ग का अवलंबन करते हुए, तत्काल ही मुझे प्राप्त हो जाता है।

किन्तु यह भेद भी वैसा ही औपचारिक और आभासी है, जैसे कि स्वप्न के पूर्ण हो जाते ही, जाने पर, स्वप्न में प्रतीत होनेवाला समय मिथ्या प्रतीत होने लगता है।

***





Sunday, May 23, 2021

कर्मनिष्ठा और साङ्ख्य

4.

(उत्तरगीता)

साङ्ख्य और कर्म

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भगवान् श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से आगे कहा :

हे राजन्! इस प्रकार अपनी स्वाभाविक निष्ठा को जानने के अन्तर ही मनुष्य या तो साङ्ख्य अर्थात् उस ज्ञान में स्थित रहते हुए शान्ति में निमग्न रहता है, या कर्ताभाव से युक्त हुआ उस  निष्ठा के अनुसार स्वयं को कर्ता मान बैठता है। 

इसी प्रकार से कर्ता-बुद्धि सहित कर्म का अनुष्ठान करते हुए वह अवश्य और अनायास ही प्रमाद अर्थात् अनवधानता से ग्रस्त होने से स्वयं को भोक्ता, स्वामी एवं ज्ञाता की तरह ग्रहण करने लगता है। यही चारों अहंकार के एकमात्र आभासी प्रकार होते हैं, जबकि अहंकार तमोगुण मात्र है। 

जब मनुष्य की बुद्धि तेजस्वी होती है और नित्य-अनित्य को देखने में परिपक्व हो जाती है तो ही उसमें आत्म-जिज्ञासा पैदा होती है। 

हे युधिष्ठिर! ऐसा मनुष्य ही साङ्ख्यनिष्ठा से युक्त कहा जाता है। 

कर्म को स्वरूपतः न तो ग्रहण किया जा सकता है,  न उसका आचरण अथवा त्याग ही किया जा सकता है क्योंकि समस्त कर्म अर्थात् कर्म-समष्टि प्रकृति से ही होते हैं। 

अध्याय ३

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। 

अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते।। २७

इसलिए कर्मनिष्ठ में स्थित हुए मनुष्य को चाहिए कि पहले वह कर्म, विकर्म और अकर्म के तत्व को जान ले। 

अध्याय ४

किं कर्म किमकर्मेतिकवयोऽप्यत्र मोहिताः। 

तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ।।१६

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः। 

अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः।। १७

कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः। 

स बुद्धिमान मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत ।। १८

इस प्रकार कर्म में सम्यक् रूप से निष्ठित मनुष्य अनायास ही साङ्ख्य का अधिकारी होता है। 

जब तक मनुष्य कर्तृत्व, भोक्तृत्व, स्वामित्व और ज्ञातृत्व बुद्धि से संलग्न रहता है, कर्म से बद्ध होता है अतः साङ्ख्य के तत्व में तथा उस निष्ठा में स्थित न हो पाने से ही उसे समस्त कर्म और कर्म के फल का त्याग करने की शिक्षा दी जाती है। 

हे राजन! ऐसा पुरुष जब तक मुझ परमात्मा को अपनी आत्मा से अन्य मानता है तब तक उसे चाहिए कि वह कर्तृत्व, भोक्तृत्व, स्वामित्व तथा ज्ञातृत्व इत्यादि को मुझे समर्पित कर दे ।

इस प्रकार से सब कुछ मुझे अर्पित कर देने पर मैं अपने आप को उसके प्रति प्रकट कर देता हूँ। 

तब वह अनन्यत्व से मुझ से एक हुआ, सर्वत्र समदर्शी हो जाता है।

इस प्रकार साङ्ख्य और कर्म (अर्थात् योग) के अनुष्ठान से एक ही फल प्राप्त होता है, इसलिए स्वरूपतः दोनों अभिन्न हैं और ऐसा ही पण्डितों के द्वारा जाना भी जाता है। 

अध्याय ४

साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः।

एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्।। ५

अध्याय १३

अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते।

तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः।। २५

***

क्रमशः 

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Friday, May 21, 2021

पुनः अभ्यासयोग

3.

इस प्रकरण के क्रमांक 2 में अभ्यासयोग का वर्णन किया गया था। उसे ही आगे बढ़ाते हुए पुनः क्रमशः अध्याय १२ के उसी श्लोक १२ पर यह क्रम निम्न तरीके से पूर्ण होता है :

भगवान् श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से आगे कहा :

युधिष्ठिर! अर्जुन को जिस प्रकार से मेरे स्वरूप (अर्थात् आत्मा) का दर्शन हुआ उसमें यद्यपि तत्वतः उसे अखिल विश्व का दर्शन हुआ, किन्तु उससे यह भी कहा गया कि वह जो कुछ और भी देखना चाहता है, उस सबको मुझमें देख सकता है।

चेतना के जिस तल पर अर्जुन को मेरे स्वरूप का दर्शन हुआ,  उसके विस्तार में जाना तुम्हारे लिए अनावश्यक है। अर्जुन ने मेरे उस स्वरूप का दर्शन किया क्योंकि यह उसकी अभिलाषा थी, किन्तु किसी भी मनुष्य का सामर्थ्य नहीं कि मेरे ऐसे दर्शन कर वह व्याकुल, व्यथित और भयभीत न हो। तब मैंने उसके भय को दूर करते हुए उससे कहा :

(अध्याय ११)

मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम्।

व्यपेतभीः प्रीतमना पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ।। ४९

सञ्जय उवाच :

इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः।

आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ।। ५०

अर्जुन उवाच :

दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन। 

इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतौ।। ५१

तब मैंने अर्जुन से पुनः यह कहा :

सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम। 

देवाऽप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः।। ५२

क्यों? 

नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन चेज्यया। 

शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा।। ५३

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन।

ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप।। ५४

मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः। 

निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव।। ५५

--

अध्याय ११ यहाँ पूर्ण हुआ। 

इसी क्रम में, अगले अध्याय १२ के पहले श्लोक में अर्जुन ने जिज्ञासा प्रस्तुत की :

अर्जुन उवाच :

एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते।

ये चाप्यमक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः।। १

तब मैंने अर्जुन से कहा :

मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।

श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः।। २

ये त्वमक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते। 

सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ।।३

सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः। 

ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः।। ४

क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् ।

अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते।। ५

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि  सन्न्यस्य मत्पराः। 

अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते।। ६

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।

भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्।। ७

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिः निवेशय ।

निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः।। ८

अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरं ।

अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय।। ९

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्म परमं भव।

मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ।।१०

अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः। 

सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्।। ११

क्यों? 

क्योंकि, 

श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते। 

ध्यानात्कर्मफलस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ।।१२

क्रमशः

***


 

 





 



 

Tuesday, May 18, 2021

2. अभ्यास-योग

भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा :
हे युधिष्ठिर! 
वैसे तो प्राणिमात्र पर ही मेरी सदा अत्यन्त कृपा रहती है, किन्तु मेरी ही त्रिगुणात्मिका माया का आवरण बुद्धि पर होने से किसी को भी मेरी इस कृपा का आभास तक नहीं होता। किन्तु इसमें
किसी का कोई दोष भी नहीं, क्योंकि जैसे बुद्धि माया से प्रेरित होती है, उसी तरह यह त्रिगुणात्मिका माया स्वयं भी मुझ पर ही आश्रित, मुझसे ही प्रेरित होकर अपने असंख्य कार्य करती रहती है। यह सारा प्रपञ्च मेरी ही लीला है और इसलिए न तो कोई पतित है, न पापी और न पुण्यवान। सभी मेरे ही व्यक्त प्रकार हैं। विभिन्न नाम-रूपों से वे अपनी अपनी भूमिका का निर्वाह करते हुए दिखाई देते हैं, किन्तु वस्तुतः न कोई कर्ता, न भोक्ता, न स्वामी और न ज्ञाता होता है। व्यक्त देह से संबद्ध बुद्धि में ही कर्म की कल्पना प्रस्फुटित होती है और देह, तथा देह का जिस जगत में आभास होता है, वह जगत तथा वह चेतना जिसमें देह और जगत की प्रतीति उत्पन्न होती है, मेरा ही प्रकाश और प्रकाश का विस्तार है। 
इसी पृष्ठभूमि में मैंने अर्जुन के लिए अभ्यास-योग का उपदेश इस प्रकार से किया था। :
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानात्-ध्यानं विशिष्यते।
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ।। १२ 
(अध्याय १२)
किन्तु इस श्लोक का सन्दर्भ जिन दूसरे श्लोकों से है, वे क्रमशः  (अध्याय ११ में) इस प्रकार से हैं :
अर्जुन उवाच :
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव। 
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ।। ४६
श्री भगवानुवाच :
मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मेत्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्।। ४७
इस प्रकार स्पष्ट है कि अर्जुन की ऐसी विशिष्ट इच्छा को पूर्ण करने के लिए उसे मैंने अपना विश्वरूपदर्शन दिखलाया था। उसे इसलिए जिस प्रकार से मेरे इस रूप का दर्शन हुआ था, वैसा दर्शन कर पाना उसके सिवा अन्य किसी दूसरे के लिए संभव नहीं है। यह भी स्पष्ट है कि इस प्रकार के विश्वरूपदर्शन में अर्जुन ने यद्यपि समस्त चर-अचर, जड-चेतन, भूत-समष्टि को एकमेव नित्य विद्यमान चेतनामात्र की तरह अनुभव कर लिया था, न कि अक्षरशः अपने चर्म-चक्षुओं से देखा था, किन्तु यह अनुभव भी अस्थायी और इसलिए अनित्य होने से यह परमात्मा का वास्तविक दर्शन था ऐसा कहना उचित न होगा। 
अर्जुन से मैंने आगे कहा :
न वेदाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः। 
एवं रूप शक्य अहं नृलोके द्रष्टुत्वदन्येन कुरुप्रवीर।। ४८
इस प्रकार मैंने पुनः इसकी पुष्टि की, कि मेरे जिस स्वरूप का दर्शन उसे हुआ, उसे उसके अतिरिक्त न तो कोई अन्य पुरुष देख सकता है, और न ही वेदों आदि के अध्ययन से, दान, पूजा आदि विविध पुण्यकर्मों से, उग्र तप इत्यादि क्रियाओं से, भी इस प्रकार के दर्शन कर पाना लोक में किसी के लिए संभव है।
***
क्रमशः
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Wednesday, May 12, 2021

उत्तरगीता

1.

महाभारत के युद्ध की समाप्ति के कुछ समय के बाद सर्वत्र शान्ति स्थापित हो चुकी थी । महाराज युधिष्ठिर धर्म के अनुसार पृथ्वी पर शासन कर रहे थे। तब एक दिन भगवान् श्रीकृष्ण से उन्होंने निवेदन करते हुए उनसे यह जिज्ञासा की --

"भगवन्! युद्ध की भीषण स्थिति में आपने अपने सखा, और मेरे अनुज को जो उपदेश प्रदान किया, उसका यत्किञ्चित अंश मुझे भी प्रदान हो, ऐसी मेरी अभिलाषा है। यदि भगवन् मुझे इस हेतु पात्र समझें तो इसे मैं अपना परम सौभाग्य समझूँगा।"

तब भगवान् श्रीकृष्ण ने मंदस्मित के साथ उनसे कहा --

"युधिष्ठिर! यह सत्य है कि उस समय मैंने अर्जुन से जो संवाद किया, वह तात्कालिकता और प्रासंगिकता की दृष्टि से यद्यपि संक्षिप्त ही था, और उसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि में जाने का न तो अवसर था, न प्रश्न, परंतु अर्जुन की पात्रता उसकी वह  विषाद-पूर्ण मानसिक स्थिति ही थी, जिसके कारण वह मेरे वचनों को ध्यान और एकाग्रता से सुन, उनका तात्पर्य यथावत् ग्रहण कर पाया। युधिष्ठिर! लोक में अर्जुन जैसा, पात्र दुर्लभ ही होता है। 

तुम्हारी स्वयं की स्थिति में भी, यद्यपि तुम भी अवश्य ही अर्जुन के ही समान इस ज्ञान की प्राप्ति करने के अधिकारी हो, किन्तु अर्जुन के लिए उस समय की उसकी वह मनोदशा ही इस शिक्षा के लिए एक उपयुक्त महत्वपूर्ण कारण सिद्ध हुई। उसकी उस विषाद-पूर्ण मनःस्थिति के तथा मुझमें अपनी अगाध श्रद्धा के कारण ही वह पात्रता में तुमसे श्रेष्ठ न होते हुए भी तुमसे न्यून भी नहीं था। वैसे तो तुम्हें धर्म क्या है और अधर्म क्या है, इसका पूर्ण ज्ञान है, और तुम तदनुसार धर्म-अधर्म के विवेक से प्रेरित होकर धर्म का आचरण भी करते हो, किन्तु लौकिक धर्म अध्यात्म के धर्म से बहुत भिन्न है, इसलिए मैं तुम्हारी जिज्ञासा शान्त करने के लिए तुमसे गीता के उसी मर्म को प्रत्यक्ष कहूँगा जिसे युद्ध के समय  मैंने अर्जुन से परोक्षतः कहा था।

चूँकि यह मर्म, जो मैं तुमसे कहने जा रहा हूँ, उसे सुयोग्य भक्त,  मुमुक्षु या अधिकारी पुरुष उचित समय आने पर अपने हृदय में ही सुनता और जान लेता है :

(कालेनात्मनि विन्दति...३८, अध्याय४)  

इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह पहले चित्त को ध्यानपूर्वक शुद्ध कर संकल्प सहित भक्ति, ज्ञान  कर्मयोग (निष्काम कर्म) का आश्रय लेते हुए इसका श्रवण करे।

 इस प्रकार ध्यान से श्रवण करने के अनन्तर मनन एवं निदिध्यासन करते हुए वह अन्ततः मुझे ही प्राप्त होता है।

ऐसा ही मेरा कोई प्रिय भक्त.... "

*** 

  

Sunday, May 9, 2021

3/15, 3/16, एवं प्रवर्तितं चक्रं

तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् .... 

Yajna in Corona Times:

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First let us narrate the above stanzas :

पहले हम इन दो श्लोकों का वाचन करें। 

ये क्रमशः इस प्रकार से हैं :

कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्। 

तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्।। १५

एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः।

अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति।। १६

--

इस कोरोना-काल में  O2, प्राणवायु (आक्सीजन) का महत्व अत्यन्त बढ़ गया है। 

पानी के इलेक्ट्रोलिसिस से  आक्सीजन का उत्पादन औद्योगिक स्तर किया जा सकता है। इसके ही साथ अनायास ही हाइड्रोजन H2 भी प्राप्त हो जाती है। 

इस प्रकार से इन दोनों गैसों को प्राप्त करने के लिए सौर-विद्युत का प्रयोग किया जा सकता है। 

सौर-विद्युत को पैदा करने के लिए जिन फ़ोटो-वोल्टैइक सेल का प्रयोग किया जाता है, उनके मूल घटकों को रिसायकल किया जा सकता है। आजकल प्रचलन में आ रही ईवी (EV) के साथ वही समस्या है, जो कि मोबाइल की बेट्रियों में होती है। उन्हें रिसायकल करना शायद कठिन है। वे धरती को और अधिक विषाक्त करते हैं। 

किन्तु यदि ईवी (EV) के स्थान पर यदि प्रदूषण-रहित हाइड्रोजन से चलने वाले वाहन विकसित किए जाएँ, तो इससे वातावरण में प्रदूषण भी नहीं फैलेगा ।

इस प्रकार यह कर्म यज्ञ का ही एक प्रकार होगा। 

यह हुआ सिद्धान्त ।

यह कितना व्यावहारिक है इसे तो वैज्ञानिक प्रयोग और परीक्षण से ही तय किया जा सकता है।

--

The idea is :

Oxygen could be generated through the electro-lysis of water. Thereby we also get hydrogen as yet another useful by-product or rather a fuel. 

This electrolysis could be done by means of the solar electricity. 

The solar electricity is produced by means of photi-voltaic cells, which (as in the case of mobile batteries) creates junk lithium or other such materials.

But when the solar electricity is produced by such a means,  we could recycle ♻ the same.

The hydrogen could replace the fuels used in vehicals. This way there will be zero pollution and carbon-emission as well. 

Of course this is only a suggestion.

The idea could be translated into reality if the scientists and technicians find out how this could meet the criteria of feasibility, viability and cost factors.

***


Wednesday, May 5, 2021

मयाध्यक्षेण, संशयात्मनः

प्रासंगिक

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गीता के दो श्लोक प्रासंगिक हैं :

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति। 

नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।। ४०

(अध्याय २)

तथा --

मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्। 

हेतुनानेन  कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते।। १०

(अध्याय ९)

इनसे ही संबद्ध, इसी अध्याय ९ के अगले दो श्लोक इस प्रकार से हैं --

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।

परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्।। ११

मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः। 

राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः।। १२

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इनके अर्थ इस ब्लॉग में अन्यत्र उपलब्ध हैं। 

यहाँ इन्हें उद्धृत करने का प्रयोजन यही है कि यदि हमारी रुचि, उत्सुकता तथा जिज्ञासा हो तो ये सारे श्लोक हमारे समस्त संसार और पूरी पृथ्वी की समस्याओं और कष्टों और संभावित समाधानों की ओर हमारा ध्यान आकर्षित कर सकते हैं ।

न तो इस ब्लॉग का लेखक बहुत विद्वान, ज्ञानी या सक्षम है, न वे सारे विचारक, चिंतक, बुद्धिजीवी, दार्शनिक, महात्मा, महापुरुष, वैज्ञानिक, गणितज्ञ, राजनेता, संत या धर्मोपदेशक आदि, जो इस दुनिया के बारे में बहुत चिन्तित, उद्विग्न हैं और इसे सुधारना या बदलना चाहते हैं, या इस बारे में एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं।

मूल प्रश्न यह है कि क्या वे संसार, दुनिया, आत्मा, या परमात्मा, और अपने आप (के वास्तविक स्वरूप) को ठीक ठीक जानते भी हैं या नहीं! 

यह हो सकता है कि मनुष्य और दूसरे सभी प्राणियों के प्रति उनके हृदय में अत्यन्त करुणा हो, किन्तु जब तक वे संसार, आत्मा, सत्य, परमात्मा और प्रमुखतः तो स्वयं अपने-आपकी वास्तविकता से अनभिज्ञ (अज्ञ) हैं, इस बारे में जानने और खोजबीन करने के महत्व के प्रति उनमें श्रद्धा तक न हो, इतना ही नहीं, इस विषय में संशयग्रस्त भी हों कि क्या ऐसा कोई सत्य, कोई आत्मा, ब्रह्म या ईश्वर है या नहीं, जो समस्त वैश्विकरण और जागतिक उपक्रम का संचालनकर्ता है, तब तक वे अपनी उसी बुध्दि से प्रेरित हुए अपने अपने उद्देश्यों की सिद्धि में संलग्न रहते हैं जो उन्हें प्रकृति से मिली होती है। 

इस प्रकार वे उन परिस्थितियों के दास (यंत्र) होते हैं, जो उन्हें विशिष्ट शुभ-अशुभ कर्मों में संलग्न करती है।

***



(अध्याय १०)

Monday, April 26, 2021

योग : अनिर्विण्णचेतसा

अध्याय 6, श्लोक 23 इस प्रकार से है :

तं विद्याद्दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्। 

स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ।।

शाङ्करभाष्य में इसे इस तरह कहा गया है --

तं विद्यात् -- विजानीयात्, 

दुःखसंयोगवियोगं -- दुःखैः संयोगो दुःखसंयोगवियोगः -- तेन वियोगः दुःखसंयोगवियोगः, 

तं दुःखसंयोगवियोगं -- योग,

इति एव सञ्ज्ञितं विपरीतलक्षणेन,

विद्यात् -- विजानीयात्,

इति अर्थः ।

उस योग नामक अवस्था को, 'दुःखों के संयोग' का वियोग समझना चाहिए। अभिप्राय यह हुआ कि दुःखों से संयोग होना 'दुःखसंयोग' है, उससे वियोग हो जाना 'दुःखों के संयोग का वियोग' है,  उस 'दुःख-संयोग-वियोग' को 'योग' ऐसे विपरीत नाम से कहा हुआ समझना चाहिए।

योगफलम् उपसंहृत्य पुनः अन्वारम्भेण योग्य कर्तव्यता उच्यते, निश्चयानिर्वेदयोः योगसाधनत्वविधानार्थम्। 

योग-फल का उपसंहार करके अब दृढ़ निश्चय को और योग-विषयक रुचि को भी योग का साधन बताने के लिए पुनः योग की कर्तव्यता बताये जाती है --

स -- यथोक्तफलो योगो,

निश्चयेन -- अध्यवसायेन,

योक्तव्यः अनिर्विण्णचेतसा। 

वह उपर्युक्त फलवाला योग बिना उकताए हुए चित्त से निश्चय-पूर्वक करना चाहिए। 

न निर्विण्णम् -- अनिर्विण्णं,

किं तत् चेतः?

तेन निर्वेदरहितेन चेतसा -- चित्तेन इत्यर्थ ।

जिस चित्त में निर्विण्णता (उद्वेग) न हो वह अनिर्विण्णचित्त है,  ऐसे अनिर्विण्ण (न उकताये हुए) चित्त से निश्चयपूर्वक योग का साधन करना चाहिए, यह अभिप्राय है। 

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