Friday, January 31, 2014

आज का श्लोक / 'हितम्' / 'hitaM'

आज का श्लोक / 'हितम्' / 'hitaM'
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अध्याय 18, श्लोक 64,
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सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ।
इष्टोsसि मे दृढमिति  ततो वक्ष्यामि ते हितम्
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( सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ।
इष्टः असि मे दृढम् इति  ततः वक्ष्यामि ते हितम् ॥)
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भावार्थ :
यद्यपि यह ज्ञान सर्वाधिक गूढ और गूढतम है, तथापि  मैं पुनः एक बार तुमसे ये तुम्हारे लिए परम हितकारी वचन कह रहा हूँ। मेरे इन वचनों को सुनो ( हे अर्जुन!) क्योंकि तुम मेरे इष्ट हो, दृढ और परम भक्त हो।
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Chapter 18, shloka 64,
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'हितम्' / 'hitaM' > For the ultimate good, benefit.
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sarvaguhyatamaM bhUyaH
shruNu me paramaM vachaH |
iShTo'si me dRDhamiti
tato vakShyAmi te hitaM ||
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Meaning :
O Arjuna! Now once again listen to my most secret wisdom that I am revealing before you, for your ultimate good and benefit only, because you are extremely dear to me.
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आज का श्लोक / 'हित्वा' / 'hitvA'

आज का श्लोक / 'हित्वा' / 'hitvA' 
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अध्याय 2, श्लोक 33,
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अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि ।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥
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( अथ चेत् त्वं इमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि ।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापं अवाप्स्यसि ॥)
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हित्वा, 'हा' / 'हन्' अर्थात् हनन करना,  'ल्यप् ' प्रत्यय सहित , 'हित्वा'= मारकर।
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भावार्थ :
अतः (हे अर्जुन!) यदि तू इस धर्मसम्मत संग्राम को नहीं करेगा तो अपने धर्म और कीर्ति की भी हानि कर पाप का भागी होगा।
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'हित्वा' / 'hitvA
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Chapter 2, shloka 33,
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atha chettvamimaM dharmyaM
saMgrAmaM na kariShyasi |
tataH svadharmaM kIrtiM cha
hitvA pApamavApsyasi ||
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Meaning : causing harm to, endangering.
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Arjuna !If you say you will not take part in this righteous war, you will lose not only the reputation and status on the worldly level, but also incur sin.
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आज का श्लोक / 'हिनस्ति' / 'hinasti''

आज का श्लोक / 'हिनस्ति' / 'hinasti'
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समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥
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(समं पश्यन् हि सर्वत्र
समवस्थितम् ईश्वरम् ।
हिनस्ति आत्मना आत्मानं
ततो याति परां गतिम् ॥)
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भावार्थ :
ईश्वर को सर्वत्र, अपने आपमें तथा अन्य सभी वस्तुओं और प्राणियों में भी समान रूप से विद्यमान जानकर वह अपने तथा किसी के भी प्रति हिंसा का आचरण नहीं करता ।
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Chapter 13, shloka 28,
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'हिनस्ति' / 'hinasti'
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samaM pashyanhi sarvatra
samavasthitamIshvaraM |
na hinastyAtmanAtmAnaM
tato yAti parAM gatiM ||
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samaM pashyan - hi sarvatra
samavasthitaM IshvaraM |
na hinasti-AtmanA-AtmAnaM
tataH yAti parAM gatiM ||
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'hinasti' : harms, endangers, inflicts cruelty, suffering.
Meaning :
One who has realized the 'Self' That is The Supreme Being as The Only Only Reality everywhere, in oneself and all beings and things, does not impose cruelty / sufferings upon himself or others.
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आज का श्लोक / 'हिमालयः'/ 'himAlayaH'

आज का श्लोक / 'हिमालयः'/ 'himAlayaH'
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अध्याय 10, श्लोक २५,
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महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरं ।
यज्ञानां जपयज्ञोsस्मि  स्थावराणां हिमालयः
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हिमालयः - हिमालय पर्वत।
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भावार्थ :
महर्षियों में मैं महर्षि भृगु, वाणी के रूपों में मैं पदात्मक वाक्यों में एक अक्षर ओंकार, यज्ञों में जपयज्ञ तथा स्थावर अर्थात्  अचल तत्वों में पर्वतराज हिमालय हूँ।
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Chapter 10, shloka 25.
'हिमालयः'/ 'himAlayaH' > Himalayas Mountains.
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maharShINAM   bhRgurahaM
girAmasmyekamakSharaM |
yajnAnAM japayajno'smi
sthAvarANAM himAlayaH ||
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Among Sages, I am bhRugu maharShi, among words, I am the monosyllable "OM", Of sacrifices, I am the sacred chanting, and of the unmoving, I am the Himalayas.
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आज का श्लोक / ’हिंसात्मकः’/'hinsAtmakaH'/

आज का श्लोक  / ’हिंसात्मकः’/'hinsAtmakaH'/  
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अध्याय १८, श्लोक २७,
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रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः ।
हर्षशोकान्वितः  कर्ता  राजसः  परिकीर्तितः ॥
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(रागी कर्मफलप्रेप्सुः लुब्धः हिंसात्मकः अशुचिः ।
हर्षशोक अन्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥)
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’हिंसात्मकः’/ हिंसा से पूर्ण,
भावार्थ :
ऐसे कर्म को जिसे करनेवाला कर्ता रागबुद्धि से युक्त होकर कर्म के विशिष्ट फल की अपेक्षा रखता है, जो हिंसा का प्रयोग करता है, हर्ष एवं शोक युक्त है, राजस कहा जाता है ।
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 / ’हिंसात्मकः’ / 'hinsAtmakaH'/ 
Meaning : An action that involves violence towards others and oneself.
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Chapter 18, shloka 27,
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rAgI karmaphalaprepsur-
lubdho hinsAtmako'shuchiH |
harSha-shokAnvitaH kartA
rAjasaH parikIrtitaH ||
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Meaning :
The one who prompted by desire, motivated by and expecting a certain result of the action, and prone to be overwhelmed by the emotions involving elation or depression from moment to moment, is said a 'rAjasa' kartA (doer).
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Thursday, January 30, 2014

आज का श्लोक / ’हिंसाम्’ / 'hinsAm'

आज का श्लोक  / ’हिंसाम्’ / 'hinsAm'
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अध्याय 18, श्लोक 25,
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अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषं ।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥
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(अनुबन्धं क्षयं हिंसाम् अनपेक्ष्य च पौरुषम् ।
मोहात् आरभ्यते कर्म यत् तत् तामसम् उच्यते ॥)
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अनुबन्ध - कर्म के अन्त में प्राप्त होनेवाला परिणाम, क्षय - शक्ति या धन की हानि, हिंसा - प्राणियों को होनेवाली पीड़ा, तथा पौरुष - अपने सामर्थ्य / क्षमता के बारे में सोचे विचारे बिना जो कर्म प्रारंभ किया जाता है उसको तामस् कर्म कहा जाता है ।
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Chapter 18, shloka 25,
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’हिंसाम्’/ 'hinsAM' - pain caused to creatures.

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anubandhaM kShayaM hinsAm-
anapekShya cha pauruShaM |
mohAdArabhyate karma
yattattAmasamuchyate ||
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Meaning :
Actions that begin in doubt, delusion / confusion, without understanding and thinking of the ultimate possible result, loss / wastage of resources,  causing harm and pain to creatures and one's own capacity, are termed 'tAmasa'.
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आज का श्लोक / ’हुतम्’ / 'hutaM'

आज का श्लोक  / ’हुतम्’ / 'hutaM'
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अध्याय 4, श्लोक 24,
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ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥
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हुतम् - हवन में अर्पित की गई सामग्री, हव्य ।
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भावार्थ :
ब्रह्म को जाननेवाले की दृष्टि में यज्ञ में किया जानेवाला हवन, हवन में अर्पित हव्य, यज्ञाग्नि, सभी ब्रह्म हैं । वह भी ब्रह्म ही है जिसके द्वारा यज्ञ का अनुष्ठान किया जाता है । और इस प्रकार के ब्रह्मकर्म के अनुष्ठान से ब्रह्मकर्मरूपी समाधि के द्वारा उसे ब्रह्म की ही प्राप्ति होती है ।
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अध्याय 9, श्लोक 16,
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अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् ।
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहग्निरहं हुतम्
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भावार्थ :
मैं ही क्रतु (श्रौतयज्ञविशेष) और यज्ञ (स्मार्तकर्मविशेष) मैं ही हूँ, पितरों को अर्पित किया जानेवाला ’स्वधा’ तथा प्राणियों के द्वारा खायाजानेवाला अन्न अर्थात् औषधि भी मैं हूँ । मन्त्र मैं हूँ, आज्य अर्थात् हवि-घृत मैं हूँ, मैं ही अग्नि तथा अग्नि में अर्पित की जानेवाली हव्य सामग्री भी हूँ ।
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अध्याय 17, श्लोक 28,
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अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
असदित्युच्यते पार्थ न तत्प्रेत्य नो इह ॥
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भावार्थ :
श्रद्धारहित जो हवन, दान, तप,किया जाता है, उसे असत् तप कहा जाता है, वह न तो इस लोक में सुख देता है, न परलोक में ।
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’हुतम्’ / 'hutaM' - The offerings made into the sacrificial Fire (yajna)
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Chapter 4, shloka 24,
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brahmArpaNaM brahmahavir-
brahmAgnau brahmaNA hutaM |
brahmaiva tena gantavyaM
brahmakarmasamAdhinA ||
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Meaning : One who knows 'brahman' /Supreme Reality, sees Him everywhere, in the Fire, in the offerings, in te oblation, in the goal and within himself also.
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Chapter 9, shloka 16,
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ahaM kraturahaM yajnaH
swadhAhamahamauShadhaM |
mantro'hamahamevAjya-
mahamagnirahaM hutaM ||
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I am the ritual, The sacrifice, the offerings made in the sacred Fires. I'm the sacred text, the medicinal herbs, the ghrit (clarified butter).
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Chapter 17, shloka 28,
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ashraddhayA hutaM dattaM
tapastaptaM kRtaM cha yat |
asadityuchyate pArtha
na tatpretya no iha ||
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Sacrifice, charity or austerity without faith in such action is worth-less, For it yields neither the happiness in this world nor here-after in another.
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Wednesday, January 29, 2014

आज का श्लोक / 'हृतज्ञानाः'/ 'hRtajnAnAH'

आज का श्लोक / 'हृतज्ञानाः'/ 'hRtajnAnAH'
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अध्याय 7, श्लोक 20,
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कामैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेsदेवताः ।
तं तं  नियमास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥
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कामनाओं से मोहित बुद्धि के कारण जिनका विवेकज्ञान नष्ट हो जाता है, वे परमात्मा को छोड़कर अन्य देवताओं की उपासना करने लगते हैं । और उनके लिए अनुकूल आराधना के विशिष्ट नियमों के पालन में संलग्न हो जाते हैं ।
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Chapter 7, shlok 20,
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'हृतज्ञानाः'/ 'hRtajnAnAH' : Those who have lost their wisdom because of being carried away by desires.
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kAmaistairhRtajnAnAH
prapadyante'nyadevatAH |
taM taM niyamAsthAya
prakRtyA niyatAH swayA ||
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Meaning : Because deluded by desires, their wisdom has left them and to fulfill the desires, they forget Me, and engage in worshiping other deities to propitiate them according to specific rules .
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आज का श्लोक / 'हृत्स्थं' / 'hRtsthaM'

आज का श्लोक / 'हृत्स्थं' / 'hRtsthaM'
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अध्याय 4, श्लोक 42,
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तस्मादज्ञानसंभूतं  हृत्स्थं ज्ञानसिनात्मनः  ।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोष्ठ भारत ॥
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हृत्स्थं  = हृदय में व्याप्त हुए । 
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भावार्थ :
हे भारत (अर्जुन)! अतः हृदय में  उत्पन्न हुए इस संशय को ज्ञानरूपी तलवार से काटकर उठो और योगबुद्धि में स्थिर हो जाओ !
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Chapter 4, shlok 42,
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tasmAdajnAnasambhUtaM
hRtsthaM jnAnAnAsinAtmanaH |
chhittvainaM sanshayaM yoga-
mAtiShThottiShTha bhArata ||
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'हृत्स्थं' / 'hRtsthaM'
Meaning : Within the heart / mind and soul.
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Therefore O bhArata (Arjuna!) With the sword of knowledge cut this doubt born of ignorance pervading your heart and mind. Stand-up and follow the wisdom born of Yoga.
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Tuesday, January 28, 2014

आज का श्लोक - 'हृदय-दौर्बल्यं'/'hRdaya-dourbalyaM'

आज का श्लोक
'हृदय-दौर्बल्यं'/'hRdaya-dourbalyaM' 
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अध्याय 2 , श्लोक 3,
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क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ
नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदय-दौर्बल्यं
त्यक्त्वोत्तिष्ठ  परंतप ॥
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हृदय-दौर्बल्यं  - भीरुता, भावुकता।
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भावार्थ :
हे पार्थ (अर्जुन)! ऐसी भीरुता तुझे शोभा नहीं देती।  हृदय की इस क्षुद्र दुर्बलता को त्यागो और हे परंतप, उठ खड़े होओ !
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'हृदय-दौर्बल्यं'/'hRdaya-dourbalyaM'
Meaning : cowardice, weakness of sentiments.
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O Arjun! O Man of Great penances, tormentor of enemies! Get rid of this weakness of heart, and stand up with firm determination.
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आज का श्लोक / 'हृदयानि'/ 'hRdayAni'

आज का श्लोक  / 'हृदयानि'/ 'hRdayAni'
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अध्याय 1, श्लोक 19
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स घोषो धार्तराष्ट्राणां  हृदयानि व्यदारयत्।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन् ॥
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हृदयानि  - हृदय (बहुवचन), हृदयों को।
भावार्थ :
युद्ध प्रारंभ करने के संकेत के लिए पांडव सेनानियों और श्रीकृष्ण द्वारा किए गए अनेक शंखों की तुमुल ध्वनि से धरती और आकाश हिल उठे और धृतराष्ट्रपुत्रों के हृदय दहल उठे।
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'हृदयानि'/ 'hRdayAni'  
Chapter 1, shloka 19,
Meaning : Hearts.
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sa ghoSho dhArtarAShTrANAM
hRdayAni vyadAdarayat |
nabhashcha pRthivIM chaiva
tumulo vyanunAdayan ||
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The tumultuous sound of the conches blown by shrikRShNa and by the army of the PaNDavAs, tore apart the heavens and the earth and rent the hearts of the sons of dhRtarAShTra.
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Saturday, January 25, 2014

आज का श्लोक 'हृदि' / hRdi'

आज का श्लोक, 'हृदि' /'hRdi'
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अध्याय 8, श्लोक 12,
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सर्वद्वाराणि संयम्य
मनो हृदि निरुध्य च ।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राण-
मास्थितो  योगधारणाम् ॥
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हृदि  = हृदय में ।
भावार्थ :
मन जिन इंद्रियों के मार्ग से बहिर्मुख  होता है, उन सब रोककर मन को अंतर्मुख अर्थात्  'हृदय' में ठहराकर  और पुनः उन मार्गों पर न जाने  देकर  (चित्त निरोध )।  प्राणों को हृदय से मूर्ध्ना की दिशा में जानेवाली नाड़ी पर ले जाकर मस्तक में स्थिर  (प्राण-निरोध) करते हुए साधक योगधारणा में प्रवृत्त होता है।
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अध्याय 13 , श्लोक 17,
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ज्योतिषामपि तज्ज्योति-
स्तमसः परमुच्यते ।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं
हृदि  सर्वस्य विष्ठितम्   ॥
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हृदि  = हृदय में ।
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भावार्थ :
समस्त ज्योतिर्मय पिंडों में स्थित स्थूल (इंद्रियग्राह्य) ज्योति की तुलना में उसी ज्योति को  से श्रेष्ठ कहा गया है, जो सबके हृदय में ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञानगम्य तीनों रूपों में प्रविष्ट है ।
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अध्याय 15, श्लोक 15,
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सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं  च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
वेदान्तकृद्वेदविदेवचाहम्  ॥
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हृदि  = हृदय में, अन्तःकरण में  ।
भावार्थ :
'मैं' सबके हृदय में  चेतना के रूप में सदा अवस्थित हूँ । मुझसे ही प्राणिमात्र में स्मृति, ज्ञान एवं उनका उद्गम और विलोपन होता रहता है ।  पुनः समस्त वेदों में एकमात्र मुझे ही जानने योग्य कहा गया है । वेदान्त का प्रणेता, वेदार्थ का कर्ता और वेद को समझनेवाला भी मैं ही हूँ।
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'हृदि' /'hRdi' 
Meaning : In the core of the Heart.
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Chapter 8, shloka 12,
sarvadWarANi sanyamya
mano hRdi nirudhya cha |
mUrdhnyAdhAyAtmanaH prANa-
mAsthito yogadhAraNaM ||
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Meaning :
controlling all the sense-organs where-from the attention strays away towards the objects, holding back the mind into the Heart, directing the vital energy (prANas) towards the cerebrum, abide in the contemplation of Yoga.
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Chapter 13, shloka 17,
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jyotiShAmapi tajjyotis-
tamasaH paramuchyate |
jnAnaM jneyaM jnAnagamyaM
hRdi sarvasya viShThitaM ||
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Meaning :
It is the light of all lights, different from darkness, It is the Enlightenment, comprehensible and within the capacity of understanding. It is already and ever there available accessible and inherent in the Heart of all beings.
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Chapter 15, shloka 15,
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sarvasya chAhaM hRdi sanniviShTo
mattaH smRtirjnAnamapohanaM cha |
vedaishcha sarvairahameva vedyo
vedAntakRdvedavideva chAhaM ||
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I am seated in the Hearts of all being. I am the source of memory, knowledge and forgetfulness also. I am the principle all the Vedas speak of, and is learnt from. Alone I am the author and the One Who knows the veda.
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आज का श्लोक / 'हृद्देशे' / 'hRddeshe'

आज का श्लोक / 'हृद्देशे' / 'hRddeshe' 
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अध्याय १८, श्लोक ६१,
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ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढेन मायया ॥
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हृद्देशे - हृदयदेश में, अन्तर्हृदय में ’चेतना’ के रूप में
(भूतानामस्मि 'चेतना', अध्याय १०, श्लोक २२, एवं अध्याय १३, श्लोक ६)
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भावार्थ :
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हे अर्जुन! ईश्वर अर्थात् सबका शासन करनेवाला नारायण प्राणिमात्र के हृदय में अवस्थित है । मायारूपी यन्त्र पर आरूढ़ उन सभी प्राणियों के जीवन को वही गतिमान रखता है ।
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Chapter 18, shloka 61.
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'हृद्देशे' / 'hRddeshe' > in the innermost recesses of the Heart, i.e. as 'Consciousness' /  'चेतना' only
(Compare ch.10 10, shloka 22 and ch.13, shloka 6 also)
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IshvaraH sarvabhUtAnAM
hRddeshe'rjuna tiShThati |
bhrAmayansarvabhUtAni
yantrArUDhena mAyayA ||
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Meaning :
O Arjuna, God has the place in the core of the heart of all and every being. From there, He controls the destiny of them all just as if they all are the robots and they play their respective roles according to His commands.
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आज का श्लोक / 'हृद्या '/ 'hRdyAH'

आज का श्लोक / 'हृद्याः '/ 'hRdyAH' 
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अध्याय 17, श्लोक 8. --
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आयुःसत्त्वबलारोग्य-
सुखप्रीतिविवर्धनाः।
रस्याः स्निग्धाःस्थिरा हृद्या
आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥
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हृद्या  = हृद्याः 
भावार्थ :
आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख एवं प्रीति इन सबका संवर्धन करनेवाले तथा रस्य - रसयुक्त (रूखे नहीं)  स्निग्ध -स्नेहयुक्त, स्थिर - शरीर में अधिक समय तक साररूप से रहनेवाले (पोषक) और हृद्य अर्थात् हृदय को प्रिय ऐसे पदार्थ सात्त्विक स्वाभाव वाले मनुष्य को भाते हैं।
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 'हृद्याः '/ 'hRdyAH' 
Chapter 17, shlok 8.
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AyuH-sattva-balArogya-
sukha-prItirvivardhanAH |
rasyAH snigdhAH sthirA hRdyA
AhArAH sAttvika-priyAH ||
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'हृद्याः '/ 'hRdyAH' = one that is agreeable, tasteful, loved by heart.
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Meaning :
Food that ensures longevity, virtue, vigor, vitality, good health, joy and happiness, which appeals to the taste, loved by heart, and easily digestible, are liked by those with sattvik tendencies.
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आज का श्लोक / 'हृषितः' / 'hRShitaH'

आज का श्लोक /  'हृषितः' /  'hRShitaH'
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अध्याय 11, श्लोक 45.
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अदृष्टपूर्वं हृषितोsस्मि दृष्ट्वा
भयेन च प्रव्यथितं मनो मे  ।
तदेव मे दर्शय देव रूपं
प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥
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हृषितः = हृषितो,
भावार्थ :
आपके जिस रूप का दर्शन मैंने पाया, वैसा मैंने या किसी ने भी पहले नहीं पाया, उससे मैं यद्यपि हर्षित हूँ,  तथापि इस दर्शन से मेरा मन भय से प्रव्यथित भी है । इसलिए भगवन् ! आप मुझ पर प्रसन्न हों और हे देवेश ! कृपाकर मुझे अपने उसी  दिव्य रूप में दर्शन दें, जिसे मैं सदा ही देखा करता हूँ ।
--
 Chapter 11, shloka 45.
--
'हृषितः' /  'hRShitaH'
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adRShTa-pUrvaM hRShito'smi dRShTvA
bhayena cha pravyathitaM mano me |
tadeva me darshaya deva rUpaM
prasIda devesha jaganniwAsa ||
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'हृषितः' /  'hRShitaH' > delighted.
Meaning :
O Lord! I am delighted having seen your form that no one has ever seen, but yet I am trembling with fear. Therefore O Lord! please have mercy upon me, and show me your That earlier form which I am used to see.
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Friday, January 24, 2014

आज का श्लोक / 'हृषीकेश' / 'hRShIkesha'

आज का श्लोक / 'हृषीकेश' /  'hRShIkesha'
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अध्याय 11, श्लोक 36,
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स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या
जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते  ।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति
सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघाः  ॥
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हृषीकेश  = हे हृषीकेश !
भावार्थ :
हे हृषीकेश  ! तुममें ही तुम्हारे ही भीतर, संपूर्ण जगत् तुम्हारी विशिष्ट कीर्ति के में प्रहर्षित होता है, तुममें ही खेलता रमता है । राक्षसगण भी डरकर भी तुममें ही अवस्थित विभिन्न दिशाओं में दौड़ते हैं  और सिद्धों के सभी संघ भी तुममें ही तुम्हें नमन करते हैं ।
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अध्याय 18, श्लोक 1.
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संन्यासस्य महाबाहो
तत्वमिच्छामि वेदितुम् ।
त्यागस्य च  हृषीकेश 
पृथक्केशिनिषूदन  ॥
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हृषीकेश = हे हृषीकेश !
भावार्थ :
अर्जुन कहते हैं -
'हे हृषीकेश !  (हे कृष्ण !)  हे महाबाहो! संन्यास और त्याग, दोनों के स्वरूप का तत्व क्या है, इसे पृथक् पृथक् मैं तुमसे सुनना चाहता हूँ ।
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Chapter 11, shlok 36.
sthAne hRShIkesha tava prakIrtyA
jagat-prahRShyatyanurajyate |
rakShAnsi bhItAni disho dravanti
sarve namasyanti cha siddhasanghAH ||
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hRShIkesha > O Lord of the senses, O Consciousness Cosmic, O Krishna!
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Meaning :
O Lord of the senses, Indeed the whole world rejoices and sports within you, only because of your glory. Demons frightened, run in all directions, and the sages and seers bow down before Thee!
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Chapter 18, shloka 1.
sannyAsasya mahAbAho
tatvamichchhAmi vedituM |
tyAgasya cha hRShIkesha
pRthakkeshiniShUdana ||
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hRShIkesha > O Lord KrishNa !
Meaning :
O Mighty-armed KrishNa! Please tell me the essence of sannyAsa and tyAga in their comparison and contrast !
(sannyAsa = Complete renunciation of sensory pleasures and abiding in the Self that comes through understanding their transient nature nd the nature of the brahman / Truth / Self, which is eternal peace and tranquility, bliss. tyAga = practicing of viveka and vairAgya.)
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आज का श्लोक / 'हृषीकेशम्' / 'hRShIkeshaM'

आज का श्लोक / 'हृषीकेशम्' / 'hRShIkeshaM' 
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अध्याय 1, श्लोक 21,
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हृषीकेशम् तदा वाक्यमिदमाह महीपते ।
अर्जुन उवाच -
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेsच्युत ॥
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भावार्थ :
तब, हे राजन् !  अर्जुन ने यह वाक्य कहा ।
(अर्जुन ने कहा)
हे अच्युत ! दोनों सेनाओं के बीच मेरे रथ को लाकर स्थापित करो !
--

अध्याय 2, श्लोक 9,
--
एवमुक्त्वा हृषीकेशम् गुडाकेशः परंतप ।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं  बभूव ह ॥
--
हृषीकेशम् अर्थात् श्रीकृष्ण के प्रति ।
भावार्थ :
--
'मैं युद्ध नहीं करूँगा'
श्रीकृष्ण से परंतप गुडाकेश (अर्जुन) इस प्रकार से कहकर मौन हो गया ।
--

'हृषीकेशम्' / 'hRShIkeshaM'
-- 
Chapter 1, shloka 21.
--
हृषीकेशम् tadA vAkyaM
idamAha mahIpate |
Arjuna uvAcha _
senayorubhayormadhye
rathaM sthApaya me 'achuta ||
--
Meaning :
Then, O King ! ( Thus was addressed dhRtarAShTra by Sanjaya, who narrated to the King dhRtarAShTra, whatever was happening on the battle-ground where the Armies were getting prepared for the war of mahAbhArata.)
achyuta = ShriKrishNa,
--
Chapter 2, shloka 9.
--
evamuktvA hRShIkeshaM
guDAkeshaH parantapa |
na yotsya iti govindaM
uktvA tUShNIM babhUva ha ||
--
Meaning :
Saying so to ShrikrishNa, The Great Ascetic Arjuna, expressed his decision to with-draw from the war, and became silent.
--
  

Thursday, January 23, 2014

आज का श्लोक / 'हृषीकेशः' / ' hRShIkeshaH'

आज का श्लोक / 'हृषीकेशः' / ' hRShIkeshaH'
_________________________________

अध्याय 1, श्लोक 15,
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं  भीमकर्मा वृकोदरः ॥
--
अध्याय 1, श्लोक 24,
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा  रथोत्तमम् ॥
--
अध्याय 2 , श्लोक 10
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव  भारत ।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥
--
हृषीकेशः  और हृषीकेशो दोनों समानार्थक हैं ।
दोनों का तात्पर्य है 'कृष्ण' ।
--
 'हृषीकेशः' / ' hRShIkeshaH'
Chapter 1, shloka 15,
--
pAnchajanyaM hRiShIkesho
devadattaM dhananjayaH |
pounDraM dadhmou mahAshankhaM
bhImakarmA vRkodaraH ||
--
Chapter 1, shloka 24.
--
evamukto hRiShIkesho
guDAkeshena bhArata |
senayorubhayormadhye
sthApayitvA rathottamaM ||
--
Chapter 2, shloka 10,
--
tamuvAcha  hRShIkeshaH
prahasanniva bhArat |
senayorubhayormadhye
viShIdantamidaM vachaH ||
--
hRShIkeshaH,  hRiShIkesho, both  mean ShriKrishna.
--      

आज का श्लोक / 'हृष्टरोमा' / 'hRShTaromA'

आज का श्लोक / 'हृष्टरोमा' / 'hRShTaromA' 
_________________________________
अध्याय 11, श्लोक 14
--
ततः स विस्मयाविष्टो  हृष्टरोमा धनञ्जयः ।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत  ॥
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हृष्टरोमा ; हृष्टरोमाः - पुलकित, प्रफुल्लित रोम, रोंगटे खड़े हुए हैं जिसके, वह !
--
भावार्थ :
--
तब विस्मय से आविष्ट हृष्टरोम धनञ्जय (अर्जुन) ने सिर झुकाकर दोनों हथेलियों की अञ्जलि बनाते हुए भगवान् को प्रणाम करते हुए यह कहा , …।
--
Chapter 11, shloka 14.
--
tataH sa vismayAviShTo
hRShTaromA dhananjayaH |
praNamya shirasA devaM
kRtAnjalirabhAShata ||
--
hRShTaromA > hRShTaromAH > One whose hair standing on end.
--
Meaning :
Filled with amazement,
and his hair standing on end,
bowing his head,
and with folded hands,
Arjuna said thus; ... ...
--

आज का श्लोक / 'हृष्यति' / 'hRShyati'.

आज का श्लोक / 'हृष्यति' / 'hRShyati'.
________________

अध्याय 12, श्लोक 17
--
यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥
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हृष् >   'हृष्यति' > खुश होता है,
--
भावार्थ :
जो न इष्ट वस्तु की प्राप्ति में हर्षित और न अनिष्ट की प्राप्ति में उद्विग्न होता है, जो न शोक करता है, न कामना, शुभ और अशुभ दोनों को समान समझता हुआ दोनों को त्याग देनेवाला मेरा भक्त मुझे प्रिय है ।
--
Chapter 12, shloka 17.
_____________________

'हृष्यति' / 'hRShyati'.
--
yo na hRShyati na dveShTi
na shochati na kAngkShati |
shubhAshubhaparityAgI
bhaktimAnyaH sa me priyaH ||
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'hRShyati'. > becomes overjoyed, glad.
Meaning :
My devotee who neither rejoices when a desired result is achieved, nor is disappointed if an undesired and unfavorable one is obtained by him, is very dear to Me.
--
achieved,


आज का श्लोक / 'हृष्यामि' / 'hRShyAmi'

आज का श्लोक / 'हृष्यामि' / 'hRShyAmi'  
_______________________

अध्याय 18 , श्लोक 76 , 77
--
राजनसंस्मृत्य संस्मृत्य  संवादमिममद्भुतम् ।
केशवार्जुनयोः पुण्यं  हृष्यामि  च मुहुर्मुहुः ॥
--
तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य  रूपमत्यद्भुतं हरेः ।
विस्मयो मे महान्-राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः ॥
--
हृष्यामि > हर्षित होता  हूँ ।
--
Chapter 18, shloka 76, 77.
--
rAjansansmRtya sansmRtya
saMvAdamimamadbhutaM |
keshavArjunayoH ouNyaM
hRShyAmi cha muhurmuhuH ||
tachcha sansmRtya sansmRtya
rUpamatyadbhutaM hareH |
vismayo me mahAnrAjan-
hRShyAmi cha punaH punaH ||
--




आज का श्लोक / 'हे' 'hey !'


 आज का श्लोक 'हे' / 'hey !' 
__________________________
अध्याय 11 , श्लोक 41,
--
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।
अजानता महिमानं तवेदं माया प्रमादात्प्रनयेन  वापि ॥
--
हे > सम्बोधन कारक अव्यय

--
  'हे' / 'hey !' 'he'  / 'hey'
--
sakheti matvA prasabhaM yaduktaM
he kRuShNa he yAdava he sakheti |
ajAnatA mahimAnaM tavedaM
mayA pramAdAtpraNayena vApi ||
--
'he' > 'hey', used to address someone, 'O'
Meaning :
Out of my ignorance or affection of You O kriShNa, O Yadava, O Friend,
out of my carelessness of Thy majesty, ....whatever I said to you, ...
(Please forgive me.)
--




आज का श्लोक / 'हेतवः' / 'hetavaH'

आज का श्लोक / 'हेतवः' 'hetavaH' 
__________________________

अध्याय 18, श्लोक १५,
--
शरीरवाङ्गमनोभिर्यत्कर्म  प्रारभते   नरः ।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते  हेतवः  ॥
--
मनुष्य शरीर, वाणी, मन आदि  से न्यायसम्मत  या न्याय से विपरीत जिस किसी भी कर्म को आरम्भ  करता है, उसे करने के हेतु (कारक, कार्यकारी तत्व, अधिष्ठान, करता, करण, चेष्टा तथा दैव  -पिछले श्लोक में विस्तार से वर्णित किए गए ये पाँच ) हैं।
--
Chapter 18, shlok 15.
_________________
  'हेतवः' 'hetavaH' 
--
sharIra-vAngmanobhiryatkarma prArabhate naraH |
nyAyyaM vA viparItaM vA panchaite tasya hetavaH ||
--
Physical, verbal or mental, whatever right or wrong action one begins to perform, these 5 factors
( 1.the seat / support of action / sense of self, / 2.the 'doer', 3. organs of action, 4. various efforts, and 5. Destiny) are behind the action.
--
  

Wednesday, January 22, 2014

आज का श्लोक / 'हेतुना' / 'hetunA'

आज का श्लोक / 'हेतुना' / 'hetunā'
_______________________

अध्याय 9, श्लोक 10,
--
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥
--
(मया अध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते स-चराचरम् ।
हेतुना-अनेन कौन्तेय जगत् विपरिवर्तते ॥)
--
भावार्थ :
मेरे ही पूर्ण नियंत्रण में प्रकृति चर-अचर जगत् को जन्म देती है । इन हेतुओं से, इन कारणों, उद्देश्यों, प्रयोजनों आदि से, जगत् सतत् परिवर्तनों से गुज़रता हुआ प्रतीत होता रहता है ।
--
'हेतुना' / 'hetunā' - because of this reason,

Chapter 9, shloka 10,
--
mayādhyakṣeṇa prakṛtiḥ
sūyate sacarācaram |
hetunānena kaunteya
jagadviparivartate ||
--
(mayā adhyakṣeṇa prakṛtiḥ
sūyate sa-carācaram |
hetunā-anena kaunteya
jagat viparivartate ||)

--

Under My Authority, prakRti gives birth to all animate and inanimate beings. And because of this reason only, world is in a state of continuous change.
--



आज का श्लोक / 'हेतुमद्भिः' / 'hetumadbhiH

आज का श्लोक / 'हेतुमद्भिः'  / 'hetumadbhiH
____________________________________
अध्याय 13, श्लोक 4
--
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्  ।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव  हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः  ॥
--
ऋषिभिः बहुधा गीतं छन्दोभिः विविधैः पृथक्  ।
ब्रह्मसूत्रपदैः च एव हेतुमद्भिः विनिश्चितैः  ॥
--
हेतु > हेतुमद्  > तृतीया विभक्ति बहुवचन = युक्तियों से, प्रकारों से
--
(इसा क्षेत्र एवं क्षेत्रज्ञ के ज्ञान को) ऋषियों ने अनेक प्रकार से गीतों में, विविध और भिन्न-भिन्न वेदमंत्रों में वर्णित किया है, विभिन्न रीतियों और युक्तियों से  पुनः ब्रह्मसूत्र के पदों में भी इसे प्रतिपादित और सुनिश्चित किया गया है ।
--
Chapter 13, shloka 4.
--
RShibhirbahudhA gItaM chhandobhirvividhaiH pRthak |
brahma-sUtra-padaishchaiva hetumadbhir-vinishchitaiH ||
--
hetumadbhiH > by means of reasoning.
--
Meaning :
Seers and sages have sung in various ways about this truth (of 'kShetra and kShetrajna', where-in puruSha is only the see-er, observer, while prakRti is the observed only.)
-- 

आज का श्लोक / - 'हेतुः' / 'hetuH'

आज का श्लोक / - 'हेतुः' / 'hetuH'
________________________ 
कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते । 
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥ 
--
(कार्य-करण-कर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिः उच्यते । 
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुः उच्यते ॥) 
-- 
कार्य (घटना / फल) करण (माध्यम, साधन, सहायक यंत्र) का आधार / अधिष्ठान प्रकृति को  कहा गया है,
 जबकि पुरुष को सुख एवं दुःख आदि के भोग का अधिष्ठान कहा गया है । 
-- 
   'हेतुः' / 'hetuH'
__________________
kArya-karaNa-kartRtve hetuH prakRtiruchyate |
puruShaH sukhaduHkhAnAM bhoktRutve heturuchyate ||

--
karya > Cause and Effect, karaNa > instrument, hetuH > motivation and purpose., basis and goal. objective and object, prakRtiruchyate > prakrutiH + uchyate > The manifestation is said to be.
puruShaH > The self / Self, soul, sukha-duHkhAnAM bhoktRtve > of experiencing the pleasures and pains.
--
prakRti ( The power ofmanifestation) is said to be responsible for cause and effect and also for the notion of 'doer-ship', puruSha the only support that makes possible the experiences of pleasure and pain.
-- 



Tuesday, January 21, 2014

आज का श्लोक / 'हेतोः' / 'hetoH'

 आज का श्लोक / 'हेतोः' / 'hetoH'
_________________________
अध्याय 1, श्लोक 35,
--
एतान्न हन्तुमिच्छामि  घ्नतोsपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते  ॥
--
हेतोः > 'हेतु' = के लिए, के उद्देश्य से,
--
हे मधुसूदन, मैं इनके हाथों मारा भी जाऊँ, और इन्हें मारने पर यदि मुझे पूरी पृथ्वी ही क्या यदि त्रैलोक्य का राज्य भी मिलता हो तो भी इन्हें मारने की इच्छा मुझे नहीं है ।
--
Chapter 1, shloka 35,
--
etAnna hantumichchhAmi ghnato'pi madhusUdana |
api trailokyarAjyasya hetoH kiM nu mahI kRte ||
--
O madhusUdana! Neither for the Lordship of the whole Earth, nor even for the three worlds, I would like to kill them, even if they kill me.
--

आज का श्लोक / 'ह्रियते'


hriyate ('ह्रियते') 
--
pUrvAbhyAsena tenaiva hriyate hyavasho'pi saH |
jijnAsurapi yogasya shabdabrahmAtivartate ||
--
(Chapter 6, shloka 44)
 AyogI, the aspirant for Truth, never falls from the path of yoga,
Though if he dies before reaching the goal of Self-realization,
because 'drawn' by the force of the latent tendencies (sanskAra),
he is 'reborn' in a noble clan  where he comes again in touch with
the right teachings that leads him onto the right path.

--
पूर्वाभ्यासेन तेनैव  ह्रियते ह्यवशोSपि  सः ।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्माति वर्तते ॥
(अध्याय 6 , श्लोक 44 )
--
हृ > ह्रियते  > कर्मवाच्य ; (के द्वारा वह) खींचा जाता है ।
--
अर्थ : जिस योगी की मृत्यु योग की पूर्णता को प्राप्त करने से पहले हो जाती है, ऐसा मनुष्य भी अपने संस्कारों के बल से खींचा जाकर ऐसे कुल में जन्म लेता है, जहाँ उसे ऐसा उपयुक्त वातावरण मिलता  है, जिससे वह पुनः सम्यक मार्ग को ग्रहण कर लेता है ।  
-- 

Saturday, January 18, 2014

आज का श्लोक / A shloka for the day. - 'ह्री:' / 'HrI:'


आज का श्लोक - 'ह्री'
___________________
*******************
गीता में किस शब्द का प्रयोग किस अध्याय के किस श्लोक में है, इसके लिए आकारनुवर्ती  सूची की जानकारी बनाने के उद्देश्य से इस 'आज का श्लोक'- लेबल के अंतर्गत लिखने का मेरा विचार है। चूँकि ऐसा अन्तिम पद 'ह्री:' है, इसलिए इस प्रकार धीरे-धीरे मैं गीता में प्रयुक्त किए गए सम्पूर्ण शब्दों का विवरण दे  सकूँगा।
--
ह्री 
--
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शांतिरपैशुनम् ।
दयाभूतेष्वलोलुप्त्वं  मार्दवं  ह्रीरचापलम्  ॥
--

A shloka for the day. -'hrI'
____________________
********************
Under this 'Lable' I will prepare a word-index of all the words we come across in GitA.
This way,  an easy access to any particular Sanskrit word in GitA will be here.
Such First word is 'HrI:' why?
Because this is the last word according to the alphabetic-index of all the words given in Gita.
And during the coming time, I hope to do the whole work.
--
Chapter 16, shloka 2.
--
hrI 
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ahinsA satyamakrodhastyAgaH shAntirapaishunaM |
dayAbhUShvaloluptvaM mArdavaM hrIrachApalaM ||
--
Meaning :
Absence of cruelty, truthfulness, absence from anger, self-giving, peacefulness, absence of vilification, compassion, absence of covetousness, gentleness, modesty and absence of fickleness.
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Wednesday, January 15, 2014

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