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Friday, June 4, 2021

विभूति-योग

7.

(उत्तरगीता)

महाराज युधिष्ठिर ने भगवान् श्रीकृष्ण से प्रश्न किया :

हे कृष्ण! 

अध्याय १० :

वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जय। 

मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविं।। ३७

उक्त श्लोक का अभिप्राय क्या है, कृपया कहें !

युधिष्ठिर के द्वारा यह निवेदन किए जाने पर श्रीकृष्ण ने कहा :

युधिष्ठिर! 

ध्यानपूर्वक सुनो! इससे पूर्व अर्जुन ने मुझसे कहा था :

सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव। 

न ही ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः।। १४

स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।

भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते।। १५

वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः। 

याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि।। १६

कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्। 

केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया।। १७

विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन। 

भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ।। १८

अर्जुन के द्वारा यह जिज्ञासा की जाने पर मैंने उससे कहा :

हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः। 

प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे।। १९

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः। 

अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च।। २०

युधिष्ठिर!  

तब मैंने अर्जुन से कहा :

अर्जुन!  वस्तुतः तो मैं 'अहं' - आत्मा की तरह समस्त भूत-मात्रों के हृदय में ही निवास करता हूँ, और इसलिए वही मेरा परमधाम है, किन्तु व्यक्त रूप में जिन विभूतियों के माध्यम से मैं भक्तों के समक्ष प्रस्तुत होता हूँ उन्हें तुम प्रधानतः इस प्रकार से जानो! 

.. .. .. 

आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्। 

मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी।। २१

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः।

इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना।। २२

रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्। 

वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ।।२३

पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्। 

सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः।। २४

महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।

यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालय।। २५

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः। 

गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः।। २६

उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम्। 

ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्।। २७

आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्। 

प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः।। २८

अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्। 

पितृृणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ।। २९

('पितृणां' > 'तृ' में ऋकार दीर्घ है, जिसे यहाँ लिखने की सुविधा नहीं होने से यह त्रुटि सुधार लें।) 

प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् ।

मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्।। ३०

पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्।

झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी।। ३१

सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन।

अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्।। ३२

अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च। 

अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः।। ३३

मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्। 

कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा।। ३४

बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्। 

मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः।। ३५

द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्वितामहम्। 

जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्वतामहम् ।।३६

और हे युधिष्ठिर! 

इसी क्रम में मैंने अर्थात् वसुदेव के पुत्र वासुदेव ने अपना उल्लेख करते हुए कहा :

वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः ।

मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः।। ३७

ये सभी मेरी ही अर्थात् एकमेव मुझ परमात्मा की ही विभूतियाँ हैं। इसलिए युधिष्ठिर! इनमें से प्रत्येक ही मैं ही हूँ, और इसीलिए तुम, हे अर्जुन! इनमें से किसी भी विभूति में मेरी भावना करते हुए यदि मेरी उपासना करो, तो भी तुम एकमात्र मुझे ही प्राप्त हो जाओगे!

(इस प्रकार 'एकेश्वरवाद' की मर्यादा का संकेत किया गया।) 

हे युधिष्ठिर! 

मैं (अहम् - आत्मा) एक भी हूँ,  एक नहीं भी हूँ।*

मैं (अहम् -आत्मा) अनेक भी हूँ,  अनेक नहीं भी हूँ।*

मैं (अहम् -आत्मा)  शून्य भी हूँ,  अशून्य (शून्य नहीं भी) हूँ।*

मेरा वर्णन इस प्रकार से भी किया जाता है :

(अध्याय २)

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।

उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः।। १६

(*तुलना करें देवी अथर्वशीर्ष से)

तथा :

यो वै रुद्रो स भगवान् यश्च ब्रह्मा तस्मै वै नमो नमः। १

...यश्च विष्णुस्तस्मै वै नमो नमः। २

यश्च स्कन्दः...। ३

यश्च इन्द्रः ...। ४

यश्च अग्निः ... । ५

यश्च वायुः ... । ६

यश्च सूर्यः। ७

यश्च सोमः । ८

अष्टौ ग्रहाः। ९

अष्टौ प्रतिग्रहाः।  १०

यच्च भूः। ११

यच्च भुवः । १२

यच्च स्वः । १३

यच्च महः । १४

या च पृथिवी । १५

यच्चान्तरिक्षं।  १६

या च द्यौ । १७

याश्चापः । १८

यच्च तेजः । १९

यश्च कालः । २०

यश्च यमः । २१

यश्च मृत्युः । २२

यच्चामृतं । २३

यच्चाकाशं । २४

यच्च विश्वं । २५

यच्च स्थूलं । २६

यच्च सूक्ष्मं । २७

यच्च शुक्लं । २८

यच्च कृष्णं । २९

यच्च कृत्स्नं । ३०

यच्च सत्यं । ३१

यच्च सर्वं । ३२

तस्मै वै रुद्राय नमो नमः।। 

(- शिवाथर्वशीर्षम्,

 इस प्रकार बहुदेववाद की मर्यादा को दर्शाया गया।)

इस प्रकार रुद्र (महादेव) सहित १+३२ = ३३ 'कोटि' के देवों के स्वरूप को स्पष्ट किया गया।) 

***

[प्रसंगवश :

क्रमशः १९, २०, २१, तथा २२ से वर्तमान कोरोना के संबंध का अनुमान किया जा सकता है, और यदि यह सत्य है तो वर्ष २३ में नए संसार की सृष्टि होगी ऐसा कहा जा सकता है।]

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Tuesday, June 1, 2021

कालेन

5.

(उत्तरगीता) 

महाराज युधिष्ठिर ने भगवान् श्रीकृष्ण से पूछा :

हे प्रभु! 

पात्रता की दृष्टि से अर्जुन में और मुझमें क्या समानता और क्या भिन्नता है, कृपया कहें! 

तब भगवान् श्रीकृष्ण बोले :

युधिष्ठिर! जैसा कि तुम्हारा नाम और गुण है, तुम युद्ध के समय भी स्थिरबुद्धि होते हो, जबकि अर्जुन ऐसे समय में कर्तव्य क्या है तथा अकर्तव्य क्या है, इस द्वन्द्व से मोहित-बुद्धि हो गया था। 

इस प्रकार उसकी निष्ठा साङ्ख्य के अनुकूल न होकर कर्म के अनुकूल थी। तुममें ऐसा द्वन्द्व या संशय नहीं उत्पन्न होता है।

उसे उसके अनुकूल शिक्षा देने हेतु मैंने उससे कहा :

(अध्याय ३)

सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।

कुर्याद्विद्वांस्तथासक्ताश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम् ।। २५

तथा, 

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्। 

जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्।। २६

इस प्रकार उसकी निष्ठा कर्म में होने से उसमें कर्तृत्व, भोक्तृत्व, स्वामित्व और ज्ञातृत्व रूपी अज्ञान और तज्जनित दुविधा एवं संशय भी थे ही। 

इसलिए मैंने परिस्थिति के अनुरूप उसे वह शिक्षा दी जिससे कि समय आने पर वह भी तुम्हारी तरह साङ्ख्य की शिक्षा का पात्र हो सके। 

इसीलिए मैंने उसे कर्मयोग अर्थात् राजयोग, राजविद्या की वही शिक्षा प्रदान की जो कि महान काल के प्रभाव से विलुप्तप्राय हो चुकी थी।

इसलिए तुम्हारे लिए मैं पुनः जिस उत्तरगीता का उपदेश करूँगा, उसे सुनकर तुम्हारी यह जिज्ञासा शान्त हो जाएगी कि क्या मैंने अर्जुन को तुमसे भिन्न कोई विशेष शिक्षा दी थी।

(अध्याय ४)

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।

विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ।। १

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः। 

स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप।। २

स एवायं मया तेऽद्य योगं प्रोक्तः पुरातनः।

भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्।। ३

अर्जुन उवाच :

अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।

कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति।। ४

तब मैंने अर्जुन से कहा :

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। 

तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप।। ५

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। 

प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया।। ६

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। 

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। ७

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। 

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।। ८

तथा --

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्वतः। 

त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।। ९

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।

ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।। ३७

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हे युधिष्ठिर! 

उपरोक्त श्लोकों से तुम समझ सकते हो कि यहाँ मुझ परमात्मा अर्थात् ईश्वर, जीवात्मा अर्थात् जीव, और आत्मा की अनन्यता को इंगित किया गया है। 

'अहं' पद (शब्द) का प्रयोग उत्तम पुरुष एकवचन तथा अन्य पुरुष एकवचन दोनों अर्थों में ग्राह्य है। 

इसी प्रकार से क्रिया-पद 'वेद' भी उत्तम पुरुष एकवचन तथा अन्य पुरुष एकवचन से सुसंगत है। 

इसलिए जो इसे जान लेता है कि मेरा जन्म तथा कर्म दिव्य है, उसे पुनर्जन्म प्राप्त नहीं होता, और वह मुझे ही प्राप्त हो जाता है।

जिस तरह एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने के लिए मनुष्य पैदल या वाहन आदि के मार्ग से जाते हैं, किन्तु पक्षी आकाश के मार्ग से उड़कर शीघ्र ही वहाँ पहुँच जाता है, उसी प्रकार कर्मयोग के मार्ग का अधिकारी पुरुष यद्यपि कुछ समय व्यतीत करते हुए अनेक माध्यमों से मुझे प्राप्त हो सकता है, किन्तु साङ्ख्य-योग का अधिकारी ज्ञानमार्ग का अवलंबन करते हुए, तत्काल ही मुझे प्राप्त हो जाता है।

किन्तु यह भेद भी वैसा ही औपचारिक और आभासी है, जैसे कि स्वप्न के पूर्ण हो जाते ही, जाने पर, स्वप्न में प्रतीत होनेवाला समय मिथ्या प्रतीत होने लगता है।

***





Sunday, May 23, 2021

कर्मनिष्ठा और साङ्ख्य

4.

(उत्तरगीता)

साङ्ख्य और कर्म

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भगवान् श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से आगे कहा :

हे राजन्! इस प्रकार अपनी स्वाभाविक निष्ठा को जानने के अन्तर ही मनुष्य या तो साङ्ख्य अर्थात् उस ज्ञान में स्थित रहते हुए शान्ति में निमग्न रहता है, या कर्ताभाव से युक्त हुआ उस  निष्ठा के अनुसार स्वयं को कर्ता मान बैठता है। 

इसी प्रकार से कर्ता-बुद्धि सहित कर्म का अनुष्ठान करते हुए वह अवश्य और अनायास ही प्रमाद अर्थात् अनवधानता से ग्रस्त होने से स्वयं को भोक्ता, स्वामी एवं ज्ञाता की तरह ग्रहण करने लगता है। यही चारों अहंकार के एकमात्र आभासी प्रकार होते हैं, जबकि अहंकार तमोगुण मात्र है। 

जब मनुष्य की बुद्धि तेजस्वी होती है और नित्य-अनित्य को देखने में परिपक्व हो जाती है तो ही उसमें आत्म-जिज्ञासा पैदा होती है। 

हे युधिष्ठिर! ऐसा मनुष्य ही साङ्ख्यनिष्ठा से युक्त कहा जाता है। 

कर्म को स्वरूपतः न तो ग्रहण किया जा सकता है,  न उसका आचरण अथवा त्याग ही किया जा सकता है क्योंकि समस्त कर्म अर्थात् कर्म-समष्टि प्रकृति से ही होते हैं। 

अध्याय ३

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। 

अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते।। २७

इसलिए कर्मनिष्ठ में स्थित हुए मनुष्य को चाहिए कि पहले वह कर्म, विकर्म और अकर्म के तत्व को जान ले। 

अध्याय ४

किं कर्म किमकर्मेतिकवयोऽप्यत्र मोहिताः। 

तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ।।१६

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः। 

अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः।। १७

कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः। 

स बुद्धिमान मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत ।। १८

इस प्रकार कर्म में सम्यक् रूप से निष्ठित मनुष्य अनायास ही साङ्ख्य का अधिकारी होता है। 

जब तक मनुष्य कर्तृत्व, भोक्तृत्व, स्वामित्व और ज्ञातृत्व बुद्धि से संलग्न रहता है, कर्म से बद्ध होता है अतः साङ्ख्य के तत्व में तथा उस निष्ठा में स्थित न हो पाने से ही उसे समस्त कर्म और कर्म के फल का त्याग करने की शिक्षा दी जाती है। 

हे राजन! ऐसा पुरुष जब तक मुझ परमात्मा को अपनी आत्मा से अन्य मानता है तब तक उसे चाहिए कि वह कर्तृत्व, भोक्तृत्व, स्वामित्व तथा ज्ञातृत्व इत्यादि को मुझे समर्पित कर दे ।

इस प्रकार से सब कुछ मुझे अर्पित कर देने पर मैं अपने आप को उसके प्रति प्रकट कर देता हूँ। 

तब वह अनन्यत्व से मुझ से एक हुआ, सर्वत्र समदर्शी हो जाता है।

इस प्रकार साङ्ख्य और कर्म (अर्थात् योग) के अनुष्ठान से एक ही फल प्राप्त होता है, इसलिए स्वरूपतः दोनों अभिन्न हैं और ऐसा ही पण्डितों के द्वारा जाना भी जाता है। 

अध्याय ४

साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः।

एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्।। ५

अध्याय १३

अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते।

तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः।। २५

***

क्रमशः 

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Tuesday, May 18, 2021

2. अभ्यास-योग

भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा :
हे युधिष्ठिर! 
वैसे तो प्राणिमात्र पर ही मेरी सदा अत्यन्त कृपा रहती है, किन्तु मेरी ही त्रिगुणात्मिका माया का आवरण बुद्धि पर होने से किसी को भी मेरी इस कृपा का आभास तक नहीं होता। किन्तु इसमें
किसी का कोई दोष भी नहीं, क्योंकि जैसे बुद्धि माया से प्रेरित होती है, उसी तरह यह त्रिगुणात्मिका माया स्वयं भी मुझ पर ही आश्रित, मुझसे ही प्रेरित होकर अपने असंख्य कार्य करती रहती है। यह सारा प्रपञ्च मेरी ही लीला है और इसलिए न तो कोई पतित है, न पापी और न पुण्यवान। सभी मेरे ही व्यक्त प्रकार हैं। विभिन्न नाम-रूपों से वे अपनी अपनी भूमिका का निर्वाह करते हुए दिखाई देते हैं, किन्तु वस्तुतः न कोई कर्ता, न भोक्ता, न स्वामी और न ज्ञाता होता है। व्यक्त देह से संबद्ध बुद्धि में ही कर्म की कल्पना प्रस्फुटित होती है और देह, तथा देह का जिस जगत में आभास होता है, वह जगत तथा वह चेतना जिसमें देह और जगत की प्रतीति उत्पन्न होती है, मेरा ही प्रकाश और प्रकाश का विस्तार है। 
इसी पृष्ठभूमि में मैंने अर्जुन के लिए अभ्यास-योग का उपदेश इस प्रकार से किया था। :
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानात्-ध्यानं विशिष्यते।
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ।। १२ 
(अध्याय १२)
किन्तु इस श्लोक का सन्दर्भ जिन दूसरे श्लोकों से है, वे क्रमशः  (अध्याय ११ में) इस प्रकार से हैं :
अर्जुन उवाच :
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव। 
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ।। ४६
श्री भगवानुवाच :
मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मेत्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्।। ४७
इस प्रकार स्पष्ट है कि अर्जुन की ऐसी विशिष्ट इच्छा को पूर्ण करने के लिए उसे मैंने अपना विश्वरूपदर्शन दिखलाया था। उसे इसलिए जिस प्रकार से मेरे इस रूप का दर्शन हुआ था, वैसा दर्शन कर पाना उसके सिवा अन्य किसी दूसरे के लिए संभव नहीं है। यह भी स्पष्ट है कि इस प्रकार के विश्वरूपदर्शन में अर्जुन ने यद्यपि समस्त चर-अचर, जड-चेतन, भूत-समष्टि को एकमेव नित्य विद्यमान चेतनामात्र की तरह अनुभव कर लिया था, न कि अक्षरशः अपने चर्म-चक्षुओं से देखा था, किन्तु यह अनुभव भी अस्थायी और इसलिए अनित्य होने से यह परमात्मा का वास्तविक दर्शन था ऐसा कहना उचित न होगा। 
अर्जुन से मैंने आगे कहा :
न वेदाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः। 
एवं रूप शक्य अहं नृलोके द्रष्टुत्वदन्येन कुरुप्रवीर।। ४८
इस प्रकार मैंने पुनः इसकी पुष्टि की, कि मेरे जिस स्वरूप का दर्शन उसे हुआ, उसे उसके अतिरिक्त न तो कोई अन्य पुरुष देख सकता है, और न ही वेदों आदि के अध्ययन से, दान, पूजा आदि विविध पुण्यकर्मों से, उग्र तप इत्यादि क्रियाओं से, भी इस प्रकार के दर्शन कर पाना लोक में किसी के लिए संभव है।
***
क्रमशः
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Wednesday, May 12, 2021

उत्तरगीता

1.

महाभारत के युद्ध की समाप्ति के कुछ समय के बाद सर्वत्र शान्ति स्थापित हो चुकी थी । महाराज युधिष्ठिर धर्म के अनुसार पृथ्वी पर शासन कर रहे थे। तब एक दिन भगवान् श्रीकृष्ण से उन्होंने निवेदन करते हुए उनसे यह जिज्ञासा की --

"भगवन्! युद्ध की भीषण स्थिति में आपने अपने सखा, और मेरे अनुज को जो उपदेश प्रदान किया, उसका यत्किञ्चित अंश मुझे भी प्रदान हो, ऐसी मेरी अभिलाषा है। यदि भगवन् मुझे इस हेतु पात्र समझें तो इसे मैं अपना परम सौभाग्य समझूँगा।"

तब भगवान् श्रीकृष्ण ने मंदस्मित के साथ उनसे कहा --

"युधिष्ठिर! यह सत्य है कि उस समय मैंने अर्जुन से जो संवाद किया, वह तात्कालिकता और प्रासंगिकता की दृष्टि से यद्यपि संक्षिप्त ही था, और उसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि में जाने का न तो अवसर था, न प्रश्न, परंतु अर्जुन की पात्रता उसकी वह  विषाद-पूर्ण मानसिक स्थिति ही थी, जिसके कारण वह मेरे वचनों को ध्यान और एकाग्रता से सुन, उनका तात्पर्य यथावत् ग्रहण कर पाया। युधिष्ठिर! लोक में अर्जुन जैसा, पात्र दुर्लभ ही होता है। 

तुम्हारी स्वयं की स्थिति में भी, यद्यपि तुम भी अवश्य ही अर्जुन के ही समान इस ज्ञान की प्राप्ति करने के अधिकारी हो, किन्तु अर्जुन के लिए उस समय की उसकी वह मनोदशा ही इस शिक्षा के लिए एक उपयुक्त महत्वपूर्ण कारण सिद्ध हुई। उसकी उस विषाद-पूर्ण मनःस्थिति के तथा मुझमें अपनी अगाध श्रद्धा के कारण ही वह पात्रता में तुमसे श्रेष्ठ न होते हुए भी तुमसे न्यून भी नहीं था। वैसे तो तुम्हें धर्म क्या है और अधर्म क्या है, इसका पूर्ण ज्ञान है, और तुम तदनुसार धर्म-अधर्म के विवेक से प्रेरित होकर धर्म का आचरण भी करते हो, किन्तु लौकिक धर्म अध्यात्म के धर्म से बहुत भिन्न है, इसलिए मैं तुम्हारी जिज्ञासा शान्त करने के लिए तुमसे गीता के उसी मर्म को प्रत्यक्ष कहूँगा जिसे युद्ध के समय  मैंने अर्जुन से परोक्षतः कहा था।

चूँकि यह मर्म, जो मैं तुमसे कहने जा रहा हूँ, उसे सुयोग्य भक्त,  मुमुक्षु या अधिकारी पुरुष उचित समय आने पर अपने हृदय में ही सुनता और जान लेता है :

(कालेनात्मनि विन्दति...३८, अध्याय४)  

इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह पहले चित्त को ध्यानपूर्वक शुद्ध कर संकल्प सहित भक्ति, ज्ञान  कर्मयोग (निष्काम कर्म) का आश्रय लेते हुए इसका श्रवण करे।

 इस प्रकार ध्यान से श्रवण करने के अनन्तर मनन एवं निदिध्यासन करते हुए वह अन्ततः मुझे ही प्राप्त होता है।

ऐसा ही मेरा कोई प्रिय भक्त.... "

***