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Wednesday, February 8, 2023

जाति और वर्ण

मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।।

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3/27,

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।।

अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।।२७।।

3/28,

तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।।

गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते।।२८।।

3/29,

प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु।।

तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्।।२९।।

4/13,

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।।

तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।।१३।।

के सन्दर्भ में मुण्डकोपनिषद् के निम्न मंत्र उल्लेखनीय हैं :

मुण्डक प्रथम

(प्रथम खण्ड-) 

ॐ ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव

विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता।।

स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठा-

मथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह।।१।।

अथर्वणे यां  प्रवदेत ब्रह्मा-

थर्वा तां पुरोवाचाङ्गिरे ब्रह्मविद्याम्।।

स भारद्वाजाय सत्यवहाय

प्राह भारद्वाजोऽङ्गिरसे परावराम्।।२।।

शौनको ह वै महाशालोऽङ्गिरसं विधिवदुपसन्न पप्रच्छ :

कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति।।३।।

तस्मै स होवाच :

द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद् ब्रह्मविदो वदन्ति -- परा चैवापरा च।।४।।

शौनक ऋषि संभवतः दत्तात्रेय परंपरा के रहे होंगे, जो गौ और श्वान दोनों का ही पालन पोषण करते थे --

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।।

शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।।१८।।

(अध्याय ५)

इससे यही स्पष्ट होता है कि अङ्गिरस की परंपरा में ऋषि गौ के साथ श्वान भी रखते थे। अंगिरा से ही आङ्ग्ल (Angel) और आङ्ग्ल-शैक्षं (Anglo-Saxon) तथा फिर अंग्रेज "जाति" का उद्भव हुआ। तैत्तिरीय उपनिषद् में शीक्षा-वल्ली भी दृष्टव्य है।

निष्कर्ष यह कि "जाति" नामक सामाजिक विभाजन पण्डितों ने नहीं बल्कि सनातन-धर्म से विद्वेष रखनेवाले विधर्मियों ने किया।

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Tuesday, July 30, 2019

अकृतेन, अकृत्स्नविदः, अक्रियः, अक्रोधः,

श्रीमद्भगवद्गीता
शब्दानुक्रम -Index 
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अकृतेन 3/18,
अकृत्स्नविदः 3/29,
अक्रियः 6/1,
अक्रोधः 16/2,
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Thursday, June 11, 2015

वर्ण-आधारित आश्रम-धर्म,


सनातन-धर्म के दो रूप हैं
वर्ण-आधारित आश्रम-धर्म,
तथा वर्ण-निरपेक्ष ’शैव’,’शाक्त’ ’सौर’ ’वैष्णव’ और ’गाणपत्य’ तथा इनसे निकले ’पौराणिक-धर्म’ .
गीता में कहीं यह नहीं कहा गया है कि ’वर्ण-आश्रम-धर्म’ का यह वर्गीकरण ’जाति’-आधारित है । किन्तु ’जाति’ एक प्रारंभिक स्थान तो रखता ही है ।
फ़िर ’वर्ण’ का अर्थ है, मनुष्य जन्म से भले ही किसी भी जाति में पैदा हुआ हो, ’वर्ण’ उसकी ’प्रकृति’ से उसने स्वयं चुना होता है ।
आश्रम प्राणिमात्र को प्राप्त होनेवाली स्वाभाविक ’अवस्था’ है जिसके अनुकूल धर्मोंका पालन करना उसके लिए हितकारी और पालन न करना अहितकारी होता है ।
एक मोटे अनुमान से 25 वर्ष तक ब्रह्मचर्य फ़िर 50 तक गार्हस्थ्य और फ़िर वानप्रस्थ ’आश्रम’ शरीर को प्रकृति से ही प्राप्त हुआ है ।
’स्त्री’ या ’पुरुष’ शरीर भी ’जीव’ को उसके ’संकल्प के ही अनुसार प्राप्त होता है इसलिए उसके अनुसार स्त्रियोचित या पुरुषोचित ’प्रवृत्तियाँ’ उसे ’प्राप्त’ होती हैं । यदि वह उनसे सुसंगति रखते हुए अपना आचरण करे तो उसे कम से कम कष्ट और अधिक से अधिक सुख प्राप्त होगा ।
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जिस व्यक्ति में ’ब्राह्मण’ ’क्षत्रिय’ ’वैश्य’ और ’शूद्र’ आदि के जैसे / जितने संस्कार (गुण तथा कर्म की प्रवृत्ति) होंगे वह ’उतना’ ही ’ब्राह्मण’ ...आदि होगा ।
इसलिए ’जाति’ से ब्राह्णण आदि होना तो एक ’संभावना’ भर होती है ।
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फ़िर गीता के अनुसार ही ’ईश्वर’ की प्राप्ति के लिए ’जाति’ के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता । ’जाति’ सामाजिक संस्था के रूप में उपयोगी है किन्तु उसकी भी मर्यादाएँ तो हैं ही ।
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उचित सन्दर्भ के लिए गीता अध्याय 3, श्लोक 28, 29, 
तथा गीता अध्याय 4, श्लोक 13, अध्याय 9, श्लोक 30, देखिए । 
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इन्हें यहाँ नीचे दिए गए 'लेबल्स'/ 'Label' को click कर भी देख सकेंगे । 
  

Sunday, August 31, 2014

आज का श्लोक, ’विचालयेत्’ / ’vicālayet’

आज का श्लोक, ’विचालयेत्’ / ’vicālayet’
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’विचालयेत्’ / ’vicālayet’  - विचलित करे, भ्रमित करे,

अध्याय 3, श्लोक 29,

प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविद न विचालयेत् ॥
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(प्रकृतेः गुण-सम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
तान् अकृत्स्नविदः मन्दान् कृत्स्नविद् न विचालयेत् ॥)
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भावार्थ :
प्रकृति के गुणों से जिनकी बुद्धि मोहित होती है, वे उन गुणों और उनसे जुड़े कर्मों में आसक्त रहते हैं, इसलिए जो ज्ञानी तत्व को ठीक से, पूरी तरह से जान चुके हैं, उन ज्ञानियों को चाहिए कि वे मन्दबुद्धि उन अज्ञानियों (की बुद्धि) को, जो कि तत्व को ठीक से, पूरी तरह से नहीं जानते, विचलित न करें ।
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’विचालयेत्’ / ’vicālayet’ - should confuse, should put in doubt,

Chapter 3, śloka 29,

prakṛterguṇasammūḍhāḥ
sajjante guṇakarmasu |
tānakṛtsnavido mandān-
kṛtsnavida na vicālayet ||
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(prakṛteḥ guṇa-sammūḍhāḥ
sajjante guṇakarmasu |
tān akṛtsnavidaḥ mandān
kṛtsnavid na vicālayet ||)
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Meaning :
Those whose minds are deluded by the attributes (guṇa) and actions (karma) caused by Manifestation (prakṛti) keep on indulging in them. The one of perfect understanding (of Reality), wisdom, should never confuse the minds of such men of imperfect understanding.
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Thursday, July 17, 2014

आज का श्लोक, ’सज्जन्ते’ / ’sajjante’

आज का श्लोक, ’सज्जन्ते’ / ’sajjante’
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’सज्जन्ते’ / ’sajjante’ - आसक्ति रखते हैं,

अध्याय 3, श्लोक 29,

प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविद न विचायेत् ॥
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(प्रकृतेः गुण-सम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
तान् अकृत्स्नविदः मन्दान् कृत्स्नविद् न विचालयेत् ॥)
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भावार्थ :
प्रकृति के गुणों से जिनकी बुद्धि मोहित होती है, वे उन गुणों और उनसे जुड़े कर्मों में आसक्त रहते हैं, इसलिए जो ज्ञानी तत्व को ठीक से, पूरी तरह से जान चुके हैं, उन ज्ञानियों को चाहिए कि वे  मन्दबुद्धि उन अज्ञानियों (की बुद्धि) को जो कि तत्व को ठीक से, पूरी तरह से नहीं जानते, विचलित न करे ।
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’सज्जन्ते’ / ’sajjante’ - are attached to,

Chapter 3, śloka 29,

prakṛterguṇasammūḍhāḥ
sajjante guṇakarmasu |
tānakṛtsnavido mandān-
kṛtsnavida na vicāyet ||
--
(prakṛteḥ guṇa-sammūḍhāḥ
sajjante guṇakarmasu |
tān akṛtsnavidaḥ mandān
kṛtsnavid na vicālayet ||)
--
Meaning :
Those whose minds are deluded by the attributes (guṇa) and actions (karma) caused by Manifestation (prakṛti) keep on indulging in them. The one of perfect understanding (of Reality) wisdom should never confuse the minds of such men of imperfect understanding.
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