Wednesday, June 25, 2014

आज का श्लोक, ’सर्वभूतानि’ / ’sarvabhūtāni’

आज का श्लोक,  ’सर्वभूतानि’ / ’sarvabhūtāni’
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’सर्वभूतानि’ / ’sarvabhūtāni’ - समस्त भूत, प्राणिमात्र,

अध्याय 6, श्लोक 29,

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥
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(सर्वभूतस्थम् आत्मानम् सर्वभूतानि च आत्मनि ।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः ॥)
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भावार्थ :
जो सम्पूर्ण भूतों में एक ही आत्मा (अर्थात् अपने-आप) को तथा सम्पूर्ण भूतों को एक ही आत्मा (अर्थात् अपने-आप) में देखता है, इस प्रकार से योग में स्थित हुआ सर्वत्र विद्यमान और एक समान एक ही तत्व का दर्शन करता है ।
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अध्याय 7, श्लोक 27,

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।
सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥
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(इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।
सर्वभूतानि सम्मोहम्  सर्गे यान्ति परन्तप ॥)
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भावार्थ :
हे भारत (अर्जुन) ! संसार में अपने जन्म ही से, संसार में सम्पूर्ण प्राणी, इच्छा तथा द्वेष से उत्पन्न हो रहे सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों से विभ्रम को प्राप्त हो रहे हैं ।
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अध्याय 9, श्लोक 4,

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्वस्थितः ॥
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(मया ततम् इदम् सर्वम् जगत् अव्यक्तमूर्तिना ।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न च अहम् तेष्वस्थितः ॥)
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भावार्थ :
मुझ अव्यक्तस्वरूप (निराकार) से यह सम्पूर्ण जगत् परिपूर्ण है । और सम्पूर्ण भूत मेरे ही आश्रय से मुझमें स्थित हैं, न कि मैं उनमें ।
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टिप्पणी :
सम्पूर्ण जगत् एवम् भूत आदि अपने अस्तित्व के प्रमाण के लिए किसी चेतन सत्ता के आश्रित होते हैं, जबकि वह चेतन सत्ता अपने अस्तित्व का प्रमाण स्वयं ही है । इस प्रकार से ’चेतनता’ के सर्वव्यापक होने के तथ्य को अस्वीकार नहीं किया जा सकता । वही चेतनता किसी देह में प्राणरूप से व्यक्त होने पर उसे व्यक्ति-विशेष के रूप में अभिव्यक्त करती है । इस प्रकार से चेतनता की अभिव्यक्ति होने के पश्चात् ही ’मैं’ यह-यह, इस प्रकार का हूँ आदि भावनाएँ मन-मस्तिष्क में उत्पन्न होती हैं । इस प्रकार से परिभाषित हुआ ’व्यक्ति’, विनाशशील कल्पना मात्र है, जबकि इस कल्पना का आश्रय अविनाशी परमात्मा ।
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अध्याय 9, श्लोक 7,

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥
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(सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिम् यान्ति मामिकाम् ।
कल्पक्षये पुनः तानि कल्पादौ विसृजामि अहम् ॥)
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भावार्थ :
हे कौन्तेय (अर्जुन) ! कल्प के अन्त में समस्त भूतों का मेरी (अपरा) प्रकृति में लय हो जाता है, और कल्प के आरंभ में मैं उनहें पुनः सृजित करता हूँ ।
 
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अध्याय 18, श्लोक 61,

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥
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(ईश्वरः सर्वभूतानाम् हृद्देशे अर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥)
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भावार्थ :
हे अर्जुन! ईश्वर, देहरूपी यन्त्र में आरूढ हुए सम्पूर्ण प्राणियों के हृदय में अवस्थित होकर उन्हें अपनी माया के द्वारा परिचालित करता है ।
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’सर्वभूतानि’ / ’sarvabhūtāni’ - to all beings,

Chapter 6, śloka 29,

sarvabhūtasthamātmānaṃ
sarvabhūtāni cātmani |
īkṣate yogayuktātmā
sarvatra samadarśanaḥ ||
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(sarvabhūtastham ātmānam
sarvabhūtāni ca ātmani |
īkṣate yogayuktātmā
sarvatra samadarśanaḥ ||)
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Meaning :
The one who sees the same Self in all beings, and all beings in the Self, such a One having realized and identified with Brahman sees everything as the same Reality.

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Chapter 7, śloka 27,

icchādveṣasamutthena
dvandvamohena bhārata |
sarvabhūtāni sammohaṃ
sarge yānti parantapa ||
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(icchādveṣasamutthena
dvandvamohena bhārata |
sarvabhūtāni sammoham
sarge yānti parantapa ||)
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O  bhārata (arjuna) !, from the very birth all beings are subject to delusion caused by the twins like desire and envy, pleasure and pain.
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Chapter 9, śloka 4,
mayā tatamidaṃ sarvaṃ
jagadavyaktamūrtinā |
matsthāni sarvabhūtāni
na cāhaṃ teṣvasthitaḥ ||
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(mayā tatam idam sarvam
jagat avyaktamūrtinā |
matsthāni sarvabhūtāni
na cāhaṃ teṣvasthitaḥ ||)
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Meaning :
This whole manifest expanse, all the world is pervaded by Me, The Immanent. All beings abide in Me, and not Me in them.
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Chapter 9, śloka 7,

sarvabhūtāni kaunteya
prakṛtiṃ yānti māmikām |
kalpakṣaye punastāni
kalpādau visṛjāmyaham ||
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(sarvabhūtāni kaunteya
prakṛtim yānti māmikām |
kalpakṣaye punaḥ tāni
kalpādau visṛjāmi aham ||)
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Meaning :
O kaunteya (arjuna)! At the time of dissolution, at the end of the kalpa ( a day of brahmā), all  beings dissolve into My prakṛti, and at the beginning of the kalp, I create them into a new life.
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Chapter 18, śloka 61,
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īśvaraḥ sarvabhūtānāṃ
hṛddeśe:'rjuna tiṣṭhati |
bhrāmayansarvabhūtāni
yantrārūḍhāni māyayā ||
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(īśvaraḥ sarvabhūtānām
hṛddeśe arjuna tiṣṭhati |
bhrāmayan sarvabhūtāni
yantrārūḍhena māyayā ||)
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Meaning :
O arjuna! The Lord Supreme dwells within the space in the heart of all beings as consciousness, and by means of His will (māya), prompts them to function accordingly as if they are driven in a mechanical way.
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