Wednesday, June 4, 2014

आज का श्लोक, ’सन्तुष्टः’ / ’santuṣṭaḥ’,

आज का श्लोक,  ’सन्तुष्टः’ /  ’santuṣṭaḥ’ 
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’सन्तुष्टः’ /  ’santuṣṭaḥ’ - संतुष्ट,

अध्याय 3, श्लोक 17,
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यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥
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(यः तु आत्मरतिः एव स्यात्-आत्मतृप्तः च मानवः ।
आत्मनि-एव च सन्तुष्टः तस्य कार्यम् न विद्यते ॥)
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भावार्थ :
परंतु जो मनुष्य (आत्मा को जानकर) आत्मा में ही रमण करता है, और आत्मा में ही तृप्त एवं सन्तुष्ट हो जाता है, उसके लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रह जाता ।
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अध्याय 12, श्लोक 14,

सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः
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(सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
मयि-अर्पित-मनोबुद्धिः यः मद्भक्तः सः मे प्रियः ॥)
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भावार्थ :
मेरा वह भक्त, जो मुझमें ही परम सन्तोष पाता है, मुझमें ही जिसकी मन-बुद्धि सतत अर्पित है, मन-बुद्धि आदि सहित जिसकी सम्पूर्ण आत्मा अपने वश में है, ऐसा दृढनिश्चय योगी मुझे प्रिय है ।
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अध्याय 12, श्लोक 19,

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येनकेनचित् ।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥
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(तुल्यनिन्दास्तुतिः मौनी सन्तुष्टः येनकेनचित् ।
अनिकेतः स्थिरमतिः भक्तिमान् मे प्रियः नरः ॥)
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भावार्थ :
प्रशंसा और निन्दा को समान समझनेवाला, मननशील, जिस किसी भी परिस्थिति में हो, जो कभी असंतुष्ट नहीं अनुभव करता, गृहविहीन, स्थिरबुद्धि और भक्ति से परिपूर्ण हृदयवाला, ऐसा मनुष्य मुझे प्रिय है ।
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टिप्पणी -
1.  अनिकेत / गृहविहीन का तात्पर्य यह है कि जो कहीं ’घर’ नहीं बनाता, ममत्व-रूपी संबंधों और ’स्वामित्व’ की भावना से अछूता होता है ।
2 . 'मुनेर्भावः' , 'मुनेः कर्म, योगचर्या इति मौनम्',
'म्ना' > आ + मनति = मानता है,
'मन्' > मनुते = मानता / माना जाता है,
'मन्' > मन्यते + सोचता है,
'मन्' > 'मननं' > मुनिः, 'मुनिः' > 'मौनम्' > 'मुनिः' > 'मौनम्' > ’मौनी’ ।             
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’सन्तुष्टः’ /  ’santuṣṭaḥ’ -content, satisfied,

Chapter 3, śloka 17,
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yastvātmaratireva syā-
dātmatṛptaśca mānavaḥ |
ātmanyeva ca santuṣṭa-
stasya kāryaṃ na vidyate ||
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(yaḥ tu ātmaratiḥ eva syāt
ātmatṛptaḥ ca mānavaḥ |
ātmani-eva ca santuṣṭaḥ 
tasya kāryam na vidyate ||)
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Meaning :
But a man, who has realized the 'Self' once and for all, delights in the Self, derives satisfaction in the Self only, and firmly abides in the Self', has nothing what-so-ever else to obtain, no more a duty to perform.
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Chapter , śloka 14,

santuṣṭaḥ satataṃ yogī
yatātmā dṛḍhaniścayaḥ |
mayyarpitamanobuddhir-
yo madbhaktaḥ sa me priyaḥ
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(santuṣṭaḥ satataṃ yogī
yatātmā dṛḍhaniścayaḥ |
mayi-arpita-manobuddhiḥ
yaḥ madbhaktaḥ saḥ me priyaḥ ||)
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Meaning :
Allways contented, abiding in Me moment to moment, and has firm resolve of practicing yoga. Having dedicated mind and intellect to Me,  such a devotee is beloved to Me.
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Chapter 12, śloka 19,

tulyanindāstutirmaunī
santuṣṭo yenakenacit |
aniketaḥ sthiramatir-
bhaktimānme priyo naraḥ ||
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(tulyanindāstutiḥ maunī
santuṣṭaḥ yenakenacit |
aniketaḥ sthiramatiḥ
bhaktimān me priyaḥ naraḥ ||)
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Meaning :
One who is alike in praise and blame, whatever be the situation, has no discontent in mind, who owns no house of one's own to live in (is free from the sense of possession over things and people, -relationships with them), who is firm in thought and is dedicated to Me, is dear to Me.
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