Friday, June 13, 2014

आज का श्लोक, ’सर्वेषु ’ / ’sarveṣu’

आज का श्लोक, ’सर्वेषु ’ / ’sarveṣu’ 
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’सर्वेषु ’ / ’sarveṣu’  - सभी (स्थानों) पर, सभी में,

अध्याय 1, श्लोक 11,

अयनेषु च सर्वेषु यथा भागमवस्थिताः ।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व व हि ।
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(अयनेषु च सर्वेषु यथाभागम् अवस्थिताः ।
भीष्मम् एव अभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥)
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भावार्थ :
इसलिए युद्धक्षेत्र के सभी मुख्य स्थलों पर, युद्धभूमि के हर स्थान पर, अपने-अपने स्थल पर अवस्थित हुए आप सभी भीष्म पितामह की ही सब ओर से रक्षा करें ।
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अध्याय 2, श्लोक 46,

यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके ।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥
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(यावान्-अर्थः उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके ।
तावान्-सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥)
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भावार्थ : ब्रह्म के तत्व को जो जान चुका होता है, उस ब्राह्मण का वेदों से उतना ही प्रयोजन होता है, जितना कि हर ओर जल से परिपूर्ण विशाल सरोवर प्राप्त होने पर किसी मनुष्य का छोटे से तालाब से होता है ।
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अध्याय 8, श्लोक 7,
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ॥
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(तस्मात् सर्वेषु कालेषु माम् अनुस्मर युध्य च ।
मयि अर्पितमनोबुद्धिः माम् एव एष्यसि न संशयः ॥)
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भावार्थ :
अतएव सभी कालों में, सदा ही मुझको निरन्तर स्मरण करो और युद्ध करो । मुझमें समर्पित मन-बुद्धि होने पर, निश्चय ही तुम मुझको ही प्राप्त होगे ।
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अध्याय 8, श्लोक 20,

परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः ।
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥
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(परः तस्मात् तु भावः अन्यः अव्यक्तः अव्यक्तात् सनातनः ।
यः सः सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥)
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भावार्थ :
समस्त भूतसमुदाय दिन के उगने के साथ संसार के व्यवहार में जाग्रत / व्यक्त हो उठता है, एवं रात्रि आने पर निद्रा के वशीभूत हुआ प्रलीन हो जाता है । अहोरात्रविद् (काल की गणना करनेवालों) जी दृष्टि में यह दिन और रात्रि का नियम आब्रह्म-भुवन (सृष्टिकर्ता ब्रह्मा से लेकर समस्त छोटे-से छोटे भूतों तक) लागू होता है । इस व्यक्त और अव्यक्त भाव से अन्य एक और अव्यक्त भाब है, जो अव्यक्त होने के साथ साथ सनातन भी है । और जो सारे भूतों के विनष्ट हो जाने (अपने आदिकारण में विलीन हो जाने) के बाद भी विनष्ट नहीं होता (क्योंकि वह अविनाशी है ।)
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अध्याय 8, श्लोक 27,

नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन ।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥
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(न एते सृती पार्थ जानन् योगी मुह्यति कश्चन ।
तस्मात्-सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥)
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भावार्थ :
इन दोनों मार्गों को* जानता हुआ कोई भी योगी मोहबुद्धि से ग्रस्त नहीं होता, अर्थात् मृत्यु के बाद भविष्य में होनेवाली उसकी गति / अवस्था के बारे में उसे दुविधा नहीं होती ।
इसलिए हे अर्जुन! तुम सभी कालों में, सदैव ही योगयुक्त हो रहो ।
(*इसी अध्याय 8 में पिछले श्लोक, क्रमांक 26 में वर्णित ’शुक्ल’ तथा ’कृष्ण’ गतियाँ)

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अध्याय 13, श्लोक 27,

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥)
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(समम् सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तम् परमेश्वरम् ।
विनश्यत्सु अविनश्यन्तम् यः पश्यति सः पश्यति ॥)
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भावार्थ :
नाश को प्राप्त होते रहनेवाले सब चर अचर भूतों में अविनाशी समभाव से, समान रूप से विद्यमान परमेश्वर को जो देखता है, वही (सत्य को) देखता है ।
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अध्याय 18, श्लोक 21,

पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् ।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥
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(पृथक्त्वेन तु यत् ज्ञानम् नानाभावान्-पृथक्-विधान् ।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तत् ज्ञानम् विद्धि राजसम् ॥)
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भावार्थ :
मनुष्य के उस ज्ञान को, अर्थात् उस बुद्धि को, जिसके द्वारा सभी भूतों (में अवस्थित एकमेव आत्मा) को परस्पर भिन्नता-सहित पृथक्-पृथक् की भाँति ग्रहण किया जाता है, राजसी बुद्धि जानो ।
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अध्याय 18, श्लोक 54,
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते परम् ॥
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(ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिम् लभते परम् ॥)
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भावार्थ :
ब्रह्म से एकीभूत हुआ उल्लसित मनवाला योगी न तो किसी के लिए शोक करता है, न किसी की आकाङ्क्षा ही करता है । वह तो सभी भूतों में समदृष्टि सहित मेरी परा भक्ति को प्राप्त हो जाता है ।
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’सर्वेषु ’ / ’sarveṣu’ - at all ( times, places, situations, positions on the battle-field etc.), every-where,

Chapter 1, śloka 11,

ayaneṣu ca sarveṣu
yathā bhāgamavasthitāḥ |
bhīṣmamevābhirakṣantu
bhavantaḥ sarva va hi |
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(ayaneṣu ca sarveṣu
yathābhāgam avasthitāḥ |
bhīṣmam eva abhirakṣantu
bhavantaḥ sarva eva hi ||)
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Meaning :
At all your positions on the battle-field where-ever you all have been deputed, every-one should protect bhīṣma pitāmaha in all and every possible way.
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Chapter 2, śloka 46,

yāvānartha udapāne
sarvataḥ samplutodake |
tāvānsarveṣu vedeṣu
brāhmaṇasya vijānataḥ ||
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(yāvān-arthaḥ udapāne
sarvataḥ samplutodake |
tāvān-sarveṣu vedeṣu
brāhmaṇasya vijānataḥ ||)
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Meaning :
One who has realized Brahman, has as much concern for the veda, as the one living near an overflowing reservoir of waters has for a small pond.
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Chapter 8, śloka 7,

tasmātsarveṣu kāleṣu
māmanusmara yudhya ca |
mayyarpitamanobuddhir-
māmevaiṣyasyasaṃśayam ||
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(tasmāt sarveṣu kāleṣu
mām anusmara yudhya ca |
mayi arpitamanobuddhiḥ
mām eva eṣyasi na saṃśayaḥ ||)
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Meaning :
Therefore dedicating all your mind and intellect, think of Me always and every moment and fight. With your mind and intellect devoted to Me you shall attain Me, there is no doubt about this.
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Chapter 8, śloka 20,
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parastasmāttu bhāvo:'nyo:'
vyakto:'vyaktātsanātanaḥ |
yaḥ sa sarveṣu bhūteṣu
naśyatsu na vinaśyati ||
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(paraḥ tasmāt tu bhāvaḥ anyaḥ
avyaktaḥ avyaktāt sanātanaḥ |
yaḥ saḥ sarveṣu bhūteṣu
naśyatsu na vinaśyati ||)
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Meaning :
Beyond this manifest and this hidden, there is yet another level of existence My transcendent form and abode, which is immutable and imperishable. Which stays so eternally even through the destruction of both the manifest and the  the immanent (seed / hidden / not manifest).
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Chapter 8, śloka 27,

naite sṛtī pārtha jānan-
yogī muhyati kaścana |
tasmātsarveṣu kāleṣu
yogayukto bhavārjuna ||
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(na ete sṛtī pārtha jānan
yogī muhyati kaścana |
tasmāt-sarveṣu kāleṣu
yogayukto bhavārjuna ||)
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Meaning :
These two different paths* are available to one who practises the way of 'Yoga'. Therefore O arjuna! keep on practising Yoga at all times.
[ *The two paths (’शुक्ल’,śukla, and ’कृष्ण’ 'kṛṣṇa',) as described in the previous shloka 26 of this chapter 8]
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Chapter13 , śloka 27,

samaṃ sarveṣu bhūteṣu
tiṣṭhantaṃ parameśvaram |
vinaśyatsvavinaśyantaṃ
yaḥ paśyati sa paśyati ||)
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(samam sarveṣu bhūteṣu
tiṣṭhantam parameśvaram |
vinaśyatsu avinaśyantam
yaḥ paśyati saḥ paśyati ||)
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Meaning :
One who is aware that the Lord Imperishable as consciousness is always present there, in all beings that are born and subsequently die, is one who really observes the truth.
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Chapter 18, śloka 21,

pṛthaktvena tu yajjñānaṃ
nānābhāvānpṛthagvidhān |
vetti sarveṣu bhūteṣu
tajjñānaṃ viddhi rājasam ||
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(pṛthaktvena tu yat jñānam
nānābhāvān-pṛthak-vidhān |
vetti sarveṣu bhūteṣu
tat jñānam viddhi rājasam ||)
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Meaning :
Know that the intellect (in man) which assumes (The One Reality present in) all beings different from one-another, is of the rājasī /  rājas kind.  
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Chapter 18, śloka 54,

brahmabhūtaḥ prasannātmā
na śocati na kāṅkṣati |
samaḥ sarveṣu bhūteṣu
madbhaktiṃ labhate param ||
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(brahmabhūtaḥ prasannātmā
na śocati na kāṅkṣati |
samaḥ sarveṣu bhūteṣu
madbhaktim labhate param ||)
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Meaning :
One who has realized Brahman as Self ( Atman) only, having thus attained oneness with the Self that is the same in all beings, attains Me in his Devotion Supreme to Me as well.
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