Sunday, April 6, 2014

आज का श्लोक, ’सीदन्ति’ / sIdanti'

आज का श्लोक, ’सीदन्ति’ / 'sIdanti'
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’सीदन्ति’ / 'sIdanti' - शिथिल,

अध्याय 1, श्लोक 29,

सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥
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(सीदन्ति मम गात्राणि मुखम् च परिशुष्यति ।
वेपथुः   च   शरीरे   मे   रोमहर्षः  च   जायते ॥)

भावार्थ :
मेरे अंग शिथिल हुए जा रहे हैं, मेरा मुख सूखा जा रहा है,  मेरा शरीर काँप रहा है, और मेरे रोएँ (भावना के प्रबल आवेग से) खड़े हो रहे हैं ।
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(संस्कृत - सद्, = बैठना, शिथिल हो जाना, सीदति, अर्थात् बैठता है, सीदन्ति, बहुवचन)
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’सीदन्ति’ / 'sIdanti' - benumbed, giving way, heavy,

Chapter 1, shloka 29,

sIdanti mama gAtrANi
mukhaM cha parishuShyate |
vepathushcha sharIre me
romaharShashcha jAyate ||
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Meaning :
My limbs give way, my mouth is parched, body trembles, and my hair stand on end.
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[संस्कृत, Sanskrit - सद्, sad > to sit, सीदति, > sits, सीदन्ति, > plural . (they) sit.
The resemblance in meaning either in phonetic way is noteworthy. There is a similar word in English 'sedentary' > meaning sitting. > sedentary life-style.]
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