Wednesday, September 25, 2019

सुदुराचारः / सुदुराचारी

सुदुराचारः / सुदुराचारी
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गीता अध्याय 9 श्लोक 30 इस प्रकार है :
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि स।।30
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गीता अध्याय 9 श्लोक 29 इस प्रकार है :
समोऽहं सर्वभूतेषु न में द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्।।29
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गीता अध्याय 2 श्लोक 41  इस प्रकार है :
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्।।41
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गीता अध्याय 2 श्लोक 44  इस प्रकार है :
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृत चेतसाम्।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते।।44
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उपरोक्त श्लोकों के हिन्दी तथा अंग्रेज़ी तात्पर्य इसी ब्लॉग में अन्यत्र देखे जा सकते हैं।
The English transcript and translation of the above four stanzas could be found,
in this blog elsewhere, ... so I wanted to avoid unnecessary repetition here.
However, you can click the labels underneath to check the exact location of them.
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'पाहि कृपामयि मामज्ञानम्'
में जैसे 'अज्ञान' का अर्थ है 'अज्ञानी' वैसे ही उपरोक्त श्लोक 9/30 में
'सुदुराचारः' का अर्थ है सुदुराचारी'--अत्यन्त दुराचारी।
उल्लेखनीय बात यह है कि इसी श्लोक में 'भजते मामनन्यभाक्' में 'भज्' धातु का प्रयोग
आत्मनेपदी है,
जबकि श्लोक 9/29 में 'भज्' धातु का प्रयोग परस्मैपदी है, किन्तु इसके तुरंत बाद ही
'मयि ते तेषु चाप्यहम्'
में स्पष्ट कर दिया गया है कि ऐसा 'दुराचारी' भी वस्तुतः अपने आचरण में कर्तृत्व-बुद्धि
से रहित होने से उसे 'साधु-पुरुष' और 'सम्यग्व्यवसित' माना जाना चाहिए।
इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि ऐसा मनुष्य उस स्थिति में है,
जैसा कि गीता अध्याय 6 श्लोक 22 में वर्णन है :
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते। 41
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