Monday, October 14, 2019

कर्म और कर्मफल

क्षीणसंकल्प 
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बहुत से कार्य अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाते और जो पहुँच भी जाते हैं उनके फल भी कभी तो स्वीकार्य और कभी अनपेक्षित तथा अकल्पित होते हैं।
गीता अध्याय 4 में कहा है :
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं हि विकर्मणः।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गति।। 17
इसे पढ़ते हुए विचार आया क्या इसे इस प्रकार से भी देखा जा सकता है :
कर्मणो ह्यपि भोक्तव्यं भोक्तव्यं हि विकर्मणः।
अकर्मणश्च भोक्तव्यं गहना कर्मणो गति।।
भगवान श्री रमणमहर्षि के ग्रन्थ उपदेश-सार का प्रारम्भ :
कर्तुराज्ञया प्राप्यते फलम्।
कर्म किं परं कर्म तज्जडं।।
से होता है।
स्पष्ट है कि किसी भी कार्य का आधार कर्ता ही होता है।
कर्म स्वयं इसलिए जड अर्थात् प्रकृति की गतिविधि है, जिसे कर्ता ही अपनी दृष्टि से देखकर शुभ-अशुभ, उचित-अनुचित, त्याज्य, निषिद्ध, कर्तव्य या बाध्यता आदि की तरह परिभाषित करता है।
इस प्रकार कर्म मंतव्य (notion) है।
कर्म के स्वरूप को इस प्रकार मन द्वारा मंतव्य की तरह ग्रहण किया जा सकता है किन्तु उसका फल (जो कर्म की ही संतति होने से कर्म का ही विस्तार है) कर्ता को भोगना ही पड़ता है।
मनुष्य (कर्ता) नित्य चेतन है जो कर्म और कर्म के प्रभाव अर्थात् कर्मफल को जानता और भोगता है।
इस प्रकार कर्म तथा कर्मफल की गति अर्थात् गतिविधि अवश्य ही गूढ़ और गहन है।
यदि मनुष्य कर्म के केवल शुभ फल को प्राप्त करना चाहता है तो यह संभव नहीं।
यहाँ उपदेश-सार के दो और श्लोक उपयोगी हैं :
कृति महोदधौ पतनकारणम्।
फलमशाश्वतं गतिनिरोधकम्।।
तथा,
ईश्वरार्पितं नेच्छया कृतम्।
चित्तशोधकं मुक्तिसाधकं।।
यहाँ श्री रमणमहर्षि संकेत करते हैं कि चूँकि कर्म के जटिल तत्व को समझना तो बड़े-बड़े विद्वानों के लिए भी दुरूह है इसलिए मनुष्य के लिए उचित यह है कि कर्म के महासमुद्र में डूबने से बचने के लिए समस्त कर्म को ईश्वर को अर्पित कर दे।
(यह भी उल्लेखनीय है कि यहाँ ईश्वर एक है या अनेक, साकार है या निराकार, जीव उसका अंश है या नहीं इस बारे में कुछ नहीं कहा गया है।)
और जब मनुष्य इस प्रकार सारे कर्मों को ईश्वरार्पित कर देता है तो ऐसा कर्म उसके चित्त को शुद्ध कर मुक्ति का हेतु होता है।
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गीता में अध्याय 18 में मनुष्य द्वारा किस प्रकार का कर्म किया जाता है, अथवा होता है इस बारे में विशेष रूप से कहा गया है :
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः।।18
अगले श्लोकों में ज्ञान, कर्म तथा कर्त्ता के तीन प्रकारों का विस्तार से वर्णन है।
किन्तु इसी अध्याय के पूर्वोक्त श्लोक के अनुसार :
यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते।।
अर्थात् जिस मनुष्य में 'मैं कर्ता हूँ' इस प्रकार की भावना नहीं होती, तथा जिसकी बुद्धि भी इस भावना से लिप्त नहीं होती वह यदि इन सारे लोकों को मिटा भी दे तो भी न वह इस कर्म का कर्ता होता है, न इसके फल से बँधता है।
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कर्ता होने की भावना तथा उससे ग्रस्त बुद्धि से जो संकल्प-जनित कर्म होता है, वह इच्छा, अनिच्छा या समष्टि-संकल्प का परिणाम होता है किन्तु भ्रमवश स्वयं को स्वतंत्र कर्ता मान लिए जाते ही मनुष्य उसके फल से बँध  जाता है।
इसलिए संकल्प से उत्पन्न होनेवाली समस्त कामनाओं का त्याग करना प्रथम आवश्यकता है।
अध्याय 6 में कहा गया है :
सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः।।24
शनैः शनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत्।।25
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पुनः
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्।।26
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