Friday, October 4, 2019

कर्शयन्तः, कर्षति, कलयताम्

श्रीमद्भगवद्गीता
शब्दानुक्रम -Index 
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कर्शयन्तः 
17/6,
कर्षति 
15/7,
कलयताम्
10/30,
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'कालः कलयताम् अहम्'
 के माध्यम से गीता ने 'काल' (की अवधारणा) का सत्य अनायास उद्घोषित किया है।
याद आती है, श्री जयशंकर प्रसाद की यह रचना :
"तुमुल कोलाहल कलय में मैं हृदय की बात रे ... "
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