Thursday, December 29, 2022

प्रज्ञा और स्थितप्रज्ञ

सन्दर्भ : अष्टावक्र गीता अध्याय ३

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उद्भूतंज्ञानदुर्मित्रमवधार्याति दुर्बलः।।

आश्चर्यं काममाकाङ्क्षेत् कालमन्तमनुश्रितः।।७।।

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जिसे योग की प्राप्ति ही हुई है, और जिसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित है, - अर्थात् आरुरुक्षु और योगारूढ मुनि का वर्णन अध्याय ६ में इस प्रकार से है :

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।।

योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते।।३।।

अष्टावक्र गीता के उपरोक्त उद्धृत श्लोक में इस पर आश्चर्य व्यक्त किया गया है कि काम आत्मज्ञान का शत्रु है, एवं अन्त-काल भी समीप ही है, इसे जान लेने के बाद भी कोई वृद्ध, दुर्बल मनुष्य विषयों के उपभोग के प्रति कैसे लालायित रह सकता है!

जब तक मुमुक्षु मनुष्य योगारूढ नहीं हुआ होता, मोक्ष या ज्ञान के लिए उसके द्वारा जो प्रयास किए किए जाते हैं वह कर्म-योग है, किन्तु योगारूढ होने पर उसमें कर्तृत्व की भावना का अभाव हो जाने पर भी प्रारब्धवश उसके द्वारा कुछ न कुछ, कोई कर्म होता ही है।

संसार में चार ही प्रकार के मनुष्य हैं। प्रथम तो वे जो इस संसार में सांसारिक पदार्थों और उनसे मिलते हुए प्रतीत होनेवाले सुखों की प्राप्ति को ही जीवन का एकमात्र ध्येय मानते हैं। और इस हेतु जो किया जाना उन्हें आवश्यक प्रतीत होता है, उसे ही करने का यत्न करते रहते हैं। किसी ईश्वर की तो जब वे कल्पना तक नहीं करते, तो उसका स्वरूप क्या है, और उसकी प्राप्ति के बारे में सोचने का तो सवाल ही उनके मन में नहीं उठता। 

दूसरे वे, जो किसी परमात्मा को ही संसार का सृष्टा, परिपालक और संहारकर्ता मानते हैं, और अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार उसकी आराधना करते हुए संसार में सदा सुख ही प्राप्त हो, यह आशा करते हैं। वे अपने, और अपने समुदाय की परंपरा आदि के अनुसार कोई ध्येय तय कर लेते हैं और उनके लिए शास्त्र ही इसका आधार होता है।

तीसरे वे, जो उस परमात्मा के स्वरूप के बारे में जिज्ञासा और अन्वेषण करते हैं। और उसकी प्राप्ति अर्थात् उसका किसी न किसी रूप में दर्शन करने की आकांक्षा उनमें होती है। 

चौथे वे जिन्हें परमात्मा / ईश्वर के होने या ना होने के विषय में  संशय या अनभिज्ञता अनुभव होती है, जबकि ईश्वर की अपेक्षा अपने आपका अस्तित्व, उन्हें प्रकटतः प्रत्यक्ष और साक्षात् सत्य जान पड़ता है।

उपरोक्त सभी प्रकार के मनुष्य नित्य-सुख की प्राप्ति की इच्छा से ही समस्त साधन करते हैं। यद्यपि उन्हें सुख का अनुभव और प्रतीति भी होती है, किन्तु नित्य और अनित्य के भेद पर न तो उनका ध्यान जाता है, न उनकी बुद्धि ही इतनी स्पष्ट स्थिर और परिपक्व होती है कि वे इस बारे में चिन्तन करते हुए नित्य और अनित्य के भेद के विवेक को जागृत करने के लिए आवश्यक अभ्यास कर सकें। 

किन्तु जिनमें भी किसी भी कारण से इस प्रकार के अभ्यास की प्रवृत्ति होती है, ऐसे मुमुक्षु ही आरुरुक्षु अथवा योगारूढ हो पाते हैं। ऐसे ही अपरिपक्व आरुरुक्षु के संबंध में यह प्रश्न हो सकता है : यह आश्चर्य है कि काम ज्ञान का शत्रु है, देह वृद्ध और दुर्बल है तथा अन्तकाल समीप ही है, इसे जानते हुए भी वे विषयों के उपभोग (कामना) की लालसा से ग्रस्त होते हैं।

यह संभवतः प्रारब्धवश, या कर्तृत्व और भोक्तृत्व की भावना के अत्यन्त क्षीण हो जाने पर भी हो सकता है।

किन्तु योगारूढ के संबंध में ऐसा प्रश्न नहीं उठ सकता। 

आरुरुक्षु स्थिति से योगारूढ स्थिति तक की प्राप्ति के बीच की अवस्था के लक्षण को, निम्न श्लोकों में देखा जा सकता है :

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।।

तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च।। ५२।।

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते तदा स्थास्यति निश्चला।।

समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि।।५३।।

(अध्याय २)

तब अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण से पूछते हैं :

स्थितप्रज्ञस्य का भाषा  समाधिस्थस्य केशव।। 

स्थितधीः कि प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्।।५४।।

और भगवान् श्रीकृष्ण तब अर्जुन से स्थितप्रज्ञ और आरुरुक्षु के वर्षों को कहते हैं। यद्यपि आरुरुक्षु योग / समाधि को प्राप्त कर चुका होता है, किन्तु इन्द्रियाँ बल-पूर्वक किस प्रकार से खींचकर उसे विषयों में और उनके भोगों में प्रवृत्त कर देती हैं जिससे वह पुनः उस स्थिति में लौट जाता हैं जहाँ कुछ समय के लिए वह पूर्व-संस्कारों के वशीभूत हो जाता है।

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