Saturday, March 16, 2024

संबंध और द्वन्द्व

पिछले पोस्ट के क्रम में --

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पिछले पोस्ट में हमने देखा कि किस प्रकार संबंध ही क्लेश है। थोड़ा सावधानी से देखें तो क्या यह पर्याप्त है? 

क्या संबंध और द्वन्द्व, विषय और विषयों का चिन्तन, अपेक्षा और चिन्तन / विचार ही क्लेश नहीं है? अपेक्षा से विचार होता है और विचार से अपेक्षा। विषयों का विचार चित्त को कल्पना या स्मृति में खींच लाता है। कल्पना भविष्य की या / और स्मृति अतीत की। दोनों ही तत्काल ही चित्त को वर्तमान के निर्विचार "जो है" से विच्छिन्न और देते हैं। विचार और विचारकर्ता भी विचार के ही दो भिन्न प्रतीत होनेवाले रूप होते हैं। विचार है तो विचारकर्ता है और विचारकर्ता है तो विचार है। दोनों कल्पना हैं न कि "जो है"!

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