Tuesday, February 21, 2023

निर्वेदम्

नाना मतं महर्षीणां... 

मेरे मनोयान ब्लॉग में अष्टावक्र गीता का एक श्लोक प्रतिदिन मैं पोस्ट कर रहा हूँ। आज अध्याय ९ का निम्न श्लोक पोस्ट करते हुए, मुझे श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय २ का श्लोक ५२ याद आया ।

दोनों श्लोकों का भाव भी समान ही है --

नाना मतं महर्षीणां साधूनां योगिनां तथा।।

दृष्ट्वा निर्वेदमापन्नः को न शाम्यति मानवः।।५।।

इसी आशय से युक्त यह श्लोक भी जान पड़ता है --

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।।

तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च।।५२।।

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