Saturday, November 12, 2022

कुरुक्षेत्र-घोषणा

Kurukshetra-declaration 

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अध्याय २,

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय।।

बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः।।

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रथम अध्याय इस ग्रन्थ की केवल प्रस्तावना मात्र है। भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनविषादयोगः नामक इस अध्याय में अर्जुन के विषाद को जानकर उस विषाद का निवारण करने के लिए अर्जुन को इस ग्रन्थ के द्वितीय अध्याय में साङ्ख्य-योग अर्थात् बुद्धियोग का उपदेश देते हैं क्योंकि कर्म स्वरूप से जड होने से किसी नित्यफल की प्राप्ति का साधन नहीं हो सकता। कर्म स्वयं अनित्य होने से जिस किसी भी फल की प्राप्ति करने के लिए सहायक होता है, वह फल स्वयं भी अनित्य ही होता है इसलिए जिसे परम समाधान को प्राप्त करने की अभिलाषा है, वह उस निष्ठा का आश्रय ग्रहण करता है, जिससे प्रेरित होकर मनुष्य किसी कर्म से संलग्न होता है। किन्तु मनुष्य की बुद्धि को कौन सी निष्ठा प्रेरित कर उसे कर्म करने के लिए प्रवृत्त करती है, इसे बुद्धि से नहीं जाना जा सकता। कर्म परिस्थितियों, इच्छा, आशा और मनुष्य के सामर्थ्य के अनुसार ही संभव हुआ करता है, और कर्म से जो फल प्राप्त होता है वह भी चूँकि अनित्य होता है, इसलिए कर्म की आवश्यकता सदा बनी ही रहती है।

इसलिए भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि बुद्धि और कर्म परस्पर अत्यन्त ही भिन्न प्रकार के तत्त्व हैं, और कर्म का स्वरूप क्या है इसे तो बुद्धि से जाना जा सकता है, किन्तु बुद्धि का तत्व क्या है इसे बुद्धियोग से ही जाना जाता है। कर्म नितान्त जड है, जबकि बुद्धि कर्म की अपेक्षा चेतन है। इसलिए कर्म पर बुद्धि से नियंत्रण किया जाता है, तथा बुद्धि पर विवेक अर्थात् बुद्धियोग से। अध्याय ४ में भगवान् श्रीकृष्ण इसे ही स्पष्ट करते हुए कहते हैं :

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः।।

तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।।१६।।

पुनः अगले ही श्लोक में बुद्धि से कर्म का क्या संबंध है इसे स्पष्ट करते हुए कहते हैं :

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।।

अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः।।१७।।

कर्म क्या है, अकर्म क्या है और विकर्म क्या है, इसे तो बुद्धि से यद्यपि जाना जा सकता है, किन्तु बुद्धिमान तो वह है जो कर्म में प्रच्छन्न अकर्म को, तथा अकर्म में प्रच्छन्न कर्म को देख पाता है, जिसे इसके बाद के निम्न श्लोक में स्पष्ट किया गया है :

कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः।।

स बुद्धिमान मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत।।१८।।

कर्म का दूसरा वर्गीकरण अध्याय १८ में उनके सात्त्विक, राजस और तामस गुणों के आधार पर किया गया है :

नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्।।

अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते।।२३।।

यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः।।

क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्।।२४।।

अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम्।।

मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते।।२५।।

जैसा कि पहले कहा गया, कर्म नितान्त जड है, और किसी भी कर्म के संभव होने हेतु पाँच कारणों का उल्लेख साङ्ख्यशास्त्र अर्थात् वेदान्त शास्त्र में भी किया गया है, फिर भी दुर्मति- युक्त  / दुर्बुद्धि युक्त मनुष्य केवल अपने-आपके ही स्वतंत्र कर्ता होने की मान्यता से ग्रस्त रहता है :

पञ्चेमानि महाबाहो कारणानि निबोध मे।।

साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्।।१३।।

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।।

विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्।।१४।।

शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः।।

न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः।।१५।।

तथा सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।।

पश्यत्कृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः।।१६।।

अपने आपको कर्ता मानने-रूपी यह कर्तृत्व-बुद्धि अर्थात् :

"मैं ही कर्म का एकमात्र कर्ता हूँ",

इस प्रकार की विषम-बुद्धि को कर्ता कहा जाता है। जिस मनुष्य में इस प्रकार की कर्तृत्व-बुद्धि का अभाव होता है, और जिसकी बुद्धि "मैं कर्ता हूँ" इस प्रकार के अहंकार की भावना से लिप्त नहीं होती, यदि वह इन समस्त लोकों को नष्ट भी कर देता है, तो भी, न तो वह किसी को मारता है, न ही इस कर्म से बँधता है :

यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।।

हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते।।१७।।

कर्ममात्र की प्रेरक-बुद्धि के तीन कारक-तत्व -- 

ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना।।

करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः।।१८।।

इस प्रकार कर्म के तत्त्व को बुद्धि से जाना जा सकता है, और तदनुसार कर्म का अनुष्ठान करना ही कर्म-योग है। बुद्धियोग में इस प्रश्न पर ध्यान दिया जाता है कि समस्त ही कर्म जिन मुख्य  पाँच कारणों से होते हैं वे कारण कौन कौन से हैं? जैसा उपरोक्त श्लोक १४ में कहा गया, प्रथम तो है अधिष्ठान अर्थात् चेतना या अस्तित्व का सहज स्वाभाविक भान जो किसी पिण्ड में चेतना की अभिव्यक्ति होने पर ही संभव है। दूसरी ओर यह भी सत्य है कि चेतना की अभिव्यक्ति होने पर ही किसी पिण्ड में अपने एवं अपने से इतर का विभाजन अहं-इदं के रूप में संभव होता है।

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। 

उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः।।१६।।

(अध्याय २)

तात्पर्य यह कि सत् और चित् एकमेव सत्य हैं।

सत् अर्थात् जो है, उसे जाननेवाला भी कोई है, अन्यथा जो है, उसके होने का क्या प्रमाण होगा! इसी प्रकार इस जानने अर्थात् बोध का अस्तित्व भी अवश्य है। यदि इसका अस्तित्व न हो तो सत् के अस्तित्वमान होने का प्रश्न ही नहीं पैदा होगा! 

इसलिए सत् ही चित् अर्थात् सत् का भान या बोध है, और इस भान या बोध का अस्तित्व स्वयंसिद्ध है। 

यही सत्-चित् ब्रह्म है, क्योंकि इसे जाननेवाला इससे भिन्न कोई दूसरा नहीं हो सकता। एकमेवोऽद्वितीयः।

इस एकमेव और अद्वितीय की अपरोक्षानुभूति ही साङ्ख्यज्ञान या साङ्ख्यनिष्ठा है। जबकि कर्म-योग के अभ्यास / अनुष्ठान में मनुष्य स्वयं को कर्म का कर्ता मान्य कर लेता है और उसे इसका आभास भी नहीं होता है कि यह मान्यता स्वयं ही एक बड़ी भूल है। 

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Friday, November 11, 2022

या निशा सर्वभूतानां

अध्याय २,

श्लोक ६९

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मेरे एक अन्य ब्लॉग में प्रकाशित पोस्ट से ---





Wednesday, November 9, 2022

संक्षिप्त गीता

श्रीमद्भगवद्गीता की शिक्षा :--
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भगवान् महर्षि श्री वेदव्यास ने इस ग्रन्थ की रचना करते समय अर्जुन की मनःस्थिति को समझते हुए इस अत्यन्त पावन और रहस्यमय ब्रह्मविद्या का उपदेश उसे उसकी पात्रता के अनुसार प्रदान किया। अर्जुन और भगवान् श्रीकृष्ण के इस सख्य-संवाद के माध्यम से जो उपदेश इस ग्रन्थ में प्रदान किया गया है, उसे ग्रहण करने की पात्रता जिसमें होती है उसके लिए तो यह ग्रन्थ अवश्य ही बारम्बार पठनीय है ही, किन्तु जो मनुष्य कोरा और शुष्क बुद्धिजीवी ही है, वह भी यदि इसका अध्ययन करता है तो उस पर भी अन्ततः प्रभु की कृपा अवश्य ही होगी, और वह इसे ग्रहण कर अपना जीवन धन्य कर सकेगा।
अध्याय २ में साङ्ख्ययोग का उपदेश दिया है, तो इसके बाद के अध्यायों में कर्मयोग का उपदेश दिया गया है। साथ ही मनुष्य में जिन दो भिन्न प्रकारों की निष्ठा स्वाभाविक रूप से होती है, उस विषय में तीसरे अध्याय के प्रारंभ में ही यह स्पष्ट कर दिया गया है कि वे दो निष्ठाएँ कौन सी हैं :
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।।
ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्।।३।।
दूसरे अध्याय में साङ्ख्य के तत्त्व को स्पष्ट करने के बाद तीसरे अध्याय में उपरोक्त दोनों निष्ठाओं के बारे में कहा गया। अध्याय ४ में यह स्पष्ट किया गया कि कर्मयोग जिसका उपदेश श्रीकृष्ण  परमात्मा ने प्रथम विवस्वान् को प्रदान किया था, वह विवस्वान् से मनु को प्राप्त हुआ और मनु से इक्ष्वाकु को। योग अर्थात् इस  राजयोग को जिसे साङ्ख्य-योग और कर्मयोग दोनों ही निष्ठाओं से राजर्षियों ने प्राप्त किया, वह पुरातन योग जो महान काल के प्रभाव से नष्ट हो गया, उसका ही उपदेश पुनः उन्हीं परमात्मा ने भगवान् श्रीकृष्ण के रूप में अर्जुन को प्रदान किया। अध्याय ५ के प्रारंभ में इसकी ही पुष्टि इस प्रकार से की गई :
साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः।।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्।।४।।
इस प्रकार की इन दोनों निष्ठाओं से युक्त मनुष्य की बुद्धि में भी यह संशय उत्पन्न हो सकता है कि क्या श्रेयस् की प्राप्ति के लिए कर्म को त्याग दिया जाना अर्थात् कर्म-संन्यास आवश्यक है या कर्म करते हुए भी यह संभव है?
इस अध्याय ५ का प्रारंभ इसी प्रश्न से होता है :
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि।। 
यच्छ्रेय एतयोरेकं तुमने ब्रूहि सुनिश्चितम्।।१।।
सन्न्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेसकरावुभौ।।
तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगौ विशिष्यते।।२।।
ज्ञेयः स नित्य सन्न्यासी ये न द्वेष्टि न काङ्क्षति।।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात् प्रमुच्यते।।३।।
साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः।।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्।।४।।
संक्षिप्त गीता को यदि इन श्लोकों में व्यक्त किया जाए तो शायद इस प्रकार से कहा जा सकता है :
अर्जुन उवाच :
कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन।।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन।।४।।
(अध्याय ४)
श्रीभगवान् उवाच :
पञ्चेमानि महाबाहो कारणानि निबोध मे।।
साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्।।१३।।
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा देवं चैवात्र पञ्चमम्।।१४।।
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः।।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः।।१५।।
तत्रैव सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न पश्यति स दुर्मतिः।।१६।।
(अध्याय १८)
अर्जुन के द्वारा पूछा जा रहा प्रश्न, उसकी इस कर्तृत्व-बुद्धि से उत्पन्न हुआ है, जब तक इस प्रकार की कर्तृत्व-बुद्धि मनुष्य में होती है वह कर्तव्यविमूढ़ रहेगा, उसके मन में यह द्वन्द्व बना ही रहेगा कि मैं क्या करूँ, तब तक वह इस संशय और अनिश्चय से ग्रस्त रहेगा ही कि मेरे लिए क्या करना उचित है और क्या करना अनुचित है। अपने आपके स्वतन्त्र कर्ता होने की यह मान्यता ही मौलिक अज्ञान और विभ्रम है। साङ्ख्य अथवा योग के उपाय का आलंबन लेने पर जब उसे यह स्पष्ट हो जाता है कि कर्तृत्व, भोक्तृत्व, ज्ञातृत्व और स्वामित्व (की भावना और यह कल्पना) ही समस्त दुःखों का मूल और एकमात्र कारण है तो उसकी प्रज्ञा स्थिर हो जाती है अर्थात् वह समत्व-योग में स्थित हो जाता है।  

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Wednesday, November 2, 2022

शाङ्करभाष्य से उद्धृत

अध्याय ९,

श्लोक २५, २६, २७,

इस अध्याय के श्लोक २५ को शुद्ध रूप में टाइपसेट करने की सुविधा न होने से उपरोक्त की पिक्चर-फ़ाइल पोस्ट कर रहा हूँ। 

अध्याय १०,

रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्।।

वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्।।२३।।

(श्लोक २३),

अध्याय १७,

त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा।।

सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु।।२।।

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।।

श्रद्धामयोऽयं पुरुषो ये यच्छ्रद्धः स एव सः।।३।।

यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः।।

प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः।।४।।

(श्लोक २, ३, ४, ५),

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Wednesday, August 17, 2022

।।भगवच्चरित्रम्।।

।।श्रीराधामाधवरहस्य।। 

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गीता, भागवत् और भगवान्

अस्ति, भाति, प्रीति

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एक दृष्टिकोण से सत्य के तीन परिप्रेक्ष्य भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक हैं, तो दूसरी दृष्टि से अस्ति भाति और प्रीति हैं।

एक ही भगवान् इन तीनों रूपों से व्यक्त और अव्यक्त है। 

उस सत्य का वर्णन भी इसलिए तीन शैलियों में पाया जाता है। 

एक है यथावत् -- जैसा कि वह है, जैसा उसका दर्शन होता है, और जिसे गेयरूप में श्रीमद्भगवद्गीता कहा जाता है।

दूसरा है रूपकात्मक -- जैसा कि वह प्रतीत होता है, और जिसे कथा अर्थात् पुराण के रूप में श्रीमद्भाग्वत महापुराण में पाया जाता है। 

तीसरा रसात्मक -- जैसा कि वह उसके क्रियाकलाप में है, प्रतीत होता है और अनुभव किया जाता है। 

वह जो है -- अस्ति वह न तो प्रतीत होता है, न उसे इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदि के माध्यम से देखा जा सकता है और न वह किसी क्रियाकलाप या कर्म में रत है। 

सर्वनाम की दृष्टि से इसी त्रयी को पुनः अहं, इदं तथा तत् इन पदों से जाना जाता है। 

एक अन्य आधार है माधव, माया और जगत्।

- अंग्रेजी भाषा में कहें तो :

Essence, Substance और  Presence तो, 

जैसा कि अध्याय ३ में कहा गया है  :

लोकेऽस्मिन्द्विविधानिष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।। 

ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्।।३।।

तथा, अध्याय ५ में पुनः इसकी पुष्टि भी की गई है :

साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः।।

एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्।।४।।

पुनः अध्याय ७ में यह कहा गया है :

दैवी एषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।। 

मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।।७।।

उपरोक्त श्लोक में भी इसे तीन प्रकारों से इंगित किया गया है :

'अहं' पद का द्वितीया एक-वचन रूप 'माम्',

'इदं' पद का स्त्रीलिंग प्रथमा एक-वचन रूप 'एषा' तथा द्वितीया एक-वचन रूप 'मायां' और 'एतां' ।

इसी प्रकार से 'तत्' पद, सर्वनाम बहु-वचन प्रथमा विभक्ति 'ते'।

ऋषि भगवान की उपासना 'अहं' पद के अनुसंधान की सहायता से, साङ्ख्य के माध्यम से करते हैं, मुनि या भक्त उसी तत्त्व का ध्यान 'त्वं' या 'तत्' - ईश्वर पद की भक्ति के द्वारा, जबकि योगी कर्म और अभ्यास के माध्यम से उसी भगवान को जानने अर्थात् उसकी प्राप्ति के लिए यत्न करते हैं।

माधव और उद्धव

उस तत्त्व को जो कि माया का स्वामी है, माधव कहा जाता है, क्योंकि माया उसी से प्रेरित होकर अपने / उसके समस्त कार्य करती है। वस्तुतः न तो कोई कर्ता है, न कार्य और चूँकि समस्त कर्म भी केवल अवधारणा ही है, उनमें से किसी का भी स्वतंत्र अस्तित्व संभव नहीं है, और क्योंकि इसलिए कर्ता, कार्य, और कर्म तीनों की ही स्वतंत्र सत्यता भी संदिग्ध है।

किन्तु जैसे ही त्रिगुणात्मिका माया के कार्य को सत्यता दी जाती है, उसे सत्यता देनेवाला 'कोई' होता है, जो इस त्रिगुणात्मिका माया के वशीभूत होता है और जिसे मनुष्य 'मैं' शब्द देता है। वह 'मैं' कर्तृत्व, भोक्तृत्व, ज्ञातृत्व और स्वामित्व इन चार रूपों में स्वतंत्र प्रतीत होता है। इस प्रकार वह स्वयंभू 'मैं' नित्य ही माया से उत्पन्न और उससे ही प्रेरित होकर आभासी रूप में विद्यमान प्रतीत होता है।  किसे?  - बुद्धि को और बुद्धि में। पुनः यह बुद्धि भी स्वयं अपना प्रमाण नहीं हो सकती, क्योंकि वह आभासी रूप इसे 'मेरा' कहकर स्वयं को इसका स्वामी मान्य करता है। 

इस प्रकार वह ज्ञातृत्व जो बुद्धि के रूप में क्षण-प्रतिक्षण प्रकट और विलुप्त होता है, भोक्तृत्व, कर्तृत्व तथा स्वामित्व का ही एक रूप है और यही अपने शुद्ध रूप में चिदाभास मात्र है।

जो माया का स्वामी है, वह तो माधव है, जबकि इस माया और अपने स्वामी होने की कल्पना से भी जो ऊपर उठ चुका है, वह उद्धव है।

माया का ही विस्तार से वर्णन रूपकात्मक शैली में पुराणों आदि में किया जाता है और उनमें वर्णित विषयों की सत्यता का कोई स्वतंत्र प्रमाण दिया जाना संभव नहीं है।

श्रीमद्भाग्वत् महापुराण भी अन्य पुराणों जैसा ही एक पुराण है। 

अब यदि श्रीमद्भगवद्गीता पर विचार करें तो इसमें परम श्रेयस् अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति के लिए दो ही उपायों अर्थात् निष्ठाओं का उल्लेख किया गया है और स्पष्ट किया गया है कि चूँकि इन दोनों ही निष्ठाओं का फल एक ही है, इसलिए जो जिस प्रकार की निष्ठा से युक्त होता है, वह उससे प्रेरित होकर तदनुसार इसी फल को प्राप्त कर सकता है।

वे दोनों उपाय इस प्रकार से हैं : 

ज्ञाननिष्ठा के रूप में साङ्ख्य दर्शन की रीति से आत्मानुसन्धान करना, अथवा निष्काम कर्मयोग का अनुष्ठान करते हुए समस्त कर्मों और फलों को ईश्वरार्पित कर देना।

√राध् -आराधायति से बना राधा शब्द आराधना और उपासना का द्योतक है। इस प्रकार भगवान के प्रति पूर्ण अव्यभिचारी समर्पण ही भक्ति है। 

श्रीमद्भाग्वत इसी शैली का ग्रन्थ है और इसमें राधा और माधव के, अर्थात् भक्त और भगवान के परस्पर प्रेम अर्थात् प्रीति के रहस्य का उद्घाटन किया गया है। और चूँकि यह भगवद्-तत्त्व रसात्मक है; -- रसो वै सः, इसलिए प्रवृत्तिमार्ग की साधना करने वालों के लिए बहुत अनुकूल है।

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Friday, August 5, 2022

RUMI / Are You Am I ??

Chapter 4,

Stanza : 16, 17, 18 .

This is not a comment about RUMI, 

This just occurred to me how it relates! 

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Sunday, July 10, 2022

Look-alikes.

येन सर्वमिदं ततम्... 

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अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्।।

विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति।।१७।।

(अध्याय २)

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।।

स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य येन सर्वमिदं ततम्।।४६।।

(अध्याय १८)

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2/17, 18/46,

Monday, June 27, 2022

जैसा संग, वैसा रंग

आज का व्हॉट्स ऐप् सन्देश

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एक मित्र ने फोटो शेयर किया :

"जैसा संग, वैसा रंग!"

मैंने रिप्लाय किया :

ध्यायतो विषयान्पुन्सो सङ्गस्तेषूपजायते।।

सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात् क्रोधोऽभिजायते।।६२।।

क्रोधात्भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः

स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशः बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ।।६३।।

(अध्याय २)

ध्यान निर्गुण है, काम रजोगुण है, क्रोध तमोगुण है। 

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।।

मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।।१४।।

(अध्याय ७)

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Tuesday, June 14, 2022

लक्ष्यार्थ और वाच्यार्थ

माम् एकम्।। 

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सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।। 

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।६६।।

(अध्याय १८)

वाच्यार्थ :

समस्त धर्मों का त्याग कर मुझ एक (कृष्ण की) शरण में आओ।

शोक मत करो, मैं (कृष्ण) तुम्हें तुम्हारे सभी पापों से मुक्त कर दूँगा ।

लक्ष्यार्थ :

समस्त धर्मों को त्याग कर मेरे (एकमेव आत्मा के) एक धर्म की शरण में आओ।

शोक मत करो, मेरी / तुम्हारी अपनी यह आत्मा ही तुम्हें तुम्हारे सभी पापों से मुक्त कर देगी।

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धर्म अर्थात् आचरण, -- आचरण किन्हीं परंपराओं, सुनिश्चित तौर तरीकों, सिद्धान्तों पर आधारित हो सकता है और जो आचरण किसी एक परंपरा में पुण्य है, उसे किसी दूसरी परंपरा में पाप भी माना जा सकता है। भिन्न भिन्न परंपराओं के मतभेदों को महत्व मत दो, और मेरे (आत्मा के) धर्म की शरण लो। किन्तु इसके लिए पहले, तुम्हें आत्मा का स्वरूप और धर्म क्या है इसे जानना होगा। और चूँकि यह आत्मा तो सबमें विद्यमान समान आधारभूत तत्व है, इसलिए उसे जानना और प्राप्त कर लेना ही एकमात्र ऐसा उपाय है, जिसका सहारा सभी ले सकते हैं, चाहे उनका आचरण, आचार-विचार एक दूसरे से कितना ही अलग क्यों न हो।

गीता के तात्पर्य को ग्रहण करने में जहाँ जहाँ सर्वनाम अस्मद् के रूपों :

'अहं' - प्रथमा एक-वचन - संज्ञा या सर्वनाम,

'माम्' / - 'मा' - द्वितीया एक-वचन, संज्ञा या सर्वनाम, 

'मया' / - तृतीया एक-वचन, संज्ञा या सर्वनाम,

'मह्यम्' / 'मे' - चतुर्थी एक-वचन, संज्ञा या सर्वनाम,

'मत्' - पञ्चमी एक-वचन, संज्ञा या सर्वनाम, 

'मम' / 'मे' - षष्ठी एक-वचन, संज्ञा या सर्वनाम,

'मयि' - सप्तमी एक-वचन, संज्ञा या सर्वनाम,

दृष्टव्य है कि उपरोक्त पदों को जब संज्ञा (आत्मा) माना जाता है, और तदनुसार उनका अर्थ ग्रहण किया जाता है, तो वह उस तात्पर्य से भिन्न हो सकता है, जो इन्हें सर्वनाम पद माना जाने से प्राप्त हो सकता है। 

एक बहुत अच्छा उदाहरण निम्न श्लोक में देखा जा सकता है :

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।। 

तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप।।५।।

(अध्याय ४)

'मे' तथा 'अहं' पदों को संज्ञा (आत्मा) के अर्थ में या सर्वनाम के अर्थ में ग्रहण किया जाए किया जाए तो भिन्न भिन्न अर्थ प्राप्त होते हैं। वाच्यार्थ की दृष्टि से आत्मा को कृष्ण (व्यक्ति विशेष) मानकर, अन्य पुरुष एक-वचन के प्रयोग के अनुसार अर्थ ग्रहण किया जाता है तो अर्जुन की ही तरह उनके भी बहुत से जन्म हुए, -- ऐसा निष्कर्ष प्राप्त किया जा सकता है । इस अर्थ की पुष्टि उक्त श्लोक में प्रयुक्त विद् -क्रियापद - 'वेद' के ल-कार से भी होती है।

'वेद' :

लट् ल-कार - अन्य पुरुष एक-वचन, या उत्तम पुरुष एक-वचन हो सकता है। 

लट् ल-कार (वर्तमान काल) में 'विद्' क्रियापद का प्रचलित रूप यह है :

वेत्ति विदतः विदन्ति -- अन्य पुरुष (Third Person)

वेत्सि वित्थः वित्थ -- मध्यम पुरुष (Second Person)

वेद्मि विद्वः विद्मः -- उत्तम पुरुष (First Person) 

और विकल्प की तरह --

वेद विदतुः विदुः - अन्य पुरुष  (Third Person) 

वेत्थ विदथुः विद - मध्यम पुरुष  (Second Person) 

वेद विद्व विद्म - उत्तम पुरुष  (First Person) 

भी प्रयुक्त किए जा सकते हैं। 

'वेत्थ' तो अवश्य ही मध्यम पुरुष एक-वचन ही है ।

तानि अहं वेद सर्वाणि में :

'अहं' पद का अर्थ इस प्रकार से आत्मा और व्यक्ति विशेष दोनों ही अर्थों में भिन्न भिन्न रूपों में समझा जा सकता है।

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Saturday, May 14, 2022

उद्वेग, उद्विग्नता

उद्विजेत्, उद्विजते

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न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्।। 

स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः।।२०।।

(अध्याय ५)

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यस्माद्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।। 

हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः।।१५।।

(अध्याय १२)

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