Sunday, March 23, 2025

Finding Out!

त्रिविधा भवति श्रद्धा 

पिछले पोस्ट को पब्लिश करते ही इस पर ध्यान गया कि इसी अध्याय के प्रारंभ में कहीं किसी श्लोक में :

"त्रिविधा भवति श्रद्धा"

से प्रारंभ होनेवाला कोई श्लोक है।

इसी अध्याय १७ के इस प्रथम श्लोक पर दृष्टि पड़ी -

अर्जुन उवाच --

ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः। 

तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्वमाहो रजस्तमः।।१।।

और इससे मुझे दिशानिर्देश प्राप्त हो गया। तात्पर्य यह कि मनुष्य की श्रद्धा भी निष्ठा के आधार पर ही सात्विक, राजसी और तामसिक इन तीनों में से किसी एक प्रकार की होती है, जिसका उल्लेख इसके तुरंत बाद के श्लोक में इस प्रकार से है -

श्रीभगवानुवाच --

त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा।

सात्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु।।२।।

सत्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।

श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः।।३।।

जिसके उल्लेख से पिछले पोस्ट को प्रारंभ किया था। 

इसलिए ऐसा कहा जा सकता है कि यहाँ "श्रद्धा" शब्द का अर्थ "निष्ठा" / conviction समझा जा सकता है।

इसमें सन्देह नहीं कि प्रथमतः तो भौतिक जगत् में अपने अस्तित्व के भान के बाद ही अपने और अपने आसपास प्रतीत होनेवाले अस्तित्व को क्रमशः अपने शरीर के रूप में "स्वयं" तथा "स्वयं" से भिन्न "संसार" की तरह समझ लिया जाता है।

ऐसा लगता है कि अवश्य ही यह आभासी विभाजन भी उसी चेतना में उत्पन्न होता है, जो कि इन्द्रियानुभूतियों से या जिससे कि इन्द्रियानुभूतियाँ उत्पन्न होती हैं।

दूसरे शब्दों में :

शरीर में चेतना के जागृत होने पर ही इन्द्रियों का कार्य, और इन्द्रियों का कार्य प्रारंभ होने के बाद ही शरीर तथा आसपास के अस्तित्व का "भान" होता है। और ध्यान से देखें तो कहा जा सकता है कि शरीर और जगत् का भान होने से भी पहले ही इन्द्रियों का भान भी, चेतना जागृत होने पर ही संभव होता है।

इसलिए भान और चेतना उस एक ही वस्तु के द्योतक हैं, जिसमें अस्तित्व को जाना तो जाता है, किन्तु इस प्रकार से "जानना" इन्द्रियों, मन, स्मृति या बुद्धि के माध्यम से नहीं, बल्कि स्वतंत्र रूप में अस्तित्व में ही अन्तर्निहित है।

चेतना (या भान) के जागृत होने पर ही अपने या "स्वयं के" तथा अपने से अन्य प्रतीत होनेवाले उस बाह्य जगत् की भिन्नता अनुभव होती है जिसे कि चेतना (या भान) के जागृत होने से पहले नहीं जाना जाता है। अस्तित्व की नित्यता यद्यपि तब भी होती तो है किन्तु ऐसा कह पाना भी चेतना (या भान) के जागृत होने पर ही संभव है। इस प्रकार से अपने-आप या "स्वयं" को जगत् से भिन्न एक "चेतन" या "मन" के रूप में जगत् से स्वतंत्र और भिन्न सत्ता मान लिया जाता है।

यह है वह निष्ठा जिसे स्वभावजा श्रद्धा भी कह सकते हैं।चेतना (या भान) के जागृत होने से पहले की सुप्त दशा में, जिसमें अपने और अपने आसपास के किसी जगत् का भान, और इसलिए इस प्रकार का कोई विभाजन भी नहीं रह जाता, क्या "मन" नामक किसी वस्तु की स्वतंत्र सत्ता हो सकती है?

अभी हम "श्रद्धात्रयी" पर आगे विचार करें तो स्पष्ट है कि "तामसी" श्रद्धा उस स्थिति को कह सकते हैं जब चेतना (या भान) के जागृत होने पर "अपने" से भिन्न किसी जगत् की प्रतीति उत्पन्न होती है, यद्यपि "अपने" से वह किस प्रकार से भिन्न और स्वतंत्र है यह भी स्पष्ट नहीं होता। प्रत्येक ही चेतन सत्ता जो "अपने" स्वयं और अपने से भिन्न जगत् को इस प्रकार से अनुभव करती है, चेतना (या भान) के जागृत होने से पहले एक ऐसी दशा में होती है जिसमें चेतना सुषुप्तप्राय होती है। फिर भी जागृत होने पर उसका नये की तरह जन्म हुआ हो, ऐसा भी नहीं है। सुषुप्त होने या जागृत होने के समय में अपने अस्तित्वमान होने के तथ्य को हर कोई अनायास जानता ही है और इस पर सन्देह उठाना तक हास्यास्पद ही है।

अपने "स्वयं" के होने के स्वाभाविक भान में ही "स्वयं" से भिन्न फिर भी अपरिहार्यतः जुड़े अर्थात् "अभिन्न" भी उस जगत् को भी वैसे ही अनायास ही नित्य और जन्म तथा मृत्यु से रहित मान लिया जाता है।

यह चेतना (या भान) का "धर्म" हुआ। 

चेतना (या भान) के जागृत होने के बाद किसी प्रकार का अभाव अनुभव होने पर उसकी पूर्ति के लिए चेष्टा होती या की जाती है। यदि उस चेष्टा से अभाव दूर हो जाता है तो उसे "सार्थक" कहा जाता है। दूसरी ओर, अभाव को दूर करने की आवश्यकता अनुभव होने और अभाव को दूर करने की चेष्टा को ही "काम" कहा जा सकता है।

इस प्रकार "अर्थ" और "काम" परस्पर जुड़े हुए हैं।

अभाव के दूर होने को ही समस्या से मुक्ति या मोक्ष कहा जा सकता है।

पुनः शारीरिक कष्ट उत्पन्न होने पर उनसे मुक्ति होने की आवश्यकता अनुभव होना और उन्हें दूर करने के उद्देश्य से की जानेवाली चेष्टा भी "कर्म" ही है।

किन्तु, और इसीलिए शरीर के जीवित रहने तक "कर्म" से "मुक्ति" हो पाना असंभव ही है।

"काम" या कामना के जागृत होने के बाद "काम" ही केवल राग, द्वेष, लोभ, भय, आशा, अपेक्षा, आशंका ही नहीं, बल्कि स्मृति के रूप में अतीत या भूत और कल्पना के रूप में अज्ञात भविष्य का सृजन कर लेता है।

और इसके बाद तुरन्त ही "जगत्" की रचना करनेवाली किसी ऐसी कल्पित अदृश्य सत्ता और उसकी शक्ति का विचार जन्म लेता है जो "स्वयं" को सदा सुरक्षित, संतुष्ट और प्रसन्न बनाए रखे।

फिर उसे "ईश्वर" या कोई दूसरा नाम दे दिया जाता है। रोचक यह भी है कि यह सब बौद्धिक ऊहापोह "मनुष्य" में ही होता है।

गीता में अध्याय ५ में इस "चेतन" सत्ता को शायद जगत् के स्वामी के रूप में तो "प्रभु" तथा असंख्य चेतन शरीरों के रूप में "विभु" कहा गया होगा, और जहाँ पर "कर्म" और  "कर्मफल" तक की अवधारणा भी सत्यता पर भी शंका की गई है। 

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः। 

न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते।।१४।।

नादत्ते कस्यचित्पापं सुकृतं चैव न विभुः।

अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः।।१५।।

ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितं आत्मनः। 

तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत् परम्।।१६।।

और इसीलिए "बुद्धियोग" को "कर्मयोग" से श्रेष्ठ भी कहा गया है :

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय। 

बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः।। 

किन्तु किसी का चित्त या मन इतना परिपक्व न हो कि वह इस सरल सत्य को ग्रहण कर सके तो वह समस्त कर्मों का अनुष्ठान निष्काम भाव से करते हुए, कर्तृत्व की भावना से युक्त रहते हुए भी उन्हें "ईश्वर" को समर्पित भी कर सकता है :

श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्-ध्यानं विशिष्यते। 

ध्यानात्कर्मफलस्त्यागः त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्।।

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The Conviction.

श्रद्धात्रयी

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। 

श्रद्धामयः अयं पुरुषः यो यच्छ्रद्धः स एव सः।।३।।

(अध्याय १७)

ऐसा प्रतीत होता है कि संभवतः गीता में आगे चलकर श्रद्धा को श्रद्धात्रयी के रूप में क्रमशः तामसी, राजसी और सात्विकी कहा गया हो।

मनुष्य नामक प्राणियों के अन्तःकरण में जो प्रकृतिप्रदत्त निष्ठा या ईश्वरप्रदत्त स्वाभाविक श्रद्धा होती है वह तीन प्रकार की होती है।

पहली है पशुतुल्य तामसी श्रद्धा जिसमें क्षण क्षण बदलते हुए और इस बदलते रूप में भी सतत अनुभव किए जा रहे संसार को ही एकमात्र सत्यता मान लिया जाता है और मन स्वयं को इसके केन्द्र की तरह शरीर विशेष के रूप में सुरक्षित बनाए रखने की कामना के पूर्ण होने की आशा तथा शरीर के नष्ट होने की कल्पना से आशंकित और भयभीत रहा करता है।

दूसरी है मनुष्य-तुल्य राजसी श्रद्धा जिसमें अपनी क्षमता और ज्ञान की मर्यादा को अनुभव करते हुए किसी ऐसी सत्ता की कल्पना की जाती है जो कि तुलना में असीम क्षमता और ज्ञान से संपन्न हो सकती है और उसे प्रसन्न करने की चेष्टा की जाती है जिसकी कृपा प्राप्त कर हम सदैव सुखी और संपन्न रहें। 

तीसरी है विवेकशील वह सात्विक श्रद्धा जिसमें संसार की प्रत्येक वस्तु और मनुष्य के अनित्य होने की कल्पना होने से ऐसी किसी भी वस्तु में आसक्ति न हो पाना और किसी ऐसी वस्तु की खोज ओर उसे जानने की चेष्टा जो कि अनश्वर और इसलिए नित्य हो, और जो जन्म तथा मृत्यु से रहित भी हो। और यह भी कि ...

यहीं तक यह विवेचना है।

इसे लिखना प्रारम्भ करते समय विचार यह था कि जिसे यहाँ श्रद्धा कहा है उसके स्थान पर निष्ठा शब्द का प्रयोग करूँ किन्तु मेरे पास कोई ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है न कोई और दूसरा उपाय जिसकी सहायता से मैं सुनिश्चित रूप से जान सकूँ कि क्या गीता में निष्ठात्रयी के बारे में और कहीं कुछ कहा गया है या नहीं।

अस्तु!

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Friday, March 21, 2025

The Big Crunch

यदा संहरते चायं

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2/58

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः। 

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।

यहाँ हृ - हरति / हरते

का आत्मनेपदी धातु के रूप में प्रयोग दृष्टव्य है।

ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति (Manifestation) तथा प्रलय (Dissolution) इस अर्थ में सृजन और विलय है न कि निर्माण और विनाश।

यह न केवल व्यष्टि बल्कि समष्टि ब्रह्माण्ड के लिए भी सत्य है।

गीता 2/58 

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Saturday, February 22, 2025

My Only Fear.

कुम्भ के बहाने! 

What I'm Affraid of!

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रारंभ इस प्रकार से होता है -

धृतराष्ट्र उवाच -

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।

मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय।।

शायद इससे अधिक उपयुक्त और प्रासंगिक कोई अन्य सन्दर्भ इस ग्रन्थ को प्रारंभ करने के लिए नहीं हो सकता है। जीवन को अर्थात् पुरुषार्थ को हम जिन चार रूपों में जान सकते हैं उनमें से धर्म प्रथम है -

धर्मः वस्तुस्वभावः।

धर्म अस्तित्व का स्वभाव है इसलिए जड चेतन हर वस्तु का अपना स्वभाव ही धर्म है जिसका अनुष्ठान अनायास हुआ करता है। जीवनरूपी सरिता के इस स्वाभाविक और सरल प्रवाह में न तो कहीं कोई कर्ता, कर्म या कर्म का उद्देश्य हो सकता है। और जैसे ही इस प्रवाह में कोई रुकावट या बाधा आती है, तो उसकी प्रतिक्रिया के रूप में कर्ता, कर्म और कर्म का कोई उद्देश्य प्रकट हो उठते हैं। ये तीनों ही चेतना की गतिविधि हैं, जिनमें चेतना ही स्वयं को इन तीनों रूपों में विभाजित कर लेती है, और कर्ता के रूप में किसी व्यक्ति-सत्ता का प्राकट्य हो जाता है, अर्थात् वह सत्ता अहं-प्रत्यय की तरह इदं प्रत्यय से पृथक् और भिन्न रूप में भासित होती है। "किसे भासित होती है?" -यह पूछना एक अतिप्रश्न होगा। क्योंकि यह  अद्वितीय चेतना ही विषय और विषयी, दृक् और दृश्य की तरह भी, दो की तरह से अस्तित्वमान और प्रतीत भी होती है।

धर्म से अर्थ की उत्पत्ति होने पर ही उस अर्थ को उद्दिष्ट के रूप में ग्रहण किया जाता है। और इसके बाद ही उस अर्थ की सिद्धि के लिए उपयुक्त प्रतीत होनेवाला समुचित और वाञ्छित कर्म किया जाता है।

"कुरु" पद, "कृ" उभयपदी धातु का युष्मद् सूचक लुट् लकार एकवचन परस्मैपदी रूप है, जबकि आत्मनेपदी  धातु की तरह यही "कुरुष्व" हो जाता है।

प्रस्तुत श्लोक में यहाँ परस्मैपदी प्रयोग है। 

किसी चेतन वस्तु में कर्तव्य की प्राप्ति उठने का भाव ही उसे कर्म करने के लिए होनेवाली प्रेरणा होता है। उसमें उठनेवाली यही भाव तत्क्षण कर्तृत्व का रूप ग्रहण कर लेता है और "मैं कर्ता हूँ" इस मूलतः त्रुटिपूर्ण कल्पना के उत्पन्न होने का कारण होता है। इस प्रकार, संपूर्ण जीवन वस्तु-मात्र के लिए "धर्मक्षेत्र और कुरुक्षेत्र" हो जाता है। "मामकाः" / "मेरे", और "पाण्डवाः" / "पाण्डु" नामक किसी दूसरे के पुत्रों के बीच तब भिन्न भिन्न उद्देश्यों की सिद्धि हेतु किया जानेवाला "कर्म" परस्पर विपरीत और विरुद्ध होने से "युद्ध" का रूप ले लेता है।

धर्म, अर्थ और काम का यह क्षेत्र तब धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र हो जाता है। और चेतन सत्ता का जीवन ऐसा ही युद्धस्थल होता है। कामना के बने रहने तक यह युद्ध सतत चलता रहता है। सतत युद्ध करता हुआ युद्ध में विजयी होने तक या मृत्यु की प्राप्ति होने तक, या युद्ध की निरर्थकता और भयावहता से पलायन कर लेने के विचार से प्रेरित होकर वह "चेतन" द्वन्द्व से ग्रस्त रहता है।

कुम्भ महापर्व शीघ्र ही संपन्न होने की ओर अग्रसर है। बहुत से भाग्यवान और पुण्यवान संगम स्नान कर चुके हैं। मुझसे भी उनकी अपेक्षा थी कि मैं भी करता या मुझे भी करना चाहिए था। मैं नहीं जानता कि मैं इस बारे में क्या कहें! कोई निश्चय कर पाने के लिए मैं स्वतंत्र हूँ भी या नहीं, या कि मैं कितना स्वतंत्र हूँ! और, क्या स्वतंत्रता आंशिक भी हो सकती है? यह भी मुझे नहीं पता है। मेरे कुम्भस्नान न कर पाने से न तो मुझे डर लगता है, और न मुझमें कोई अपराध-बोध ही उठता है, किन्तु किसी दूसरे की भावनाओं को मुझसे कहीं चोट न लग जाए इसका कुछ डर मुझे अवश्य है। और इसलिए उनका सामना कर पाने में भी! 

कुम्भस्नान कर पाना या न कर पाना तो मेरे वश में नहीं है, किन्तु धर्म-रूपी गंगा, कर्म-रूपी यमुना, और दर्शन-रूपी अदृश्य सरस्वती के त्रिवेणी के इस पावन संगम में स्नान करते रहना मुझे अपेक्षाकृत सरल, और मेरा और भी अधिक बड़ा सौभाग्य अनुभव होता है।

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Sunday, December 8, 2024

मयाध्यक्षेण

9/10

मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्।। 

हेतुनाऽनेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते।।१०।।

(अध्याय १०)

आत्मा स्वयं ही अस्तित्वमान सत्य है, जो स्वयं ही और स्वयं से ही स्वयं को ही जानता है।

Self is the Existential Reality, Conscious of Being, Knowing It-Self through Self.

Being Conscious implies Existence, and Existence implies Being the Self.

यह अद्वैत सत्य है। आत्मा की अध्यक्षता में ही उसकी ही शक्ति / क्षमता से स्फूर्त होकर उसकी ही प्रकृति सम्पूर्ण चर और अचर जगत् को जन्म देती है, अर्थात् जगत् की सृष्टि करती है और इसीलिए यह जगत् सतत परिवर्तित होता है। परिवर्तन ही काल है और काल ही परिवर्तन है। इस प्रकार आभासी-स्थान और आभासी-काल पुनः पुनः व्यक्त और अव्यक्त होते हैं स्थूल, सूक्ष्म और कारणगत आत्मा ही तब द्रव्य और ऊर्जा का रूप ग्रहण करता है। आत्मा भी तब स्वयं ही और स्वयं से ही अनेक, असंख्य पिण्डों में जीवभाव के रूप में परस्पर पृथक् और स्वतंत्र "अहंकार" के रूप में जगत् और जगत्सापेक्ष्य चेतन के रूप में असंख्य जीवों का रूप लेता है। और इसीलिए जन्म और मृत्यु आभासी और कल्पित घटनाएँ हैं, न कि वे वस्तुतः घटित होती हैं। इसलिए जीव के परिप्रेक्ष्य में न तो जन्म और न ही मृत्यु का अस्तित्व संभव है। जीव के परिप्रेक्ष्य और सन्दर्भ में, जन्म और मृत्यु सदैव ही किसी और के ही होते हैं। चेतन आत्मा, जीव और जड जगत् के परिप्रेक्ष्य में जन्म और मृत्यु नामक कुछ नहीं होता है।

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प्रत्याहार

विषय - (Object), विषयी - (Subject),

और चित्त - (attention) 

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विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिने।। 

रसोऽपि रसवर्जं तं परं दृष्ट्वा निवर्तते।।५९।।

(श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय २)

स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः।।५४।।

(पातञ्जल योगसूत्र - साधनपाद)

।।2.54।।

शांकरभाष्य 

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स्वविषयसंप्रयोगाभावे चित्तस्वरूपानुकार इवेति चित्तनिरोधे चित्तवन्निरुद्धानीन्द्रियाणि नेतरेन्द्रियजयवदुपायान्तरमपेक्षन्ते। यथा मधुकरराजं मक्षिका उत्पतन्तमनूत्पतन्ति निविशमानमनुनिविशन्ते तथेन्द्रियाणि चित्तनिरोधे निरुद्धानीत्येष प्रत्याहारः।।

स्वविषय-असम्प्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इव इन्द्रियाणां प्रत्याहारः।।

स्वविषय-संप्रयोग अभावे चित्त-स्वरूप-अनुकार इव इति चित्त-निरोधे चित्तवत् निरुद्धानि इन्द्रियाणि न इतर इन्द्रिय-जयवत् उपायान्तरम् अपेक्षन्ते। यथा मधुकरराजं मक्षिका उत्पतन्तं अनु उत्पत्ति निविशमानं अनुनिविशन्ते तथा इन्द्रियाणि चित्त-निरोधे निरुद्धानि इति एषः प्रत्याहारः।। 

ततः परमावश्यता इन्द्रियाणाम्।।५५।।

ततः परमा वक्रता इन्द्रियाणाम्।।

--

विषयी के चित्त का इन्द्रियों के विषय से संपर्क होने पर वृत्ति-विशेष सक्रिय होती है। चित्त के निरुद्ध हो जाने पर चित्त की तरह से इन्द्रियाँ भी निरुद्ध हो जाती हैं। और  तब विषयी के रूप में विद्यमान अहं-वृत्ति भी अपने स्रोत में विलीन होकर शान्त हो जाती है। तब इन्द्रियाँ पूर्णतः परम वश में हो जाती हैं।

व्यवहार में ऐसा संभव नहीं होता। इसलिए सबसे पहले तो ध्यान (attention) को विषयों से हटाकर सिर्फ "मैं" / "स्वयं" पर लाया जाना होता है।

दूसरी रीति में ध्यान का विषय इष्ट / ईश्वर होता है, जिसका चिन्तन करते हुए अन्य सभी आते-जाते विचारों में लिप्त हुए बिना, उनकी उपेक्षा कर दी जाती है, और ध्यान को इष्ट / ईश्वर पर लौटाया जाता है। स्पष्ट है कि तब "मैं" ध्यानकर्ता के रूप में प्रच्छन्न (छिपा हुआ) रहता है। इसलिए प्रायः होता यह है कि मन विभाजित होकर एक साथ दो कार्यों में संलग्न होता है और दो ही क्या दो से अधिक भागों में भी उसकी गतिविधि जारी रहती है। यह एक बहुत संकटपूर्ण स्थिति होती है जिससे सावधान रहना चाहिए। अधिकतर लोगों का मन इस प्रकार इतना अधिक विभाजित (fragmented) हो जाता है कि यद्यपि वह एक ही समय में एक से अधिक कार्य (multitasking) तो कर सकता है किन्तु एक समय पर केवल किसी एक ही कार्य को कर पाना उसके लिए कठिन हो जाता है। उदाहरण के लिए आप ड्राइविंग सीखते समय जितना सावधान होते हैं और आपका मन तब जितना शून्य होता है, ड्राइविंग सीख लेने के बाद वैसे सावधान नहीं रह पाते और दूसरा कोई कार्य जैसे कि संगीत सुनना, किसी से फोन पर या वैसे ही बातचीत करने आदि कार्य में संलग्न हो जाते हैं। जैसा कभी सरकस में किसी को करते हुए देखा होगा।

इसका एक कारण यह होता है कि जिस विषय में हमारी स्वाभाविक रुचि होती है, उस विषय पर मन सरलता से एकाग्र हो जाता है और हमें एकाग्रता का अभ्यास करने की आवश्यकता नहीं होती। किन्तु कभी कभी विचित्र स्थिति ऐसी भी हो जाती है जब हमारी रुचि एक साथ दो या अधिक विषयों में होती है। परिस्थिति के अनुसार भी ऐसा आवश्यक हो जाता है जब हम दुविधा में कुछ तय नहीं कर पाते। 

तीसरी रीति से, जब ध्यान को इन्द्रियों से लौटाकर ब्रह्म के स्वरूप पर स्थिर किया जाता है तो अहं-वृत्ति ब्रह्म से पृथक् न रहकर ब्रह्म से उसका तादात्म्य हो जाता है। अर्थात् तब इसे ही ब्रह्माकार वृत्ति कहा जाता है। इस स्थिति में जो अनुभव होता है उसे "अहं ब्रह्मास्मि" कहा जा सकता है। किन्तु यह अपरोक्षानुभूति (आत्मज्ञान) नहीं है।

अपरोक्षानुभूति वह है जिसका उल्लेख "रसवर्जं" के रूप में प्रारंभ में किया गया है।

इन तीनों विधियों में योग के बहिरङ्ग उपायों :

निरोध, एकाग्रता, समाधि से प्राप्त "समापत्ति" के साथ साथ प्रत्याहार का प्रयोग अपरिहार्यतः आवश्यक है।

इससे यह स्पष्ट है कि प्रत्याहार (withdrawing of attention from external objects) कितना महत्वपूर्ण है।

यतो यतो हि निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्। 

ततो ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्।।

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Wednesday, November 20, 2024

अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा

1/20

अध्याय १,

अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः।।

प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः।।२०।।

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श्रीमद्भगवद्गीता में श्री हनुमानजी की क्या भूमिका है, इस एक श्लोक से अनुमान लगाया जा सकता है!

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Wednesday, October 30, 2024

The Turning Point.

श्रीमद्भगवद्गीता 

4/13,

अध्याय ४,

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।।

तस्यापि कर्तारं मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।।१३।।

6/46,

अध्याय ६,

तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।।

कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन।।४६।।

6/47,

अध्याय ६,

योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।।

श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युक्ततमो मतं।।४७।।

12/12,

अध्याय १२,

श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते।।

ध्यानात्कर्मफलस्त्यागः त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्।।१२।।

18/47,

अध्याय १८,

श्रेयान्सस्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात्।।

स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।४७।।

18/48

अध्याय १८,

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।। 

सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः।।४८।।

गुणकर्मविभागशः

मूढ जहीहि धनागमतृष्णा...

पूज्य आदि शङ्कराचार्य कृत चर्पटपञ्जरिका स्तोत्रम् की यह पंक्ति प्रायः मुझे याद आती है। और इस ब्लॉग को पढ़नेवाले किसी धनलोलुप से कल जब एक ईमेल मुझे प्राप्त हुआ जिसे गूगल मेल ने "स्पैम" में डाल रखा था, और तुरन्त ही मैंने उसे डिलीट कर दिया था, तब भी एक बार यह पंक्ति मुझे याद आई।

गीता के द्वितीय अध्याय के एक श्लोक में अर्जुन विषाद से व्याकुल होकर जब भगवान् श्रीकृष्ण से -

"न योत्स्य" अर्थात् "न योत्स्ये" कहते हैं -

एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।।

न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह।।९।।

और इसी प्रकार अंतिम अठारहवें अध्याय के एक श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि अहङ्कार से ग्रस्त होकर तुम जो "न योत्स्य" कहते हो तो तुम्हारा वह मान्यतारूपी व्यवसाय व्यर्थ है क्योंकि  प्रकृति ही तुम्हें युद्ध करने के लिए बाध्य कर देगी और तब तुम अवश्य ही युद्ध करोगे। 

यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।। 

मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति।।५९।। 

संपूर्ण ग्रन्थ में अर्जुन न तो "मैं स्वतंत्र कर्ता हूँ" इस भ्रम से, और इसीलिए न इस भ्रम और अन्तर्द्वन्द्व से कि मुझे युद्ध करना चाहिए या नहीं करना चाहिए, और अंततः भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा दिए गए "युद्धस्य कृतनिश्चयः" की आज्ञा का पालन करनेवाले युद्ध में संलग्न हो जाते हैं।

तात्पर्य यह कि जो कुछ भी शुभ या अशुभ होता है वह प्रकृति से ही पूर्वनिश्चित होता है यह समझकर प्रकृति के कार्य में हस्तक्षेप करने से बचते हुए प्राप्त हुए कर्तव्य में यत्नपूर्वक संलग्न होना ही एकमात्र विकल्प है।

ऊपर उद्धृत श्लोकों में प्रारब्ध और कर्तव्य के बीच की दुविधा का सामना कैसे करें इसके लिए ही मार्गदर्शन है।

मुझे प्राप्त ईमेल का सन्दर्भ इसलिए क्योंकि जैसा मैंने दूसरे भी अनेक स्थानों पर उल्लेख किया है, चूँकि अपने स्वभाव से जैसा मुझे उपयुक्त प्रतीत होता है, मैं वैसा ही निष्काम कर्म करने का यत्न करता हूँ और धन अर्जित करने की आवश्यकता या धन अर्जित करने की चिन्ता मुझे छूती तक नहीं, इसलिए धनप्राप्ति करना मेरा ब्लॉग लिखने का उद्देश्य कदापि नहीं है। किन्तु उपरोक्त प्रकार का ईमेल भेजनेवालों की प्रकृति बहुत भिन्न होने से वे भी उसी अनुसार कर्म करने के लिए बाध्य हैं, और ठीक इसी तरह प्रायः गूगल, फेसबुक और दूसरे भी सभी लोग।

किसी को कुछ समझाना न तो मर्यादा के अनुसार मुझे मेरे लिए उचित प्रतीत होता है और न ही मेरी चिन्ता का विषय है।

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Monday, October 14, 2024

किं कर्म किमकर्मेति

4/16, 4/17

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रामायण और रामचरितमानस

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः। 

तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।।१६।।

कर्मणोह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।

अकर्मणश्च ह्यपि बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः।।१७।।

महर्षि वाल्मीकि और गोस्वामी श्री तुलसीदास जी ने अपनी अपनी कविदृष्टि से भगवान् श्रीराम के चरित्र का वर्णन क्रमशः वाल्मीकि रामायण और श्रीरामचरितमानस में किया। दोनों ही ग्रन्थ सनातन अर्थात् धर्म की अमूल्य धरोहर हैं। दुर्भाग्य से आज के समय में पूर्वाग्रहपूर्ण और विद्वेष युक्त तथाकथित विद्वान दोनों ग्रन्थों के विषय में भिन्न भिन्न मतों के आधार पर शंकाएँ खड़ी करते रहते हैं और उन्हें न तो सनातन से और न धर्म या अध्यात्म से ही कुछ लेना देना होता है, बल्कि उनमें से कुछ तो इसी बहाने से सनातन का तिरस्कार भी करते हैं। जैसे कि इन दोनों ग्रन्थों में भगवान् श्रीराम और दूसरे पात्रों के प्रसंगों में विरोधाभास क्यों है, या कौन से तथ्यों को प्रामाणिक कहा जा सकता है। उदाहरण के लिए रामायण के सातवें काण्ड के संबंध में प्रश्न उठाए जाते हैं कि क्या मूल ग्रन्थ में उत्तरकाण्ड विद्यमान था या नहीं, और क्या इसे बाद में ग्रन्थ में जोड़ दिया गया? संभवतः इन विवादों का कोई अन्त नहीं है।

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Wednesday, September 4, 2024

Teacher's Day!

शिक्षक दिवस

Shrimadbhagvad-gita 

2/7

कार्पण्यदोषोपहृतस्वभावः

पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेता।।

यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे 

शिष्योऽस्तेहं शाधि मां त्वां प्रपन्नं।।७।।

(अध्याय २)

There are two slightly different versions of the above verse.

The another is :

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः ... 

Both of the two could give us the same sense so the matter settles there.

However with reference to :

The Teacher's Day,

Another two words in the verse are :

शिष्यः  and  शाधि --

Both these two words come from the verb-root

√शास्  - शासयति, शास्ते, 

Conveying the sense of governing, ruling over, administrate, and to be governed, ruled over, administrated by someone.

Another word related to this verb-root is  : शासनम्  meaning the Governance or the administration.

This how this Sanskrit root-verb turned into  शाह in the Persian -

आर्यमेहर शाह रजा पहलवी 

Was the Emperor of Iran before the Islamic Revolution that ousted him.

Each of the above words has origin in Sanskrit :

आर्य - श्रेष्ठ -  Arya - Noble, 

मिहिर / मेहर Mihir  The Sun,

शाह - शास् - shAs 

रजा - राजा - King. 

पहलवी - Pahlavi

As could be found in the :

Valmiki Ramayanam

However, The English word "Teach" comes from "Touch" that again, from "त्वच्" in Sanskrit. 

Whatever be the origin, the "sense" of "learning / learn from" is effectively conveyed by this word.

The next word is :

शाधि 

Which is the  लुट् लकार, imperative mood, second person singular form of this verb "Teach". Simple and Direct meaning is "to request the teacher for giving the instructions".

Accordingly, the word : अनुशासनम् 

Conveys the sense of  "Discipline" and the one who follows this "Discipline" is called "शिष्यः" meaning - "The Disciple".

Next is : आचार्य  - आचारयति यः स आचार्यः। 

This is about one who teaches about the conduct, behaviour, morality, ethics and manners.

Still another word often  misinterpreted is : गुरु - "Guru" -- meaning some-one bigger, greater in power, position or effect. Usually associated with the word : जनः  गुरुजनः गुरुजनाः : Means the elders and the old people like the parents and other respectable men and women.

The word "student"  comes from the Sanskrit root verbs "स्तु" - स्तौति  meaning one who prays before someone, praises in order to please the Master. 

Again the word : Master comes from the Sanskrit word  मस्त / मस्तकं meaning the "Head" . There is a similar word "Mast". The Master is one who has control over the one who prays before and praises to :

येन सः स्तूयते  i.e. the student.

The very first introductory chapter of the तैत्तिरीय उपनिषद् - शीक्षावल्ली,

Sets the criteria for the student and the teacher who deserve to learn and teach respectively. In very concise words this word narrates what is "Education" and who can be a right educater and who could be educated in the proper sense of the word "Education".

Interestingly,  The Words :

Edit, Edict, Educate,

all have the origin in the the Sanskrit root-verb इ ईयते,  with prefix उपसर्ग "अधि" this gives us : अधीयते  meaning one who studies just as अधिगम्यते means "is learnt" or "understood" .

This is what I have learnt so far.

अनेन यद्धि मया अवगम्यते अधिगम्यते वा यावत्।। 

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