Friday, March 19, 2010

सांख्य और योग के अनुसार 'पात्रता'

~~प्रवृत्ति तथा निवृत्तिपरक दो प्रकार की बुद्धियाँ ~~
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गीता के भगवान् शंकराचार्य लिखित भाष्य अध्याय , के प्रारंभ में कहा गया है,
''शास्त्रस्य प्रवृत्ति-निवृत्तिभूते द्वे बुद्धी भगवता निर्दिष्टे, सांख्ये बुद्धि: योगे बुद्धि: इति । ''
अर्थात्, इस गीताशास्त्र के द्वितीय अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा जिन दो प्रकार की बुद्धियों का उल्लेख
किया गया है, वे हैं;
प्रवृत्तिपरक योगबुद्धि, एवं
निवृत्तिपरक सांख्यबुद्धि
ये दोनों अभ्यास के लिए पूर्व-निष्ठा के अनुसार साधकों की पात्रता के अनुसार हैं
जब तक मनुष्य का आग्रह यह रहता है कि मैं एक स्वतंत्र कर्त्ता हूँ, मैं अपनी बुद्धि, विवेक या इच्छा के अनुसार कर्मकरने के लिए स्वतंत्र हूँ, तब तक उसे चाहिए कि वह यथासंभव चित्तशुद्धि के लिए उपाय करेऔर इसके लिएसहायक हैं, विविध प्रकार की उपासनाएँजिसमें भी उसकी रुचि हो, श्रद्धापूर्वक उसे करने से क्रमश: चित्त की शुद्धिहो जाती हैइस प्रकार उसे क्या करूँ क्या करूँ, इस द्वंद्व से भी मुक्ति मिल जाती है
अध्याय श्लोक में कहा गया है,
''नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण: ।
शरीरयात्रापि ते प्रसिद्ध्येदकर्मण: ॥ ''
फिर अध्याय में ही श्लोक श्लोक में सावधान करते हुए यह भी कहा है,
'' यज्ञार्थात्कर्मणोSन्यत्र लोकोSयं कर्मबंधन: ।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंग: समाचर ॥ ''
यज्ञ का तात्पर्य है, जिससे संपूर्ण विश्व का कल्याण अर्थात् हित होइसे ही अगले ही श्लोक में स्पष्ट करते हुए,
''सहयज्ञा: प्रजा: सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापति: ।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोSस्त्विष्टकामधुक ॥ ''
सृष्टि के आदिकाल में यज्ञ सहित प्रजा को रचकर प्रजापति ने कहा, कि इस यज्ञ से तुम वृद्धि को प्राप्त करो
यह यज्ञ तुम लोगों को इष्ट कामनाओं की प्राप्ति में साधन होगातात्पर्य स्पष्ट है कि यज्ञ कर्मस्वरूप है
इस समय पात्रता के संबंध से आवश्यक उल्लेख किया गया
चित्त-शुद्धि पूर्ण हो जाने पर मनुष्य में आत्म-जिज्ञासा का उद्भव होता हैतब उसके चित्त में बुद्धि से प्रेरित,
''
मैं स्वतंत्र कर्त्ता हूँ । '' अपने इस निष्कर्ष पर प्रश्न उठता है, और जिसे 'मैं' कहा जा रहा है, वह वस्तु क्या है, याउसका यथार्थ तत्त्व क्या है, इस बारे में वह खोज-बीन करता हैतब उसे ज्ञात होता है कि
/जिसे बुद्धि 'मैं' कहती है, वह तत्त्व, यद्यपि देह से सदैव संयुक्त रहनेवाली कोई वस्तु है, किन्तु देह उसे नहींजानती, बल्कि वही देह को जानता हैक्योंकि देह 'जड' है, जबकि 'मैं' चेतन है
/जिसे बुद्धि 'मैं' कहती है, वह तत्त्व, यद्यपि मन से सदैव संयुक्त रहनेवाली कोई वस्तु है, किन्तु 'मन' उसे नहींजानता, बल्कि वही 'मन' को जानता हैक्योंकि जिसे 'मन' कहा जाता है, अर्थात् भाव, भावनाएँ, स्मृति, आदि मनकी विभिन्न और समस्त चित्तवृत्तियाँ, मनुष्य की बुद्धि अपने-आपको उनसे अलग जानती है, और मनुष्य स्पष्ट रूपसे इसे भी जानता है, कि उसका मन सतत बदलता रहता है, जबकि मन को जाननेवाली बुद्धि, मन की अपेक्षास्थिर होती है
/ किन्तु जिसे बुद्धि 'मैं' कहती है, स्वयं बुद्धि भी उसके ही आश्रय से कार्यरत होती है, या कार्य नहीं करतीवहचेतन तत्त्व बुद्धि को भी जानता है, और उसके ही आश्रय से मनुष्य 'मेरी बुद्धि' कहता हैतात्पर्य यह, कि मनुष्य मेंयह बोध स्वाभाविक रूप से होता है कि 'मैं' बुद्धि को जाननेवाला तत्त्व 'है', कि बुद्धि
/इस प्रकार जिसे बुद्धि 'मैं' कहती है, वह उस 'मैं' की शक्ति से ही ऐसा कह पाती हैऔर वह शक्ति, बुद्धि जिसे 'मैं' कहती है, चेतन तत्त्व है, जिसकी तुलना में बुद्धि अपेक्षाकृत 'जड' है
/ बुद्धि तथा देह में स्थित अन्य सभी अवयवों के कार्य प्राण की शक्ति से ही संपन्न होते हैं . एक ओर जहाँ बुद्धि केसचालन में भी प्राण (शक्ति) का होना आवश्यक है, वहीं प्राणों के द्वारा होने के सत्य को बुद्धि में ही ग्रहण क्या जाताहैइस प्रकार प्राण और बुद्धि, तथा प्राण और दूसरे सारे अवयव परस्पर अन्योन्याश्रित हैंफिर भी सूक्ष्मता कीदृष्टि से, वे सभी जड हैं और एक 'चेतन' तत्त्व की विद्यमानता में ही उनके क्रियाकलाप संभव और प्रमाणित भी होसकते हैं
क्या उस चेतन तत्त्व के अतिरिक्त कोई दूसरा 'मैं' हो सकता है ? अर्थात्,
/ क्या मनुष्य में 'दो' 'मैं' होते हैं ?
प्रत्येक मनुष्य सहज रूप से जानता ही है, कि वह सदैव वही-एक है
यह बोध उसे दूसरों से नहीं प्राप्त होताऔर वह ऐसी कल्पना स्वप्न तक में भी नहीं कर सकता कि वह 'दो' या, 'एक से अधिक' कुछ है
इस प्रकार सामान्य वैचारिक विवेचना से भी यह स्पष्ट हो जाता है कि यह 'चेतन' तत्त्व ही वह वस्तु है, जिसे मनुष्यमैं' कहता हैकिन्तु देह तथा दूसरे अवयवों के द्वारा इससे शक्ति प्राप्त कर इसके ही अंतर्गत कार्यरत रहने से बुद्धिमें यह भ्रम उत्पन्न हो जाता है कि 'मैं', -'यह' अथवा 'वह' हूँ
यदि यह प्रश्न करें कि उस चेतन का प्रमाण क्या ? तो हम एक अंतहीन और विसंगत प्रश्नक्रम में फँस जाते हैं
इस प्रकार यह स्पष्ट ही है कि वह चेतन तत्त्व अपना प्रमाण आप ही है
इस प्रकार मनुष्य में विद्यमान चेतन तत्त्व, जो निराकार है, सदैव एकमेव है, और उस निराकार चेतनता के हीप्रकाश में, उसकी ही शक्ति से बुद्धि, मन इन्द्रियाँ, और स्थूल देह आदि कार्य में प्रवृत्त हो सकते हैंयद्यपि वह तत्त्वउनकी किसी भी क्रिया में भाग नहीं लेता, और सदैव एक दृष्टा की भाँति उपस्थित रहता है, देह, मन, बुद्धि, इन्द्रियोंतथा प्राण भी, इन विविध अवयवों के समुच्चय से हम व्यावहारिक जगत के अंतर्गत अपनी और इसी प्रकार से'दूसरों' की भी एक आभासी स्वतंत्र सत्ता है, इस मान्यता से ग्रस्त हो जाते हैं
कर्मप्रवृत्ति से प्रेरित साधक योगबुद्धि वाला होने से योगमार्ग का साधक होने का पात्र होता है, जबकि उपरोक्तविवेचन से ग्रहण किये जानेवाले एकमात्र चेतन तत्त्व को ही 'मैं' के यथार्थ स्वरूप की तरह ग्रहण करनेवाला सांख्यअर्थात् ज्ञानमार्ग का साधक होने का पात्र होता है

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