Thursday, December 29, 2022

प्रज्ञा और स्थितप्रज्ञ

सन्दर्भ : अष्टावक्र गीता अध्याय ३

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उद्भूतंज्ञानदुर्मित्रमवधार्याति दुर्बलः।।

आश्चर्यं काममाकाङ्क्षेत् कालमन्तमनुश्रितः।।७।।

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जिसे योग की प्राप्ति ही हुई है, और जिसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित है, - अर्थात् आरुरुक्षु और योगारूढ मुनि का वर्णन अध्याय ६ में इस प्रकार से है :

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।।

योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते।।३।।

अष्टावक्र गीता के उपरोक्त उद्धृत श्लोक में इस पर आश्चर्य व्यक्त किया गया है कि काम आत्मज्ञान का शत्रु है, एवं अन्त-काल भी समीप ही है, इसे जान लेने के बाद भी कोई वृद्ध, दुर्बल मनुष्य विषयों के उपभोग के प्रति कैसे लालायित रह सकता है!

जब तक मुमुक्षु मनुष्य योगारूढ नहीं हुआ होता, मोक्ष या ज्ञान के लिए उसके द्वारा जो प्रयास किए किए जाते हैं वह कर्म-योग है, किन्तु योगारूढ होने पर उसमें कर्तृत्व की भावना का अभाव हो जाने पर भी प्रारब्धवश उसके द्वारा कुछ न कुछ, कोई कर्म होता ही है।

संसार में चार ही प्रकार के मनुष्य हैं। प्रथम तो वे जो इस संसार में सांसारिक पदार्थों और उनसे मिलते हुए प्रतीत होनेवाले सुखों की प्राप्ति को ही जीवन का एकमात्र ध्येय मानते हैं। और इस हेतु जो किया जाना उन्हें आवश्यक प्रतीत होता है, उसे ही करने का यत्न करते रहते हैं। किसी ईश्वर की तो जब वे कल्पना तक नहीं करते, तो उसका स्वरूप क्या है, और उसकी प्राप्ति के बारे में सोचने का तो सवाल ही उनके मन में नहीं उठता। 

दूसरे वे, जो किसी परमात्मा को ही संसार का सृष्टा, परिपालक और संहारकर्ता मानते हैं, और अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार उसकी आराधना करते हुए संसार में सदा सुख ही प्राप्त हो, यह आशा करते हैं। वे अपने, और अपने समुदाय की परंपरा आदि के अनुसार कोई ध्येय तय कर लेते हैं और उनके लिए शास्त्र ही इसका आधार होता है।

तीसरे वे, जो उस परमात्मा के स्वरूप के बारे में जिज्ञासा और अन्वेषण करते हैं। और उसकी प्राप्ति अर्थात् उसका किसी न किसी रूप में दर्शन करने की आकांक्षा उनमें होती है। 

चौथे वे जिन्हें परमात्मा / ईश्वर के होने या ना होने के विषय में  संशय या अनभिज्ञता अनुभव होती है, जबकि ईश्वर की अपेक्षा अपने आपका अस्तित्व, उन्हें प्रकटतः प्रत्यक्ष और साक्षात् सत्य जान पड़ता है।

उपरोक्त सभी प्रकार के मनुष्य नित्य-सुख की प्राप्ति की इच्छा से ही समस्त साधन करते हैं। यद्यपि उन्हें सुख का अनुभव और प्रतीति भी होती है, किन्तु नित्य और अनित्य के भेद पर न तो उनका ध्यान जाता है, न उनकी बुद्धि ही इतनी स्पष्ट स्थिर और परिपक्व होती है कि वे इस बारे में चिन्तन करते हुए नित्य और अनित्य के भेद के विवेक को जागृत करने के लिए आवश्यक अभ्यास कर सकें। 

किन्तु जिनमें भी किसी भी कारण से इस प्रकार के अभ्यास की प्रवृत्ति होती है, ऐसे मुमुक्षु ही आरुरुक्षु अथवा योगारूढ हो पाते हैं। ऐसे ही अपरिपक्व आरुरुक्षु के संबंध में यह प्रश्न हो सकता है : यह आश्चर्य है कि काम ज्ञान का शत्रु है, देह वृद्ध और दुर्बल है तथा अन्तकाल समीप ही है, इसे जानते हुए भी वे विषयों के उपभोग (कामना) की लालसा से ग्रस्त होते हैं।

यह संभवतः प्रारब्धवश, या कर्तृत्व और भोक्तृत्व की भावना के अत्यन्त क्षीण हो जाने पर भी हो सकता है।

किन्तु योगारूढ के संबंध में ऐसा प्रश्न नहीं उठ सकता। 

आरुरुक्षु स्थिति से योगारूढ स्थिति तक की प्राप्ति के बीच की अवस्था के लक्षण को, निम्न श्लोकों में देखा जा सकता है :

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।।

तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च।। ५२।।

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते तदा स्थास्यति निश्चला।।

समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि।।५३।।

(अध्याय २)

तब अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण से पूछते हैं :

स्थितप्रज्ञस्य का भाषा  समाधिस्थस्य केशव।। 

स्थितधीः कि प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्।।५४।।

और भगवान् श्रीकृष्ण तब अर्जुन से स्थितप्रज्ञ और आरुरुक्षु के वर्षों को कहते हैं। यद्यपि आरुरुक्षु योग / समाधि को प्राप्त कर चुका होता है, किन्तु इन्द्रियाँ बल-पूर्वक किस प्रकार से खींचकर उसे विषयों में और उनके भोगों में प्रवृत्त कर देती हैं जिससे वह पुनः उस स्थिति में लौट जाता हैं जहाँ कुछ समय के लिए वह पूर्व-संस्कारों के वशीभूत हो जाता है।

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Sunday, December 25, 2022

The Zen and Samurai.

ध्यान, युयुत्सु और युद्ध-कला 

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Zen, Ju-jutsu and Martial Arts.

Whatever intuition I have, wakes up and wakes me up around at the right moment when it's most needed.

I began studying Gita in 1968, when I was 15 years of age. Just to have a preliminary and introductory understanding of what Gita is.

Basically I was just curious and had no idea or opinion what Gita was about and where shall I be, having gone through this book. In a way, I felt about Gita like kind of any other  text-book of a subject that I had to study in and during my student-life.

The very first verse took me by grip and I had to contemplate a lot to comprehend its  meaning and sense.

Because of reasons beyond my knowledge, I have been trained in the way of learning the scriptures in and according to the recitation. (Only later on I realized how fortunate I was to follow this way of practicing the Dharma.)

I thought of and pondered over exactly what the word Dharma in Gita might have meant. But that didn't help me much.

Then I tried to understand the text according to its storyline. That was however easier and interesting also.

The whole chapter 1 narrates the storyline in a nutshell.

Then I had to go slowly. The second chapter is truly the turning point. A road-block and also a block-buster too. 

The genre, the text had in the chapter second was altogether almost quite different from and onwards the third chapter.

As is the way of the intellectual, I felt as if I was caught into an intellectual labyrinth.

Exactly after 25 years, as if chalked out and pre-destined, I could discover and feel, what I could say; the comprehensive, the whole approach and the understanding of this text might be. I felt my understanding was quite appropriate, in line, and suited with the way  Adi Shankaracharya has explained in His commentary in Gita :

श्रीमद्भगवद्गीता भाष्य / Gita Bhashya.

He beautifully relates and connects all the threads in chapter 18.

In between, and during my college days I tried to delve deeper into philosophies and 'ism-s' and the same pushed me into  dark even more, and fortunately I could rescue myself after a short stint there in time.

I already had with me a copy of ;

J. Krishnamurti's 

"Poems and Parables" ,

Which helped me in understanding how :

"Ideals are Brutal Things." is true. 

But the interesting part of all this exercise is, I found out a "pattern" where I could relate all these old / new notions and concepts that often hinder :

The Exploration into the Reality.

Again, while pondering over the words

युयुत्सवः / युयुत्सु -- yuyutsu (ju-jutsu?) and ध्यान -- Zen, by chance, I seriously felt that Japanese Religion, language, culture, tradition are so  greatly influenced by the doctrine of Gita.

Lord Shrikrishna was no doubt the Hero of the text, yet He too had (to play) a role in the war that took place in Kurukshetra.

As an individual person like Arjuna, due to circumstances only, He too was pushed into this war.

He was only the charioteer, not a warrior as such. Still He was the convener indeed. He did not take part in the war, yet everything that had any role in the war, was controlled and ordained by His order and Intelligence.

And there, He was this spontaneity about the war.

While Arjuna was ridden with conflict and was just unable to decide what is his duty or the Dharma, Lord Shrikrishna helped him in removing his doubt and in overcoming the conflict.

So,  in a way Arjuna could be likened to the Samurai that could commit "Hara-kiri"; the ultimate sacrifice done by a warrior while performing his duties.  An honorable and adorable death that takes one to the gates of heaven.

This Hara-kiri is no escape from the war but also an act of the Self-respect, --a ritual too.

So a Samurai does not commit suicide, but observes the duty,  - the Dharma.

In Sanskrit; the words war (युद्ध) and yoga (योग) could be conveniently derived from the root-verb

√युज्- युज्यते,  √युध् - युध्यते..

युज्यस्व 2/38, 2/50,

युध्यस्व, 2/18, 3/30, 11/34,

युयुत्सवः , युयुत्सुम् 1/28, 

योगः कर्मसु कौशलम् ।। 2/50

1/4, 2/38, 2/50,

समर ~ samara in Sanskrit means Battle / War.

May be Samurai is a cognate! 

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Thursday, December 22, 2022

न जायते म्रियते वा कदाचिन्

नायं भूत्वाऽभविता वा न भूयः.. 
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श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 2 का यह श्लोक इस प्रकार से है :
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वाऽभविता वा न भूयः।।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।२०।।
कठोपनिषद् अध्याय १, वल्ली २ में यही श्लोक निम्नलिखित रूप में पाया जाता है:
न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न भभूत कश्चित्।।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।।१८।।
कदाचिन्नायं -- कदाचित् न अयं,
विपश्चिन्नायं -- विपश्चित् न अयं,
'कदाचित्' अर्थात् किसी भी काल में, क्योंकि काल स्वयं जो कि एक ओर जहाँ क्षणजीवी की तरह से अस्तित्वमान और विलीन होता हुआ जान पड़ता है, दूसरी दृष्टि से वही अजन्मा, अजर, अमर, शाश्वत्, गौण नित्य भी है, ऐसा भी समझा जा सकता है। किन्तु काल का यह स्वरूप बुद्धि के सक्रिय हो उठने पर, उसके पश्चात् ही जाना जाता है। दूसरी ओर, यह तर्क कि भी इतना ही महत्वपूर्ण है कि बुद्धि स्वयं भी किसी न किसी काल में ही तो उदित / जाग्रत होकर पुनः पुनः विलीन होती रहती है। वस्तुतः काल और बुद्धि का संपूर्णतः एकमेव युगपत् अस्तित्व है और उनमें किसी भेद का होना संभव नहीं है।
'विपश्चिन्नायं' में विपश्चित् का अर्थ हुआ - वि पश्चित् । पश्च से बने शब्द past, post 'बाद में' के द्योतक हैं। जबकि पहले / बाद में, काल या बुद्धि के सन्दर्भ में ही हो सकते हैं।
विपश्चित् का दूसरा अर्थ है जिस किसी ने भी उस अजर अमर नित्य शाश्वत को जान लिया है, उसके इसे जान लिए जाने के बाद वह अपने आपको जिस प्रकार से समझता है।
कठोपनिषद् से उद्धृत उपरोक्त श्लोक में इसलिए विपश्चित् शब्द सर्वथा उपयुक्त है। इसी प्रकार, श्रीमद्भगवद्गीता से जिस श्लोक को उद्धृत किया गया है, उसमें भी 'कदाचित्' शब्द स्थान और प्रसंग के सर्वथा अनुकूल है।
इसके पूर्व के श्लोकों से भी यह स्पष्ट है :
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युद्धस्व भारत।।१८।।
य एवं वेत्ता हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते।।१९।।

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Saturday, December 3, 2022

अथवा बहुनैतेन

किं ज्ञातेन तवार्जुन ...।।

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Shrimadbhagvad-gita 10/42

अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन।।

विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्।।

This Manifest World and the consciousness,  the one who observes the world is verily The Lord Himself.

What-so-ever that is claimed by the Physicist is supported by the underlying Reality only, that is ever so Immortal, Inherent Timeless and Unique Consciousness only.

This following link given here sums up quite well as is narrated in the stanza 10/42 of the Text 

श्रीमद्भगवद्गीता :





Sunday, November 20, 2022

ज्ञानं विज्ञानसहितं

ज्ञान और विज्ञान 

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अध्याय ९

श्री भगवानुवाच --

इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्नसूयवे।।

ज्ञानं विज्ञानसहितं

यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।।१।।

संसार में और प्रकृति में अर्थात् अपरा प्रकृति में दो ही प्रकार के लक्षणवाली वस्तुएँ तत्व हैं। जड और चेतन। यह अनुभव / ज्ञान जिसे है -- वह तो चेतन है, और उसमें स्वयं अपना संवेदन जिस भी "मैं" भाव, विचार, अथवा भावना के माध्यम से होता है उसे अहंकार, अहं-वृत्ति, अहं-संकल्प, अहं-प्रत्यय आदि कहा जाता है। अहंकार का अस्तित्व भी क्रमशः अव्यक्त और व्यक्त इन दो प्रकारों में एक ही चेतना (consciousnesses) के सुप्त और जाग्रत प्रकार हैं। जब किसी जैव-प्रणाली में चेतना अभिव्यक्त होती है, तो चेतना इन्हीं दोनों रूपों में अप्रकट और प्रकट होती है। एक ऐसी चेतन जैव-प्रणाली में ही अपने स्वयं के चेतन होने का ज्ञान जाग्रत होता है और इस ज्ञान से अपने संसार में कुछ वस्तुओं को वह अपने ही जैसा चेतन, जबकि शेष को अपने से भिन्न प्रकार का अर्थात् अचेतन या जड समझने लगता है। इस प्रकार जीवन सदा और अपरिहार्यतः भी इस ज्ञान का एक और नाम है। किन्तु जीवन उस प्रकृति अर्थात् समस्त जगत् को भी कहा जाता है जिसमें अपने जैसी अनेक जड और चेतन वस्तुएँ भी हैं। इस प्रकार प्रत्येक चेतन वस्तु में अहंकार होता है, जो कि उसे प्रतीत होनेवाली समस्त जड वस्तुओं को जड प्रकृति, और चेतन वस्तुओं को चेतन प्रकृति में विभाजित कर लेता है।

बुद्धि का प्रस्फुटन और फिर विकास होने पर अहंकार-युक्त उस चेतन में भाषा की उत्पत्ति होती है। विभिन्न अनुभवों को स्मृति में क्रमबद्ध करने पर काल / समय का आभास भी इस ज्ञान में गौण / आनुषंगिक रूप से विद्यमान होता है।

यद्यपि वह काल के स्वरूप को नहीं समझ पाता है, फिर भी वह विभिन्न प्रत्यक्ष घटनाओं में काल के किसी स्वाभाविक क्रम की पहचान कर उसे स्मृति से  समायोजित कर लेता है जो कि उसे उसका अपना जीवन परिभाषित करने में और उसे जीने के लिए पर्याप्त सहायक होता है।

भाषा की उत्पत्ति के बाद वह इस प्रणाली को अपनी बुद्धि की सहायता से और भी व्यवस्थित परिष्कृत और क्रमबद्ध कर लेता है। यह ज्ञान है। यह ज्ञान मनुष्य में अन्य जीवों की तुलना में कुछ भिन्न प्रकार से विकसित होता है और वह निरन्तर इसे और भी अधिक परिवर्धित करते हुए कल्पना कर लेता है कि किसी समय वह ज्ञान की पराकाष्ठा पर पहुँचकर किसी ऐसी वस्तु को प्राप्त कर लेगा जिसे वह परम सत्य कहता है।

इस ज्ञान में अन्तर्निहित इसके तीन तत्व वैसे तो ज्ञाता, ज्ञेय तथा उनको परस्पर संबंधित करनेवाली जानकारी हैं, किन्तु सामान्य रूप से "ज्ञान" शब्द को जानकारी के अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है। यह जानकारी जिसे होती है उसे ज्ञाता कहा जाता है। जिस विषय में यह जानकारी होती है उस विषय को ज्ञेय कहा जाता है तथा इस जानकारी को ज्ञान।

प्रकृति में जो असंख्य घटनाएँ घटती हैं, और वे किसकी प्रेरणा से घटित होती हैं इसे जानना ही विज्ञान है। विज्ञान के अन्तर्गत जिन विषयों को जाना जाता है और उनके मध्य कारण-कार्य का क्या संबंध है यह इस मान्यता पर आधारित है कि चूँकि इन असंख्य घटनाओं में एक अत्यन्त सुचारु व्यवस्था है, इसलिए उनके मूल में अवश्य ही कोई प्रखर प्रज्ञा (Intelligence) है।  विज्ञान इसलिए कारण-कार्य के जिन वैश्विक, सार्वत्रिक और सार्वकालिक सिद्धान्तों का आविष्कार करता है, उन्हें निरन्तर ही और आगे बढ़ाया जाना होता है और शायद यह एक अन्तहीन प्रयास है।

यह प्रयास भी, जो कि कर्म ही है, उन्हीं कारणों से प्रारंभ होता है, जिनसे सभी प्रकार के कर्मों का प्रारंभ होता है और जिसके बारे में श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय १८ में इस प्रकार से कहा है :

ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना।।

करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः।।१८।।

इस प्रकार चेतन ज्ञानयुक्त अहंकार में कर्तृत्व का विचार उत्पन्न होता है और तब उसकी बुद्धि में अपने स्वयं के स्वतंत्र कर्ता होने का विचार जन्म लेता है। चूँकि किसी कर्म के संपन्न हो सकने में मूलतः पाँच निमित्त संयुक्तरूप से मिलकर ही उसे पूर्ण करते हैं इसलिए इसी अध्याय १८ के पिछले श्लोक १६ में अपने स्वयं के स्वतंत्र कर्ता होने की बुद्धि को दुर्मति कहा गया है :

तत्रैव सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।।

पश्यत्कृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मति।।१६।।

अतः यह तथाकथित विज्ञान जो कि केवल विषयपरक ज्ञान (objective knowledge / information) के अन्तर्गत ही परम ज्ञान की प्राप्ति करने की आशा रखता है, अध्यात्म के उस विज्ञान से अनभिज्ञ रह जाता है जो कि चेतनता और चेतना के स्वरूप का अन्वेषण करता है।

श्रीमद्भगवद्गीता की शिक्षा इस अर्थ में सरल और विशिष्ट है कि यह मनुष्य की दो प्रकार की स्वाभाविक निष्ठाओं, साङ्ख्य-योग और कर्म-योग की निष्ठाओं के अनुसार मनुष्य के उसके अपने लिए अनुकूल आध्यात्मिक मार्ग को दर्शाती है।

लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।।

ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्।।३।।

(अध्याय ३)

चूँकि इन दोनों निष्ठाओं से प्राप्त होनेवाला फल एक है, इसलिए उनमें परस्पर विरोध भी नहीं है।

सङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः।।

एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्।।४।।

यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते।।

एकः साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति।।५।।

अध्याय ५ से भी यही सिद्ध होता है। 

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Sunday, November 13, 2022

निष्ठा, बुद्धि, आस्था और संकल्प

Consciousness and Perception,

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The Text Shrimadbhagvad-gita begins at the battlefield of Kurukshetra where Arjuna was tormented by the great sadness, conflict and agony of fighting against his own family, his  very own kith and kin.

In the Chapter 2, However Lord Shrikrishna explains to him the essence of :

Intelligence (प्रज्ञा),

Awareness (चैतन्य),

Consciousness (चेतना),

Perception (संवेदन),

Conscience (विवेक),

Conviction (निष्ठा),

Intellect (बुद्धि),

Thought (विचार, संकल्प)

Conditioning (आस्था) 

And finally;

The Action (कर्म),

In that order.

This Great Text is only a part of a Chapter from the Great Epic महाभारत  / Mahabharata, from a section भीष्म-पर्व / Bhishma-Parva.

Of this Bhishma-Parva, the chapters 25 to 42  together are titled Shrimadbhagvad-gita.

All these texts like The Veda वेद, The Purana पुराण Mahabharata इतिहास and Mahabharata is said to have been authored by the Great Sage Maharshi Veda-Vyasa  महर्षि वेदव्यास .

The name Maharshi Veda-Vyasa is again may be a title only of one who is perfectly well-versed in the scriptural / the Supreme knowledge, and may not strictly point out to one single individual.

Again, irrespective of the fact, who-so-ever might have written down this text, it is also said that the Sage Veda-Vyasa narrated the same to him. Likewise, the one who-so-ever might have noted down this in script, is said to have the name (The Lord) Ganesha / गणेश.

These titles do suggest that the author who narrated, and the person, -one who scripted, might be a Sage and a Divine Element in that order.

So even if, the text Gita might have been so narrated by the Great Sage Veda-Vyasa to Lord Ganesha, it was there as a theme in the mind of the Sage which He spontaneously and slowly developed in the style and form of a story.

These ancient people of wisdom knew and understood what they conveyed to the other people around them and the scriptures then were recorded in their memory and in the written form also.

This might be understood the Genesis of this text Shrimadbhagvad-gita.

In the Chapter 2 the theme is the Sankhya Principle (साङ्ख्य- सिद्धान्त) of Wisdom (तत्व) that was the only connecting thread of the whole text, -till the Chapter 18 of this concise and essence development Shrimadbhagvad-gita.

Even more so, there is One typical verse / श्लोक, No. 49 of this Chapter 2, that could be referred to be as the essential theme itself.

This is :

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय।।

बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः।।४९।।

Where it has been declared that the very conviction (निष्ठा) an aspirant may have, is of the two kinds :

Sankhya (साङ्ख्य) and Karma (कर्म) .

This is how aspirants (seeker of the truth)  differ from one to another.

In the next chapters the same point has been dealt with in details.

Shrimadbhagvad-gita is therefore kind of a Declaration made at this battlefield that is otherwise Kurukshetra indeed, where the  battle was Mahabharata was fought between the Princes of Kuruvansha.

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Saturday, November 12, 2022

कुरुक्षेत्र-घोषणा

Kurukshetra-declaration 

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अध्याय २,

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय।।

बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः।।

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रथम अध्याय इस ग्रन्थ की केवल प्रस्तावना मात्र है। भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनविषादयोगः नामक इस अध्याय में अर्जुन के विषाद को जानकर उस विषाद का निवारण करने के लिए अर्जुन को इस ग्रन्थ के द्वितीय अध्याय में साङ्ख्य-योग अर्थात् बुद्धियोग का उपदेश देते हैं क्योंकि कर्म स्वरूप से जड होने से किसी नित्यफल की प्राप्ति का साधन नहीं हो सकता। कर्म स्वयं अनित्य होने से जिस किसी भी फल की प्राप्ति करने के लिए सहायक होता है, वह फल स्वयं भी अनित्य ही होता है इसलिए जिसे परम समाधान को प्राप्त करने की अभिलाषा है, वह उस निष्ठा का आश्रय ग्रहण करता है, जिससे प्रेरित होकर मनुष्य किसी कर्म से संलग्न होता है। किन्तु मनुष्य की बुद्धि को कौन सी निष्ठा प्रेरित कर उसे कर्म करने के लिए प्रवृत्त करती है, इसे बुद्धि से नहीं जाना जा सकता। कर्म परिस्थितियों, इच्छा, आशा और मनुष्य के सामर्थ्य के अनुसार ही संभव हुआ करता है, और कर्म से जो फल प्राप्त होता है वह भी चूँकि अनित्य होता है, इसलिए कर्म की आवश्यकता सदा बनी ही रहती है।

इसलिए भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि बुद्धि और कर्म परस्पर अत्यन्त ही भिन्न प्रकार के तत्त्व हैं, और कर्म का स्वरूप क्या है इसे तो बुद्धि से जाना जा सकता है, किन्तु बुद्धि का तत्व क्या है इसे बुद्धियोग से ही जाना जाता है। कर्म नितान्त जड है, जबकि बुद्धि कर्म की अपेक्षा चेतन है। इसलिए कर्म पर बुद्धि से नियंत्रण किया जाता है, तथा बुद्धि पर विवेक अर्थात् बुद्धियोग से। अध्याय ४ में भगवान् श्रीकृष्ण इसे ही स्पष्ट करते हुए कहते हैं :

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः।।

तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।।१६।।

पुनः अगले ही श्लोक में बुद्धि से कर्म का क्या संबंध है इसे स्पष्ट करते हुए कहते हैं :

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।।

अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः।।१७।।

कर्म क्या है, अकर्म क्या है और विकर्म क्या है, इसे तो बुद्धि से यद्यपि जाना जा सकता है, किन्तु बुद्धिमान तो वह है जो कर्म में प्रच्छन्न अकर्म को, तथा अकर्म में प्रच्छन्न कर्म को देख पाता है, जिसे इसके बाद के निम्न श्लोक में स्पष्ट किया गया है :

कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः।।

स बुद्धिमान मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत।।१८।।

कर्म का दूसरा वर्गीकरण अध्याय १८ में उनके सात्त्विक, राजस और तामस गुणों के आधार पर किया गया है :

नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्।।

अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते।।२३।।

यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः।।

क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्।।२४।।

अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम्।।

मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते।।२५।।

जैसा कि पहले कहा गया, कर्म नितान्त जड है, और किसी भी कर्म के संभव होने हेतु पाँच कारणों का उल्लेख साङ्ख्यशास्त्र अर्थात् वेदान्त शास्त्र में भी किया गया है, फिर भी दुर्मति- युक्त  / दुर्बुद्धि युक्त मनुष्य केवल अपने-आपके ही स्वतंत्र कर्ता होने की मान्यता से ग्रस्त रहता है :

पञ्चेमानि महाबाहो कारणानि निबोध मे।।

साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्।।१३।।

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।।

विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्।।१४।।

शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः।।

न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः।।१५।।

तथा सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।।

पश्यत्कृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः।।१६।।

अपने आपको कर्ता मानने-रूपी यह कर्तृत्व-बुद्धि अर्थात् :

"मैं ही कर्म का एकमात्र कर्ता हूँ",

इस प्रकार की विषम-बुद्धि को कर्ता कहा जाता है। जिस मनुष्य में इस प्रकार की कर्तृत्व-बुद्धि का अभाव होता है, और जिसकी बुद्धि "मैं कर्ता हूँ" इस प्रकार के अहंकार की भावना से लिप्त नहीं होती, यदि वह इन समस्त लोकों को नष्ट भी कर देता है, तो भी, न तो वह किसी को मारता है, न ही इस कर्म से बँधता है :

यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।।

हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते।।१७।।

कर्ममात्र की प्रेरक-बुद्धि के तीन कारक-तत्व -- 

ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना।।

करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः।।१८।।

इस प्रकार कर्म के तत्त्व को बुद्धि से जाना जा सकता है, और तदनुसार कर्म का अनुष्ठान करना ही कर्म-योग है। बुद्धियोग में इस प्रश्न पर ध्यान दिया जाता है कि समस्त ही कर्म जिन मुख्य  पाँच कारणों से होते हैं वे कारण कौन कौन से हैं? जैसा उपरोक्त श्लोक १४ में कहा गया, प्रथम तो है अधिष्ठान अर्थात् चेतना या अस्तित्व का सहज स्वाभाविक भान जो किसी पिण्ड में चेतना की अभिव्यक्ति होने पर ही संभव है। दूसरी ओर यह भी सत्य है कि चेतना की अभिव्यक्ति होने पर ही किसी पिण्ड में अपने एवं अपने से इतर का विभाजन अहं-इदं के रूप में संभव होता है।

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। 

उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः।।१६।।

(अध्याय २)

तात्पर्य यह कि सत् और चित् एकमेव सत्य हैं।

सत् अर्थात् जो है, उसे जाननेवाला भी कोई है, अन्यथा जो है, उसके होने का क्या प्रमाण होगा! इसी प्रकार इस जानने अर्थात् बोध का अस्तित्व भी अवश्य है। यदि इसका अस्तित्व न हो तो सत् के अस्तित्वमान होने का प्रश्न ही नहीं पैदा होगा! 

इसलिए सत् ही चित् अर्थात् सत् का भान या बोध है, और इस भान या बोध का अस्तित्व स्वयंसिद्ध है। 

यही सत्-चित् ब्रह्म है, क्योंकि इसे जाननेवाला इससे भिन्न कोई दूसरा नहीं हो सकता। एकमेवोऽद्वितीयः।

इस एकमेव और अद्वितीय की अपरोक्षानुभूति ही साङ्ख्यज्ञान या साङ्ख्यनिष्ठा है। जबकि कर्म-योग के अभ्यास / अनुष्ठान में मनुष्य स्वयं को कर्म का कर्ता मान्य कर लेता है और उसे इसका आभास भी नहीं होता है कि यह मान्यता स्वयं ही एक बड़ी भूल है। 

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Friday, November 11, 2022

या निशा सर्वभूतानां

अध्याय २,

श्लोक ६९

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मेरे एक अन्य ब्लॉग में प्रकाशित पोस्ट से ---





Wednesday, November 9, 2022

संक्षिप्त गीता

श्रीमद्भगवद्गीता की शिक्षा :--
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भगवान् महर्षि श्री वेदव्यास ने इस ग्रन्थ की रचना करते समय अर्जुन की मनःस्थिति को समझते हुए इस अत्यन्त पावन और रहस्यमय ब्रह्मविद्या का उपदेश उसे उसकी पात्रता के अनुसार प्रदान किया। अर्जुन और भगवान् श्रीकृष्ण के इस सख्य-संवाद के माध्यम से जो उपदेश इस ग्रन्थ में प्रदान किया गया है, उसे ग्रहण करने की पात्रता जिसमें होती है उसके लिए तो यह ग्रन्थ अवश्य ही बारम्बार पठनीय है ही, किन्तु जो मनुष्य कोरा और शुष्क बुद्धिजीवी ही है, वह भी यदि इसका अध्ययन करता है तो उस पर भी अन्ततः प्रभु की कृपा अवश्य ही होगी, और वह इसे ग्रहण कर अपना जीवन धन्य कर सकेगा।
अध्याय २ में साङ्ख्ययोग का उपदेश दिया है, तो इसके बाद के अध्यायों में कर्मयोग का उपदेश दिया गया है। साथ ही मनुष्य में जिन दो भिन्न प्रकारों की निष्ठा स्वाभाविक रूप से होती है, उस विषय में तीसरे अध्याय के प्रारंभ में ही यह स्पष्ट कर दिया गया है कि वे दो निष्ठाएँ कौन सी हैं :
लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।।
ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्।।३।।
दूसरे अध्याय में साङ्ख्य के तत्त्व को स्पष्ट करने के बाद तीसरे अध्याय में उपरोक्त दोनों निष्ठाओं के बारे में कहा गया। अध्याय ४ में यह स्पष्ट किया गया कि कर्मयोग जिसका उपदेश श्रीकृष्ण  परमात्मा ने प्रथम विवस्वान् को प्रदान किया था, वह विवस्वान् से मनु को प्राप्त हुआ और मनु से इक्ष्वाकु को। योग अर्थात् इस  राजयोग को जिसे साङ्ख्य-योग और कर्मयोग दोनों ही निष्ठाओं से राजर्षियों ने प्राप्त किया, वह पुरातन योग जो महान काल के प्रभाव से नष्ट हो गया, उसका ही उपदेश पुनः उन्हीं परमात्मा ने भगवान् श्रीकृष्ण के रूप में अर्जुन को प्रदान किया। अध्याय ५ के प्रारंभ में इसकी ही पुष्टि इस प्रकार से की गई :
साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः।।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्।।४।।
इस प्रकार की इन दोनों निष्ठाओं से युक्त मनुष्य की बुद्धि में भी यह संशय उत्पन्न हो सकता है कि क्या श्रेयस् की प्राप्ति के लिए कर्म को त्याग दिया जाना अर्थात् कर्म-संन्यास आवश्यक है या कर्म करते हुए भी यह संभव है?
इस अध्याय ५ का प्रारंभ इसी प्रश्न से होता है :
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि।। 
यच्छ्रेय एतयोरेकं तुमने ब्रूहि सुनिश्चितम्।।१।।
सन्न्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेसकरावुभौ।।
तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगौ विशिष्यते।।२।।
ज्ञेयः स नित्य सन्न्यासी ये न द्वेष्टि न काङ्क्षति।।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात् प्रमुच्यते।।३।।
साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः।।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्।।४।।
संक्षिप्त गीता को यदि इन श्लोकों में व्यक्त किया जाए तो शायद इस प्रकार से कहा जा सकता है :
अर्जुन उवाच :
कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन।।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन।।४।।
(अध्याय ४)
श्रीभगवान् उवाच :
पञ्चेमानि महाबाहो कारणानि निबोध मे।।
साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्।।१३।।
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा देवं चैवात्र पञ्चमम्।।१४।।
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः।।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः।।१५।।
तत्रैव सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न पश्यति स दुर्मतिः।।१६।।
(अध्याय १८)
अर्जुन के द्वारा पूछा जा रहा प्रश्न, उसकी इस कर्तृत्व-बुद्धि से उत्पन्न हुआ है, जब तक इस प्रकार की कर्तृत्व-बुद्धि मनुष्य में होती है वह कर्तव्यविमूढ़ रहेगा, उसके मन में यह द्वन्द्व बना ही रहेगा कि मैं क्या करूँ, तब तक वह इस संशय और अनिश्चय से ग्रस्त रहेगा ही कि मेरे लिए क्या करना उचित है और क्या करना अनुचित है। अपने आपके स्वतन्त्र कर्ता होने की यह मान्यता ही मौलिक अज्ञान और विभ्रम है। साङ्ख्य अथवा योग के उपाय का आलंबन लेने पर जब उसे यह स्पष्ट हो जाता है कि कर्तृत्व, भोक्तृत्व, ज्ञातृत्व और स्वामित्व (की भावना और यह कल्पना) ही समस्त दुःखों का मूल और एकमात्र कारण है तो उसकी प्रज्ञा स्थिर हो जाती है अर्थात् वह समत्व-योग में स्थित हो जाता है।  

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Wednesday, November 2, 2022

शाङ्करभाष्य से उद्धृत

अध्याय ९,

श्लोक २५, २६, २७,

इस अध्याय के श्लोक २५ को शुद्ध रूप में टाइपसेट करने की सुविधा न होने से उपरोक्त की पिक्चर-फ़ाइल पोस्ट कर रहा हूँ। 

अध्याय १०,

रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्।।

वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्।।२३।।

(श्लोक २३),

अध्याय १७,

त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा।।

सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु।।२।।

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।।

श्रद्धामयोऽयं पुरुषो ये यच्छ्रद्धः स एव सः।।३।।

यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः।।

प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः।।४।।

(श्लोक २, ३, ४, ५),

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