Sunday, April 10, 2022

गीता में ध्यान-योग

साङ्ख्य-निष्ठा और कर्म-निष्ठा

----------------©-----------------

ज्ञान अर्थात् साङ्ख्य-ज्ञान / साङ्ख्य-योग और कर्म-योग यही दो प्रकार की निष्ठाएँ ही श्रीमद्भगवद्गीता ग्रन्थ का प्रधान विषय है। निम्न श्लोक में इसी को सूत्र-रूप में व्यक्त किया गया है :

श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते।।

ध्यानात्कर्मफलस्त्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्।।१२।।

(अध्याय १२)

यहाँ ज्ञान को साङ्ख्य ज्ञान अथवा बौद्धिक ज्ञान, दोनों के अर्थ में सन्दर्भ के अनुसार ग्रहण किया जा सकता है, किन्तु ध्यान का संकेत यहाँ महर्षि पतञ्जलि-कृत योगशास्त्र के सन्दर्भ में लिया जाना, अधिक सार्थक तथा समीचीन होगा। क्योंकि किसी भी ध्यान के अभ्यास में ध्याता (अर्थात् विषयी / subject), ध्येय (अर्थात् विषय / object) और दोनों के एक-दूसरे से संबंधित होने में, ध्यान ( -विषय और विषयी का संयोग / attention) भी एक कारक (factor) तो होता ही है। इसीलिए पतञ्जलि महर्षि ने इस ग्रन्थ के प्रथम अध्याय (समाधिपाद) के प्रारंभ में ही योग को परिभाषित करते हुए :

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।।

का उल्लेख किया है।

तृतीय अध्याय में :

देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ।।१।।

तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्।।२।।

तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः।।३।।

के पश्चात् धारणा, ध्यान तथा समाधि तीनों के एकत्र होने को संयम कहा है :

त्रयमेकत्र संयमः।।४।।

तज्जयात् प्रज्ञालोकः।।५।।

(उपरोक्त सूत्र ५ को श्रीमद्भगवद्गीता के  श्लोकों 2/54, 2/55, 2/56, 2/57, 2/58, और 2/61 के संदर्भ में ग्रहण किया जाना प्रासंगिक होगा।) 

तस्य भूमिषु विनियोगः।।६।।

इस प्रकार की भूमिका के बाद चित्त की वृत्ति पर होनेवाले तीनों प्रकारों के परिणामों - क्रमशः निरोध-परिणाम, समाधि-परिणाम तथा एकाग्रता-परिणाम के चित्त पर होनेवाले प्रभाव को स्पष्ट किया गया है। इन प्रभावों से ही पुनः चित्त के धर्म, लक्षण और अवस्था परिणामों की व्याख्या की गई है :

एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्था परिणामा व्याख्याताः।।१३।।

उपरोक्त विवरण यहाँ इस संबंध में महत्वपूर्ण है कि जब भक्ति (रूपी कर्म) के माध्यम से इष्ट के स्वरूप की मानसिक प्रतिमा पर ध्यान एकाग्र किया जाता है उस समय भी चित्त पर (जानते हुए या अनजाने ही) उक्त परिणाम होते हैं।

पातञ्जल योगसूत्र में साधनपाद में कहा गया है :

दृष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः।।२०।।

इसी दृष्टा का वर्णन समाधिपाद में :

तदा दृष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ।।३।।

के द्वारा किया गया है। 

सैद्धान्तिक विवेचना की दृष्टि से यह सब उपयोगी है, किन्तु यह फल तो अभ्यास से ही सिद्ध होता है, केवल कठिन और दुरूह शब्दावलि से परिचित होने मात्र से नहीं।

***


Saturday, April 9, 2022

कर्म-मार्ग और ज्ञान-मार्ग

अभ्यास-योग

---------©---------

वैसे तो इन दो प्रकार की निष्ठाओं के अनुसार मनुष्य ज्ञान-मार्ग और कर्म-मार्ग में से किसी एक का ही अधिकारी हो सकता है, किन्तु कोई बिरला ही इस बारे में जागरूक होता है। यह जानने से पहले प्रायः सभी मनुष्य संसार में निरंतर सुख पाते रहना एवं कष्टों से बचते रहना ही चाहते हैं। जब तक मनुष्य यह नहीं देख पाता कि सुख और दुःख परिस्थितियों और समय के साथ साथ अपना रंग-रूप बदलते रहते हैं तब तक मनुष्य सदैव सुखी रहने और दुःख से बचे रहने की लालसा से ग्रस्त रहता है। किन्तु जब उसे दुःख से बचने का कोई रास्ता दिखाई देना बन्द हो जाता है, तब वह या तो किसी भगवान, ईश्वर, देवता आदि की शरण लेता है, या संसार तब उसे सतत बदलते दिखाई देनेवाले दुःख का ही दूसरा नाम प्रतीत होता है। इस स्थिति में भी भगवान, ईश्वर या देवता कौन / क्या है, यद्यपि इसकी भी उसे कल्पना, ज्ञान और इसका कोई महत्व तक नहीं होता, फिर भी वह केवल आशा-अपेक्षा और संभावना की दृष्टि से वह ऐसे किसी इष्ट में विश्वास करना चाहता है, -न कि उसे ऐसा कोई विश्वास वस्तुतः होता है, किन्तु  फिर भी ऐसे विश्वास से उसे मनोवैज्ञानिक रूप से कुछ सान्त्वना मिलती हुई भी प्रतीत हो सकती है। या फिर आसपास के दूसरों लोगों के संपर्क से भी वह ऐसी किसी आस्था को जाने या अनजाने ग्रहण कर लेता है, जो कि उसकी एक धारणा ही होती है, न कि यथार्थ वस्तुस्थिति। 

फिर भी दोनों ही स्थितियों में उसे संसार से भय लगने लगता है, या वैराग्य ही हो जाता है। यह वैराग्य उस विराग से बहुत अलग प्रकार का होता है, जिसमें मन एक विषय से ऊब जाने से किसी दूसरे विषय की ओर आकर्षित होने लगता है।

तब मनुष्य यद्यपि नित्य सुख और अनित्य सुख के भेद को तो समझ लेता है, किन्तु फिर भी उसे यह स्पष्ट नहीं हो पाता है कि नित्य और अनित्य जिसे कहा जाता है, वह (तत्व) वस्तुतः क्या है?

इस प्रकार परिपक्व मन, बुद्धि वाला, धैर्यशील तथा वैराग्य-युक्त कोई बिरला ही उस नित्य तत्व की खोज में प्रवृत्त होता है और उसे ठीक ठीक जानकर आत्मा, ब्रह्म, ईश्वर, चेतन, चैतन्य-मात्र,  चेतना, भान, बोध या निजता आदि का नाम देता है। या यह भी संभव है कि तब वह उसे कोई नाम ही न दे, और मौन रहते हुए वाणी का प्रयोग केवल व्यावहारिक रूप से बहुत आवश्यक होने पर ही करे।

किसी भी स्थिति में मनुष्य को प्रारंभ में कोई न कोई अभ्यास तो करना ही होता है :

श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते।। 

ध्यानात्कर्मफलस्त्यागस्त्याच्छान्तिरनन्तरम्।।१२।।

(अध्याय१२)

यहाँ 'ज्ञान' का तात्पर्य केवल सापेक्ष, बौद्धिक, या साङ्ख्य-ज्ञान (निरपेक्ष) के अर्थ में भी ग्रहण किया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि ध्यान के अभ्यास में ध्याता, ध्येय और ध्यान की गतिविधि रूपी त्रिपुटी होती है, किन्तु निरपेक्ष अर्थात् साङ्ख्य ज्ञान में इस त्रिपुटी का विलय हो जाता है। 

***



 

Friday, April 8, 2022

सफलता के मंत्र-मूल

सफलता / असफलता

------------©-------------

श्रीमद्भगवद्गीता ग्रंथ का प्रारंभ अर्जुन की विषण्ण मनःस्थिति से होता है, और प्रथम अध्याय का आरंभ :

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।। 

मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय।।१।।

इस श्लोक से। 

यह इसी का द्योतक है कि शरीर, मन, बुद्धि रूपी धर्मों के क्षेत्र में पृथक् पृथक् किन्तु व्यवहार रूपी कर्म / आचरण के क्षेत्र में एक दूसरे से भिन्न भिन्न, फिर भी एक साथ विद्यमान कुरुवंश के उन  वंशजों ने क्या किया। क्योंकि शरीर, मन, बुद्धि एवं चेतना सभी अपने अपने विशिष्ट धर्मों को त्याग नहीं सकते जबकि कर्म एक ऐसी वस्तु है जो घटना के रूप में काल-स्थान के अन्तर्गत घटित होनेवाला तथ्य है, किन्तु भिन्न भिन्न शरीरों में अवस्थित विभिन्न मनुष्य उसे भिन्न भिन्न प्रकार से परिभाषित और ग्रहण करते हैं।  इस प्रकार धर्म एक काल-स्थान निरपेक्ष सत्य है, जबकि कर्म एक निष्कर्ष है जो धारणा / धृति के रूप में मनुष्य के स्वभाव की आधारभूत वास्तविकता।

यह स्वभाव गुण-कर्म का संयोग है और यही चार मूल वर्णों का कारण है। उल्लेखनीय है कि ये चार वर्ण यद्यपि जन्म के अर्थ में जातिवाचक हैं किन्तु सामाजिक भेद की उस भावना के अर्थ में मनुष्यों का वर्गीकरण नहीं करते जैसा कि जाति शब्द से समझा जाता है। जाति पुनः मूल वर्ण का लक्षण हो सकता है, या फिर इन गुण-कर्मों के विभिन्न अनुपात में संयुक्त होने का परिणाम भी हो सकता है। इसलिए कोई भी मनुष्य जो किसी भी जाति में क्यों न पैदा हुआ हो, अपने स्वभाव / गुण-कर्म के अनुसार ही किसी कार्य को करने में प्रवृत्त होता है, प्रवृति ही से प्राप्त उसके संस्कारों से उसमें किसी कार्य को करने के लिए इच्छा-अनिच्छा, रुचि-अरुचि, संकल्प-विकल्प आदि उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार से उसमें कर्म करने की भावना का उद्भव होता है और तब उसमें अज्ञान और प्रमादवश अपने आपके एक स्वतंत्र कर्ता, भोक्ता, ज्ञाता और स्वामी होने की भावना के रूप में अहंवृत्ति का जन्म होता है। चेतना (consciousness) की अपनी भूमिका इस पूरे क्रम में केवल उस अविकारी (immutable) आधारभूत अधिष्ठान (underlying principle) की होती है जो प्रवृत्ति के कार्य में कोई हस्तक्षेप नहीं करती । किन्तु प्रवृत्ति से संलग्न अज्ञान और प्रमाद ही इस स्वतंत्र प्रतीत होनेवाले कर्ता, भोक्ता, ज्ञाता एवं स्वामी में ही अपने आपके स्वयं के एक स्वतंत्र व्यक्ति होने का आभास पैदा करते हैं। यहीं से कर्म की अवधारणा पैदा होती है, जो बुद्धि को आवरित कर लेती है। 

ऐसे स्वतंत्र कर्ता और प्रतीत होने वाले कर्म की अवधारणा की सत्यता की परीक्षा करने पर स्पष्ट हो जाता है कि केवल चेतना ही अस्तित्वमान एकमात्र वास्तविकता है। 

यह हुई साङ्ख्य अर्थात् ज्ञाननिष्ठा जिसका वर्णन अध्याय २ के अन्तर्गत किया गया है।

जब मनुष्य इस प्रकार की परीक्षा करने में असमर्थ होता है, तो उसमें किंकर्तव्यविमूढता की भावना उत्पन्न होती है, और वह यह भी नहीं देख पाता, कि क्या वास्तव में वह कर्म करने या न करने के लिए स्वतंत्र है भी या नहीं?

किन्तु इस स्थिति में भी उसमें कर्म किए जाने की आवश्यकता का आग्रह तो होता ही है। इसे ही कर्मयोग अर्थात् ज्ञाननिष्ठा भी कहा जाता है। चूँकि दोनों ही प्रकार की निष्ठा से अंततः एक ही फल प्राप्त होता है, इसलिए अध्यात्म के तत्व के जिज्ञासु मनुष्य को चाहिए, कि पहले अपने में विद्यमान स्वाभाविक निष्ठा इनमें से कौन सी है इसे ठीक ठीक समझ ले। 

***

Friday, April 1, 2022

यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य

...निबन्धायासुरी मता।। 

--

पुरुषोत्तमयोग नामक अध्याय १५ का उपसंहार निम्न दो श्लोकों से किया गया है :

यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।। 

स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत।।१९।।

इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ।।

एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत।।२०।।

--

संसारमोक्षाय दैवी प्रकृतिः --

अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।।

दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यास्तपमार्जवम्।।१।।

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।।

दयाभूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्।।२।।

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।।

भवन्ति सम्पदं दैवमभिजातस्य भारत।।३।।

--

निबन्धायासुरी च राक्षसी --

दम्भो दर्पोऽतिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।।

अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्।।४।।

दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।।

मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव।।५।।

--

द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च।। 

दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु।।६।।

(अध्याय १६)

किसी भी मनुष्य को अपनी दैवी प्रकृति और आसुरी प्रकृति के अनुसार ही क्रमशः दैवी और आसुरी सम्पदाएँ प्राप्त होती हैं।

इसी प्रकार दैवी प्रकृति से संपन्न ही किसी मनुष्य की निष्ठा भी दो प्रकारों में से किसी एक ही प्रकार की होती है।

लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।।

ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्।।३।।

(अध्याय ३)

इसलिए यद्यपि तप, दान, ज्ञान, यज्ञ आदि विभिन्न कर्म क्रमशः सात्त्विक, राजस या तामस होने पर भी, अपनी अपनी दैवी या आसुरी संपदाओं और निष्ठा के अनुसार ही फल प्रदान करते हैं। एक ही मनुष्य में स्वभाव अर्थात् प्रकृति से ही ज्ञाननिष्ठा अर्थात् साङ्ख्य की ज्ञान-रूपी सहजनिष्ठा अथवा कर्मनिष्ठा -- निष्काम कर्म, भक्ति, ईश्वर-प्रणिधान आदि में से प्रधान रूप से एक ही निष्ठा विद्यमान होती है।

अपनी निष्ठा और अधिकार के अनुसार कोई भी मनुष्य निष्काम कर्मयोग अथवा साङ्ख्य-ज्ञान का अवलंबन लेकर परम श्रेयस् की प्राप्ति कर सकता है।

जिनमें ज्ञाननिष्ठा प्रधान और कर्मनिष्ठा गौण होती है, परमार्थ के ऐसे जिज्ञासुओं की बुद्धि तो ईश्वर, ब्रह्म, तत्त्व,धर्म, सत्य अथवा आत्मा को जानने की प्रवृत्ति से प्रेरित होती है, परन्तु जिनमें यह संकल्प विद्यमान होता है कि मैं कर्ता, भोक्ता, स्वामी और ज्ञाता आदि के रूप में जन्म और मृत्यु के चक्र में फँसा हुआ जीव हूँ, वे भी अनुमान से भी उस परमेश्वर की कल्पना कर सकते हैं जो इस समस्त जगत् का संचालन करता है, और उस कल्पित ईश्वर के स्वरूप का आश्रय लेकर अंततः उसके यथार्थ स्वरूप को भी जानकर उससे तादात्म्य रूपी सायुज्य, सामीप्य, सान्निध्य तथा सारूप्य प्राप्त कर सकते हैं। जिन्हें यह अभ्यास भी कठिन जान पड़ता है, उनके लिए गीता से यह निर्देश प्राप्त होता है :

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।।

मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि।।१०।।

अथैतदप्यशक्त्योऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः।।

सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्।।११।।

क्योंकि --

श्रेयो हि ज्ञानं अभ्यासात्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते।।

ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्।।१२।।

(अध्याय १२)

***

--



Thursday, March 24, 2022

I just don't know ...

About :

--

I just don't know,

Who is / are viewing this blog,

For whatsoever reasons.

But I would sure like to thank them all.

Obeisance :

At the Holy feet of Lord Sri-Krishna, who dwells in the heart of all and everyone! 

Regards!

May Krishna shower His Blessings / grace upon all who go through / study / worship / adore / follow this great text.

***

श्री भगवानुवाच :

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।। 

भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।।६१।।

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।। 

तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।।६२।।

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।। 

विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु।।६३।।

सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः।। 

इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ।।६४।।

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।। 

मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे।।६५।।

सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।। 

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।६६।।

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन।।

न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति।।६७।।

य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।। 

भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः।।६८।।

न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः।।

भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि।।६९।।

अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः।। 

ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः।।७०।।

श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः।। 

सोऽपि मुक्तः शुभान्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्।।७१।।

कच्चितैच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा।।

कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय।।७२।।

अर्जुन उवाच :

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।।

स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव।।७३।।

सञ्जय उवाच :

इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः।। 

संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्।।७४।।

व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्।। 

योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्।।७५।।

राजन्स्मृसंत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्।। 

केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः।।७६।।

तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः।। 

विस्मयो मे महान्-राजन्-हृष्यामि च पुनः पुनः।।७७।।

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।। 

तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।।७८।।

***

समाप्तमिदं गीताशास्त्रम् ।।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 

।।श्रीकृष्णार्पणमस्तु।।

***





 





Wednesday, February 16, 2022

3 "I".

Incision into :

------------©-----------

The Inclination,

The Involvement, and

The Indulgence.

Gita chapter 1 is about the foreground what Maharshi VEDAVYASA turned into a greatest classic of all times.

This chapter 1 narrates about the situation in the battlefield where the Great war took place. And it was but natural that Arjuna was overwhelmed by self-pity and could not see what the war meant and was of worth.

So far, so good.

Sri-Krishna explained to him the essentials of Sankhya angle in the next chapter 2.

Arjuna was unable to grasp this teaching of the Sankhya Darshana so a dialogue started between the two. 

From the chapter 2 onwards till the end, that is the chapter 18, throughout this whole text of Gita, Sri-Krisna deals with Yoga aspect of the Karma-Darshana, on the (pretext of the) assumption that this may help Arjuna to take a decision with confidence.

In a way Sri-Krishna performed the role of a motivational speaker / Guru only. 

But the crux / the climax of this text comes and is to be seen in the chapter 18, where Sri-Krishna, - though well aware that Karma (deed), JnAna (knowledge) and the Karta (the notion of 'some-one' who is supposed to execute / perform the deed) are hypothetical, appear and disappear in thought only and as such they have no intrinsic truth whatever, assumes them as to be true for helping and convincing Arjuna.

Though Arjuna is quite unaware of this fact, he listens to Sri-Krishna with all due respect, care, and attention and follows his words.

Sri-Krishna further elaborates His point and takes it for granted, that not only the Karma (deed), but also the Karta (the one who is supposed to execute / perform a deed) along-with the JnAna (knowledge) are as much real and true, the result of the deed / action, -the  (Karma-phala) -is real.

That is how Sri-Krishna then classifies and categorizes the three hypothetical ideas / notions, namely the Karta, the Karma, and the JnAna, accordingly in terms of the three kinds of  satvika, rajasika and tamasika tendencies respectively.

satvika, rajasika and tamasika are the kinds of tendencies of mind that could be treated again as the synonyms of

The Inclination,

The Involvement, and

The Indulgence.

Accordingly the Karta, the Karma and the JnAna are also described in terms of these three tendencies, which are basically the 3 constituents of Maya only.

In conclusion, the whole text of Gita deals with beautifully and fits perfectly well with the way one would approach the Reality.

***

This Reminds me of -

(Thus spake Sri Nisargadatta Maharaj:)

"If you know what you teach, you can teach what you know".

***

Sunday, February 13, 2022

नासतो विद्यते भावो

श्रीमद्भगवद्गीता :

--

अध्याय २,

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।।

उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ।।१६।।

अविनाशी तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।।

विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ।।१७।।

अध्याय ४,

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।।

उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ।।३४।।

--

भगवान् श्री रमण महर्षि कृत सद्दर्शनम् :

सत्प्रत्ययाः किन्नु विहाय सन्तं ।

हद्येष चिन्तारहितं हृदाख्यः ।।

कथं स्मरामस्तममेयमेकम् ।

तस्य स्मृतिस्तत्र दृढैव निष्ठा ।।१।।

--

प्रस्तुत प्रविष्टि (पोस्ट) के प्रारंभ के ३ श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता से उद्धृत किए गए हैं किन्तु यहाँ इसका उद्दिष्ट प्रयोजन, श्री रमण महर्षि-कृत सद्दर्शनम् नामक ग्रन्थ के प्रारंभ में उल्लिखित :

"सत्प्रत्ययाः"

पद की विवेचना करना है।

जिस सत् (Reality) पद को अहम्, निज, सत्य, ब्रह्म, आत्मा, अव्यय, अविनाशी, ईश्वर, इत्यादि पदों के द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है वह वाणी का विषय नहीं होने से उसका वर्णन करना  बहुत कठिन है। 

अतः उसके बारे में जानने और कहने के लिए एकमात्र उपलब्ध और संभव उपाय यही है, कि उस 'सत्' नामक तत्त्व के द्योतक उसके चिह्नों और लक्षणों, उसके अर्थात् उसे इंगित करने वाले उन संकेतों के माध्यम से ही उसकी प्राप्ति के लिए प्रयास किया जाए। 

उसके ऐसे कौन से चिह्न, लक्षण, द्योतक संकेत हैं, जिनके द्वारा  शास्त्रों में उसे इंगित किया गया है, और जिन्हें सामान्य बुद्धि से युक्त मनुष्य भी सफलतापूर्वक ग्रहण कर अन्ततः हृदयङ्गम कर सकता है?

अथर्वशीर्ष ऐसा ही एक उपक्रम है जिसका पाठ, अध्ययन कर अल्पबुद्धियुक्त ऐसा मनुष्य जिसका चित्त निर्मल, मन परिपक्व और विवेक जागृत हो, उस तत्त्व का साक्षात्कार कर सकता है। अथर्वशीर्ष उस परमात्मा के ऐसे चिह्नों या संकेतों के माध्यम से उसकी उपासना और स्तवन करने का अनुष्ठान है ।

संक्षेप में :

त्वं, अहम् तथा तत् (एवं यह) इन तीन सर्वनामों के माध्यम से उसे ही क्रमशः गणपति, रुद्र, देवी, नारायण तथा सूर्य आदि की संज्ञा देकर उसके ही स्वरूप का वर्णन श्री गणपति-अथर्वशीर्ष, शिव-अथर्वशीर्ष, श्री देवी-अथर्वशीर्ष, नारायण-अथर्वशीर्ष तथा सूर्य-अथर्वशीर्ष के रूप में किया गया है ।

***



 

Wednesday, February 2, 2022

मनश्चञ्चलमस्थिरम् ...

गीता अध्याय ६
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम् ।।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ।।२६।।
--
(Gita 6/26)
Latent and Blatant :
Exactly, "Who" is there that is supposed to go through this exercise?
Is there another mind that is supposed to bring back home (home is where the heart is!) this wandering mind to its home / heart?
Here, may be the heart the same that has been pointed out in the following verses 4/42 and 61/18 of the chapter 4 and 18 respectively?  :
तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः।।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ।।४२।।
and, 
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।।
भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ।।६१।।
This way for the time being, let us consider the two salient modes of mind. 
One is the superficial mind that is restless and keeps moving from one to another object.
There is yet another underlying deeper mind that is silent, taciturn, reticent, sitting at the core of the heart.
Though this division of mind into the superficial and the deeper too helps to some extent, the prime factor that governs the whole of this mind is the "attention" only that is the ever-existing fact within the grasp of all of us.
Still, the attention could be further viewed as the one and the same thing that has 3 components inseparable to one-another. This 3 components or the aspects of the "attention" could be again termed as the sense of being as the "I AM", the consciousness (knowing) and the intellect --the tendency of the mind.
The three aspects could be understood in the form of the Rudra-principle, the DevI-principle, and the gaNesha-principle as well.
Bringing back the wandering mind to its natural abode,  - the heart, could be done when these 3 principles are seen as the three marks of Reality that could be at once grasped by means of any or all of them together.
This is how one could 'meditate' and discover by reciting pATha of the three Atharva SheerShaM, namely :
The gaNesha Atharva SheerShaM, 
The Shiva Atharva SheerShaM, and the
Devi Atharva SheerShaM.
In the very process of reciting the pATha or the stotram one gradually discovers the mechanism of the mind at the two levels referred to above.

***
 


Tuesday, January 18, 2022

In First Person.

पुरुषोत्तम योग 

---------©----------

(पुरुषसूक्त नामक यह स्तवन - ऋग्वेद् -मण्डल १० वें के सूक्त ९०, शुक्ल यजुर्वेद -अध्याय ३१ / १-१६, तथा अथर्ववेद -१९ वें काण्ड के छठे सूक्त, तैत्तिरीय संहिता, और तैत्तिरीय आरण्यक आदि में भी पाठान्तर सहित प्राप्त होता है। यहाँ पर गीताप्रेस, गोरखपुर के पुस्तक क्रमांक 1800, पञ्चदेव अथर्वशीर्ष संग्रह नामक ग्रन्थ से प्राप्त 'पुरुषसूक्त' से उद्धृत किया जा रहा है।)

--

ॐ सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।।

स भूमिं सर्वत स्पृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ।।१।।

पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम् ।।

उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ।।२।।

एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः ।।

पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ।।३।।

त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत् पुनः ।।

ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनाशने अभि ।।४।।

ततो विराडजायत विराजो अधि पूरुषः ।।

स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः ।।५।।

तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम् ।।

पशूँस्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये ।।६।।

तस्मात्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे ।।

छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ।।७।।

तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः ।।

गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः ।।८।।

तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः ।।

तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये ।।९।।

यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन् ।।

मुखं किमस्यासीत् किं बाहू किमूरू पादा उच्येते ।।१०।।

ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः ।।

ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत ।।११।।

चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत ।।

श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत ।।१२।।

नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णौ द्यौः समवर्तत ।।

पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन् ।।१३।।

यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत ।।

वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः ।।१४।।

सप्तस्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः ।।

देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम् ।।१५।।

यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ।।

ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्या सन्ति देवाः ।।१६।।

***

सन्दर्भ :

(१) मृत्युञ्जयमन्त्र :

त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धि पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्यो र्मुक्षीय माऽमृतात् ।।

(२) महामृत्युञ्जयमन्त्र :

ओं हौं जूं सः ओं भूर्भुवः स्वः ओं त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्यो र्मुक्षीय मामृतात् ।। ॐ स्वः भुवः भूः ओं यः सः जूं हौं ओं ।।

कृपया उपरोक्त मन्त्रों के शुद्ध रूप की पुष्टि किसी विद्वान से अवश्य करें। क्योंकि यहाँ केवल जानकारी के उद्देश्य से इसे प्रस्तुत किया जा रहा है। 

(३) श्वेताश्वतरोपनिषद्  -- अध्याय ३,

सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् ।।

स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ।।१४।।

(४) दशाङ्गुलम् :

नाभि ही भूमि है। नाभि से दश अङ्गुल ऊपर हृदय है। यही उस परमात्मा का निज धाम है जिसके संबंध में कहा गया है :

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।।

अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ।।२०।।

(अध्याय १०)

इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्चाद्राज्ये सचराचरम् ।।

मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्दृष्टुमिच्छसि  ।।७।।

(अध्याय ११)

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति  ।।

भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया  ।।६१।।

(अध्याय १८)

***


 












Wednesday, January 12, 2022

गीता : शिक्षा का प्रयोजन

गीता : प्रयोजन की शिक्षा

--------------©--------------


भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उपदेश देते हुए कहा :

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।।

विवस्वान मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ।।१।।

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।।

स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ।।२।।

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।।

भक्तो मेऽसि सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ।।३।।

(ज्ञान-कर्म-सन्न्यास-योग, अध्याय ४)

इससे पूर्व अध्याय ३ में भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म-योग की शिक्षा दी थी । इसी अध्याय के अन्तर्गत भगवान् श्रीकृष्ण ने मनुष्य में विद्यमान उस स्वाभाविक निष्ठा का वर्णन किया, जिसे साङ्ख्य-योग के सन्दर्भ में ज्ञान तथा कर्म-योग के सन्दर्भ में कर्म कहा जाता है।

लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ  ।।

ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ।।३।।

और इससे भी पहले अध्याय २ में अर्जुन को साङ्ख्य-योग की शिक्षा दी थी।

इस प्रकार से, शिक्षा का प्रयोजन अपने भीतर उस मौलिक निष्ठा की पहचान कर लेना है, जिसके आधार पर अपने मार्ग को जान लिया जाता है।

किन्तु उस प्रयोजन की शिक्षा का प्राप्त हो जाना भी उतना ही महत्वपूर्ण और आवश्यक है। 

इसी ओर संकेत करते हुए अगले अध्याय ५ में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं :

साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।।

एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ।।४।।

यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते ।।

एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ।।५।।

***