Thursday, February 18, 2010

जिज्ञासु और मुमुक्षु /4

~~~~~~~~~ जिज्ञासु और मुमुक्षु /4~~~~~~~~
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सामान्य मनुष्य जिज्ञासु तो अवश्य होता है, किन्तु उसकी जिज्ञासा प्राय: उन्हीं बातों के विषय में होती है, जो उसके 'सुख' को अधिकतम और दु: को न्यूनतम करने की दृष्टि से उसे उपयोगी जान पड़ते होंकिन्तु जीवन उसे सिखाता है कि सुख सदा टिकता नहीं, और यदि सुख-प्राप्ति हो भी जाए, तो उससे भी मनुष्य ऊब जाता हैहालाँकि कुछ मनुष्यों का विचार यह भी हो सकता है कि जीवन में भोगों को भोगते रहा जाए, 'ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत' उनकाआदर्श वाक्य होता हैस्पष्ट है कि इस परिवर्त्तनशील जगत में कुछ भी स्थिर नहीं है, और उनकी बुद्धि भी कभी कभी उन्हें धोखा दे देती हैमनुष्य की स्मृति सदैव स्थिर नहीं रहती, क्योंकि वह बाहर से आई 'जानकारी' कासंग्रह-मात्र है, और पल-पल बदलती रहती है, इसलिए कोई भी श्रेष्ठ से श्रेष्ठ आदर्श या ध्येय हो, मनुष्य उसे सदैव स्मरण तक नहीं रख सकतायदि मनुष्य किसी बात पर सदैव अपना ध्यान बनाए रख सकता है, तो वह है, : 'अपने चेतन होने का' सरल सा तथ्य
एक 'जीव' होने का तात्पर्य है, 'सचेतन होना' । इस 'सचेतनता' के ही अंतर्गत समस्त 'ज्ञात' अवस्थित हैऔर 'सचेतनता' को शारीरिक स्तर तक ही सीमित समझें, तो वह तो पशुओं और वनस्पतियों में भी होती ही हैकिन्तु 'चेतना' या 'चेतनता', या 'संवेदन-क्षमता' एक स्वयंसिद्ध तथ्य है, और 'अपने होने' का सीधा तात्पर्य है 'सचेतन होना' । हम 'सचेत' हों या न हों, 'सचेतन' तो सदा ही और अवश्य ही होते हैं . हो सकता है कि 'दूसरों' की दृष्टि में हम कभी 'अचेत' भी नज़र आये हों, किन्तु वे दूसरे तो हमें हमारी 'सचेतनता' के ही होने पर दृष्टिगत हो सकते हैं । किन्तु इस सहज स्वाभाविक 'सचेतनता' पर जानकारी का आरोपण हो जाता है, तो हम 'अपने' को परिभाषित कर लेते हैं, हम किसी नाम-रूप को 'अपनी पहचान' की भाँति 'ओढ़' लेते हैं, और हमारी बुद्धि निरंतर उस 'पहचान' की स्मृति को सुदृढ़ बनाने का प्रयास करती रहती हैसंक्षेप में हम अपने आप को एक 'व्यक्ति-विशेष' समझने लगते हैं, जो 'सापेक्ष-ज्ञान' की दृष्टि से उपयोगी और व्यावहारिक तल पर आवश्यक भी है, किन्तु वह निरपेक्ष या परम सत्य नहीं हैउस बारे में विस्तार से लिखा जाना है, किन्तु उसके लिए अभी उचित समय नहीं है
अभी तो प्रश्न यह है, कि क्या इस परिवर्त्तनशील अस्तित्त्व में कोई 'नित्य' तत्त्व है भी ? क्योंकि यदि ऐसा कोई नित्य तत्त्व है ही नहीं, तो इस सबका क्या प्रयोजन ? फिर तो 'सुख' भी नित्य कैसे होगा ? किन्तु हमारे मन में 'सुख' की प्राप्ति की इच्छा के बारे में देखें तो इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि वह बाकी सारी परिवर्त्तनशील वस्तुओं के बीच भी यथावत स्थिर और शायद नित्य भी हैक्या इससे यह अनुमान करना, कि 'सुख' हमारा स्वाभाविक स्वरूप है, गलत होगा ? 'सुख' के विषय और प्रकार भले ही परिवर्त्तित होते रहें, एक ही सुख कुछ समय बाद भले ही दु: प्रतीत होने लगे, किन्तु 'सुख' की ओर आकर्षित रहने की हमारी प्रवृत्ति तो सदैव एक सी बनी रहती हैतात्पर्य यही हुआ कि हम 'नित्य-सुख' की प्राप्ति चाहते हैं, किन्तु हमारी बुद्धि जिन विषयों में सुख अनुभव करती है, वे तात्कालिक रूप से किसी शारीरिक आवश्यकता के पूर्ण होने से, या कष्ट से हमारा ध्यान हट जाने के फलस्वरूप 'मिलते-हुए' से लगते हों, वास्तव में 'सुख' होकर हमारा दृष्टि-भ्रम ही होते हैंफिर 'नित्य-सुख' का स्वरूप क्या है ? यदि यह प्रश्न हमारे मन में उठता है, तो हम अपेक्षतया 'श्रेष्ठ' जिज्ञासु हो जाते हैं
अब हम समझ सकते हैं कि इस प्रकार की परिपक्वता मन में जाने पर हम इस परिवर्त्तनशील जगत को 'दुखमय' की तरह देखने लगते हैं । गीता (अध्याय ८, श्लोक १५) के शब्दों में, :
"मामुपेत्य पुनर्जन्म दु:खालयं-अशाश्वतं ।
नाप्नुवन्ति महात्मान: संसिद्धिं परमां गता: ॥
किन्तु अभी जैसा हमारा जीवन का 'अनुभव' और समझ है, उस जीवन को जीने और जीवन-यापन के लिए हमें कर्म तो फिर भी करना ही होगा, ऐसा हमें लगता हैक्योंकि कर्म से तो हम भाग ही नहीं सकते
जब हम कुछ और परिपक्व होते हैं, तो हमें समझ में आने लगता है कि कर्म हमारे मन पर एक 'संस्कार' डाल देता है, और उस कर्म से मिलनेवाला सुख या दु: हमारे मन में उस कर्म के प्रति अंतर्द्वंद्व पैदा कर देता हैइसलिए हम तब 'कर्म' के 'स्वरूप' की जिज्ञासा में प्रवृत्त हो उठते हैं । अर्थात्, कर्म के स्वरूप की जिज्ञासा हममें जागृत होने लगती है । क्योंकि कर्म ही हममें 'संस्कार' के माध्यम से सदैव बन्धनग्रस्त रखता है
यदि हममें यह जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि इस कर्म-संस्कार-कर्म के चक्र से, इस 'दुश्चक्र' से कैसे मुक्त हों, तो हम 'मुमुक्षु' कहलाने के पात्र होते हैंकिन्तु यह सब केवल वैचारिक चिंतन मात्र से ही नहीं हो जाता, क्योंकि अतीत के जाने कितने 'संस्कारों' का संवेग (potential) हमारे उस प्रकार के चिंतन में व्यवधान डालता रहता हैइसलिए बात पुन 'सचेतनता' या अभ्यास पर आती है
'अभ्यास' मन के ही स्तर पर होता है, और वह भी कर्म का ही एक रूप हैअभ्यास करने का तात्पर्य है, ऐसा कर्म, जो पूर्वकृत कर्म से उत्पन्न संस्कार का क्षय करेचित्त-शुद्धि के लिए ऐसे अभ्यास का यही फल है, कि तब मन सुग्राह्य और बुद्धि एकाग्र, स्थिर, और निर्दोष हो जाती है । 'पात्रता' के लिए बुद्धि में दो और आवश्यकताएँ होती है, उसका अंतर्मुख होना, तथा 'सूक्ष्म' होना . यदि अभी हमारी बुद्धि में ये पाँच विशेषताएँ नहीं हैं, तो हम अपनी जिज्ञासा में आगे नहीं बढ़ सकते
सांख्य या योग दर्शन में 'ईश्वर-तत्त्व' पर कोई आग्रह नहीं हैयोग-दर्शन में "ईश्वरप्रणिधानाद्वा'' (प्रथम अध्याय, सूत्र २३) के अंतर्गत ईश्वर के प्रति समर्पित बुद्धि को एक विकल्प की तरह प्रस्तुत किया गया हैअन्य दर्शनों की ही तरह ये दोनों दर्शन भी किसी तरह के मत को 'आरोपित' नहीं करतेकिन्तु गीता में जहाँ जहाँ 'ईश्वर' शब्दप्रयुक्त है, वहाँ उस शब्द से क्या आशय है, यह समझना भी ज़रूरी होगाईश्वर के स्वरूप पर विचार करने से हमें स्पष्ट हो जाएगा कि ईश्वर के प्रति निष्ठा का क्या अर्थ है, और हममें वैसी निष्ठा वास्तव में है या नहींयदि है, तो हम बहुत सौभाग्यशाली हैं, यदि नहीं भी है, तो हमें समझना होगा कि 'ईश्वर' शब्द से हमारा क्या आशय है ? 'ईश्वर' को मानने या न मानने से अधिक महत्वपूर्ण है, यह जानना कि इस 'शब्द' से हमारा क्या आशय है . क्योंकि हमारा आशय जितना सुस्पष्ट और 'अनुभव-आधारित' होगा, हम उतनी ही जल्दी उस तत्त्व के स्वरूप को हृदय से समझ सकेंगे । या फिर भी हम 'आत्म-तत्त्व' को समझने के माध्यम से उस तत्त्व को और भली-भाँति ग्रहण कर सकेंगेइतना ही नहीं, उसे अपने हृदय में अवस्थित परम सत्य की भाँति पहचान भी लेंगेक्योंकि तब हम पात्र और अधिकारी भी होंगे

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