Saturday, February 6, 2010

जिज्ञासु.

~~~~~~~~ जिज्ञासु ~~~~~~~~~
________________________
******************************
गीता के अध्ययन का हमारा प्रयोजन ही यह तय करता है कि हम कैसे 'जिज्ञासु' हैं और हम जैसे भी जिज्ञासुहोंगे, हमारी 'पात्रता' वैसी ही होगी अर्थात् हम गीता-अध्ययन के उत्तम, या मध्यम 'पात्र' होंगे, या 'पात्र' नहीं होंगे यदि हम 'पात्र' नहीं है तो हम पहले यही प्रयास कर सकते हैं कि 'पात्रता' हममें क्यों नहीं है, इसे जान लें। गीता मेंश्रीकृष्ण अर्जुन से (अध्याय १८, श्लोक ६७ में ) कहते हैं :

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन
चाशुश्रू षवे वाच्यं मां यो-अभ्यसूयति

उक्त श्लोक में उन चार प्रकार के लोगों के बारे में स्पष्ट किया गया है, जो गीता के तत्त्व को ग्रहण ही नहीं कर सकते
इनमें प्रथम वे हैं, जो 'तप'शून्य हैं दूसरे स्थान पर वे हैं, जो भक्ति-रहित हैं तीसरा स्थान उन मनुष्यों का है, -जोइसे सुनना ही नहीं चाहते और चौथे वे लोग हैं, जो 'मुझसे' अर्थात् ईश्वर से वैरबुद्धि रखते हैं
यहाँ एक बार फिर इस ओर ध्यान देना होगा कि श्रीकृष्ण का 'ईश्वर' से क्या तात्पर्य है उन्होंने स्पष्ट रूप से ईश्वरक्या' है, इस बारे में अनेक स्थानों पर उस तत्त्व का वर्णन किया है वे 'अभेद-बुद्धि' से, 'अनन्य भाव' से 'अपने' कोऔर जगत को भी उस 'चटनी-तत्त्व' से अभिन्न कहते हैं, जिसे वे ईश्वर कहते हैं 'वह' ईश्वर 'अस्तित्त्व-मात्र' कीनिज और विषयगत 'सत्ता' है
He is the only Subjective as well as Objective Reality of the whole Existence
जिस 'चैतन्य-तत्त्व' में जगत और हम आते-जाते हैं, जिसमें अवस्थित हैं, और नाम-रूप की तरह ही अंतत: विलीन हो जाते हैं, 'जीव-भाव' भी हमें वहीं से प्राप्त होता है किन्तु जीवभाव, जो प्रकृति अर्थात तीन गुणों कीपारस्परिक क्रीडा का ही परिणाम है, अपने-आपको ईश्वर से भिन्न एक स्वतंत्र तत्त्व मान बैठता है, और यहअज्ञान' का प्रारंभ है जब इस अज्ञान अर्थात 'मोहबुद्धि' से ग्रस्त 'जीव' दु: को प्राप्त होता है, तो वह 'दु: क्यों है', इसे समझने की बजाय दु: को सुख प्रतीत होनेवाली वस्तुओं से दूर करने का प्रयास करता है लेकिन वहमोहित बुद्धि' से ग्रस्त 'जीव' यह तक नहीं देख पाता कि सारे सुख अनित्य और अशाश्वत हैं फिर वे 'नित्य' सुखकैसे दे सकते हैं ?
गीता अध्याय , श्लोक २७ में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, :

इच्छा-द्वेष-समुत्थेन द्वंद्व-मोहेन भारत
सर्व-भूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप

अर्थात्,
हे भरतवंशी अर्जुन ! संसार में इच्छा और द्वेष से उत्पन्न सुख-दु:खादि द्वंद्व-रूपी 'मोह' से समस्त प्राणी अत्यंतअज्ञता को प्राप्त हो रहे हैं

स्पष्ट है कि ऐसा कोई अपात्र जब गीता के अध्ययन का प्रयास करेगा तो उसे गीता से वह तत्त्व नहीं प्राप्त हो सकेगाजो किसी 'पात्र' या 'सत्पात्र' को मिलेगा
अगले ही श्लोक (अध्याय , श्लोक २८) में वे स्पष्ट करते हैं कि फिर कौन इस तत्त्व को ग्रहण कर सकता है ?
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणां
ते द्वंद्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रता:

अर्थात्,
किन्तु ( सकाम कर्म करने से उसका फल प्राप्त होता है, जो पुन: कर्म-संस्कार उत्पन्न करता है और इस सृक्न्हालाका अंत नहीं होता, यह देख लेने के उपरान्त ) निष्काम भाव से श्रेष्ठ पुण्य कर्मों को करनेवाले लोग उनके पाप नष्ट सेराग तथा द्वेषजनित मोहबुद्धि समाप्त हो जाने से 'मुझे' (ईश्वर-चैतन्य को) ही भजते हैं
'भजन' का तात्पर्य क्या है इसे भी गीता में स्पष्ट किया गया है
तो अब 'पात्रता' में दूसरी कौन सी बाधाएँ होती हैं, इस बारे में हम "जिज्ञासु -" के अंतर्गत विचार करेंगे

' ' ' _____________________________
************************************

No comments:

Post a Comment