Sunday, June 30, 2013

’श्री रमण महर्षि से बातचीत’ पुस्तक से उद्धृत अंश -१

’श्री रमण महर्षि से बातचीत’ पुस्तक से उद्धृत अंश -१
§ 58.  श्री रंगनाथन, आई.सी.एस. :
श्रीमद्भग्वद्गीता में एक जगह कहा है : व्यक्ति का स्वयं का धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है; दूसरे का धर्म भय देनेवाला है । स्वधर्म का क्या महत्त्व है?
महर्षि : सामान्यतया स्वधर्म  से तात्पर्य विशिष्ट कोटि तथा जातिगत कर्त्तव्यों  से है । भौतिक वातावरण भी ध्यान में रखना चाहिए ।
भक्त : यदि वर्णाश्रम धर्म से आशय है तो इस प्रकार के धर्म का प्रचलन तो भारत में ही है । जबकि गीता का उपयोग तो अखिल जगत् के हेतु होना चाहिए ।
महर्षि : हर देश में किसी न किसी रूप में वर्णाश्रम विद्यमान है । महत्त्व इस बात है कि एकमात्र आत्मा में स्थित रहो, वहाँ से बाहर न भटको इसका वास्तविक भाव यही है ।
 स्व = स्वयं का अर्थात् आत्मा का ।
पर = दूसरे का अर्थात् अनात्मा का ।
आत्मधर्म का प्रतिष्ठान आत्मा में है । वहाँ क्लेश अथवा भय नहीं होंगे । जब कोई अन्य होता है तभी दुःख उत्पन्न होता है । यदि यह अनुभूति हो कि केवल एकमात्र आत्मा ही है, दूसरा कोई नहीं है, तब भय नहीं होगा । आज मानव भ्रमवश अनात्म-धर्म को आत्म-धर्म समझकर दुःख उठाता है ।  उसे (आत्मा को) जानकर उसी में स्थित रहना चाहिए । तब भय का अन्त हो जाता है और संशय भी नहीं रहते । यदि इसका अर्थ वर्णाश्रम धर्म लें तो भी यही आशय निकलेगा । ऐसा धर्म तभी फलदायक होगा जब निःस्वार्थ भाव से किया जाये । अर्थात् यह मान लिया जाय कि कर्त्ता नहीं है परन्तु किसी उच्चतर सत्ता का यन्त्र मात्र है । उच्चतर सत्ता अवश्यम्भावी को होने दे और मैं केवल उसके आदेशों का ही पालन करूँ । कर्म मेरे नहीं हैं । इसलिए कर्मों के परिणाम भी मेरे नहीं हो सकते । यदि इसके अनुरूप विचार तथा कर्म हों तो कष्ट है कहाँ?  चाहे वर्णाश्रम धर्म हो अथवा लौकिक धर्म यह महत्व का नहीं है । अन्ततोगत्वा निष्कर्ष यह निकला :
 स्व = आत्मनः
पर = अनात्मनः
ऐसे संशय स्वाभाविक हैं । शास्त्रानुसार व्याख्या का आधुनिक जीवन से सामञ्जस्य नहीं हो सकता, जिसे जीवनयापन हेतु अनेक प्रकार से कार्य करना होता है ।
पोंडी से आये एक व्यक्ति ने बीच में टोका :
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । सब कर्त्तव्यों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ । 
श्रीभगवान : सर्व अनात्मनः ही है; महत्त्व ’एक’ का है । जिस मनुष्य की दृढ़ स्थिति ’एक’ पर है, उसके लिए धर्म कहाँ है ? तात्पर्य यह है कि "आत्मा में निमग्न हो जाओ ।"
भक्त : गीता का उपदेश तो कार्य करने के लिए किया गया था ।
महर्षि : गीता क्या कहती है ? अर्जुन ने युद्ध करने से इन्कार कर दिया । कृष्ण ने कहा, " जब तक तुम लड़ने से इन्कार करते रहोगे; तुम में कर्त्तापन का भाव रहेगा । युद्ध  करने अथवा न करने वाले तुम हो कौन् ? कर्त्ता भाव को त्यागो । जब तक उस भाव का निवारण नहीं करोगे तुम्हें कर्म तो करना ही होगा । उच्चतर सत्ता तुम्हारा उपयोग कर रही है । उसके आदेश के पालन की अवहेलना कर तुम स्वयं उसी सत्ता को स्वीकार कर रहे हो । इसकी अपेक्षा उस सत्ता को अंगीकार कर उसके आदेशों का यन्त्रवत् पालन करो । (अन्य प्रकार से कहें तो) यदि तुम इन्कार करोगे तो तुम्हें बलपूर्वक युद्ध में खींच लिया जायेगा । अनिच्छुक कर्त्ता की अपेक्षा इच्छापूर्वक कार्य करना श्रेयस्कर है ।"
 "अथवा आत्मा में स्थित हो कर्त्तापन के भाव से रहित होकर स्वभावानुसार कर्म करो । तब कर्म का फल तुम्हें प्रभावित नहीं करेगा । यही पुरुषार्थ एवं वीरता है ।"
’आत्मा में संस्थिति’ ही गीता के उपदेश का सार है । अन्त में महर्षि ने स्वयं फिर कहा, "यदि मनुष्य आत्मा में स्थित है, ये संशय उदय नहीं होंगे । वे तभी तक उदय होते हैं जब तक वह वहाँ स्थित नहीं होता ।"
भक्त : जिज्ञासु का ऐसे उत्तर से क्या हित होगा ?
महर्षि : फिर भी शब्दों में शक्ति होती है जो यथासमय निश्चय ही फल लाएगी ।
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Monday, June 17, 2013

~~ राजनीति और धर्म ~~1.

~~ राजनीति और धर्म ~~ 1.
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गीता (अध्याय २) में कहा गया है;
ध्यायतो विषयान्पुन्सः सङ्गस्तेषूपजायते ।
सङ्गात्संजायते काम: कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥६२॥
क्रोधात्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः ।
स्मृतिभ्रंशाद्-बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥६३॥
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥६४॥
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ध्यायतो  > ध्यायतः > जिसका ध्यान उन, विषयान् > विषयों पर होता है, पुन्सः > उस मनुष्य की, सङ्गः तेषु -उपजायते > उन विषयों के साथ चित्त की संलग्नता हो जाती है । इस प्रकार चाहते या न चाहते हुए भी, अन - वधानतावश  मनुष्य उन विभिन्न विषयों में प्रवृत्त हो जाता है । स्पष्ट है कि सारे ही विषय चित्त से अन्य हैं, अर्थात् ’जड’ हैं, क्योंकि चित्त ’चेतन-सत्ता’ की रश्मि मात्र ही तो है । उनसे चित्त का संग होने पर चित्त में उनकी सत्यता होने का बुद्धि-भ्रम उपजता है । उनकी सत्यता की बुद्धि होने पर, सङ्गात्-संजायते कामः > इस प्रकार के संग से उन्हें प्राप्त करने की उत्कण्ठा अर्थात् कामना उत्पन्न हो जाती है ।  कामात् क्रोधः अभिजायते >  और कामना दुष्पूर होती है, क्योंकि विषय अनंत, तथा इन्द्रियों की भोग-क्षमता अत्यन्त अल्प है. इसलिए क्रोध का आगमन होता है । क्रोधात् भवति > क्रोध से उत्पन्न होता है, संमोहः > मोह की भावना का अतिरेक, संमोहात्-स्मृति-विभ्रमः > और मोह के इस अतिरेक से स्मृति का सामञ्जस्य खो जाता है । स्मृति-भ्रंशात्-बुद्धिनाशः > स्मृति के असामञ्जस्य अव्यवस्थित हो जाने से सहज स्वाभाविक विवेक-बुद्धि नष्ट हो जाती है । बुद्धि-नाशात्-प्रणश्यति > इस प्रकार से विवेक-बुद्धि के नष्ट होने पर चित्त की सरलता, स्पष्टता,  समझने की स्वाभाविक क्षमता नष्ट हो जाती है । दूसरी ओर, राग-द्वेषवियुक्तैः > राग-द्वेष से शून्य, तु > किन्तु, विषयान् इन्द्रियः चरन् > जो हैं, जिसकी इन्द्रियाँ विषयों के संसर्ग में रहते हुए भी, आत्म-वश्यैःविधेय-आत्मा > जिसका चित्त संपूर्णतः आत्मा में स्थिर और समाहित है , ऐसा मनुष्य, प्रसादम् अधिगच्छति > आत्मा की शान्ति के प्रसाद का उपभोग करता है ।
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विवेकचूडामणि (श्लोक३२५) में कहा गया है;
लक्ष्यच्युतं चेद्यदि चित्तमीषद् बहिर्मुखं सन्निपतेत्तस्ततः ।
प्रमादतः प्रच्युतकेलिकन्दुकः सोपानपङ्क्तौ पतितो यथा तथा ॥
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Friday, May 31, 2013

Chess / शतरंज

~~ Chess / शतरंज ~~
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http://ashwatthah.blogspot.in/search/label/रणभूमि%20%2F%20क्रीड़ाभूमि
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Sunday, May 26, 2013

'धर्म' और 'Religion'


'धर्म' और 'Religion' 

'shreyAnswadharmo viguNaH 
paradharmAtswanuShThitAt,
swadharme nidhanaM shreyaH
paradharme bhayAwahaH ' (GitA : 3/35).
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श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्  |
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मे भयावहः || ( गीता ३ / ३५ ).
says GitA.
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The dharma here means 'dhRti', the natural tendencies, temperament and orientation of the mind. Taking use of them in their best possible way according to one's wisdom and understanding is what is meant by dharma. Taking into consideration this, Arjuna, who is a kShatriya (warrior) is adviced to engage in war, because he is not a brahmin and can't go begging for alms. His 'dharma' is quite different. And It is right, natural and so meritorious for him, if he does not run away from the war that has been imposed upon him by the circumstances.
So 'dharma' is not the same as 'religion', while 'religion' is but traditions of different 'social groups'. Unfortunately all our political-understanding (?) does not takes into consideration of this fact, and there are differences and rivalries of all kinds in society.
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Monday, April 8, 2013

श्लोक अध्याय २, क्रमांक ५८. Shloka 2, #58


श्लोक अध्याय २, क्रमांक ५८. 

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यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥
(गीता २/५८)
यदा = जब, संहरते = समेट लेता है, च अयं कूर्मः = और यह जीव, जैसे = कछुवा, अङ्गानि-इव = अपने अंगों को, सर्वशः = हर ओर से, इन्द्रियाणि = इन्द्रियों को, इन्द्रियार्थेभ्यः = उनके अपने अपने विषयों से, तस्य = उसकी, प्रज्ञा = सत्य को ग्रहण कर सकनेवाली क्षमता, प्रतिष्ठिता = भली भाँति सुस्थिर हो जाती है ।
अर्थ - जैसे कछुवा अपने अंगों को भीतर खींच लेता है, मनुष्य भी उसी प्रकार से जब अपनी स्थूल एवं सूक्ष्म इन्द्रियों में संलग्न चित्त को उनसे पृथक् कर अपने भीतर अवस्थित अपने शुद्ध ’होनेमात्र’ के सहज बोध पर केन्द्रित कर लेता है, तब इन्द्रियों के उनके अपने-अपने विषयों से मुक्त रहने, और चित्त के इन्द्रियों से भी बँधे न होने पर अपने ही हृदय में नित्य अवस्थित नैसर्गिक आनन्द के बोध में निमग्न  उसकी बुद्धि सुस्थिर हो जाती है ।  फ़िर उसका चित्त विषयों और विषयों में सुख-बुद्धि की भावना नहीं रखता । इस प्रकार की मति में स्थित वह स्थितप्रज्ञ हो जाता है ।   

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Shloka ch.2, #58
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yadA sanharate chAyaM kUrmo'ngAnIva sarvashaH |
indriyANIndriyArthebhyastasya prajnA pratiShThitA || (gitA 2/58). 
Just as a tortoise withdraws its organs within itself, A seeker who withdraws attention from the objects, and then from the senses also, then from the mind dissociated from objects and senses, he goes deeper into the pure sense of 'just pure being' only without a thought (including I-thought) stirring, and even more, stays there for such a long time that his mind gets totally absorbed in that sense of 'just pure being' only, attains the intelligence that becomes an understanding of the Self. Firmly established in that understanding of the Self, he is free for ever from all sorrow, and enjoys the spontaneous bliss of the Self, the brahman.
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Tuesday, July 20, 2010

॥ गीता में कवि ॥

~~~~~~~ ॥ गीता में कवि ॥ ~~~~~
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मैं नहीं सोचता कि कविता कालजयी होती होगी ।
कविता में ऐसी कल्पना शायद कविता को अधिक
सार्थकता देती होगी, बस उतने में संतुष्ट होना काफ़ी
है ।
इस बारे में गीता के विचार जानने की उत्सुकता हुई,
और देखा तो पढ़ा -
किं कर्म किम् अकर्म-इति कवयो-अपि अत्र मोहिताः ।
तत् ते कर्म प्रवक्ष्यामि यत् ज्नात्वा मोक्ष्यसे अशुभात् ॥
-अ४श्लोक१६
आद्य शंकराचार्य ने यहाँ कवि का अर्थ मेधावी किया है ।
काम्यानाम् कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदु:।
----- अ१८श्लोक२
यहाँ कवि का अर्थ पन्डित किया है ।
कविं पुराणम् अनुशासितारम् अणोः अणीयान् समनुस्मरेत् यः ।
------अ८श्लोक९
यहाँ कवि का अर्थ क्रान्तदर्शी तथा सर्वज्ञ किया है ।
और अंत में-
वृष्णीनाम् वासुदेवो-अस्मि ---------- ।
मुनीनाम्---------------- कवीनां उशना कविः ॥
-----अ१०श्लोक३७
कुछ नया लिखने की दृष्टि से मैंने यह प्रयास किया है ।
चूँकि अपर्णाजी ने टैग किया इसलिए साहस कर रहा हूँ।


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(*मूलत: फेसबुक की एक मित्र सुश्री अपर्णा मनोज
के द्वारा कविता के संबंध में अपने विचार व्यक्त 
करने के लिए किये गए अनुरोध के प्रत्युत्तर में व्यक्त 
मेरे विचार.)  

Thursday, May 13, 2010

अधिकारी

~~~~~~~~~अधिकारी~~~~~~~~~~
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पात्रता और अधिकारिता, दोनों शब्दों के बारे में हम पहले कह चुके हैं .
गीता वेदान्त की प्रस्थान-त्रयी के तीन प्रमुख ग्रंथों में से एक है .
गीता समझने के लिए इसलिए हमें यह जानना बहुत उपयोगी होगा कि
गीता के अध्ययन के लिए कौन सी पात्रताएं वेदान्त-ग्रथों में निर्धारित की गयी हैं .
क्योंकि उन ग्रंथों में इस दृष्टि से जो कहा गया है, उसके आधार पर भी हम अपनी
अधिकारिता, और योग्यता के बारे में स्पष्टता से  जान सकें .
वेदांत-ग्रंथों में अधिकारी, विषय, संबंध एवं प्रयोजन इन चार परस्पर जुडी हुई
आवश्यकताओं को 'अनुबंध' का नाम दिया गया है .
ये आवश्यकताएं (शर्तें) पूर्ण होने पर हम अधिकारी और सर्वथा सुयोग्य पात्र होते हैं .
संक्षेप में :
अधिकारी तु विधिवदधीतवेद्वेदांगत्त्वेना... ... प्रमाता ."
 अर्थात् ,
अधिकारी तो वह है, जिसने विधिपूर्वक वेद और वेदांगों का अध्ययन किया हो,
उनके वास्तविक आशय को जिसने इस अथवा पूर्व जन्म में हृदयंगम किया हो,
कर्मों का काम्य, निषिद्ध, वर्जनायुक्त आदि स्वरूप जानकर तदनुसार नित्य,
नैमित्तिक, प्रायश्चित्त, उपासना आदि कर्मों का अनुष्ठान किया हो, जिससे उसके
अंत:करण का सारा कल्मष धुल गया हो, और उसका चित्त अत्यंत सरल, शुद्ध और
निर्मल हो चुका होने से जो साधन-संपन्न ऐसा 'प्रमाता' हो चुका हो जो विषय को
ठीक-ठीक समझकर बुद्धि में स्थिरता से धारण कर सके, .
काम्य-कर्म : कामनाओं की पूर्ति के लिए किये जानेवाले, स्वर्ग इत्यादि  इष्ट
साधनस्वरूप कर्म .
निषिद्ध-कर्म : नरक आदि का कारण बनानेवाले अनिष्ट कर्म .
नित्य-कर्म : जिनके न करने से जीवन में कष्ट उत्पन्न होते हों . जैसे मन और शरीर
की शुद्धि, संध्यावंदन, आदि कर्म .
नैमित्तिक-कर्म : पुत्र के जन्म होने पर उसके निमित्त किये जानेवाले संस्कार रूपी
प्रासंगिक कर्म .
प्रायश्चित्त्त-कर्म : जाने-अनजाने किये गए दोषयुक्त कर्मों से उत्पन्न पापों के क्षय
हेतु किये जानेवाले कर्म .
उपासना-आदि-कर्म : सगुण-ब्रह्म-विषयक पूजा-पाठ इत्यादि .
इस प्रकार कर्मों के स्वरूप को ठीक से समझने के बाद, और उनके विधिवत अनुष्ठान
से, अर्थात् सम्यक-रीति से विहित कर्म करने से तथा अविहित के त्याग से चित्त
अत्यंत शुद्ध, बुद्धि विवेक-वैराग्य एवं एकाग्र, तथा मान बहुत शांत और प्रसान रहने
लगता है . तब वह सुख की प्राप्ति के लिए इन्द्रिय-गम्य विषयों की ओर से मुंह मोड़
लेता है, और दूसरे शब्दों में कहें तो, '' अंतर्मुख'' होने लगता है .
अब साधनों के बारे में -
१)नित्य-अनित्य-वस्तु विवेक,
२)इस लोक तथा मृत्यु के बाद प्राप्त होनेवाले समस्त लोकों के सारे भोगों के प्रति
विराग-बुद्धि होना,
३)मुमुक्षा के लिए उपयोगी शम, दम, उपरति, तितिक्षा, समाधान, श्रद्धा आदि ६
संपत्तियां होना .
४)इस प्रकार की संपत्ति से संपन्न साधक को शांत-दांत 'प्रमाता' कहा जाता है .
इसे ही अधिकारी भी कहा जाता है .
विषय : ग्रन्थ में जिसका विस्तार से विवेचन किया जाता है . अपनी बुद्धि के अनुसार
मनुष्य निश्चय कर सकता है कि गीता में किस विषय की शिक्षा दी गयी है, इसे वह
ईश्वर-प्राप्ति, मोक्ष, आदि कोई व्यक्तिगत रुचिप्रद लक्ष्य के रूप में भी चिन्हित कर
सकता है .
संबंध : जिस लक्ष्य की प्राप्ति ग्रन्थ से अभीष्ट है, उसके बोध के लिए ग्रन्थ का किस
प्रकार से अध्ययन किया जाए . तात्पर्य यह कि हम गीता या अन्य कोई ग्रन्थ
पढ़ते तो हैं, किन्तु उससे हमें उचित बोध नहीं प्राप्त हो पाता .ग्रन्थ के अंतर्गत जिस
प्रमाण को दिया गया है, उसे ग्रहण कर, उसमें बोध्य(सत्य) तथा बोधक (विवेचना)
का पारस्परिक संबंध .
प्रयोजन :
ग्रन्थ के अध्ययन द्वारा इच्छित लक्ष्य की प्राप्ति होना .
इस रीति से इन चारों (विषय, संबंध, अधिकारी तथा प्रयोजन) की स्पष्टता होने पर
शिक्षा सार्थक और सफल होती है .


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  ,

Wednesday, April 14, 2010

व्यवसायात्मिका बुद्धि:

~~~~~~~व्यवसायात्मिका बुद्धि:~~~~~~
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हमारी बुद्धि, या कहें 'धृति', जो कि एक व्यापक अर्थवाला शब्द है, हमारी पात्रता को निर्धारित करती है ।
गीता अध्याय २, श्लोक क्रमांक ४१ एवं ४४ में इस बारे में बहुत उपयोगी निर्देश प्राप्त होते हैं ।
व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन ।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयो-अव्यवसायिनां ॥ (४०)
भोगैश्वर्य प्रसक्तानां तयापहृतचेतसां ।
व्यवसायात्मिका बुद्धि: समाधौ न विधीयते ॥ (४४)
हमारी पात्रता को जो वस्तु निर्धारित करती है, वह है व्यवसायात्मिका बुद्धि । अर्थात् गीता के माध्यम से हम क्या प्राप्त करना चाहते हैं । हमारा प्रयोजन । जब तक हमारी बुद्धि में संसार की अनित्यता पर संशय नहीं उठता, तब तक हमें हमारी प्रतीतियों का संसार नित्य प्रतीत होता है । बुद्धि से ही यह भी समझ में आता है कि जिस संसार मेंहम रहते हैं, वहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है । किन्तु अशुद्ध बुद्धि के कारण हम मन लेते हैं कि 'भविष्य' तो है, जहाँ हम कुछ इच्छाओं को पूरा कर सकेंगे । जीवन के लिए, शरीर की रक्षा और दूसरी आवश्यकताओं की पूर्ति करना, औरसंसार में 'सुख' की प्राप्ति का विचार करना, उसकी आशा करना ये दोनों बहुत अलग-अलग बातें हैं । जब बुद्धि से ही हमें यह स्पष्ट हो जाता है कि संसार के (इन्द्रियों के) विषयों में सुख नहीं, सुख का आभास मात्र है, तो फिर हमें उन विषयों के सीमित सामर्थ्य का बोध होने लगता है, जो क्रमश: चिंतन द्वारा और भी दृढ़ किया जा सकता है । यहाँ लक्ष्य उन विषयों अथवा विषयों के भोगों की निंदा करना नहीं, बल्कि उनसे प्राप्त होते प्रतीत होनेवाले सुखों कीसच्चाई पर ध्यान देना है . जब बारम्बार उनकी सच्चाई पर प्रश्न उठाया जाता है, तो बुद्धि शुद्ध और सूक्ष्म, एकाग्रऔर ऋजु हो जाती है, और अनायास विषयों तथा उनके भोगों के प्रति बुद्धि में वैराग्य उत्पन्न होने लगता है । फिरजब संसार के विषयों और उनसे प्राप्त होनेवाले तथाकथित सुखों से मन उचट जाता है, तो अपनी स्वयं की देह औरइन्द्रियों के प्रति भी लगाव समाप्त हो जाता है । ऐसी एकाग्र बुद्धि के द्वारा जब हम संसार तथा उसके परे की भीएकमात्र सत्यता अर्थात् 'सत् -चित् - स्वरूप' एकमात्र ईश्वर-तत्त्व को ही नित्य और नित्य-सुख देनेवाले तत्त्व की भाँति देख लेते हैं, तो प्रारंभ में यद्यपि यह एक अनुमानात्मक निष्कर्ष ही होता है, किन्तु फिर बारम्बार के चिंतन सेयही एक प्राप्तव्य वस्तु है, इस बारे में हमारे संशय समाप्त हो जाते हैं । इस प्रकार की बुद्धि ही वह 'धृति' है, जिसमें बुद्धि व्यवसायात्मिका होने साथ-साथ शुद्ध और एकाग्र, और वैराग्ययुक्त भी होती है । यदि हम वैराग्ययुक्त इस बुद्धि से रहित हैं, तो हमारी मलिन बुद्धि, जो विषयों और उनसे प्राप्त होते केवल प्रतीत भर होनेवाले, (न कि वस्तुत: मिलनेवाले) की नित्यता पर प्रश्न नहीं उठाती । 'सुख'-प्राप्ति की संभावना और उससे उत्पन्न होनेवाला उनका आकर्षण मन को भोगैश्वर्य के प्रति लालायित बनाए रखते हैं , और चूँकि वहाँ हमारी बुद्धि व्यवसायात्मिका नहीं रहजाती, इसलिए वह 'समाधि' की साधना और अभ्यास के लिए अनुपयुक्त होती है । इसलिए हम देखते हैं, कि केवल कोरे शब्द-ज्ञान से संपन्न बड़े-बड़े पंडित भी गीता के बहुत अध्ययन के उपरांत भी, उसके मर्म के प्रति सुनिश्चय नहीं कर पाते । इसलिए संसार के सुखों के लिए प्रयत्नशील होना और ईश्वर-तत्त्व की प्राप्ति के लिए प्रयास करना परस्पर दो विपरीत दिशाएँ हैं। जब हम इस प्रकार से अपनी मन:स्थिति की ठीक से परीक्षा कर लेते हैं, तो भी हमें हमारी पात्रता का सुनिश्चय हो जाता है ।

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Friday, March 19, 2010

सांख्य और योग के अनुसार 'पात्रता'

~~प्रवृत्ति तथा निवृत्तिपरक दो प्रकार की बुद्धियाँ ~~
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गीता के भगवान् शंकराचार्य लिखित भाष्य अध्याय ३, के प्रारंभ में कहा गया है,
''शास्त्रस्य प्रवृत्ति-निवृत्तिभूते द्वे बुद्धी भगवता निर्दिष्टे, सांख्ये बुद्धि: योगे बुद्धि: इति च । ''
अर्थात्, इस गीताशास्त्र के द्वितीय अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा जिन दो प्रकार की बुद्धियों का उल्लेख
किया गया है, वे हैं;
प्रवृत्तिपरक योगबुद्धि, एवं
निवृत्तिपरक सांख्यबुद्धि ।
ये दोनों अभ्यास के लिए पूर्व-निष्ठा के अनुसार साधकों की पात्रता के अनुसार हैं ।
जब तक मनुष्य का आग्रह यह रहता है कि मैं एक स्वतंत्र कर्त्ता हूँ, मैं अपनी बुद्धि, विवेक या इच्छा के अनुसार कर्मकरने के लिए स्वतंत्र हूँ, तब तक उसे चाहिए कि वह यथासंभव चित्तशुद्धि के लिए उपाय करे । और इसके लिएसहायक हैं, विविध प्रकार की उपासनाएँ । जिसमें भी उसकी रुचि हो, श्रद्धापूर्वक उसे करने से क्रमश: चित्त की शुद्धिहो जाती है । इस प्रकार उसे क्या करूँ क्या न करूँ, इस द्वंद्व से भी मुक्ति मिल जाती है ।
अध्याय ३ श्लोक ८ में कहा गया है,
''नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण: ।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मण: ॥ ''
फिर अध्याय ३ में ही श्लोक ९ श्लोक में सावधान करते हुए यह भी कहा है,
'' यज्ञार्थात्कर्मणोSन्यत्र लोकोSयं कर्मबंधन: ।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंग: समाचर ॥ ''
यज्ञ का तात्पर्य है, जिससे संपूर्ण विश्व का कल्याण अर्थात् हित हो । इसे ही अगले ही श्लोक में स्पष्ट करते हुए,
''सहयज्ञा: प्रजा: सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापति: ।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोSस्त्विष्टकामधुक ॥ ''
सृष्टि के आदिकाल में यज्ञ सहित प्रजा को रचकर प्रजापति ने कहा, कि इस यज्ञ से तुम वृद्धि को प्राप्त करो ।
यह यज्ञ तुम लोगों को इष्ट कामनाओं की प्राप्ति में साधन होगा । तात्पर्य स्पष्ट है कि यज्ञ कर्मस्वरूप है ।
इस समय पात्रता के संबंध से आवश्यक उल्लेख किया गया ।
चित्त-शुद्धि पूर्ण हो जाने पर मनुष्य में आत्म-जिज्ञासा का उद्भव होता है । तब उसके चित्त में बुद्धि से प्रेरित,
''
मैं स्वतंत्र कर्त्ता हूँ । '' अपने इस निष्कर्ष पर प्रश्न उठता है, और जिसे 'मैं' कहा जा रहा है, वह वस्तु क्या है, याउसका यथार्थ तत्त्व क्या है, इस बारे में वह खोज-बीन करता है । तब उसे ज्ञात होता है कि
१/जिसे बुद्धि 'मैं' कहती है, वह तत्त्व, यद्यपि देह से सदैव संयुक्त रहनेवाली कोई वस्तु है, किन्तु देह उसे नहींजानती, बल्कि वही देह को जानता है । क्योंकि देह 'जड' है, जबकि 'मैं' चेतन है ।
२/जिसे बुद्धि 'मैं' कहती है, वह तत्त्व, यद्यपि मन से सदैव संयुक्त रहनेवाली कोई वस्तु है, किन्तु 'मन' उसे नहींजानता, बल्कि वही 'मन' को जानता है । क्योंकि जिसे 'मन' कहा जाता है, अर्थात् भाव, भावनाएँ, स्मृति, आदि मनकी विभिन्न और समस्त चित्तवृत्तियाँ, मनुष्य की बुद्धि अपने-आपको उनसे अलग जानती है, और मनुष्य स्पष्ट रूपसे इसे भी जानता है, कि उसका मन सतत बदलता रहता है, जबकि मन को जाननेवाली बुद्धि, मन की अपेक्षास्थिर होती है ।
३/ किन्तु जिसे बुद्धि 'मैं' कहती है, स्वयं बुद्धि भी उसके ही आश्रय से कार्यरत होती है, या कार्य नहीं करती । वहचेतन तत्त्व बुद्धि को भी जानता है, और उसके ही आश्रय से मनुष्य 'मेरी बुद्धि' कहता है । तात्पर्य यह, कि मनुष्य मेंयह बोध स्वाभाविक रूप से होता है कि 'मैं' बुद्धि को जाननेवाला तत्त्व 'है', न कि बुद्धि ।
४/इस प्रकार जिसे बुद्धि 'मैं' कहती है, वह उस 'मैं' की शक्ति से ही ऐसा कह पाती है । और वह शक्ति, बुद्धि जिसे 'मैं' कहती है, चेतन तत्त्व है, जिसकी तुलना में बुद्धि अपेक्षाकृत 'जड' है ।
५/ बुद्धि तथा देह में स्थित अन्य सभी अवयवों के कार्य प्राण की शक्ति से ही संपन्न होते हैं . एक ओर जहाँ बुद्धि केसचालन में भी प्राण (शक्ति) का होना आवश्यक है, वहीं प्राणों के द्वारा होने के सत्य को बुद्धि में ही ग्रहण क्या जाताहै । इस प्रकार प्राण और बुद्धि, तथा प्राण और दूसरे सारे अवयव परस्पर अन्योन्याश्रित हैं । फिर भी सूक्ष्मता कीदृष्टि से, वे सभी जड हैं और एक 'चेतन' तत्त्व की विद्यमानता में ही उनके क्रियाकलाप संभव और प्रमाणित भी होसकते हैं ।
क्या उस चेतन तत्त्व के अतिरिक्त कोई दूसरा 'मैं' हो सकता है ? अर्थात्,
६ / क्या मनुष्य में 'दो' 'मैं' होते हैं ?
प्रत्येक मनुष्य सहज रूप से जानता ही है, कि वह सदैव वही-एक है ।
यह बोध उसे दूसरों से नहीं प्राप्त होता । और वह ऐसी कल्पना स्वप्न तक में भी नहीं कर सकता कि वह 'दो' या, 'एक से अधिक' कुछ है ।
इस प्रकार सामान्य वैचारिक विवेचना से भी यह स्पष्ट हो जाता है कि यह 'चेतन' तत्त्व ही वह वस्तु है, जिसे मनुष्यमैं' कहता है । किन्तु देह तथा दूसरे अवयवों के द्वारा इससे शक्ति प्राप्त कर इसके ही अंतर्गत कार्यरत रहने से बुद्धिमें यह भ्रम उत्पन्न हो जाता है कि 'मैं', -'यह' अथवा 'वह' हूँ ।
यदि यह प्रश्न करें कि उस चेतन का प्रमाण क्या ? तो हम एक अंतहीन और विसंगत प्रश्नक्रम में फँस जाते हैं ।
इस प्रकार यह स्पष्ट ही है कि वह चेतन तत्त्व अपना प्रमाण आप ही है ।
इस प्रकार मनुष्य में विद्यमान चेतन तत्त्व, जो निराकार है, सदैव एकमेव है, और उस निराकार चेतनता के हीप्रकाश में, उसकी ही शक्ति से बुद्धि, मन इन्द्रियाँ, और स्थूल देह आदि कार्य में प्रवृत्त हो सकते हैं । यद्यपि वह तत्त्वउनकी किसी भी क्रिया में भाग नहीं लेता, और सदैव एक दृष्टा की भाँति उपस्थित रहता है, देह, मन, बुद्धि, इन्द्रियोंतथा प्राण भी, इन विविध अवयवों के समुच्चय से हम व्यावहारिक जगत के अंतर्गत अपनी और इसी प्रकार से'दूसरों' की भी एक आभासी स्वतंत्र सत्ता है, इस मान्यता से ग्रस्त हो जाते हैं ।
कर्मप्रवृत्ति से प्रेरित साधक योगबुद्धि वाला होने से योगमार्ग का साधक होने का पात्र होता है, जबकि उपरोक्तविवेचन से ग्रहण किये जानेवाले एकमात्र चेतन तत्त्व को ही 'मैं' के यथार्थ स्वरूप की तरह ग्रहण करनेवाला सांख्यअर्थात् ज्ञानमार्ग का साधक होने का पात्र होता है ।

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Tuesday, March 9, 2010

ईश्वर -4 .

~~~~~~~~~~~ईश्वर -4~~~~~~~~
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गीता में जिसे ईश्वर-तत्त्व कहा गया है, उसकी दो प्रकृतियों का निरूपण है । वे दो प्रकृतियाँ हैं,
१- अपरा
२-परा
इन्हें हम क्रमश:
1. Manifest Reality,
2. Transcendent Reality
कह सकते हैं ।
अपरा प्रकृति के अंतर्गत जगत और असंख्य जीवों की सृष्टि, परिपालन और प्रलय होता रहता है, जबकि ईश्वर की परम अवस्थिति, परम धाम, इससे परे है ।
इस सन्दर्भ में गीता के निम्न दो श्लोक विचारणीय हैं :
अध्याय ७, श्लोक ४,
भूमिरापोSनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च ।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥
तथा,
अध्याय ७, श्लोक ५,
अपरेयमिस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे परां ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत ॥
इस प्रकार गीता में यह स्पष्ट है, कि 'जीव' (अहंकार) भी, भूमि, आप (जल), वायु, आकाश, मन, बुद्धि और ईश्वर की ही आठ प्रकार की प्रकृति की एक अभिव्यक्ति है ।
पुन: अध्याय १०, श्लोक २२ में,
वेदानां सामवेदोSस्मि देवानामस्मि वासव: ।
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥
एवं अध्याय १३, श्लोक ६ में,
इच्छा द्वेष: सुखं दु:खं संघातश्चेतना धृति: ।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतं ॥
उस एकमात्र कड़ी का उल्लेख है, जिसके माध्यम से ईश्वर और जीव परस्पर अनन्य अर्थात् अभिन्न हैं । वह कड़ी है --चेतना । जहाँ जीव में यह कड़ी (चेतना) अहंकार, मन, बुद्धि, आदि से संयुक्त होने से उसमें अपने एक पृथकअस्तित्त्व होने का भ्रम उत्पन्न कर देती है, वहीं ईश्वर इस भ्रम से रहित है । उसकी चेतना और जीव की चेतना का प्रधान भेद यही है ।
यह भी देखना होगा कि जैसे हम 'चेतना' शब्द का प्रयोग प्राय: और अनजाने ही मन तथा बुद्धि के लिए भी करते हैं, वह वास्तव में त्रुटिपूर्ण है, और वह हमारे अज्ञान को और भी दृढ़ बनाए रखता है । जीव (से जुडी चेतना) तो मन-बुद्धि, धृति और अहंकार (अहं-बुद्धि) से संपन्न है, जबकि ईश्वर में निहित चेतना इन सब अवयवों से रहित है ।
इस प्रकार से जब हम 'चेतना' के स्वरूप को समझ लेते हैं और उसे ही ईश्वर के तत्त्व को जानने के एकमात्र माध्यम की तरह देखने लगते हैं, तो एक प्रश्न और सामने आता है ।
'चेतना' विषयपरक यथार्थ (Objective Reality) है, या 'स्वपरक' यथार्थ (Subjective Reality) है ?
या वह एक साथ दोनों है ?
जीव की बुद्धि इस संबंध में आदि 'माया' के आवरण से ग्रस्त होने से संशयग्रस्त रहती है, और 'अहंकार' से प्रेरित होकर अपने को जन्म-मृत्यु, सुख-दु:ख जरा-व्याधि से ग्रस्त अनुभव करती है । इस अहंकार को भी चेतना ही प्रकाशित करती है, और जीव स्वयं को आभासी अज्ञान के बंधन में जकड़ा पाता है । यदि वह चेतना के शुद्ध स्वरूप पर ध्यान दे, तो उसका संशय दूर हो जाता है । चूँकि जन्म से ही मनुष्य 'मोहबुद्धि' लेकर संसार में आता है, इसलिए उसे यह सब सूझता ही नहीं । अत: एक बार पुन: हम इस श्लोक पर आयें :
अध्याय७, श्लोक २७,
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वंद्वमोहेन भारत: ।
सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परंतप ॥
इस प्रकार यह समझा जा सकता है कि अज्ञान ही जन्म का एकमात्र कारण है ।
किन्तु, मोहबुद्धि के कारण इस अज्ञान का निवारण बहुत कठिन होता है । इसलिए 'पात्रता' की प्राप्ति हेतु पहले चित्त-शुद्धि होना आवश्यक है ।
चित्त-शुद्धि जहाँ एक ओर अपरिहार्यत: आवश्यक है, वहीं संसार के समस्त पदार्थों और उनमें प्रतीत होनेवाले समस्त सुखों की अनित्यता और नित्य क्या है इस जिज्ञासा का उत्पन्न होना भी उतना ही आवश्यक है ।
और स्पष्ट है कि यदि ये योग्यताएँ हममें हैं तो हम दु:खों की आत्यंतिक निवृत्ति की आकांक्षा से प्रवृत्त होकर, या 'नित्य क्या है ?', इसकी जिज्ञासा से प्रेरित होकर गीता से मार्गदर्शन पाने का प्रयास करेंगे ।

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>>>>> सांख्य और योग के अनुसार मनुष्य की पात्रता >>>>>