Thursday, December 16, 2021

अन्तःकरण

मन, बुद्धि, चित्त, अहं(कार)

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निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।।

न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ।।३१।।

(अध्याय १)

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व 

जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।।

मयैवेते निहताः पूर्वमेव 

निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्  ।।३३।।

(अध्याय ११)

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अन्तःकरण को चार लक्षणों से जाना जा सकता है :

मन, बुद्धि, चित्त और अहं(कार)

मन, अन्तःकरण की भोगबुद्धि है । अर्थात् यह बुद्धि कि मैं सुख-दुःख, पाप-पुण्य का उपभोगकर्ता हूँ ।

बुद्धि अर्थात् ऐसा ज्ञान, जो कि सत्य, असत्य, मिथ्या / दोषयुक्त, अर्थात्  मोह और / या भ्रम से ग्रस्त हो सकता है ।

चित्त अर्थात् चेतना :

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।।

इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ।।२२।।

(अध्याय १०)

चेतना के तीन तल हैं :

पहला है -- चेतन (conscious),

दूसरा है -- अवचेतन (sub-conscious),

और तीसरा है -- अचेतन (un-conscious).

अचेतन ही आत्म-अज्ञान (मूल अविद्या) अर्थात् अहं(कार) है ।

यही अचेतन पहले तो अवचेतन की तरह अभिव्यक्त होता है और फिर चेतन की तरह ।

इस अचेतन में ही, कर्तृत्व, भोक्तृत्व, ज्ञातृत्व तथा स्वामित्व, इन चार प्रकार की बुद्धियों का उद्भव, स्थिति और लय होता है ।

इस प्रकार से अनायास ही आत्मा (अपने-आप) को ही बुद्धि में ही कर्ता, भोक्ता, ज्ञाता तथा स्वामी मान लिया जाता है।

फिर आत्मा क्या है? आत्मा न तो कर्ता, न भोक्ता, न ज्ञाता और न ही स्वामी है । अन्तःकरण के ये चार लक्षण, मन की उपाधियाँ हैं। उपाधि ही वह निमित्त है, जिसके बारे में प्रारम्भ के दो श्लोकों (1/31, 11/33) में कहा है।

इस प्रकार वह सभी कुछ, जो कुछ भी होता है वह कर्म / घटना केवल दृश्य प्रतीतिमात्र है। कर्ता, भोक्ता, ज्ञाता तथा स्वामी का अस्तित्व भी केवल कोरी कल्पना ही है।

आत्मा यद्यपि इस समस्त दृश्यमात्र का अधिष्ठान है, दृष्टा और दृश्य भी अन्योन्याश्रित होने से उनका स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है। इस सत्य को जान लेना ही आत्म-ज्ञान और आत्म-निष्ठा भी है। 

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Wednesday, November 3, 2021

निमित्त और उपादान

अध्याय १,

निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।

न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ।।३१।।

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अध्याय ११,

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व

जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।

मयैवेते निहताः पूर्वमेव

निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ।।३३।।

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अध्याय १३

गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।

पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ।।१३।।

अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।

प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ।।१४।।

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सद्दर्शनम् 

सर्वैर्निदानं जगतोऽहमश्च,

वाच्यः प्रभुः कश्चिदपारशक्तिः ।

चित्रेऽत्रेऽत्र लोक्यं च विलोकिता च

पटः प्रकाशोऽप्यभवत् स एकः ।।१।।

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क्या इसका अर्थ यह हुआ कि सृष्टि तो वस्तुतः कभी होती ही नहीं, क्योंकि परमात्मा स्वयं ही जगत् है ।

ऊपर के श्लोकों में यह कहा गया कि परमात्मा ही वैश्वानर तथा सोम का रूप लेता है (न कि उनकी सृष्टि करता है), किन्तु अब यदि अध्याय १० के इन श्लोकों का अवलोकन करें, जिनमें कहा गया है :

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।

अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ।।२०।।

आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् ।

मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ।।२१।।

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।

इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ।।२२।।

रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।

वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्  ।।२३।।

पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् ।

सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ।।२४।।

महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।

यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालय ।।२५।।

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।

गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ।।२६।।

उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् ।

ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् ।।२७।।

आयुधानामहं वज्रं धेनूनानस्मि कामधुक् ।

प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकि ।।२८।।

अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।

पितृणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्  ।।२९।।

('पितृणामर्यमा' में 'तृ' दीर्घ है, जिसे यहाँ यथावत् प्रस्तुत print / typeset करने में कठिनाई है, कृपया 10/29 में देखें, शायद मिल जाएगा,  या फिर अन्यत्र देखें।) 

प्रह्लादास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्  ।

मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ।।३०।।

पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् ।

झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ।।३१।।

सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।

अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ।।३२।।

अक्षराणामकारोस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च ।

अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ।।३३।।

मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् ।

कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ।।३४।।

बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।

मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ।।३५।।

द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्वितामहम् ।

जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्वमतामहम् ।।३६।।

वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः ।

मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ।।३७।।

दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।

मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ।।३८।।

नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।

एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतिर्विस्तरो मया ।।३९।।

यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।

न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ।।४०।।

यद्यद्विभूतिमत्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।

तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् ।।४१।।

10/30 एवं 10/33 में परमात्मा के 'काल' के स्वरूप को दो प्रकार  से व्यक्त किया गया है। 

एक तो वह है जो भौतिकीविदों (कलयतां) के द्वारा प्रतिपादित किया जानेवाला 'काल' है जो कि क्रमशः पुनः पुनः व्यक्त और अव्यक्त (manifest and unmanifest)  होता है, तो दूसरा वह जो अक्षय-स्वरूप अर्थात् अक्षर-स्वरूप है। 

इसे ही शिव-अथर्वशीर्ष में इस प्रकार से कहा गया है :

"अक्षरात्संजायते कालो कालाद् व्यापकः उच्यते व्यापको हि भगवान् रुद्रो भोगायमानो... "

तात्पर्य यह कि भौतिकीविदों द्वारा जिस "काल" का आकलन किया जाता है, वह बनती-मिटती रहनेवाली वस्तु है जो सतत व्यक्त और अव्यक्त होता रहता है। 

इसकी तुलना में परमात्मा वह "अक्षय-स्वरूप" काल है जिससे कि यह सापेक्ष काल पुनः पुनः अस्तित्व ग्रहण करता हुआ और पुनः पुनः विलीन होता हुआ प्रतीत होता है। 

इसी आभासी "काल" से स्थान / आकाश का उद्भव होता है ।

क्या परमात्मा सृष्टि का 'कर्ता' है?

स्पष्ट है कि सृष्टि अभिव्यक्ति है, न कि उसके द्वारा की जानेवाली निर्मिति, क्योंकि परमात्मा स्वयं ही सृष्टि का :

एकमात्र (unique) निमित्त कारण तथा, 

उपादान कारण (effective and material cause),

दोनों ही एक साथ है, या कहें कि परमात्मा स्वयं ही सृष्टा तथा सृष्टि भी है, किन्तु सृष्टिकर्त्ता नहीं है, और न उससे अलग दूसरा कोई सृष्टिकर्ता है। 

अतः यद्यपि यह तय किया जा सकता है कि भौतिक सृष्टि कब हुई, किन्तु उस तथ्य का संबंध केवल सूर्य के उद्भव से ही हो सकता है, न कि शेष अस्तित्व, या काल और स्थान (Time and Space) से ।

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Tuesday, October 26, 2021

सोमः भूत्वा रसात्मकः ।।

अहं वैश्वानरो भूत्वा

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रुद्र ही सोम होकर पृथ्वी में प्रविष्ट होता है, जहाँ वह वनस्पतियों और औषधियों को रसात्मक होकर पुष्ट करता है, वहीं जीवों में वैश्वानर होकर जीवों के द्वारा सेवन किए जानेवाले अलग अलग चार प्रकार के अन्न को पचाने का कार्य भी करता है। 

इस प्रकार एकमेवाद्वितीय परमेश्वर परब्रह्म रुद्र, वैश्वानर, सोम आदि विविध रूप लेकर जगत की सृष्टि, परिपालन और संहार करता है। 

जहाँ एक ओर उस एकमेव ईश्वर, परब्रह्म परमात्मा को भगवान् श्रीकृष्ण ने उत्तम पुरुष एकवचन 'अहं' पद के प्रयोग के द्वारा  श्रीमद्भगवद्गीता में व्यक्त किया है, वहीं भगवान् रुद्र ने भी इसी प्रकार उत्तम पुरुष एकवचन के द्वारा ही उसका / अपने तत्व का वर्णन शिव-अथर्वशीर्ष में किया है ।

वस्तुतः तो शिव-अथर्वशीर्ष के द्वितीय मंत्र में देवतागण रुद्र की स्तुति करते हुए कहते हैं :

यो वै रुद्रः स भगवान् यच्च कृष्णं तस्मै वै नमो नमः ।।९।।

यद्यपि यहाँ "कृष्ण" शब्द वर्ण के अर्थ में प्रयुक्त किया गया है, किन्तु गीता में ही अध्याय १० में भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारा किया गया यह उल्लेख भी दृष्टव्य है :

रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।

वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ।।२३।।

काल-क्रम को आधार माने तो श्रीमद्भगवद्गीता की रचना यद्यपि अथर्वशीर्ष के बाद हुई है, किन्तु वेद तथा पुराण आदि अपौरुषेय होने से उनमें व्यक्त किए गए सत्य काल से प्रभावित नहीं होते। 

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जैसा पहले कहा गया है, 'सोम' जहाँ एक ओर रुद्र का ही पर्याय है, वहीं एक रोचक कथा से यह भी विदित होता है कि क्यों इसे 'देवताओं' के 'पेय' के रूप में जाना जाने लगा। 

जब भगवान् श्रीराम ने रावण का वध कर दिया तब देवता बहुत प्रसन्न हुए और इन्द्र ने भगवान् श्रीराम की स्तुति करते हुए उनसे निवेदन किया कि देवता उनके प्रति अपना अनुग्रह कैसे प्रकट कर सकते हैं? 

तब भगवान् श्रीराम ने इन्द्र से कहा कि वह इस युद्ध में मारे गए सभी वानरों, ऋक्षों आदि पर अमृत की वर्षा कर उन्हें फिर से जीवित कर दे। तब इन्द्र ने ऐसा ही किया । तब अमृत की कुछ बून्दें वहाँ की भूमि पर इधर-उधर बिखर गईं, जिनसे अमृता या सोमवल्ली की उत्पत्ति हुई। 

इसे ही आयुर्वेद में गुडूची कहा जाता है, और इसके नाम से एक औषधिवर्ग ही है, जिसे "गुडूच्यादिवर्ग" कहा जाता है। 

चूँकि इस औषधि के रस को अमृततुल्य माना जाता है इसलिए भी देवताओं के अमृत-पान का संबंध इससे जोड़कर यह कहा जाता है कि देवता किसी विशेष द्रव्य / पेय का पान करते हैं।

किन्तु जैसा पहले कहा गया, उससे यही स्पष्ट है कि "सोम" कोई पेय नहीं है ।

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Saturday, October 23, 2021

त्रैविद्या सोमपाः

पुष्णामि / पचामि 

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"सोमः" शीर्षक से लिखित एक पुस्तक का वीडियो, यू-ट्यूब पर देखा। मेजर जनरल जी. डी. बख्शी द्वारा लिखी गई इस पुस्तक को देखने का सौभाग्य तो नहीं मिला, अतः उस बारे में मेरे द्वारा कुछ लिखने का प्रश्न ही नहीं उठता। बहरहाल, वीडियो पर एक टिप्पणी लिखी, जिसमें यह उल्लेख किया, कि गीता में 'सोम' के विषय में क्या कहा गया है।

गीता अध्याय १५ के निम्न दो श्लोकों में क्रमशः सोम तथा अग्नि का वर्णन इस प्रकार से है :

गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।

पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ।।१३।।

अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।

प्राणायामसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ।।१४।। 

अध्याय ९ के निम्न श्लोक में 'सोमपाः' का प्रयोग भी दृष्टव्य है :

त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा 

यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।

ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक-

मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ।।२०।।

इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण ने उत्तम पुरुष एकवचन क्रियापदों 'पुष्णामि' तथा 'पचामि' के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि वे ही सोम का रूप ग्रहण कर समस्त औषधियों को पुष्टि प्रदान करते हैं, वहीं वे ही वैश्वानर अग्नि के रूप में अन्न के चार प्रकार के पाचन की क्रिया को संपन्न करते हैं ।

उपरोक्त वर्णन से यह स्पष्ट है कि इस प्रकार से जिस 'सोम' को आज के कुछ विद्वान् कोई रसायन या पदार्थ-विशेष मान बैठे हैं, और उसे जड़ी-बूटियों आदि में खोजने की चेष्टा करते हुए उसके विषय में भाँति भाँति के अनुमान लगाते हैं वह कितना त्रुटिपूर्ण है । दूसरी ओर, आयुर्वेद में गुडूची नामक वनस्पति का एक नाम 'सोम' या 'अमृतवल्ली' पाया जाता है ।

इस वनस्पति का रस प्राप्त कर उसे औषधि की तरह से प्रयोग किया जाता है। 

यज्ञ के द्वारा हवन किए जानेवाले द्रव्यों से वैदिक देवताओं का आवाहन किया जाता है और इस दृष्टि से सोम भी इन्द्र, अग्नि,  वायु आदि की तरह देवता-विशेष है, न कि कोई वनस्पति, द्रव्य इत्यादि । 

इसकी पुष्टि शिव-अथर्वशीर्ष से भी होती है जहाँ देवता रुद्र की स्तुति करते हुए मंत्र २ में कहते हैं :

"यो वै रुद्रः स भगवान् यश्च सोमस्तस्मै वै नमो नमः।।८।।"

इससे भी यही स्पष्ट होता है कि 'सोम' के रूप में रुद्र ही यज्ञ में हवन की गई सामग्री को ग्रहण करते हैं ।

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Friday, September 3, 2021

गीता-नवनीत

सर्वोपनिषदो गावः

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जीवन पथ पर वैसे तो हर मनुष्य को चाहे-अनचाहे चलना ही होता है किन्तु अपने इस कार्य को वह चार तरीकों के आधार पर इस प्रकार से सुनिश्चित कर सकता है कि अंततः उसे जीवन में श्रेयस् की प्राप्ति हो जाए। 

गीता का अध्याय ७ का यह श्लोक इसी ओर संकेत करता है :

श्री भगवान् उवाच :

चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।

आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ।।१७।।

वहीं गीता के अध्याय १२ के इस श्लोक में कहा गया है :

श्रेयो हि ज्ञानं अभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते। 

ध्यानात्कर्मफलस्त्यागस्त्याच्छान्तिरनन्तरम् ।।१२।।

इस प्रकार इस श्लोक से श्रेयस् अर्थात् सत्य, ईश्वर, मन की पूर्ण और परम शान्ति की प्राप्ति की अभिलाषा रखनेवाले जिज्ञासुओं के भेद की ओर संकेत किया गया है।

किन्तु इन सभी जिज्ञासुओं के बीच में जो भी भेद दिखलाई देता है वह भी मूलतः पुनः उनकी उसी दो प्रकार की निष्ठा का ही भेद है, जिसे कि अध्याय ३ के इस श्लोक से स्पष्ट किया गया है :

लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ । 

ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनां ।।३।।

इस प्रकार निष्ठा के भेद से ही उपरोक्त चार प्रकार के भिन्न भिन्न तरीकों के प्रयोग में भी अंतर हो सकता है ।

पुनः इसका ही संक्षेप में वर्णन अध्याय ५ के इन श्लोकों में किया गया है :

अर्जुन उवाच :

सन्न्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि । 

यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ।।१।।

श्री भगवान् उवाच :

सन्न्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ ।

तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ।।२।।

ज्ञेयः स नित्यसन्न्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति ।

निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ।।३।।

साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ।

एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ।।४।।

यत्साङ्ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते ।

एकं साङ्ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ।।५।।

सन्न्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः। 

योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म न चिरेणाधिगच्छति।।६।।

इस प्रकार भिन्न भिन्न जिज्ञासुओं को एक ही श्रेयस् की प्राप्ति साङ्ख्य या योग की अपनी अपनी निष्ठा के अनुसार होती है। 

भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता के अध्याय २ में साङ्ख्यरूपी योग का महत्व प्रतिपादित किया, अध्याय ३ में कर्मयोग का, एवं अध्याय ४ में यज्ञ और कर्म के महत्व का वर्णन समान रूप से किया। सन्न्यास का अर्थ है वह, जिसे योग अथवा साङ्ख्य की अपनी निष्ठा के अनुसार सन्न्यास की प्राप्ति हो गई। 

अध्याय ५ में इसीलिए कर्मसन्न्यास-योग का वर्णन किया गया, और उसके महत्व को प्रतिपादित किया गया।

किन्तु इसी क्रम को आगे बढ़ाने हुए अध्याय ६ का प्रारंभ निम्न श्लोक से किया गया :

अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः । 

स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ।।१।।

इसलिए सन्न्यासी यज्ञरूपी कर्म करे या न करे, अग्नि का स्पर्श करे या नहीं, कर्मफल का आश्रय नहीं ग्रहण करता। किन्तु इस सन्न्यास की उपलब्धि के लिए मनुष्य को जो योगाभ्यास करना होता है उस अभ्यास में उस मुनि की परिपक्वता के अनुसार उसे आरुरुक्षु अथवा योगारूढ कहा जाता है। इस प्रकार यद्यपि मुनि का कर्म या तो श्रेयस् की प्राप्ति के उद्देश्य से किया जाता है, या कर्म के शमन के लिए, यह उसकी परिपक्वता के अनुसार होता  है। पुनः यहाँ यह भी कहा गया है कि दोनों ही स्थितियों में योग का अवलम्बन लिया जाता है। इसलिए नित्यसन्न्यासी और योगी में समानता और भिन्नता भी देखी जा सकती है । 

इसे ही अगले श्लोकों में कहा गया है :

श्री भगवान् उवाच :

यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।

न ह्यसन्न्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ।।२।।

तथा,

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।

योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ।।३।।

अध्याय ६ को इसलिए योग अथवा अभ्यासयोग कहा गया। 

इसी क्रम को अध्याय ७ में विस्तारपूर्वक ज्ञानविज्ञानयोग का नाम दिया गया। 

ज्ञानविज्ञानयोग के ही क्रम में अगले अध्याय ८ में ब्रह्मविद्या के माध्यम से ब्रह्म की प्राप्ति के महत्व को तारकब्रह्मयोग नामक अध्याय में स्पष्ट किया गया।

गीता अध्याय २ में यद्यपि साङ्ख्य का तथा अध्याय ३ में कर्म को महत्व देकर उनका वर्णन किया गया, किन्तु इस प्रकरण को अध्याय ४ में इस प्रकार से उद्घाटित किया गया है कि साङ्ख्य की निष्ठा और दुरूहता के कारण उस मार्ग को न ग्रहण करने के इच्छुक और कर्म में रुचि और उसकी निष्ठा रखनेवाले मनुष्य के लिए जो उचित और ग्राह्य है, वह उस राजविद्या राजयोग रूपी कर्मनिष्ठा का अवलम्बन लेकर श्रेयस् की प्राप्ति का अभ्यास कर सके। यह वही योगविद्या है जिसका उपदेश सृष्टि करने के समय परमेश्वर ने विवस्वान (सूर्य) को दिया था, सूर्य से यह उपदेश मनु को प्राप्त हुआ और मनु से इक्ष्वाकु को, इस प्रकार यह भगवान् श्रीराम के वंश में परम्परा से प्राप्त होता रहा। 

अध्याय ४ इस प्रकार से प्रारंभ होता है :

श्री भगवान् उवाच :

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।

विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ।।१।।

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः। 

स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ।।२।।

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः । 

भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ।।३।।

इस प्रकार रामायण के अन्तर उत्तररामायण और उत्तररामायण के अन्तर गीता का प्राकट्य हुआ। 

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Sunday, August 22, 2021

प्रसाद : कामायनी,

हृदय की बात! 

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भरत मुनि के नाट्य-शास्त्र में कुल ३३ भाव हैं,  जिनमें से एक है : निर्वेद ।

यही ३३ (कोटि के) देवता शिव-अथर्वशीर्ष में 'रुद्र' के पर्याय हैं। किन्तु निर्वेद के अतिरिक्त शेष सभी संचारी और व्यभिचारी कहे जाते हैं। यहाँ 'व्यभिचारी' का तात्पर्य 'दुराचारी' नहीं, समय और परिस्थिति के अनुसार वि-अभि-चारी है।

'प्रसाद' की रचना 'कामायनी' पढ़ते समय इस शब्द से कभी मेरा परिचय हुआ था। 

गीता में अध्याय २ में इसका उल्लेख :

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।

तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ।।५२।।

में पाया जाता है ।

कामायनी के,

"रे मन, तुमुल कोलाहल कलय में मैं हृदय की बात रे!"

इस गीत को आशा भोसले ने गाया भी है ।

यह 

"हृदय की बात"

क्या है? 

यह अपने अस्तित्व का भान और उसकी वह सहज स्फुर्णा है, जिसे 'अहं-स्फुर्णा' कहा जाता है। यद्यपि यह विषय-रहित भान नित्य विशुद्ध होता है, किन्तु बुद्धि भूल से इसे ही किसी विषय पर आरोपित कर 'अहंकार' का रूप ले लेती है। यही बुद्धि इस अहंकार-रूपी मोहकलिल को पार कर लेती है तो निर्वेद नामक स्थिति में होती है। वैसे तो बुद्धि के दो प्रकार स्थिति और गति के रूप में होते हैं, किन्तु बुद्धि की निर्वेद नामक यह अवस्था इन दोनों से विलक्षण है, जहाँ उस प्रज्ञा का उन्मेष होता है, जिसके प्रतिष्ठित हो जाने पर मनुष्य अपनी आत्मा को स्वरूपतः जान लेता है। 

"श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च" के माध्यम से, श्रुतियों और शास्त्रों आदि के द्वारा जिस बुद्धि के चंचल होने का संकेत किया गया है, वही बुद्धि इस प्रकार मोहकलिल को पार कर, अचल समाधि में कैसे दृढ हो जाती है, इसका वर्णन 

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।

समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ।।५३।।

के माध्यम से पुनः, "योग" की प्राप्ति के वर्णन में है। 

इसी योग की प्राप्ति के बाद योगारूढ हुए स्थितप्रज्ञ, समाधिस्थ हुए मुमुक्षु की स्थिति का वर्णन,

क्रमशः श्लोक क्रमांक ५४, ५५, तथा ५६ में है :

स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव । 

स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ।।५४।।

प्रजहाति यदा कामान्सर्वार्थान्पार्थ मनोगतान् ।

आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ।।५५।।

दुःखेष्वनुद्गविग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।

वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ।।५६।। 

इस प्रज्ञा और इसके लक्षणों का वर्णन पुनः

"तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।"

के द्वारा इसी अध्याय के अगले श्लोकों ५७ तथा ५८ में भी प्राप्त होता है :

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।

नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।।५७।।

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः ।

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।।५८।।

प्रसंगवश, 

योगारूढ मुनि / योगी, तथा आरुरुक्षु मुनि के बारे में गीता के अध्याय ६ के इस श्लोक ३, का उल्लेख करना यहाँ उपयोगी होगा :

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।

योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ।।३।।

किन्तु यदि इस सब सन्दर्भ से थोड़ा हटकर यह देखें कि 'प्रसाद' के 'निर्वेद' सर्ग के इस गीत में 'पवन (प्राण) की प्राचीर' और 'चेतना थक सी रही' को जिस प्रकार 'झूलते विश्व-दिन' के परिप्रेक्ष्य में संयोजित किया गया है, तो कहना होगा कि इससे कवि की यह रचना को कालजयी 'हृदय की बात' हो जाती है!

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उल्लिखित गीत इस प्रकार से है:

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रे मन! 

तुमुल-कोलाहल कलय में,

मैं, हृदय की बात रे! 

विकल होकर, नित्य चंचल,

खोजती जब नींद के पल, 

चेतना थक-सी रही तब, 

मैं, मलय की बात रे! 

चिर-विषाद-विलीन-मन की, 

इस व्यथा के तिमिर-वन की, 

मैं, उषा-सी ज्योति-रेखा, 

कुसुम-विकसित, प्रात रे! 

जहाँ मरु-ज्वाला धधकती,

चातकी कन को तरसती,

उन्हीं जीवन घाटियों में, 

मैं, सरस बरसात रे! 

पवन की प्राचीर में रुक, 

जला जीवन जी रहा झुक, 

इस सुलगते विश्व-दिन की,

मैं, कुसुम-ऋतु, रात रे!

चिर निराशा, नीरधर से,

प्रतिच्छायित,अश्रु-सर में,

उस स्वरलहरी के, अक्षर सब,

संजीवन-रस बने-घुले,

रे मन! 

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Thursday, August 19, 2021

तप, ज्ञान, कर्म और योग

अभ्यासयोग 

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अध्याय ३ में भगवान् श्रीकृष्ण ने अध्यात्म-विषयक जिज्ञासुओं में दो प्रकार की निष्ठा का वर्णन किया है :

लोकेऽस्मिन्द्विविधानिष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।

ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ।।३।।

दो प्रकार की निष्ठाएँ क्रमशः साँख्य एवं योग की दृष्टि से कहने के अनंतर अर्जुन को इस विषय में शंका होती है कि निष्ठा की भिन्नता से क्या मुमुक्षु की उपलब्धि भी भिन्न भिन्न प्रकार की होती है?

अतः तब अध्याय ५ में भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन की इस शंका का निवारण करते हुए उससे कहते हैं :

साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः। 

एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्।।४।।

इस प्रकार गीता में ज्ञान-विषयक दो धारणाएँ प्राप्त होती हैं:

एक तो साङ्ख्यदर्शन के अनुसार होनेवाला आत्म-ज्ञान, जो कि मुक्ति का साधन है, तथा दूसरा सैद्धान्तिक तत्त्वज्ञान, जो केवल शास्त्रीय होता है और वस्तुतः अज्ञान का ही विशेष प्रकार है। 

इस प्रकार का ज्ञान भी यद्यपि सैद्धान्तिक होता है, किन्तु फिर भी वह ज्ञानरहित अभ्यास की अपेक्षा श्रेष्ठ होता है। 

इसलिए अध्याय १२ में भगवान् श्रीकृष्ण (सैद्धान्तिक ज्ञान से रहित) तप करनेवाले अभ्यासयोगियों अर्थात् तपस्वियों से इस ज्ञान से युक्त ज्ञानियों को अधिक श्रेष्ठ कहते हुए ध्यानयोगियों को ऐसे ज्ञानियों से भी श्रेष्ठतर कहते हैं। पुनः ऐसे ध्यानयोग में संलग्न, ध्यानरूपी कर्म करने की तुलना में उन्हें और भी अधिक श्रेष्ठ कहते हैं, जो कर्मफल (की आशा) को भी त्याग देते हैं।

अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।

अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय।।९।।

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव। 

मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ।।१०

अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः। 

सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्।।११।।

तथा अंत में :

श्रेयो हि ज्ञानं अभ्यासाज्ज्ञाद्ध्यानं विशिष्यते। 

ध्यानात्कर्मफलस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ।।१२।।

इस प्रकार तप, कर्म, ज्ञानरहित अभ्यास अर्थात् तप और ज्ञान-सहित कर्म को क्रमशः श्रेष्ठतर कहते हुए, अन्त में कर्मफल को ही त्याग देने को शान्ति की प्राप्ति का साधन कहते हैं। 

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Friday, July 30, 2021

संयम

पातञ्जल योग-सूत्रों में वर्णित संयम 

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श्रीमदभगवद्गीता में 

"संयम" 

शब्द का प्रयोग क्रमशः इस प्रकार से है :

अध्याय २

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।

वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।६१।।

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। 

यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः।।६९।।

अध्याय ३

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्। 

इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते।।६।।

अध्याय ४

श्रोत्रादीनिन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति। 

शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति।। २६

अध्याय ६

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः। 

मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः।। १४

अध्याय ८

सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च। 

मूर्ध्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्।।१२।।

अध्याय १०

अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्। 

पितृणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्।।२९।।

पातञ्जल योग-दर्शन के चार अध्यायों में से समाधिपाद नामक पहले अध्याय में समाधि का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है।

दूसरे अध्याय साधनपाद में समाधि की प्रक्रिया में जिन साधनों की सहायता लेना आवश्यक है, उन साधनों का वर्णन विस्तार से किया गया है। 

उन साधनों का ठीक से प्रयोग करने पर चित्त का रूपान्तरण जिस प्रकार से हो जाता है, और आत्मा के स्वरूप को जानकर वह जिस कैवल्य में दृढतापूर्वक अधिष्ठित हो जाता है,  उस कैवल्य-मुक्ति का वर्णन किया गया है। 

विभूतिपाद के प्रथम तीन सूत्र क्रमशः इस प्रकार से हैं :

देशबन्धश्चित्तस्य धारणा।।१।।

तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्।।२।।

तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः।।३।।

उपरोक्त सूत्र में समाधिपाद के सूत्र :

स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का ।।४३।।

का संदर्भ 'स्वरूपशून्यमिव' के तुल्य और समानार्थी भी है।

इस प्रकार गीता में प्रयुक्त 'समाधि' तथा 'ध्यान', 'संयम' की सिद्धि में सहायक हैं और 'धारणा', 'ध्यान' तथा 'समाधि' का सामान्य और विशेष अर्थ 'संयम' के संदर्भ में दृष्टव्य है ।

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Thursday, July 29, 2021

समाधि, समाधातुम्,

ब्रह्मकर्मसमाधिना 4/24,

समधिगच्छति 3/4,

समाधातुम् 12/9,

समाधाय 17/11,

समाधौ 2/44, 2/53,

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पातञ्ल योगसूत्र का प्रारंभ समाधिपाद से होता है। 

पुनः समाधि के प्रकारों में क्रमशः 

वितर्कविचारानन्दास्मितानुगमात् सम्प्रज्ञातः ।। १७ ।।

तथा 

विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः ।।१८ ।।

(समाधिपाद) 

इस प्रकार से मुख्यतः समाधि के  दो प्रकार वर्णित किए गए हैं। 

इसका अर्थ यह हुआ कि समाधिस्थ 'मन' इन दो प्रकारों में से किसी एक में समाधान-पूर्वक अवस्थित होता है ।

वितर्क का अर्थ हुआ तर्क-वितर्कयुक्त, विश्लेषणपरक चिन्तन । 

विचार का अर्थ हुआ किसी व्यवधान से रहित सरलता से किया जानेवाला वैचारिक क्रम, जिसमें तर्क-वितर्क को अधिक महत्व नहीं दिया जाता।

आनन्द का अर्थ हुआ भाव या भावना में निमग्न होने से प्राप्त होने वाला सुख। 

अस्मिता का अर्थ हुआ ज्ञातृत्व, कर्तृत्व, भोक्तृत्व, और स्वामित्व की भावना में निमग्न होने से प्राप्त होनेवाला सुख अर्थात् अहं-संकल्प। 

इस प्रकार इन चारों के संबंध से युक्त अस्मिता रूप समाधान, या वितर्क, विचार और आनन्द के रूप में होने वाला समाधान, यह  सम्प्रज्ञात समाधि है (उपरोक्त सूत्र १७),

इसी प्रकार इससे अन्य समाधि वह है जिसमें मन ज्ञात- से परे चला जाता है (उपरोक्त सूत्र १८),

किन्तु वहाँ भी संस्काररूप में तो 'मन' होता ही है जो इस समाधि से व्युत्थान की दशा में पुनः पूर्ववत् कार्य करने लगता है ।

यद्यपि इस दूसरी समाधि को प्राप्त कर लेने पर इससे भी 'मन' पर एक नया संस्कार होता है जो पूर्व संस्कारों के बीज को दग्ध कर देता है।

इस प्रकार 'चित्त' नामक वस्तु का अस्तित्व क्रमशः संस्कार, 'मन' की वृत्ति तथा समाधानयुक्त दशा के रूप में हुआ करता है। 

यद्यपि असम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति हो जाने पर कुछ या सारे बीजरूप संस्कार दग्ध हो जाते हैं किन्तु उस समाधि में निरंतर बने रहने से वे पूरी तरह भस्म हो जाते हैं और यही वास्तविक ज्ञानाग्नि है ।

पातञ्जल योगसूत्र में 'समाधि' और 'संयम' इन दोनों का अभिप्राय भिन्न भिन्न है, क्योंकि विभूतिपाद के 

देशबन्धश्चित्तस्य धारणा ।।१।।

तत्रप्रत्ययैकतानता ध्यानम्  ।।२।।

तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः ।।३।।

तथा, 

त्रयमेकत्र संयमः।।४।।

से यही प्रतीत होता है। 

इसी प्रकार 'तदेवार्थमात्रनिर्भासं' की पुनरावृत्ति समाधिपाद के

स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का ।।४३।। 

सूत्र से सुसंगत है। 

पुनः 'अर्थ' का अभिप्राय वही है जो 

इन्द्रियार्थान् 3/6,

इन्द्रियार्थेभ्यः  2/58, 2/68,

तथा 

इन्द्रियार्थेषु 5/9, 6/4, 13/8,

में है, अर्थात् इन्द्रियों के विषय ।

किन्तु 'समाधातुम्' का प्रयोग अध्याय १२ में :

अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थितम् ।

अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ।।९।।

दृष्टव्य है। यह भी उल्लेखनीय है कि उपरोक्त श्लोक में 'योग'  शब्द भी देखा जा सकता है। 

पुनः अध्याय ३ के निम्न श्लोक में समधिगच्छति शब्द का प्रयोग भी उपलब्धि के अर्थ में किया गया है 

न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते ।

न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति  ।।४।।

समाधान और समाधि एक ही प्रक्रिया का प्रारंभ और पूर्णता है । यह अध्याय २ के निम्न श्लोकों से भी स्पष्ट होता है --

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् ।

व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ।।४४।।

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला ।

समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ।।५३।।

स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव ।

स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ।।५४।।

किन्तु गीता में भी उसी प्रकार से 'संयम' को 'समाधि' की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है, जैसा महर्षि पतञ्जलि ने उनके योगसूत्र में दिया है। 

इस बारे में अगले पोस्ट में! 

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Saturday, July 24, 2021

तान्यहं और तानहं

गीता में 'अहं' पद का प्रयोग 

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अध्याय 4 -श्लोक 5, 

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।

तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप ।।

(4/5)

अध्याय 16, -श्लोक 19,

तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् ।

क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ।।

(16/19)

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इस पोस्ट का सन्दर्भ कल के मेरे द्वारा अपने  vinaysv  blog  में लिखे गए पोस्ट 

~~कर्पूरगौरं~~

से है। 

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जो पुरुष अपने आत्म-स्वरूप से अभिज्ञ होता है, वह अपने तथा दूसरों के भी इन असंख्य आभासी जन्म-मृत्यु आदि को जानते हुए, अपनी अविनाशी आत्मा के जन्म तथा मृत्यु से रहित होने के सत्य से भी अवगत होता है । जबकि वह मनुष्य, जो अपने आपको जन्म लेनेवाला तथा मरणशील मानता है, वह अपनी इस निज आत्मा की अविनाशिता से अपरिचित रह जाता है।  

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जो पुरुष अपने अन्तर्हृदय में नित्य विद्यमान भगवत्सत्ता अर्थात्  भगवत्ता की उपेक्षा जाने-अनजाने, मोह या अज्ञानवश करते हुए, उस परमात्मा से द्वेष करते हैं, और उसका इस प्रकार तिरस्कार करते हैं, उनका वही निज आत्म-स्वरूप परमेश्वर उन्हें पुनः पुनः सतत आसुरी योनियों में जन्म लेने के लिए बाध्य करता है।

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