Sunday, May 25, 2014

आज का श्लोक, ’संन्यासम्’ / ’saṃnyāsam’,

आज का श्लोक,  ’संन्यासम्’ / ’saṃnyāsam’,
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’संन्यासम्’ / ’saṃnyāsam’,  - संन्यास (की प्रक्रिया)

अध्याय 5, श्लोक 1,

अर्जुन उवाच -
सन्न्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि ।
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥
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(सन्न्यासम् कर्मणाम् कृष्ण पुनः योगम् च शंससि ।
यत्-श्रेयः एतयोः एकं तत् मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥)
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भावार्थ :
अर्जुन ने कहा :
हे कृष्ण! आप कर्मों के संन्न्यास (त्याग) की बात करते हैं, किन्तु फिर साथ ही योग की भी प्रशंसा कर रहे हैं ।  इन दोनों में से कौन सा एक दूसरे की अपेक्षा अधिक श्रेयस्कर है, इस बारे में मुझसे सुनिश्चित रूप से कहें ।
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अध्याय 6, श्लोक 2,
यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव ।
न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ॥
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(यम् सन्न्यासम् इति प्राहुः योगम् तम् विद्धि पाण्डव ।
न हि असन्न्यस्तसङ्कल्पः योगी भवति कश्चन ॥)
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भावार्थ :
जिसे संन्यास कहा जाता है तुम उसे ही योग जानो , क्योंकि संकल्पों का त्याग किए बिना कोई भी मनुष्य योगी नहीं होता ।
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टिप्पणी :
संन्यास शब्द का सीधा तात्पर्य तो ’त्याग कर देना’ होता है, किन्तु त्याग केवल बाह्य आचरण के साथ-साथ मन के स्तर पर ’कर्तापन’ की भावना के त्याग के रूप में भी होता है तो वही ’योग’ अर्थात् ’कर्मयोग’ कहा जाता है । इसलिए ’संन्यास’ और योग मूलतः एक ही प्रक्रिया हैं ।
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अध्याय 18, श्लोक 2,

श्रीभगवानुवाच :

काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्न्यासं कवयो विदुः ।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥
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(काम्यानाम् कर्मणाम् न्यासं सन्न्यासं कवयः विदुः ।
सर्वकर्मफलत्यागम् प्राहुः त्यागं विचक्षणाः ॥)
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भावार्थ :
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा :
विद्वान् पुरुष कामनाओं की प्राप्ति के उद्देश्य से किए जानेवाले कर्मों का त्याग ही संन्यास है, ऐसा समझते हैं, जबकि (अन्य) विचारपूर्वक देखने-जाननेवालों के मतानुसार समस्त कर्मफल का त्याग ही वस्तुतः त्याग होता है ।
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टिप्पणी :
उपरोक्त श्लोक में संक्षेप में संन्यास को परिभाषित किया गया है । यह जानना रोचक होगा कि इसका शाब्दिक अर्थ व्युत्पत्ति के आधार पर मुख्यतः दो प्रकार से प्राप्त होता है ।
’नि’ उपसर्ग के साथ ’अस्’ धातु (’होने) के अर्थ में संयुक्त करने पर ’न्यस्’ और फिर इससे अपत्यार्थक ’न्यास’ व्युत्पन्न होता है ।
’नि’ उपसर्ग के साथ ’आस्’ धातु (बैठने, स्थिर होने के अर्थ में) से ’न्यास्’ और ’न्यास’ प्राप्त होता है ।
तात्पर्य यह कि एक ओर जहाँ किसी वस्तु को उसके यथोचित स्थान पर रखना ’न्यास’ है, तो दूसरी ओर अपने स्वाभाविक स्वरूप (आत्मा) में मन को स्थिरता से रखना भी ’न्यास’ ही है । इसी को गौण अर्थ में न्यास अर्थात् अंग्रेज़ी भाषा के trust के लिए हिन्दी में प्रयुक्त किया जाता है ।
यह तो हुआ ’न्यास’ । इसके साथ ’सं’ उपसर्ग लगा देने से इसे पूर्णता प्राप्त हो जाती है और ’संन्यास’ प्राप्त हो जाता है  ।
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’संन्यासम्’ / ’saṃnyāsam’,  - Renunciation of different forms.

Chapter 5, śloka 1,
अर्जुन उवाच -
sannyāsaṃ karmaṇāṃ kṛṣṇa
punaryogaṃ ca śaṃsasi |
yacchreya etayorekaṃ
tanme brūhi suniścitam ||
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(sannyāsam karmaṇām kṛṣṇa
punaḥ yogam ca śaṃsasi |
yat-śreyaḥ etayoḥ ekaṃ
tat me brūhi suniścitam ||)
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Meaning :
arjuna said : O  kṛṣṇa ! You speak of  Renunciation (sannyāsa) of action (karma), and at the same time You also praise yoga. Please tell me with certainty, which of the two is superior.
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Note :
In this and following śloka of this Chapter 5, the meaning and essence of Renunciation is explained. The Renunciation could be either at the formal level when one renounces the possession of things, but does not give up the idea that the action happens because of the three attributes (guṇa) of prakṛti  and one is always free and unaffected from all action (karma) and the notion of "I do  / I don't do" are but illusion only, Or at a deeper level of understanding this truth.
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Chapter 6, śloka 2,
yaṃ sannyāsamiti prāhur-
yogaṃ taṃ viddhi pāṇḍava |
na hyasaṃnyastasaṅkalpo
yogī bhavati kaścana ||
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(yam sannyāsam iti prāhuḥ
yogam tam viddhi pāṇḍava |
na hi asannyastasaṅkalpaḥ
yogī bhavati kaścana ||)
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Meaning :
What is described as (sannyāsa) Renunciation, know well that yoga is the same, O pāṇḍava (arjuna)! No one can be a yogī without first having relinquished the mode of will prompted by desire (saṃkalpa vṛtti).
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Chapter 18, śloka 2,

śrībhagavānuvāca :

kāmyānāṃ karmaṇāṃ nyāsaṃ
sannyāsaṃ kavayo viduḥ |
sarvakarmaphalatyāgaṃ
prāhustyāgaṃ vicakṣaṇāḥ ||
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(kāmyānām karmaṇām nyāsaṃ
sannyāsaṃ kavayaḥ viduḥ |
sarvakarmaphalatyāgam
prāhuḥ tyāgaṃ vicakṣaṇāḥ ||)
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Meaning :
śrīkṛṣṇa said :
Learned know, giving up of the actions prompted by the desires of enjoyments is the right kind of Renunciation,  And giving up the fruits of each and every action is termed as tyāgaṃ by the wise, vicakṣaṇā .
Note : Summarily there is a renunciation of action (karma), and there is another, of the fruits of all action (phalatyāga).
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Note :
’नि’ उपसर्ग, ’ni’ upasarga, associated with ’अस्’ धातु,  ’as’- dhātu (in the sense of being) gives us : ’न्यस्’ ’nyas’ and then we derive ’न्यास’ ’nyāsa’.
 ’नि’ उपसर्ग ’ni’ upasarga associated with ’आस्’ धातु ’ās’ dhātu ( in the sense of 'staying') gives us ’न्यास्’ ’nyās’ and then we derive ’न्यास’ ’न्यास’.
Thus, संन्यास / sannyāsa means right disposal of things
The prefix (upasarga) ’सं’ ’saṃ’ attached ’न्यास्’ ’nyās’ gives us the term   संन्यास / sannyāsa.
The prefix ’सं’ ’saṃ’ signifies perfection.
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