Saturday, May 24, 2014

आज का श्लोक, ’संपत्’ / ’saṃpat’,

आज का श्लोक,  ’संपत्’ / ’saṃpat’,
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’संपत्’ / ’saṃpat’ - सम्पदा, संस्कार, पूर्व-अर्जित निधि,

अध्याय 16, श्लोक 5,

दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥
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दैवी सम्पत्-विमोक्षाय निबन्धाय आसुरी मता ।
मा शुचः सम्पदम् दैवीम् अभिजातः असि पाण्डव ॥)
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भावार्थ :
इन दो प्रकार की सम्पदों में से दैवी तो मुक्ति का हेतु होती है, जबकि आसुरी मनुष्य के बन्धन का कारण होती है । हे पाण्डुपुत्र अर्जुन! तुम इस विषय में शोक मत करो, व्याकुल मत होओ, क्योंकि तुमने निश्चित ही दैवी सम्पदा से संपन्न होते हुए जन्म लिया है ।

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’संपत्’ / ’saṃpat’ - wealth, attributes, potential qualities and acquired tendencies.

Chapter 16, shloka 5,

daivī sampadvimokṣāya
nibandhāyāsurī matā |
mā śucaḥ sampadaṃ
daivīmabhijāto:'si pāṇḍava ||
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daivī sampat-vimokṣāya
nibandhāya āsurī matā |
mā śucaḥ sapadam daivīm
abhijātaḥ asi pāṇḍava ||)
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Meaning :
The daivī -divine attributes lead one to the liberation of the self, while the āsurī - demonic, keep one in the bondage. Grieve not O arjuna, for you are born with divine attributes.
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