Monday, May 5, 2014

आज का श्लोक, ’ संश्रिताः ’ / ’saṃśritāḥ’,

आज का श्लोक,  ’संश्रिताः’ / ’saṃśritāḥ’
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 ’संश्रिताः’ /  ’saṃśritāḥ’ - से परिपूर्ण, पर अवलंबित,

अध्याय 16, श्लोक 18,

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥
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(अहङ्कारम् बलम् दर्पम् कामं क्रोधम् च संश्रिताः
माम् आत्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तः अभ्यसूयकाः ॥)
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भावार्थ :
आसुरी प्रकृति वाले मनुष्यों का वर्णन करते हुए इस श्लोक में श्रीभगवान् कृष्ण आगे कहते हैं, कि अएसे मनुष्य अहंकार, बल, दर्प (गर्व), कामना, और क्रोध से भरे होते हैं, दूसरों की निन्दा करनेवाले ये मनुष्य अपने तथा अन्य सभी जीवों में अवस्थित मुझ अन्तर्यामी से  अकारण द्वेष रखते हैं ।
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’संश्रिताः’ / ’saṃśritāḥ’ - clinging to,

Chapter 16, shloka 18,

ahaṅkāraṃ balaṃ darpaṃ
kāmaṃ krodhaṃ ca saṃśritāḥ |
māmātmaparadeheṣu
pradviṣanto:'bhyasūyakāḥ ||
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(ahaṅkāram balam darpam
kāmaṃ krodham ca saṃśritāḥ |
mām ātmaparadeheṣu
pradviṣantaḥ abhyasūyakāḥ ||)
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Meaning :
Such people having āsurī prakṛti / pravṛtti, -inborn evil tendencies, ego-centered attitude, strength, arrogance, desire and anger, hate Me, -the Being present ever, as the most intimate Self in all beings, including themselves also.
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