Sunday, May 25, 2014

आज का श्लोक, ’संन्यासिनाम्’ / ’saṃnyāsinām’,

आज का श्लोक,  ’संन्यासिनाम्’ / ’saṃnyāsinām’,  
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’संन्यासिनाम्’ / ’saṃnyāsinām’ - संन्यासियों का,
  
अध्याय 18, श्लोक 12,

अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्न्यासिनां क्वचित् ॥
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(अनिष्टम्-इष्टम् मिश्रम् च त्रिविधम् कर्मणः फलम् ।
भवति-अत्यागिनाम् प्रेत्य न तु सन्न्यासिनाम् क्वचित् ॥)
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भावार्थ :
मृत्यु होने के पश्चात् कर्म (तथा उसके फल की कामना) को न त्याग सकनेवाले मनुष्यों को, उनके कर्मों का कर्मफल इष्ट, अनिष्ट एवम् मिश्रित इन तीन रूपों में भोगना पड़ता है, जबकि संन्यासी -अर्थात् जिन्हें यह स्पष्ट होता है कि कर्म प्रकृति के तीन गुणों का कार्य है, और मैं / स्वरूप) / आत्मा नित्य अकर्ता, उन्हें कदापि नहीं ।
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’संन्यासिनाम्’ / ’saṃnyāsinām’ - of those who have renounced the fruits of actions (karma).

Chapter 18, shloka 12,

aniṣṭamiṣṭaṃ miśraṃ ca
trividhaṃ karmaṇaḥ phalam |
bhavatyatyāgināṃ pretya
na tu sannyāsināṃ kvacit ||
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(aniṣṭam-iṣṭam miśram ca
trividham karmaṇaḥ phalam |
bhavati-atyāginām pretya
na tu ’saṃnyāsinām’ kvacit ||)
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Meaning :
Those who don't renounce action ’karma’ and are indulged in it because of the desire of the fruits have to experience, enjoy or suffer the good, evil or mixed effects of those actions ’karma’ in the form of their fruits.While those who have got rid of the sense of doer-ship and there-by the ’karma’ and have understood well that all actions are the play of the 3 attributes of  ’prakṛti’ never (have to experience, enjoy or suffer such fruits).
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 Note :
 
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