Thursday, May 22, 2014

आज का श्लोक, ’सम्पदम्’ / ’sampadam’,

आज का श्लोक,  ’सम्पदम्’ / ’sampadam’,
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’सम्पदम्’ / ’sampadam’, - संपत्ति, पूर्वार्जित संचित निधि,

अध्याय 16, श्लोक 3,

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता ।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥
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(तेजः क्षमा धृतिः शौचम् अद्रोहः नातिमानिता ।
भवन्ति सम्पदम् दैवीम् अभिजातस्य भारत ॥)
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भावार्थ : तेज अर्थात् दूसरों को सहज ही प्रभावित कर देने का गुण, क्षमा, धैर्य, देह-मन की स्वच्छता, किसी के प्रति तिरस्कार की भावना न होना, अपने-आप के श्रेष्ठ होने का गर्व न होना, ये सभी (तथा पूर्व के दो श्लोकों में वर्णित दूसरे लक्षण) दैवी सम्पदा से संपन्न पुरुषों में पाए जाते हैं ।
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टिप्पणी : इस अध्याय के प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण ने दैवी सम्पदा क्या है, और उससे संपन्न मनुष्य के लक्षण स्पष्ट किए हैं । सभी मनुष्य अपने संस्कारों के रूप में दैवी और आसुरी सम्पदाओं सहित मनुष्य-जन्म ग्रहण करते हैं । और उनकी मात्रा और शक्ति के अनुसार जीवन में सब-कुछ शुभ-अशुभ प्राप्त करते हैं ।
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अध्याय 16, श्लोक 4,

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ॥
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(दम्भः दर्पः अभिमानः च क्रोधः पारुष्यम् एव च ।
अज्ञानम् च अभिजास्य पार्थ सम्पदम् आसुरीम् ॥)
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भावार्थ : हे पार्थ (अर्जुन) ! दम्भ, गर्व, अभिमान, क्रोध, और कठोरता, तथा अज्ञान, आसुरी सम्पदा से संपन्न पुरुषों में पाए जानेवाले लक्षण हैं ।
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अध्याय 16, श्लोक 5,

दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥
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दैवी सम्पत्-विमोक्षाय निबन्धाय आसुरी मता ।
मा शुचः सम्पदम् दैवीम् अभिजातः असि पाण्डव ॥)
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भावार्थ :
इन दो प्रकार की सम्पदों में से दैवी तो मुक्ति का हेतु होती है, जबकि आसुरी मनुष्य के बन्धन का कारण होती है । हे पाण्डुपुत्र अर्जुन! तुम इस विषय में शोक मत करो, व्याकुल मत होओ, क्योंकि तुमने निश्चित ही दैवी सम्पदा से संपन्न होते हुए जन्म लिया है ।
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’सम्पदम्’ / ’sampadam’,  - wealth, qualities, earned by one's good or evil deeds and tendencies, one is born with.

Chapter 16, shloka 3,
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tejaḥ kṣamā dhṛtiḥ śaucam-
adroho nātimānitā |
bhavanti sampadaṃ daivīm-
abhijātasya bhārata ||
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(tejaḥ kṣamā dhṛtiḥ śaucam
adrohaḥ nātimānitā |
bhavanti sampadam daivīm
abhijātasya bhārata ||)
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Meaning :
Brilliance of the spiritual kind, forgiveness, fortitude, cleanliness and purity of mind, body and speech (behavior), absence of hatred, lack of self-pride, all these constitute the wealth that is of the daivī - divine kind.

Note :
In the shlokas 1 and 2, of this Chapter 16, śrīkṛṣṇa explained to arjuna the kinds symbolic of divine tendencies and the same also in this 3rd.



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Chapter 16, shloka 4,
dambho darpo:'bhimānaśca
krodhaḥ pāruṣyameva ca |
ajñānaṃ cābhijātasya
pārtha sampadamāsurīm ||
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(dambhaḥ darpaḥ abhimānaḥ ca
krodhaḥ pāruṣyam eva ca |
ajñānam ca abhijātasya
pārtha sampadam āsurīm ||)
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Meaning :
Hypocrisy, arrogance, aggressiveness, self-pride, anger, rudeness as well as ignorance, these all constitute the wealth that is of the āsurī -demonic / evil kind.
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Chapter 16, shloka 5,
daivī sampadvimokṣāya
nibandhāyāsurī matā |
mā śucaḥ sampadaṃ 
daivīmabhijāto:'si pāṇḍava ||
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daivī sampat-vimokṣāya
nibandhāya āsurī matā |
mā śucaḥ sampadam daivīm
abhijātaḥ asi pāṇḍava ||)
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Meaning :
The daivī -divine attributes lead one to the liberation of the self, while the āsurī - demonic, keep one in the bondage. Grieve not O arjuna, for you are born with divine attributes.
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