Wednesday, October 1, 2014

17/16,

आज का श्लोक,
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अध्याय 17, श्लोक 16,

मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ।
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(मनःप्रसादः सौम्यत्वम् मौनम् आत्मविनिग्रहः
भावसंशुद्धिः इति एतत् तपः मानसम् उच्यते ॥)
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भावार्थ :
चित्त की प्रसन्नता, स्वाभाविक शान्ति, भगवत् / आत्म-चिन्तन-परायणता, मन का विवेक द्वारा निग्रह, एवं अन्तःकरण के भावों की अत्यन्त पवित्रता इस प्रकार के तप को मानस तप कहा जाता है ।
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Chapter 17, śloka 16,

manaḥprasādaḥ saumyatvaṃ
maunamātmavinigrahaḥ |
bhāvasaṃśuddhirityetat-
tapo mānasamucyate |
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(manaḥprasādaḥ saumyatvam
maunam ātmavinigrahaḥ
bhāvasaṃśuddhiḥ iti etat
tapaḥ mānasam ucyate ||)
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Meaning :
Serenity and calm, inclination to contemplate about The Lord / Self, restraining the tendencies of mind with due attention over them, purity of the thought and feelings, these are called the austerities (tapa) at the level of the mind.
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