Wednesday, October 15, 2014

आज का श्लोक, ’योगस्य’ / ’yogasya’

आज का श्लोक, ’योगस्य’ / ’yogasya’ 
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’योगस्य’ / ’yogasya’ - योग का, योग-विषयक,

अध्याय 6, श्लोक 44,

पूर्वाभ्यासेन तेनैव  ह्रियते ह्यवशोऽपि  सः ।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्माति वर्तते ॥
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(पूर्वाभ्यासेन तेन एव ह्रियते हि-अवशः अपि सः ।
जिज्ञासुः अपि योगस्य शब्दब्रह्म-अतिवर्तते ॥)
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भावार्थ :
जिस योगी की मृत्यु योग की पूर्णता को प्राप्त करने से पहले हो जाती है, ऐसा मनुष्य भी अपने संस्कारों के बल से खींचा जाकर किसी उपयुक्त कुल में जन्म लेता है, जहाँ उसे ऐसा उचित वातावरण मिलता  है, जिससे वह पुनः सम्यक मार्ग को ग्रहण कर लेता है, और ब्रह्म के शाब्दिक रूप से परे जाकर तत्व को प्राप्त हो जाता है ।
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’योगस्य’ / ’yogasya’ - of yoga,

Chapter 6, śloka 44,

pūrvābhyāsena tenaiva
hriyate hyavaśo:'pi  saḥ |
jijñāsurapi yogasya 
śabdabrahmāti vartate ||
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(pūrvābhyāsena tena eva
hriyate hi-avaśaḥ api saḥ |
jijñāsuḥ api yogasya 
śabdabrahma-ativartate ||)
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Meaning :
A yogī, the aspirant for Truth, never falls from the path of yoga, Though if  dies before reaching the goal of Self-realization, because 'drawn' by the force of the latent tendencies (saṃskāra), he is 'reborn' in a noble clan  where he comes again in touch with the right teachings that leads him onto the right path, transcends the mere verbal descriptions of Brahman and attains the Reality (Brahman) in true sense of the word.
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