Tuesday, October 7, 2014

आज का श्लोक, ’योगाय’ / ’yogāya’,

आज का श्लोक, ’योगाय’ / ’yogāya’
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’योगाय’ / ’yogāya’ - योग में, योग के अभ्यास में,

अध्याय 2, श्लोक 50,

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥
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(बुद्धियुक्तः जहाति इह उभे सुकृतदुष्कृते ।
तस्मात्-योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ।)
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भावार्थ :
समबुद्धि रखनेवाला मनुष्य शुभ तथा अशुभ, दोनों ही प्रकार के कर्मों को इसी लोक में (जीवित रहते हुए ही) भली प्रकार से त्याग देता है (-कर्मसंन्यास), इसलिए (समत्वबुद्धि के माध्यम से योगरत हो जाओ, क्योंकि योग का तात्पर्य है कर्म करने के कौशल में कुशल हो जाना ।
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’योगाय’ / ’yogāya’ - with a purpose of practicing yoga,

Chapter 2, śloka 50,

buddhiyukto jahātīha
ubhe sukṛtaduṣkṛte |
tasmādyogāya yujyasva
yogaḥ karmasu kauśalam ||
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(buddhiyuktaḥ jahāti iha
ubhe sukṛtaduṣkṛte |
tasmāt-yogāya yujyasva
yogaḥ karmasu kauśalam |)
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Meaning :
One, who has attained Wisdom, is Wise, renounces the noble and ignoble both kinds of actions (by understanding the fact and refusing to accept the notion ; 'I do' / 'I don't do', - he is aware that actions / incidences, happen on their own.)
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