Thursday, February 6, 2014

आज का श्लोक / 'हन्तुम्' / 'hantuM'

आज का श्लोक / 'हन्तुम्' / 'hantuM'
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'हन्तुम्' / 'hantuM' - मारने के लिए ( 'हन्' + 'तुमुन् प्रत्यय)
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अध्याय 1, श्लोक 35,
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एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोsपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥
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(एताम् न हन्तुम् इच्छामि घ्नतः अपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किम्  नु महीकृते ॥)
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भावार्थ :
हे मधुसूदन ! धरती ही क्या, तीनों लोकों का राज्य भी मुझे मिलता हो तो भी मैं इन्हें मारना नहीं चाहता भले ही मैं स्वयं ही क्यों न मारा जाऊँ !
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अध्याय 1, श्लोक 37,
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तस्मान्नार्हा  वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधवः ॥
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(तस्मात् न अर्हाः वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान् स्वबान्धवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधवः ॥)
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भावार्थ :
अतएव हमारे लिए यह उचित नहीं कि हम अपने स्वबन्धुओं, इन धृतराष्ट्रपुत्रों को मारें । हे माधव ! अपने ही स्वजनों को मारकर हम कैसे सुखी होंगे?
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अध्याय 1, श्लोक 45,
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अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥
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(अहो बत महत् पापं कर्तुम्  व्यवसिताः वयम् ।
यत् राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनम् उद्यताः ॥)
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भावार्थ :
अहो खेद की बात है कि राज्यसुख के लोभ से ग्रस्त होकर हम, अपने ही स्वजनों को मारने के कार्य में संलग्न होने हेतु उद्यत हो उठे हैं !
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'हन्तुम्' / 'hantuM' - to kill,
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Chapter 1, shloka 35,
etAnna hantumichchhAmi
ghnato'pi madhusUdana |
api trailokyarAjyasya
hetoH kiM nu mahI kRute ||
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Meaning :
O madhusUdana! Neither for the Lordship of the whole Earth, nor even for the three worlds, I would like to kill them, even if they kill me.
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Chapter 1, shloka 37,
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tasmAnnArhA vayaM hantuM
dhArtarAShTrAnswabAndhavAn
swajanaM hi kathaM hatvA
sukhinaH syAma mAdhava ||
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Meaning :
Therefore, it is not right to kill the sons of dhRtarAShTra, our own kin and relatives, for how can we hope happiness by killing our own people? O Madhava?
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Chapter 1, shloka 45,
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aho bat mahatpApaM
kartuM vyavasitA vayaM |
yadrAjyasukhalobhena
hantuM swajanamudyatAH ||
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Meaning :
Alas ! It is strange! Driven by the longing for the power of kingship and royal luxuries, we are bent on committing such a great sin, of killing our own brethren and kin!
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