Thursday, February 13, 2014

आज का श्लोक, 'स्वाध्यायाभ्यसनम्' / 'swAdhyAyAbhyasanaM'

आज का श्लोक, 'स्वाध्यायाभ्यसनम्' / 'swAdhyAyAbhyasanaM'
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'स्वाध्यायाभ्यसनम्' / 'swAdhyAyAbhyasanaM' -
('स्व+अधि+अयनं ' -
'स्व' अर्थात् 'मैं', 'अहं', जिस शब्द को हमारे यथार्थ तत्व और आभासी परिचय दोनों के लिए प्रयुक्त किया जाता है।
'अधि' अर्थात् जो पूर्व से विद्यमान है।
'अयनं' अर्थात् 'की दिशा में जाना' / 'अनुसन्धान'
इसलिए स्वाध्याय का तात्पर्य हुआ 'आत्मानुसंधान' जिसे बोलचाल के शब्दों में कहेंगे :
'मैं कौन (हूँ)?' इस बारे में जिज्ञासा होना  / जानना समझना ।
'अभ्यसनम्' -
'अभि' अर्थात् 'भलीभाँति', सुचारु रूप से।
'असनं' = 'अस्' धातु, + 'शानच्' प्रत्यय , अर्थात 'में स्थित रहना'  ।
इस प्रकार 'स्वाध्यायाभ्यसनम्' का अर्थ हुआ :
  'आत्मानुसंधान' करना और 'आत्मा' के सम्यक् स्वरूप में निमग्न रहना ।
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अध्याय 17, श्लोक 15,
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अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनम् चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥
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(अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्याय-अभ्यसनम् च एव वाङ्मयं तप उच्यते ॥)
भावार्थ :
वाणी के स्तर पर किए जानेवाले 'तप' के अंतर्गत अपनी वाणी को ऐसा रखना जो किसी के लिए उद्वेगकारी न हो, जिसमें मिथ्यावचन न कहे जाएँ, जो सबके लिए हितकारी तथा प्रिय हो, तथा जिसमें आत्म-जिज्ञासा संबंधी ग्रंथों का पठन -पाठन एवं चिंतन-मनन आदि होता हो ।
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'स्वाध्यायाभ्यसनम्' / 'swAdhyAyAbhyasanaM' -
'Self-Enquiry', 'Self-knowledge' 'Self-Realization' and 'Self-abidance'.
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Chapter 17, shloka 15,
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anudvegakaraM vAkyaM
satyaM priyahitaM cha yat |
swAdhyAyAbhyasanaM chaiva
vAngamayaM tapa uchyate ||
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Meaning :
The austerities of words spoken or thought, that one should observe include speaking truth, speaking what does not cause distress to oneself as well as to others, which are helpful to all and soothing. And of the words of scriptures, that one need to study, contemplate and meditate upon. Repetition and chanting of the Mantras that makes the mind pure and full of devotion .
                             

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