Monday, February 3, 2014

आज का श्लोक / ’हर्षामर्शभयोद्वेगैः /'harShAmarshabhayodvegaiH'

आज का श्लोक /
’हर्षामर्शभयोद्वेगैः /'harShAmarshabhayodvegaiH'
________________________

अध्याय 12,  श्लोक 15,
--
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।
हर्षामर्शभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥
--
(यस्मात् न य्द्विजते लोको लोकात् न उद्विजते च यः ।
हर्ष-अमर्श-भय-उद्वेगैः मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥)
भावार्थ :
जिससे न तो संसार को उद्वेग होता है, और न संसार ही जिसे उद्विग्न कर पाता है, जो हर्ष, क्षोभ, भय तथा उद्वेग से रहित है ऐसा मनुष्य मेरा प्रिय होता है .।
--
Chapter 12, shloka 15,
--
’हर्षामर्शभयोद्वेगैः /'harShAmarshabhayodvegaiH'
With Elation, anger, fear and anxiety.
--
yasmānnodvijate loko
lokānnodvijate ca yaḥ |
harṣāmarṣabhayodvegair-
mukto yaḥ sa ca me priyaḥ ||
--
(yasmāt na udvijate lokaḥ
lokāt na udvijate ca yaḥ |
harṣa-amarṣa-bhaya-udvegaiḥ
muktaḥ yaḥ ca saḥ me priyaḥ ||)
--

--
Meaning :
One who does not annoy the world, nor is annoyed by the world, who is free from Elation, anger, fear and anxiety, is dear to Me.
--

No comments:

Post a Comment