Thursday, February 20, 2014

आज का श्लोक, ’स्वयम्’ / 'swayaM'

आज का श्लोक, ’स्वयम्’ / 'swayaM'
--
’स्वयम्’ / 'swayaM' - स्वयं,
*
अध्याय 4, श्लोक 38,
--
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
त्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥
(न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।
तत् स्वयम् योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥)
भावार्थ :
इसमें सन्देह नहीं, कि जिसे मनुष्य सदा ही योगाभ्यास की पूर्णता में स्वयं अपनी ही आत्मा मे  पा लिया करता है, उस ज्ञान जैसा पावनकारी और दूसरा कुछ इस संसार में नहीं है ।
--
अध्याय 10, श्लोक 13,
--
आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा ।
असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ॥
(आहुः त्वाम् ऋषयः सर्वे देवर्षिः नारदः तथा ।
असितः देवलः व्यासः स्वयं च एव ब्रवीषि मे ॥)
--
(जैसा कि) आपके बारे में सभी ऋषि, असित, देवल,  व्यास, आदि सभी ऋषिगण, देवर्षि नारद, तथा  स्वयं आप भी कहते हैं ।
--
अध्याय 10, श्लोक 15,
--
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥
(स्वयम् एव आत्मना आत्मानम् वेत्थ त्वम् पुरुषोत्तम ।
 भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते  ॥)
--
भावार्थ :
हे भूतों को उत्पन्न करनेवाले, भूतों के ईश्वर, देवाधिदेव, जगत्स्वामी! आप स्वयं ही अपने-आपको अपने ही से जानते हैं ।
--    
अध्याय 18, श्लोक 75,
--
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् ।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्
--
(व्यास-प्रसादात् श्रुतवान्-एतत्-गुह्यम्-अहम् परम् ।
योगं योगेश्वरात्-कृष्णात्-साक्षात्-कथयतः स्वयम् ॥)
--
स्वयं योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन के प्रति कहे जाते हुए इस परम गोपनीय योग को महर्षि श्री व्यासजी के अनुग्रह से (दिव्य-दृष्टि पाकर) मैंने स्वयं प्रत्यक्ष सुना ।
--
’स्वयम्’ / 'swayaM' - oneself, myself, Himself, herself, yourself , themselves.   
--
Chapter 4, shloka 38,
--
na hi jnAnena sadRshaM
pavitramiha vidyate |
tatswayaM yogasaMsiddhaH
kAlenAtmani vindate ||
Meaning:
Here in the whole world, there is nothing else as much powerful as the wisdom, that purifies the mind. Over the passage of time, this wisdom is revealed to one, who has pursued over this path of Yoga earnestly and sincerely.
--

Chapter 10, shloka 13,
--
AhustvAMRuShayaH sarve
devarShirnAradastathA |
asito devalo vyAso
swayaM chaiva bravIShi me ||
--
Thus the seers call you, the divine sage nArada, and the other sages such as asita, devala, and The Great sage vyAsa also. And You Yourself also tell me the same.
--
Chapter 10, shloka 15,
--
swayaM-evAtmanAtmAnaM
vettha twaM puruShottama |
bhUtabhAvana bhUtesha
devadeva jagatpate ||
--
O Greatest of all individuals, O Lord of all creatures, O Lord of all Gods, O Lord of the entire universe! You alone know Yourself through Your own Intelligence, which is again but Your own inherent essential potency only.
--

Chapter 18, shloka 75,
--
vyAsaprasAdAchchhrutavAn-
etad-guhyamahaM paraM |
yogaM yogeshvarAtkRShNAt-
sAkShAtkathayataH swayaM  ||
--
By the mercy of vyAsa, Having acquired the divine vision , I have heard these most confidential talks directly from the Lord of all yoga, shrIkRiShNa. And I myself before my own eyes, saw Him Himself imparting this to Arjuna.
--


No comments:

Post a Comment