Monday, February 24, 2014

आज का श्लोक, ’हुतम्’ / 'hutaM'

आज का श्लोक, ’हुतम्’ / 'hutaM
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’हुतम्’ / 'hutaM'  - हवन में अर्पित की गई सामग्री, हव्य ।
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अध्याय 4, श्लोक 24,
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ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥
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(ब्रह्म-अर्पणं ब्रह्म-हविः ब्रह्म-अग्नौ ब्रह्मणा हुतम्
ब्रह्म एव तेन गन्तव्यं ब्रह्म-कर्म-समाधिना ॥)
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भावार्थ :
ब्रह्म को जाननेवाले की दृष्टि में यज्ञ में किया जानेवाला हवन, हवन में अर्पित हव्य, यज्ञाग्नि, सभी ब्रह्म हैं । वह भी ब्रह्म ही है जिसके द्वारा यज्ञ का अनुष्ठान किया जाता है । और इस प्रकार के ब्रह्मकर्म के अनुष्ठान से ब्रह्मकर्मरूपी समाधि के द्वारा उसे ब्रह्म की ही प्राप्ति होती है ।
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अध्याय 9, श्लोक 16,
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अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् ।
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्
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(अहम् क्रतुः अहं यज्ञः स्वधा-अहम् अहम्-औषधम् ।
मन्त्रः अहम् एव आज्यम् अहम् अग्निः अहम् हुतम् ॥)
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भावार्थ :
मैं ही क्रतु (विष्णु, इच्छा, कर्म, यज्ञ, शक्ति, वेदविहित कर्म-विशेष तथा दस प्रजापतियों में से एक), यज्ञ, स्वधा  (पितरों को अर्पित किया जानेवाला द्रव्य ), तथा ओषधि हूँ । मन्त्र भी मैं ही, (जिसका हवन किया जाता है, या जो दीपक में जलता है, वह ) घृत भी मैं हूँ । मैं ही अग्नि तथा मैं ही हवन में अर्पित की जानेवाली आहुति / हवन-रूपी क्रिया हूँ ।
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अध्याय 17, श्लोक 28,
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अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
असदित्युच्यते पार्थ न तत्प्रेत्य नो इह ॥
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भावार्थ :
श्रद्धारहित जो हवन, दान, तप,किया जाता है, उसे असत् तप कहा जाता है, वह न तो इस लोक में सुख देता है, न परलोक में ।
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’हुतम्’ / 'hutaM' - The offerings made into the sacrificial Fire (yajna)
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Chapter 4, shloka 24,
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brahmArpaNaM brahmahavir-
brahmAgnau brahmaNA hutaM |
brahmaiva tena gantavyaM
brahmakarmasamAdhinA ||
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Meaning : One who knows 'brahman' /Supreme Reality, sees Him everywhere, in the Fire, in the offerings, in the oblation, in the goal and within himself also.
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Chapter 9, shloka 16,
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ahaM kraturahaM yajnaH
swadhAhamahamauShadhaM |
mantro'hamahamevAjya-
mahamagnirahaM hutaM ||
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Meaning :
I am the vedika-ritual and vedika-sacrifice, I am swadhA ( the offerings made to ancestors), I am the herbs and other substances that heal, I am the sacred chants, I am alone the clarified butter (offered into fire during a yajna, or even for lighting a lamp.) and I am the offerings
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Chapter 17, shloka 28,
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ashraddhayA hutaM dattaM
tapastaptaM kRtaM cha yat |
asadityuchyate pArtha
na tatpretya no iha ||
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Meaning :
Sacrifice, charity or austerity without faith in such action is worth-less, For it yields neither the happiness in this world nor here-after in another.
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