Sunday, March 2, 2014

आज का श्लोक, ’स्मृतिः’ / 'smRtiH'

आज का श्लोक  ’स्मृतिः’ / 'smRtiH' 
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’स्मृतिः’ / 'smRtiH' - स्मृति, स्मरण, याद,
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अध्याय 10 श्लोक 34,
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मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् ।
कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥
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(मृत्युः सर्वहरः च अहम् उद्भवः च भविष्यताम् ।
कीर्तिः श्रीः वाक् च नारीणां स्मृतिः मेधा धृतिः क्षमा ॥)
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भावार्थ :
मैं मृत्यु हूँ जो सब-कुछ अर्थात् प्राणों और जीवन को भी हर लेती है, तथा मैं उद्भव हूँ  जो उत्पन्न होनेवालों की उत्पत्ति का हेतु हूँ । तथा कीर्ति, श्री,  वाक्, स्मृति धृति, तथा क्षमा अदि के स्त्रीवाचक रूपों में जिसे जाना जाता है, वह भी मैं हूँ ।
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अध्याय 15, श्लोक 15,
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सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं  च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
वेदान्तकृद्वेदविदेवचाहम्  ॥
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भावार्थ :
'मैं' सबके हृदय में  चेतना के रूप में सदा अवस्थित हूँ । मुझसे ही प्राणिमात्र में स्मृति, ज्ञान एवं उनका उद्गम और विलोपन होता रहता है ।  पुनः समस्त वेदों में एकमात्र मुझे ही जानने योग्य कहा गया है । वेदान्त का प्रणेता, वेदार्थ का कर्ता और वेद को समझनेवाला भी मैं ही हूँ।
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(टिप्पणी :
भावार्थ :
मैं ही सभी प्राणियों के हृदय में अन्तर्यामी रूप से विद्यमान हूँ तथा मुझ से ही स्मृति, ज्ञान, अप-ऊहन अर्थात् विवेकबुद्धि से मिथ्या का निरसन आदि वृत्तियाँ / हृदय में जागृत होती हैं । जानने के लिए वेद जिस एकमात्र जानने योग्य तत्व का वर्णन वेद करते हैं और सभी वेदों के माध्यम से जिसे जानने का यत्न किया जाता है, वह मैं ही हूँ और वेदों का कर्ता (स्रष्टा) एवं वेदों को जाननेवाला (चैतन्य) भी मैं ही हूँ ।)
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अध्याय 18 श्लोक 73,
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अर्जुन उवाच :
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्ध्वा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥
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(नष्टः मोहः स्मृतिः लब्ध्वा त्वत्-प्रसादात् मया अच्युत ।
स्थितः अस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥)
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भावार्थ :
अर्जुन ने कहा :
हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह (जिसने मेरी स्मृति को आवरित कर रखा था) नष्ट हो गया है, और उस स्मृति को पाकर मेरे संशय विलीन हो गए हैं और मैं पुनः आत्मा में अवस्थित (स्थितधी)* हो गया हूँ ।
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(* देखिए, 2/54, 2/56)
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’स्मृतिः’ / 'smRtiH' - memory that is acquired and forgotten, and also the memory of the spontaneous knowledge of the all-pervading 'Self'' which is to be discovered as is the case used in a following verse (shloka 73 of chapter 18).
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Chapter 10, shloka 34,
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mRtyuH sarvaharashchAhaM
udbhavashcha bhaviShyatAm |
kIrtiH shrIrvAkcha nArINAM
smRtirmedhA dhRtirkShamAH ||
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Meaning :
I am the Death that takes away every-thing, and I am the cause of all that would manifest. Glory, Opulence and affluence, the sound primordial, the memory, the Intelligence, the stamina and the potential, - the feminine aspects (of the brahman).
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Chapter 15, shloka 15,
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sarvasya chAhaM hRdi sanniviShTo
mattaH smRtirjnAnamapohanaM cha |
vedaishcha sarvairahameva vedyo
vedAntakRdvedavideva chAhaM ||
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I am seated in the Hearts of all being. I am the source of memory, knowledge and forgetfulness also. I am the principle all the Vedas speak of, and is learnt from. Alone I am the author and the knower of the vedas.
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Chapter 18, shloka 73,
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arjuna uvAcha :

naShTo mohaH smRitirlabdhvA
tvatprasAdAnmayAnagha |
sthito'smi gatasandehaH
kariShye vachanaM tava ||
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Meaning :
arjuna said : O Infallible One (shrikrRShNa), My illusion is now removed. And by your Grace, I have recollected my composure (and remembered again the truth of my Real being). My my doubts are cleared away and I am firmly stabilized in Wisdom. And shall act accordingly as you instruct me to do.
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