Thursday, March 6, 2014

आज का श्लोक, 'स्थिरम्' / 'sthiraM'

आज का श्लोक, 'स्थिरम्' / 'sthiraM'
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'स्थिरम्' / 'sthiraM' - स्थिर, अचल, दृढ,
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अध्याय  6, श्लोक 11,
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शुचौ देशे प्रतिष्ठाय स्थिरमासनमात्मनः ।
नात्युछ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥
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(शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरम्-आसनम्-आत्मनः ।
न-अत्युच्छ्रितम् न-अतिनीचम् चैल-अजिन-कुशोत्तरम् ॥)
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(टिप्पणी : अति-उत्-श्रितम्, चैल-अजिन)
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भावार्थ :
(ध्यान-योग के अभ्यास हेतु) स्वच्छ स्थान पर स्थिरता से बैठने का अपना आसन, कपड़े पर मृग-छाले, और उस पर कुश बिछाकर ऐसा बनाये, जो न तो बहुत ऊँचा हो, न अति नीचा हो, अर्थात् जिस पर सुखपूर्वक बैठा जा सके ।
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अध्याय 12, श्लोक 9,
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अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ॥
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(अथ चित्तम् समाधातुम् न शक्नोषि मयि स्थिरम्
अभ्यासयोगेन ततो माम्-इच्छ-आप्तुम् धनञ्जय ॥)
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(टिप्पणी : सं + आ+ धातुम् = समाधातुम् , आधार में सुचारु रूपेण आश्रय लेना)  
भावार्थ :
हे धनञ्जय (अर्जुन)! और यदि तुम चित्त को मुझमें समाहित कर वहीं दृढतापूर्वक स्थिर नहीं कर सकते, तो अभ्यासयोग के सहारे मुझे प्राप्त करने की इच्छा करो ।
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'स्थिरम्' / 'sthiraM' - stable, well-placed, fixed, steady, settled, / convenient, comfortable and stable,
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Chapter 6, shloka 11,
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shuchau deshe pratiShThApya
sthiramAsanAtmanaH |
nAtyuchchhritaM nAtinIchaM
chailAjinakushottaraM ||
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(For practicing dhyAna-yoga, -meditation), one should select a clean, serene place and by means of putting cloth and deer-skin upon kusha-grass, prepare a comfortable and stable seat for sitting.
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Chapter 12, shloka 9,
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atha chittaM samAdhAtuM
na shaknoShi mayi sthiraM |
abhyAsayogena tato
mAmichChhAptuM dhananjaya ||
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Meaning :
And, if you find it difficult to fix your attention rooted firmly in Me, then try to attain Me devotedly, by way of practicing yoga. (abhyAsa-yoga).
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